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बुधवार, 28 नवंबर 2018

सहज समाधि भली-(प्रवचन-21)

इक्कीसवां समापन प्रवचन

सहजै सहजै सब गया

दिनांक 08 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

ओशो, आपने इस प्रवचनमाला का आरंभ संत कबीर के पदः सहज समाधि भली के विशद उदघाटन से शुरू किया था। इसलिए इस समापन के दिन हम आपसे प्रार्थना करेंगे कि कबीर के कुछ और पदों का अभिप्राय हमें समझाएंः
सहज सहज सब कोइ कहै, सहज न चीन्है कोइ।
जा सहजै साहब मिलै, सहज कहावै सोइ।।
सहजै सहजै सब गया, सुत वित काम निकाम।
एकमेक ह्वै मिली रह्या, दास कबीरा नाम।।
जो कछु आवै सहज में, सोइ मीठा जान।
कडुवा लागै नीम-सा, जामें ऐंचातान।
सहज मिलै सो दूध सम, मांगा मिलै सो पानि।
कह कबीर वह रक्त सम, जामें ऐंचातानि।।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-20)

बीसवां प्रवचन

साक्षित्व, समय-शून्यता और मन की मृत्यु

दिनांक 08 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

कहते हैं कि एक वृद्ध स्त्री थी भगवान बुद्ध के समय में। वह बुद्ध के ही गांव में जन्मी थी और उनके जन्म-दिन पर ही।
 लेकिन वह सदा ही बुद्ध के सामने आने से डरती रही तभी से जब कि वह छोटी सी थी। युवा हो गई, फिर भी डरती रही। और वृद्ध हो गई, फिर भी।
 लोग उसे समझाते भी कि बुद्ध परम पवित्र हैं, साधु हैं, सिद्ध हैं। उनसे भय का कोई भी कारण नहीं। उनका दर्शन मंगलदायी है, वरदान-स्वरूप है। लेकिन उस वृद्धा की कुछ भी समझ में नहीं आता। यदि वह कभी भूल से बुद्ध की राह में पड़ भी जाती थी, तो भाग खड़ी होती। अव्वल तो बुद्ध गांव में होते, तो वह किसी और गांव चली जाती।
 लेकिन एक दिन कुछ भूल हो गई। वह कुछ अपनी धुन में डूबी राह से गुजरती थी कि अचानक बुद्ध सामने पड़ गए। भागने का समय ही नहीं मिला। और फिर वह बुद्ध को सामने ही पा इतनी भयभीत हो गई कि पैरों ने भागने से जवाब दे दिया।

 उसे तो लगा कि जैसे उसकी मृत्यु ही सामने आ गई है।
 भाग तो वह न सकी, पर आंखे उसने जरूर बंद कर लीं।
 पर यह क्या--! बंद आंखों में भी बुद्ध दिखाई पड़ रहे हैं! और गैरिक वस्त्रों में स्वर्ण सा दीप्त उनका चेहरा सामने है।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-19)

उन्नीसवां प्रवचन

दायित्व की गरिमा और आत्म-सृजन के लिए विद्रोह

दिनांक 08 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक बादशाह को ख्याल था कि उसने जो जाना और माना है, वह सब सही है। एक अर्थ में वह न्यायप्रिय भी था। उसकी तीन बेटियां थी।
एक दिन राजा ने अपनी सभी बेटियों को बुला कर कहाः मेरी सारी संपदा तुम्हारी होने वाली है। मुझसे ही तुम्हें जीवन मिला और मेरी इच्छा से ही तुम्हारा भविष्य और भाग्य निर्मित होगा।
दो राजकुमारियों ने तो यह बात मान ली; लेकिन तीसरी ने कहाः यद्यपि स्थिति का तकाजा है कि मैं कानून का पालन करूं, तो भी यह नहीं मान सकती कि मेरा भाग्य आपकी मरजी से बनेगा।

हम देखेंगे, यह कह कर राजा ने बागी बेटी को कैद में डाल दिया, जहां वह वर्षों कष्ट झेलती रही। इस बीच उसके हिस्से का धन भी बादशाह और वफादार बेटियों ने मिल कर खर्च कर दिया। और तब बादशाह ने स्वयं कहाः यह लड़की अपनी नहीं, मेरी मरजी से कैद काट रही है। इससे स्पष्ट है कि मेरी इच्छा ही उसकी नियति है।
और प्रजा भी राजा की राय से राजी थी।
बीच-बीच में राजा ने बंदी बेटी से अपनी मनवाने के बहुत उपाय किये, लेकिन सारी यातनाओं के बावजूद राजकुमारी ने विचार नहीं बदला। अंत में राजा ने राज्य के बाहर एक डरावने जंगल में उसको छुड़वा दिया, जहां हिंस्र पशुओं के साथ-साथ ऐसे खतरनाक आदमी भी थे, जिन्हें राज्य देश-निकाले की सजा दिया करता था।
 लेकिन जंगल में पहुंच कर राजकुमारी ने पाया कि गुफा घर है और पेड़ों के फल सोने के थाल वाले फलों जैसे ही हैं। फिर उस जंगल की आजाद जिंदगी का क्या कहना! और उस कुदरती राज्य में कोई भी तो उसके राजा-पिता की आज्ञा नहीं मानता था।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-18)

अठारहवां प्रवचन

आत्मिक विस्फोट की पात्रता

दिनांक 07 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

झेन साधक बनजान बाजार से गुजर रहा था। एक कसाई और एक ग्राहक की बातचीत उसके कानों में पड़ी।
ग्राहक ने कहाः मुझे सर्वश्रेष्ठ मांस का टुकड़ा ही देना।
कसाई बोलाः मेरी दुकान में सब कुछ सर्वश्रेष्ठ ही है। यहां कुछ भी नहीं है, जो सर्वश्रेष्ठ नहीं।
बस, इतना सुन कर बनजान ज्ञान को उनलब्ध हो गया।
ओशो, कृपा कर इस कथा का मर्म हमें बताएं।


परम ज्ञान की घटना किसी भी क्षण घट सकती है। कहावत है कि एक छोटा सा तिनका भी उंट को बिठा सकता है; लेकिन वह आखिरी तिनका होना चाहिए। ऊंट पर वजन को रखते जाओ, रखते जाओ, सहता जाएगा, एक सीमा तक। फिर आखिरी तिनका भी उसे बिठा देगा, जब वजन सीमा के पार हो जाएगा। बरतन में पानी को भरते जाओ, भरते जाओ, फिर एक सीमा है, उसके बाद एक बूंद भी ज्यादा, बरतन में न समा सकेगी। फिर एक बूंद भी बरतन के बाहर पानी को ले जाएगी। आखिरी बूंद आखिरी तिनका क्रांतिकारी सिद्ध होता है।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-17)

सत्रहवां प्रवचन

अहंकार के तीन रूप--शिकायत, उदासी और प्रसन्नता

दिनांक 06 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक बार राबिया बीमार थी।
सहानुभूति में दो फकीर देखने आए। एक थे हसन और दूसरे मलिक।
हसन ने कहाः राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।
फिर मलिक बोलेः राबिया, फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं, बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी मानता है।
राबिया थोड़ी देर चुप रही।
फिर वह बोलीः मुझे माफ करना; लेकिन जब मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो फिर कैसी शिकायत? क्या सहना? और किसकी खुशी?
ओशो, तीन फकीरों की इस परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-16)

सोलहवां प्रवचन

ब्राह्मणत्व का निखार--प्रामाणिकता की आग में

दिनांक ५ अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक किशोर, ऋषि हरिद्रुमत गौतम के आश्रम में पहुंचा था। वह सत्य को जानना चाहता था। ब्रह्म के लिए उसकी जिज्ञासा थी। उसने ऋषि के चरणों में सिर रख कर कहा थाः ‘आचार्य, मैं सत्य को खोजने आया हूं। मुझ पर अनुकंपा करें और ब्रह्म-विद्या दें। मैं अंधा हूं और आंखें चाहता हूं।’
उस किशोर का नाम था--सत्यकाम।
ऋषि ने उससे पूछाः ‘वत्स, तेरा गोत्र क्या है? तेरे पिता कौन हैं? उनका नाम क्या है?’
उस किशोर को अपने पिता का कोई ज्ञान न था, न ही गोत्र का पता था। वह अपनी मां के पास गया और उससे पूछ कर लौटा। और उसकी मां ने उससे जो कहा, उसने जाकर ऋषि को कहा।

वह बोलाः ‘भगवन, मुझे अपने गोत्र का ज्ञान नहीं है। न ही मैं अपने पिता को जानता हूं। मेरी मां को भी मेरे पिता का ज्ञान नहीं है। उससे मैंने पूछा तो उसने कहा कि युवावस्था में वह अनेक भद्र पुरुषों के साथ रमती और उन्हें प्रसन्न करती रही। उसे पता नहीं है कि मैं किससे जन्मा हूं। मेरी मां का नाम जाबाली है। इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूं। ऐसा ही आपसे बताने को भी उसने कहा है।’

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

सहज समाधि भली-(प्रवचन-15)

पंद्रहवां प्रवचन

बुद्धपुरुष अर्थात जीवित मंदिर--मौन का

दिनांक 04 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक झेन गुरु थे--सोइची। जिस दिन से सोइची ने तोफुकु के मंदिर में शिक्षण देना शुरू किया, उसी दिन से मंदिर का रूपांतरण हो गया।
दिन आता, दिन जाता; रात आती, रात जाती; लेकिन तोफुकु का मंदिर सदा मौन ही खड़ा रहता। मंदिर एक गहन सन्नाटा ही हो गया। कहीं से कोई आवाज न उठती थी। सोइची ने सूत्रों का पाठ भी बंद करा दिया। यहां तक कि मंदिर के घंटे भी सदा सोए हुए रहते; क्योंकि सोइची के शिष्यों को सिवाय ध्यान के और कुछ नहीं करना था।
फिर बरसों तक ऐसा ही रहा। लोग भूल ही गए कि पड़ोस में मंदिर है। और सैकड़ों संन्यासी थे वहां; आत्मज्ञान के दीये जलते थे; और समाधि के फूल खिलते थे।

और अचानक एक दिन लोगों ने सुना कि मंदिर के घंटे बज रहे हैं और शास्त्रों के सूत्र पढ़े जा रहे हैं। लोग भागे मंदिर की तरफ। सोइची ने संसार छोड़ दिया था। उसके शव पर ही सूत्र पढ़े जा रहे थे, घंटे बज रहे थे।
ओशो, इस कथा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-14)

चौदहवां प्रवचन

एक साधे सब सधै

दिनांक 3 अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

याज्ञवल्क्य ने अपनी मित्र-स्त्री मैत्रेयी से कहाः ‘देखो, मैं गृहस्थाश्रम में ही पड़े रहना नहीं चाहता, मैं ऊपर उठना चाहता हूं। आओ, कात्यायिनी के साथ तुम्हारा निपटारा करा दूं।’
मैत्रेयी ने कहाः ‘भगवन, अगर यह सारी पृथ्वी वित्त से पूर्ण होकर मेरी हो जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो जाऊंगी?’
याज्ञवल्क्य ने कहाः ‘उस अवस्था में जैसे साधन-संपन्न लोग चैन से जीवन-निर्वाह करते हैं, वैसा तुम्हारा जीवन होगा। धन-धान्य से अमरता पाने की आशा नहीं हो सकती।’
मैत्रेयी ने कहाः ‘जिससे मैं अमर न हो सकूं, उसे लेकर मैं क्या करूंगी? भगवन, अमर होने का जो रहस्य आप जानते हों, उसका मुझे उपदेश कीजिए।’
याज्ञवल्क्य ने कहाः ‘तू तो मेरी प्रिय है, और बड़ा प्रिय वचन बोल रही है। आ, बैठ, तुझे मैं सब खोल कर समझाता हूं। ज्यों-ज्यों मैं बोलता जाऊं, मेरी बात ध्यान देकर सुनते जाना।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-13)

तेरहवां प्रवचन

आत्मघाती संदेह और आस्था का अमृत

दिनांक २ अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा: 

नूरी बे अलबानिया का निवासी था--विचारवान और प्रतिष्ठित। अपने से बहुत छोटी उम्र की युवती से उसने विवाह किया।
एक संध्या वह समय से पहले घर लौटा, तो उसके वफादार नौकर ने आकर उसे कहाः ‘आपकी पत्नी, मेरी मालकिन, बहुत संदेहजनक ढंग से पेश आ रही हैं। उनके कमरे में एक बड़ा संदूक है--इतना बड़ा है कि एक आदमी उसमें समा जाए। पहले वह आपकी दादी के पास था और उसमें थोड़े से जड़ी के सामान थे। लेकिन अब उसमें शायद बहुत कुछ है। मैं आपका सबसे पुराना नौकर हूं, लेकिन मालकिन मुझे भी उस संदूक के भीतर झांकने नहीं देती हैं।’
नूरी बे अपनी पत्नी के कमरे में जा पहुंचा और देखा कि वह एक लकड़ी के संदूक के पास उदास बैठी है। ‘क्या मैं देख सकता हूं कि इस संदूक में क्या है?’ उसने पूछा।
पत्नी ने उत्तर दियाः ‘क्या एक नौकर के संदेह के कारण पूछते हो या इस कारण पूछते हो कि तुमको ही मुझ पर भरोसा नहीं रहा?’
नूरी बे ने कहाः ‘इन बातों में गए बगैर संदूक को खोलना क्या मुमकिन नहीं होगा?’
नहीं।’--पत्नी ने कहा।
‘क्या इसमें ताले लगे हैं?’

सहज समाधि भली-(प्रवचन-12)

बारहवां प्रवचन

विचार की बोतल और निर्विचार की मछली

दिनांक १ अगस्त, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

रीको ने एक बार अपने गुरु नानसेन से कहा कि बोतल वाली मछली की समस्या क्या है, कृपा कर मुझे समझा दें!
उसने कहाः ‘अगर कोई आदमी बोतल के भीतर मछली का एक बच्चा रख दे और बोतल के मुंह के द्वारा उसे भोजन देता रहे, तो मछली बढ़ते-बढ़ते इतनी बड़ी हो जाएगी कि बोतल के भीतर उसके बढ़ने की और जगह न रहेगी।
उस हालत में वह आदमी उस मछली को किस तरह बाहर निकाले कि मछली भी न मरे और बोतल भी न टूटे।
‘रीको!’ नानसेन चिल्लाया और जोर से उसने हाथों की ताली बजाई।
‘हां गुरुदेव!’ रीको चौंक कर बोला।
‘देखो,’ नानसेन ने कहाः ‘मछली बाहर निकल आई।’
ओशो, इस झेन पहेली को हमें भी समझाने की कृपा करें।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-11)

विचार नहीं--अनुभव ही नाव है

ग्यारहवां प्रवचन

दिनांक ३१ जुलाई, १९७४, प्रातः काल, श्री रजनीश आश्रम पूना,

कथा:

एक परंपरावादी दरवेश नैतिक प्रश्नों पर विचार करता हुआ नदी किनारे से जा रहा था। अचानक दूर से आती हुई "ऊ हू' की आवाज उसके कानों में पड़ी और उसकी विचार-धारा टूट गई। कहीं दूर कोई आदमी दरवेश-मंत्र का पाठ कर रहा था; लेकिन उच्चारण बहुत गलत था।
दरवेश ने सोचा कि एक जानकार के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं जाऊं और मंत्रपाठ की सही विधि उसे बता दूं। और वह नाव खेकर उस छोटे-से द्वीप पर पहुंचा, जहां एक दूसरा दरवेश अपने झोपड़े में सूत्र-पाठ कर रहा था। पास जाकर पहले दरवेश ने उसे सही पाठ बताया और दिल में नेक काम करने की खुशी भरकर अपनी नाव में लौट आया।
इस मंत्र की बड़ी महिमा थी और समझा जाता था कि इसके पाठ से आदमी पानी की लहरों पर भी चल सकता है। पहले दरवेश को, लेकिन इसका विश्वास भर था, अनुभव नहीं था।

दरवेश थोड़ी ही दूर गया होगा कि उसे मंत्र का गलत पाठ फिर सुनाई पड़ने लगा। और उस आदमी की भूल करने की जिद्द पर उसे क्रोध आया। तभी एक चकित करने वाला दृश्य सामने था। दूसरा दरवेश उसकी ओर भागा आ रहा था--पानी पर चलता हुआ। और पास आकर उसने कहा: "माफ करना भाई, शुद्ध मंत्रोच्चार की विधि एक बार फिर बताने की कृपा करो।'
ओशो, कृपापूर्वक इस बोध-कथा का मर्म हमें बताएं।

सोमवार, 26 नवंबर 2018

सहज समाधि भली-(प्रवचन-10)

दसवां प्रवचन

अनुग्रहपूर्ण रागशून्यता और मन का अतिक्रमण

दिनांक  30 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

सदगुरु जोशू ने एक बार अपने शिष्यों को यह चेतावनी दीः ‘जहां बुद्ध पुरुष हों वहां ज्यादा देर मत टिकना; और जहां बुद्ध पुरुष नहीं हों, वहां से तुरंत खिसक जाना।’ इसी महान गुरु ने दूसरी बार कहाः ‘यदि बुद्ध का नाम लेना तो पीछे ठीक से मुंह धो लेना।’
और यही जोशू प्रायः संध्या समय बुद्ध की प्रतिमा के सामने फूल चढ़ाते, सुगंध जलाते और सिर टेकते भी देख जाते थे।
ओशो, अंतर्विरोधों से भरे वचन और आचरण को स्पष्ट करने की कृपा करें।


अमृत भी अज्ञान में जहर बन सकता है। ज्ञानी जहर को भी अमृत बना लेता है। न तो अमृत में अमृत है और न जहर में जहर। ज्ञान या अज्ञान पर सब निर्भर करता है। जो जानते हैं, उनके लिए कारागृह भी मुक्त आकाश है; और जो नहीं जानते, उनके लिए मुक्त आकाश भी कारागृह है।
तुम कहां हो, यह सवाल नहीं है; तुम क्या हो, यही सवाल है। और तुम अगर अज्ञान से भरे हो, तो घर बदलने से कुछ भी न होगा। तुम जहां जाओगे, तुम्हारा कारागृह तुम्हारे साथ ही रहेगा।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन

जीवन-सूत्रः दर्पणवत, अव्याख्य, तथाता में जीना

दिनांक 29 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

कहीं एक मंदिर बन रहा था। तीन श्रमिक वहां धूप में बैठ कर पत्थर तोड़ रहे थे। एक राहगीर वहां से गुजर रहा था। बारी-बारी से उसने श्रमिकों से पूछाः ‘क्या कर रहे हो?’
एक से पूछा। वह बोलाः ‘पत्थर तोड़ रहा हूं।’ उसके कहने में बड़ी पीड़ा थी और स्वर भी भारी था।
दूसरे से पूछा। वह बोलाः ‘आजीविका कमा रहा हूं।’ वह दुखी तो नहीं था; लेकिन उसकी उदासी कम भारी नहीं थी।
अजनबी तब तीसरे श्रमिक के पास गया और उससे भी वही सवाल पूछा। वह व्यक्ति गीत गा रहा था, उसकी आंखों में चमक थी और वह आनंदमग्न था। गीत रोक कर उसने कहाः ‘मैं मंदिर बना रहा हूं।’ और फिर वह गीत गुनगुनाने लगा।
ओशो, जीवन और धर्म के संबंध में इशारे करने वाली अपनी इस प्रिय कहानी पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन

मिटना है द्वार--‘होने’ का

दिनांक 28 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक नदी दूर पहाड़ों से निकल कर यात्रा करती हुई, किसी मरुभूमि में जा फंसी। वहां उसकी धाराएं दहकते बालू में खोने लगीं। नदी घबड़ाई, क्योंकि उसकी जीवन-यात्रा ही समाप्त होने को आ गई।
तभी नेपथ्य से एक आवाज आईः ‘जैसे हवा रेगिस्तान पार करती है, वैसे ही नदी भी कर सकती है। बजाय इसके कि तुम बालू में सूख कर समाप्त हो जाओ, अच्छा होगा कि भाप बन कर तुम बन कर तुम भी हवा के साथ मरुस्थल के पार हो जाओ।’
यह सुन कर नदी बोलीः ‘हवा में घुल जाने पर मैं कैसे जानूंगी कि मैं ही हूं? मेरा तो रूप ही बदल जाएगा! फिर मेरी पहचान क्या रहेगी?’

नेपथ्य की आवाज ने कहाः ‘तुम्हारे स्वरूप को हवा सम्हाल लेगी और वर्षा के द्वारा उतार कर फिर तुम्हें नदी बना देगी।’
नदी ने वही किया। पहाड़ों पर फिर वर्षा हुई और फिर नदी नदी हो गई। और नदी सीख भी गई कि मेरा स्वरूप क्या है। नदी इधर सीखती रही और उधर बालू ने कहाः ‘हम जानते हैं, यही हम रोज होते देखते हैं; क्योंकि नदी-तट से पहाड़ों तक हम ही फैले हैं।’
इसलिए कहा जाता है कि ‘जीवन की नदी’ कैसे बहे, यह बात बालुओं में लिखी पड़ी है।
ओशो, कृपापूर्वक इस बोध-कथा का अर्थ समझाएं।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन

दुख-बोध से दुख-निरोध की ओर

दिनांक 27 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

ओशो, क्रांति-बीज में आपने कहा हैः
‘‘गौतम बुद्ध ने चार आर्य-सत्य कहे हैं--दुख, दुख का कारण, दुख-निरोध और दुख-निरोध का मार्ग। जीवन में दुख है। दुख का कारण है। इस दुख का निरोध भी हो सकता है। और दुख-निरोध का मार्ग है।’’
‘‘मैं पांचवां आर्य-सत्य भी देखता हूं। और यह पांचवां इन चारों के पूर्व है। वह न हो, तो ये चारों भी नहीं रह सकते हैं।
‘‘यह पांचवां या प्रथम आर्य-सत्य क्या है--वह है दुख के प्रति मूर्च्छा।’’
ओशो, इस पांचवें या प्रथम आर्य-सत्य की विशद व्याख्या करने की करुणा करें।


जो जानते हैं, उनके लिए यह जीवन दुख से ज्यादा नहीं है। जो नहीं जानते हैं, उनके लिए यह जीवन सुख की एक आशा है। जो नहीं जानते हैं, वे भी दुख भोगते हैं; लेकिन दुख को बिना देखे भोगते हैं। दुख भोगते हैं सुख की आशा में। और वही आशा उनकी आंखों पर धुंध बन जाती है।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन

समग्रता ही है मार्ग

दिनांक 26 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा: 

एक शिष्य ने गुरु उमोन से कहा, ‘बुद्ध का प्रकाश समस्त विश्व को प्रकाशित करता है; बुद्ध की प्रज्ञा सारे जगत को आलोकित करती है।’
लेकिन वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि गुरु ने कहा, ‘आह! क्या तुम किसी दूसरे की पंक्तियां नहीं दुहरा रहे हो?’
शिष्य झिझका, तो उमोन ने उसकी आंखों में ध्यान से देखा। घबड़ा कर शिष्य ने कहा, ‘हां।’
उमोन बोला, ‘तब तुम मार्गच्युत हो गए।’
कुछ समय बाद एक दूसरे गुरु शिशिन ने अपने शिष्यों से पूछा, ‘किस बिंदु पर उमोन का शिष्य मार्गच्युत हुआ था?’
ओशो, इस रहस्य भरी परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

बुद्ध के अंतिम शब्द, जो उन्होंने इस पृथ्वी पर कहे, वे सदा स्मरण रखने जैसे हैं। वे तीन छोटे से शब्द हैं--‘अप्प दीपो भव’--अपना दीया स्वयं ही बनो; खुद के प्रकाश स्वयं ही बनो; बी ए लाइट अनटु दाई सेल्फ।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन

उन्मुक्त जिज्ञासा, खुला हृदय और जीवन-रहस्य

कथा:

मरियम का बेटा जीसस एक दिन, अपने छुटपन में, तालाब के किनारे बैठ कर मिट्टी के पक्षी बना रहा था। दूसरे बच्चे, जो ऐसा नहीं कर सके, ईर्ष्या से भर कर अपने बड़े-बूढ़ों के पास जीसस की शिकायत ले गए। उस दिन शनिवार था; इसलिए बूढ़ों ने कहाः ‘सॅबथ के दिन ऐसा नहीं होने दिया जा सकता।’
फिर बड़े-बूढ़े तालाब पर पहुंच गए और उन्होंने जीसस से अपने पक्षी दिखाने की मांग की। जीसस ने अपने बनाए पक्षियों की ओर इशारा किया, और वे पक्षी उड़ गए।
बुजुर्गों में से एक बोलाः ‘उड़ने वाले पक्षी कोई कैसे बना सकता है; इसलिए सॅबथ का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।’
दूसरे ने कहाः ‘मैं यह कला सीखना चाहता हूं।’
और तीसरा बोलाः ‘यह कोई कला नहीं, सिर्फ धोखा है।’
फिर एक दिन एक लड़का जोसेफ बढ़ई के कारखाने में बैठा था। जब लकड़ी का एक तख्त छोटा पड़ गया, तब उसने उसे तान कर लम्बा कर दिया।

यह बात भी जब लोगों ने सुनी, तब कुछ ने कहाः ‘यह चमत्कार है, इसलिए यह लड़का संत होगा।’
कुछ दूसरों ने कहाः ‘इस पर हमें भरोसा नहीं आता, इसलिए दुबारा, तिबारा करो।’
और तीसरा दल बोलाः ‘यह कभी सच नहीं हो सकता; इस बात को किताब से अलग रखो।’

सहज समाधि भली-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन

साधक अर्थात सोया हुआ सिद्ध

दिनांक २४ जुलाई, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक शिष्य ने केम्बो से पूछाः ‘क्या सभी बुद्ध-पुरुष निर्वाण के एक ही मार्ग पर अग्रसर होते हैं और सभी युगों में?’
केम्बो ने अपनी छड़ी उठा कर हवा में शून्य की आकृति बनाते हुए कहाः ‘यह रहा वह मार्ग। यहीं से वह शुरू होता है।’
वह शिष्य फिर उमोन के पास गया और उनसे भी वही सवाल पूछा। दोपहरी थी और उमोन के हाथ में पंखा था। उसने सभी दिशाओं में पंखा हिला कर कहाः ‘वह मार्ग कहां नहीं है? उसका आरंभ कहां नहीं है?’
और फिर जब किसी ने ममोन से इसी घटना का राज पूछा, तब उसने कहाः ‘इसके पहले कि पहला कदम उठे, मंजिल आ जाती है। और इसके पूर्व कि जीभ हिले, वक्तव्य पूरा हो जाता है।’
ओशो, इस झेन परिचर्चा का अभिप्राय क्या है?


साधक और सिद्ध में रत्ती भर भी भेद नहीं है। भेद दिखाई पड़ रहा है--साधक की भ्रांति के कारण। साधक भी सिद्ध है; अभी उसे इसका पता नहीं चला है। सिद्ध भी साधक था, जब तक पता नहीं था। जैसे ही पता चला, सिद्ध हो गया। तो भेद आत्मा में नहीं है, सिर्फ प्रतीति में है। साधक भी सिद्ध है; सिर्फ उसे होश नहीं है; कौन है--इसका पता नहीं है।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन

सहज स्वभाव--लोभ और भय से मुक्त

दिनांक २३ जुलाई, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

मरियम के बेटे ईसा एक गांव से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ लोग राह के किनारे एक दीवाल पर बहुत संतापग्रस्त होकर मुंह लटकाए हुए बैठे हैं।
ईसा ने उनसे पूछाः ‘यह हालत कैसे हुई तुम्हारी?’
उन्होंने कहाः ‘नरक के भय से हम ऐसे हो रहे हैं।’
थोड़ा आगे बढ़ने पर ईसा ने कुछ और लोगों को देखा, जो राह के किनारे तरह-तरह के आसनों और मुद्राओं में बैठे हैं। और वे भी बहुत-बहुत उदास हैं।
ईसा ने उनसे भी पूछाः ‘तुम्हारी तकलीफ क्या है?’
उन्होंने कहाः ‘स्वर्ग की आकांक्षा ने हमें ऐसा बना दिया है।’
उसी गांव में ईसा और आगे बढ़े; फिर कुछ लोग उन्हें मिले। उन्हें देख कर लगा कि जीवन में उन्होंने बहुत-कुछ झेला है; लेकिन वे आनंद-मग्न हैं।
पूछने पर उन्होंने बतायाः ‘हमने हकीकत देख ली; इसलिए और मंजिलें भूल गईं।’
ओशो, इस सूफी कहानी का अभिप्राय क्या है?
जीवन जीने का ढंग तीन प्रकार का हो सकता है। या तो तुम भय के कारण जीओ, तब जीवन एक
दुख होगा--एक पीड़ा, एक संताप। वैसे जीवन में आनंद के फूल खिलने का कोई उपाय नहीं, वैसे जीवन में शांति भी संभव नहीं; भयभीत--कंपता ही रहेगा। संतुलन बनाना भी कठिन होगा। और भयभीत चाहेगा कि पैदा ही न हुआ होता, तो अच्छा था।

सहज समाधि भली-(प्रवचन-02)

स्वीकार की आग

दूसरा प्रवचन

दिनांक २२ जुलाई, १९७४; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

जोशू ने नानसेन से पूछाः ‘मार्ग कौन है?’
नानसेन ने कहाः ‘दैनंदिन जीवन ही मार्ग है।’
जोशू ने फिर पूछाः ‘क्या उसका अध्ययन हो सकता है?’
नानसेन ने कहाः ‘यदि अध्ययन करने की कोशिश की, तो तुम उससे दूर भटक जाओगे।’
जोशू ने फिर पूछाः ‘यदि मैं अध्ययन नहीं करूं, तो कैसे जानूंगा कि यह मार्ग है?’
नानसेन ने उत्तर में कहाः ‘मार्ग दृष्ट जगत का हिस्सा नहीं है; न ही वह अदृष्ट जगत का हिस्सा है। पहचान भ्रम है और गैर-पहचान व्यर्थ। अगर तुम असंदिग्ध होकर सच्चे मार्ग पर पहुंचना चाहते हो तो आकाश की तरह अपने को उसकी पूरी उन्मुक्तता में, पूरी स्वतंत्रता में छोड़ दो। और उसे न शुभ कहो और न अशुभ।’
कहते हैं कि ये शब्द सुन कर जोशू ज्ञान को उपलब्ध हो गया।
ओशो, कृपापूर्वक इस परिसंवाद का मर्म हमें समझाएं।

यह छोटी सी परिचर्चा--जोशू और नानसेन के बीच--जीवन को बदलने वाली हो सकती है। तुम्हारे जीवन में भी एक अंगार--इस परिचर्चा से पड़ सकता है। तुम भी भभक कर जल सकते हो। और अति कठिनाई होती है