दसवां-प्रवचन-(संन्यास परम सुहाग है)
दिनांक 20-01-1975, ओशो आश्रम पूना।सूत्र:
डगमग छाड़ि दे मन बौरा।अब तो जरें बनें बनि आवै, लीह्नों हाथ सिंधौरा।।
होई निसंक मगन ह्वै नाचै, लोभ मोह भ्रम छाड़ौ।
सूरो कहा मरन थें डरपै, सती न संचै भाड़ौ।।
लोक वेद कुल की मरजादा, इहै गलै मै पासी।
आधा चलि करि पीछा फिरिहैं, ह्वै ह्वै जग में हासी।।
यह संसार सकल है मैला, राम कहैं ते सूचा।
कहै कबीर नाव नहिं छाड़ौ, गिरत परत चढ़ि ऊंचा।।
कबीर के वचनों के पूर्व कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात..
मन न तो बीमार होता है और न तो स्वस्थ, चूंकि मन ही बीमारी है। मन कभी शांत नहीं होता। और, इसीलिए यह कहना भी व्यर्थ हैं कि मन कभी अशांत होता है। अशांति ही मन है।

