प्राणिमात्र
के लिए शांति—प्रवचन—सत्रहवां
ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 17
फरवरी, 1973
इसके
अतिरिक्त, उन पवित्र
अभिलेखों का
और क्या आशय, जो तुझसे यह
कहलवाते हैंः
"ॐ, मेरा
विश्वास है कि
सभी अर्हत
निर्वाण-मार्ग
के मधुर फल
नहीं चखते
हैं।
"ॐ, मेरा विश्वास
है कि सभी
बुद्ध
निर्वाण-धर्म
में प्रवेश नहीं
करते हैं। '
हां, आर्य-पथ पर
अब तू स्रोतापन्न
नहीं है, तू
एक बोधिसत्व
है। नदी पार
की जा चुकी
है। सच है कि
तू "धर्मकाया'
के वस्त्र
का अधिकारी हो
गया है, लेकिन
"संभोग काया' निर्वाणी से बड़ा है।
और उससे भी
बड़े हैं
"निर्माण कायावाले'--कारुणिक
बुद्ध
अब
ओ बोधिसत्व, अपना सिर
झुका और ठीक
से सुन। करुणा
स्वयं बोलती
हैः जब तक प्राणिमात्र
दुख में हैं, क्या तब तक
आनंद संभव है?
क्या तू
अकेला
सुरक्षित
होगा और सारा
संसार रोता
रहेगा?

