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गुरुवार, 12 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--17

प्राणिमात्र के लिए शांति—प्रवचन—सत्रहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 17 फरवरी, 1973

इसके अतिरिक्त, उन पवित्र अभिलेखों का और क्या आशय, जो तुझसे यह कहलवाते हैंः
", मेरा विश्वास है कि सभी अर्हत निर्वाण-मार्ग के मधुर फल नहीं चखते हैं।
", मेरा विश्वास है कि सभी बुद्ध निर्वाण-धर्म में प्रवेश नहीं करते हैं'
हां, आर्य-पथ पर अब तू स्रोतापन्न नहीं है, तू एक बोधिसत्व है। नदी पार की जा चुकी है। सच है कि तू "धर्मकाया' के वस्त्र का अधिकारी हो गया है, लेकिन "संभोग काया' निर्वाणी से बड़ा है। और उससे भी बड़े हैं "निर्माण कायावाले'--कारुणिक बुद्ध
अब ओ बोधिसत्व, अपना सिर झुका और ठीक से सुन। करुणा स्वयं बोलती हैः जब तक प्राणिमात्र दुख में हैं, क्या तब तक आनंद संभव है? क्या तू अकेला सुरक्षित होगा और सारा संसार रोता रहेगा?

बुधवार, 11 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--16

ऐसा है आर्य मार्ग—प्रवचन—सोलहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; प्रातः, 17 फरवरी, 1973

और यदि तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो क्या तुझे अपने भविष्य का पता है? आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य होगा, लेकिन मनुष्यों द्वारा न देखा जाएगा, और न उनका धन्यवाद ही तुझे मिलेगा। और अभिभावक-दुर्गभ भ को बनानेवाले अन्य अनगिनत पत्थरों के बीच तू भी एक पत्थर बन कर जीएगा। करुणा के अनेक गुरुओं के द्वारा निर्मित उनकी यातनाओं के सहारे ऊपर उठा और उनके रक्त से जुड़ा यह दुर्ग मनुष्य-जाति की रक्षा करता है। क्योंकि मनुष्य मनुष्य है, इसलिए यह उसे भारी विपदाओं और शोक से बचाता है।
साथ ही, चूंकि मनुष्य इसे नहीं देखता है, इसलिए वह न स्पर्श कर सकता है और न प्रज्ञा की वाणी को सुन सकता है क्योंकि वह जानता ही नहीं है।
लेकिन ओ जिज्ञासु, निर्दोष आत्मावाले तूने तो इसे सुना है और तू तो सब कुछ जानता है इसलिए तुझे निर्णय करना है, अतः एक बार फिर से सुन।

मंगलवार, 10 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--15

बोधिसत्व बन!—प्रवचन—पंद्रहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 16 फरवरी, 1973

हां, वह शक्तिशाली है। वह जीवंत शक्ति, जो उसमें मुक्त हुई है और जो शक्ति वह स्वयं है, माया के मंडप को देवताओं के भी ऊपर महान ब्रह्मा और इंद्र के ऊपर भी उठा सकती है। अब वह निश्चित ही अपने महा पुरस्कार को उपलब्ध करेगा।
क्या वह, जिसने महा माया को जीत लिया है, इन वरदानों को अपने ही विश्राम और आनंद के लिए, अपने ही सुअर्जित सुख और गौरव के लिए उपयोग नहीं करेगा?
नहीं, ओ निसर्ग के गुह्य-विद्या के साधक, यदि कोई पवित्र तथागत के चरण-चिह्नों पर चले तो वे वरदान और शक्तियां उसके लिए नहीं हैं।
क्या तू उस नदी को बांध देगा, से उसके मूल उद्गम को वापस भेज देगा?
यदि तू कठिन श्रम से उपलब्ध ज्ञान की उस स्रोतस्विनी को, स्वर्ग में जन्मी प्रज्ञा को प्रवाहमान रहने देना चाहता है, तो तुझे उसे एक ठहरा हुआ सरोवर बनने से बचाना होगा।

सोमवार, 9 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--14

तितिक्षा—प्रवचन—चौदहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 16 फरवरी, 1973

ध्यान-द्वार संगमरमर के कलश जैसा है--सफेद और पारदर्शी। उसके भीतर एक स्वर्णाग्नि जलती है, वह प्रज्ञा की शिखा है, जो आत्मा से निकलती है।
तू ही वह कलश है।
अब तूने अपने को इंद्रियों के विषयों से विच्छिन्न कर लिया है, तूने दर्शन-पथ तथा श्रवण-पथ की यात्रा कर ली है, और अब तू ज्ञान के प्रकाश में खड़ा है। अब तू तितिक्षा भी की अवस्था को उपलब्ध हो गया।
नारजोल (सिद्ध), तू सुरक्षित है।

शनिवार, 7 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--13

समय और तू—प्रवचन—तेरहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 15 फरवरी,1973  

तैयार रह और समय रहते चेत जा। यदि तूने प्रयत्न किया और विफल हो गया, अदम्य लड़ाके, तो भी साहस न छोड़। लड़े जा और बारबार युद्ध में जुटता रह।
जिसके घावों से उसका कीमती जीवन-रक्त बह रहा हो, ऐसा निर्भीक योद्धा
प्राण त्यागने के पहले शत्रु पर फिर-फिर आक्रमण करेगा और उसे उसके दुर्ग से निकाल बाहर करेगा। कर्म करो, तुम सब जो निष्फल और दुखी हो, उसकी तरह ही कर्म करो और निष्फल होने के बाद भी अपनी आत्मा के सभी शत्रुओं को--महत्वाकांक्षा, क्रोध, घृणा और अपनी वासना की छाया तक को--निकाल बाहर करो

शुक्रवार, 6 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) --प्रवचन--12

सावधान!—प्रवचन—बारहवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; प्रातः 15 फरवरी, 1973

और तब, ओ सत्य के संधानी, तेरे मन, आत्मा जंगल में दौड़ते-फिरने वाले पागल हाथी की तरह हो जाएंगे। जंगल के वृक्षों को जीवित शत्रु मानकर पागल हाथी सूर्य से प्रकाशित चट्टानों पर नाचने वाली अस्थिर छायाओं को मारने की चेष्टा में ही समाप्त हो जाता है।
सावधान हो, नहीं तो कहीं अहं की चिंता में देव-ज्ञान की भूमि पर तेरी आत्मा के पैर न उखड़ जाएं!
सावधान हो, नहीं तो कहीं तेरी आत्मा परमात्मा को भूल अपने कांपते मन के ऊपर नियंत्रण न खो बैठे और इस प्रकार अपनी जीत का फल भी गंवा दे।
परिवर्तन से सावधान, क्योंकि परिवर्तन तेरा बड़ा शत्रु है। यह परिवर्तन लड़कर तुझे तेरे मार्ग से निकाल बाहर करेगा और तुझे संदेह के दुष्ट दलदल में गाड़ देगा।

बुधवार, 4 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--11

मन के पार— प्रवचन—ग्यारहवां


ध्यान शिविर, आनंद शिला, अंबरनाथ
रात्रि 14 फरवरी, 1973

जब तू विराग की उस अवस्था को प्राप्त कर चुकेगा, तब वे द्वार, जिन्हें तुझे मार्ग पर चल कर जीतना है, तुझे अपने भीतर लेने के लिए अपना हृदय पूरे-का-पूरा खोल देंगे। प्रकृति की बड़ी से बड़ी शक्तियां भी तब गति को नहीं रोक सकेंगी। तब तू सप्तवर्णी मार्ग का स्वामी हो जाएगा; लेकिन, ओ परीक्षा के प्रत्याशी! उसके पहले यह संभव नहीं है।
तब तक एक बहुत कठिन काम तुझे करना है: तुझे अपने को एक साथ सर्व-विचार भी अनुभव करना है और अपनी आत्मा से सर्व-विचारों को निष्कासित भी करना है।
तुझे मन की उस स्थिरता को उपलब्ध होना है, जिसमें तेज से तेज हवा भी किसी पार्थिव विचार को उसके भीतर प्रविष्ट न करा सके। इस तरह परिशुद्ध होकर मंदिर को सभी सांसारिक कर्म, शब्द व पार्थिव रोशनी से रिक्त हो जाना है। जिस प्रकार पाला की मारी तितली देहली पर ही गिर कर ढेर हो जाती है, उसी प्रकार सभी पार्थिव विचारों को मंदिर के सामने ढेर हो जाना चाहिए।

मंगलवार, 3 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--10

आगे बढ़—प्रवचन—दसवां


ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; 14 फरवरी, 1973


अब तू उस खाई को पार कर चुका है, जो मानवीय वासनाओं के द्वार को घेर कर खड़ी है। अब तू "काम' और उसकी दुदात सेना पर विजय पा चुका है।
तूने अपने हृदय से अशुद्धियों को निकाल दिया है और कलुषपूर्ण वासनाओं से अब वह मुक्त है। लेकिन ओ गौरवशाली योद्धा, तेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है। ओ शिष्य (लानू) पवित्र-द्वीप को घेरने वाली दीवार को ऊंचा उठा। यही वह बांध होगा जो तेरे मन की उस मद और संतुष्टि से रक्षा करेगा, जो बड़ी उपलब्धि के विचार से उत्पन्न होती है।
अहंकार का भाव काम को बिगाड़ कर धर देगा, अतः मजबूत बांध बना, नहीं तो कहीं लड़ाकू लहरों की भयानक बाढ़ जो महा संसार के माया के समुद्र से आकर इसके किनारों पर चढ़ाई और चोट करती है, यात्री और उसके द्वीप को ही न निगल जाए। हां यह तब भी घटित हो सकता है, जब विजय उपलब्ध हो गई हो।

सोमवार, 2 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--09

स्वामी बन—प्रवचन—नौवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 13 फरवरी, 1973

मनुष्य में आलय अर्थात विश्वात्मा या परमात्मा के शुद्ध और उजजवल सत्व को छोड़ कर सब कुछ मृण्मय है। मनुष्य उसकी स्फटिक किरण है, प्रकाश की एक रेखा जो भीतर अपूर्व रूप से निर्दोष और निष्कलुष है--नीची भूमि पर एक मृतिका रूप। वही प्रकाश-रेखा तेरा जीवन-गुरु और तेरी सच्ची आत्मा है--द्रष्टा और मूक चिंतक। और तेरी निम्न-आत्मा का शिकार आत्मा केवल भूल करनेवाले शरीर में आहत होती है। इन दोनों पर नियंत्रण और स्वामित्व कायम कर और तू निकट जाते हुए संतुलन के द्वार के भीतर जाने में सुरक्षित है।

दूसरे तट को जाने वाले ओ साहसी यात्री, प्रसन्न रह। कामदेव की कानाफूसी पर कान मत दे। और अनंत आकाश में जो लुभानेवाली शक्तियां हैं, जो दुष्टभाव वाली आत्माएं हैं, जो द्वेषी ल्हामयी हैं, उनसे दूर ही रह।

समाधि के सप्‍त द्वार -(ब्‍लावट्स्‍की)-- प्रवचन--08

अस्तित्व से तादात्म्य—प्रवचन—आठवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 13 फरवरी, 1973

चौथे मार्ग विराग पर वासना या इच्छा का हल्का सा झोंका भी आत्मा की शुभ्र दीवारों पर पड़ने वाले स्थिर प्रकाश को हिला देगा। अंतःकरण में, जो तेरी उच्चस्थ आत्मा और निम्नस्थ आत्मा के बीच पथ या सेतु है, जो वृत्तियों का महापथ है और जो अहंकार को झकझोर कर जगाने वाला है, माया के भ्रांत सुखों के लिए राग या खेद की छोटी से छोटी लहर भी, बिजली की कौंध जैसी भासती लहर भी, तेरे तीन पुरस्कारों को तुझसे छीन लेगी, जो तूने श्रम से जीते हैं।
क्योंकि तू जान कि उस नित्य में कोई छूट नहीं है।
महाप्रभु का, पूर्णता के तथागत का जो अपने पूर्वजों के चरण चिन्हों पर चलते चले आए हैं, वचन हैं: आठ घोर दुख सदा के लिए विदा हो जाते हैं। यदि नहीं, तो जान कि तू ज्ञान को, निर्वाण को उपलब्ध नहीं हो सकता।
विराग का सदगुण बहुत कठोर और क्रूर है। यदि तू इस मार्ग का स्वामी होना चाहता है तो तुझे पहले से बहुत बढ़ कर अपने मन और दृष्टि को घातक कर्म से मुक्त रखना है।

रविवार, 1 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--07

घातक छाया—प्रवचन—सातवां

 ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 12 फरवरी,1973  

हे शिष्य, उस घातक छाया से सावधान रह। उस समय तक कोई भी उच्चस्थ आत्मा का प्रकाश निम्नस्थ आत्मा के अंधकार को नहीं मिटा सकता, जिस समय तक उससे सभी अहंकारी विचार निकल नहीं गए हैं और यात्री यह नहीं कहता है कि मैंने इस क्षणभंगुर शरीर को त्याग दिया है, मैंने कारण का नाश कर दिया है। अतः जो छायाएं पड़ती हैं, वे अब नहीं टिक सकतीं। क्योंकि अब उच्चस्थ और निम्नस्थ आत्मा के बीच अंतिम महायुद्ध आरंभ हो गया है। इस महायुद्ध में समस्त रण-क्षेत्र समा गया है, वह मानो है ही नहीं।

लेकिन, जब एक बार तू क्षांति (धैर्य) के द्वार को पार कर जाता है, तब तीसरा चरण भी उठ जाता है। तेरा शरीर तेरा सेवक है। और अब चौथे चरण की तैयारी कर। यह लोभ का द्वार है जो अंतरस्थ मनुष्य को फांसता है।

शनिवार, 31 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--06

क्षांति—प्रवचन—छठवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; प्रातः 12 फरवरी, 1973

ओम शिष्य, भय संकल्प का हनन करता है और प्रयासों का स्थगन। यदि शील गुण का अभाव हो, तो यात्री के पांव लड़खड़ाते हैं और चट्टानी पथ पर कर्म के पत्थर उसके पांवों को लहूलुहान कर देते हैं।
ओ साधक, अपने पावों को दृढ़ कर। क्षांति (धैर्य) के सत्व में अपनी आत्मा को नहला, क्योंकि अब तू उसी के नाम के द्वार को पहुंच रहा है--बल और धैर्य का द्वार।
अपनी आंखों को बंद मत कर, और दोरजे (सुरक्षा के वज्र) से अपनी दृष्टि को मत हटा। काम के बाण उस व्यक्ति को बद्ध कर देते हैं, जो विराग को प्राप्त नहीं हुआ है।
कंपन से सावधान! भय की सांस के नीचे पड़ने से धैर्य की कुंजी में जंग लग जाता है और जंग लगी कुंजी ताले को नहीं खोल सकती।

गुरुवार, 29 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--05

प्रवेश द्वार—प्रवचन—पांचवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 11 फरवरी 1973,

दान, प्रेम और करुणा की कुंजी पाकर तू दान के द्वार पर सुरक्षित खड़ा होगा। यही मार्ग का प्रवेश द्वार है।
ओ प्रसन्न तीर्थयात्री, देख जो द्वार तुझे दीख रहा है, वह ऊंचा और बड़ा है और प्रवेश के लिए आसान मालूम पड़ता है। और उससे होकर जो पथ जाता है, वह सीधा और चिकना तथा हरा-भरा है। अंधेरे वन की गहराइयों में यह प्रकाशित वन-पथ की तरह है--एक स्थान जो अमिताभ के स्वर्ग से प्रतिबिंबित होता है, वह चमकीले पंख वाले पक्षी, आशा के बुलबुल हरे लता-कुंजों में बैठकर निर्भय यात्रियों के लिए सफलता का गीत गाते हैं। वे बोधिसत्व के पांच सदगुणों को गाते हैं। जो बोधिशक्ति के पांच स्रोत हैं, और वे ज्ञान के सात चरणों को गाते हैं।

बढ़ा चल, क्योंकि तू कुंजी लाया है, तू सुरक्षित है।

सोमवार, 26 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लवट्स्‍की)-प्रवचन--04

सम्यक जीवन—प्रवचन-चौथा

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; प्रातः 11 फरवरी 1973,

शिक्षक अनेक हैं, लेकिन परम गुरु एक ही है--जिसे आलय या विश्वात्मा कहते हैं। उस परम सत्ता में ऐसे ही जी, जैसे उसकी किरण तुझमें जीती है। और प्राणी मात्र में ऐसे जी, जैसे वे परम सत्ता में जीते हैं।
मार्ग की देहली पर खड़ा होने के पूर्व, अंतिम द्वार को पार करने के पहले तुझे दोनों को एक में निमज्जित करना है और व्यक्ति-सत्ता को परम-सत्ता के लिए त्यागना है। और इस तरह दोनों के बीच में जो पथ है, जिसे अंतःकरण कहते हैं, उसे नष्ट कर डालना है।
तुझे धर्म को, उस कठोर नियम को उत्तर देना होगा, जो तुझसे तेरे पहले ही कदम पर पूछेगा:
उच्चाशी, क्या तूने सभी नियमों का पालन किया है?

रविवार, 25 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्सकी) प्रवचन--03

सम्यक दर्शन—प्रवचन—तीसरा

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 10 फरवरी 1973,

हे शिष्य, इसके पहले कि तू गुरु के साथ और प्रभु के साथ साक्षात्कार के योग्य हो सके, तुझे क्या कहा गया था?
अंतिम द्वार पर पहुंचने के पहले तुझे अपने मन से अपने शरीर को अलग करना सीखना है, छाया को मिटा डालना है और शाश्वत में जीना सीखना है। इसके लिए तुझे सर्व में जीना और श्वास लेना है, वैसे ही जैसे वह जिसे तू देखता है, तुझमें श्वास लेता है। और तुझे सर्व भूतों में स्वयं को और स्वयं में सर्व भूतों को देखना है।
तू अपने मन को अपनी इंद्रियों की क्रीड़ाभूमि नहीं बनने देगा।
तू अपनी सत्ता को परम सत्ता से भिन्न नहीं रखेगा, वरन समुद्र को बूंद और बूंद को समुद्र में डुबा देगा।
इस प्रकार तू प्राणिमात्र के साथ पूरी समरसता में जीएगा, सभी मनुष्यों के प्रति ऐसा प्रेम-भाव रखेगा, जैसे कि वे तेरे गुरु-भाई हैं--एक ही शिक्षक के शिष्य और एक ही प्यारी मां के पुत्र।

शनिवार, 24 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--02

प्रथम दर्शन--प्रवचन--दूसरा

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 10 फरवरी, 1973

वह देख, ईश्वरीय प्रज्ञा के मुमुक्षु, तू अपनी आंखों के सामने क्या देख रहा है?
पदार्थ के समुद्र पर अंधकार का आवरण पड़ा है और उसके भीतर ही मैं संघर्षरत हूं। मेरी दृष्टि की छाया में वह गहराता है, और आपके हिलते हाथ की छाया में वह विच्छिन्न हो जाता है। सांप के फैलते केंचुल की तरह एक छाया गतिवान होती है यह बढ़ती है, फूलती-फैलती है, और अंधकार में विलीन हो जाती है।
यह मार्ग के बाहर तेरी ही छाया है--तेरे ही पापों के अंधकार से बनी है।
हां, प्रभु मैं तेरे मार्ग को देखता हूं। इसका आधार दलदल में है और इसका शिखर निर्वाण के दिव्य व गौरवमय प्रकाश से मंडित है। और अब मैं ज्ञान के कठिन और कंटकाकीर्ण पथ पर निरंतर संकीर्ण होते जाते द्वारों को भी देखता हूं।
लानू (शिष्य) तू ठीक देखता है। ये द्वार मुमुक्षु को नदी के पार दूसरे किनारे पर निर्वाण में पहुंचा देते हैं। प्रत्येक द्वार की एक स्वर्ण-कुंजी है, जो उसे खोलती है। ये कुंजियां हैं:

शुक्रवार, 23 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार(ब्‍लावट्स्‍की)-प्रवचन--01

स्‍त्रोतापन्‍न बनपहला प्रवचन

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 9 फरवरी, 1973

हे उपाध्याय, निर्णय हो चुका है, मैं ज्ञान पाने के लिए प्यासा हूं। अब आपने गुहय मार्ग पर पड़े आवरण को हटा दिया है और महायान की शिक्षा भी दे दी है। आपका सेवक आपसे मार्गदर्शन के लिए तत्पर है।
यह शुभ है, श्रावक तैयारी कर, क्योंकि तुझे अकेला यात्रा पर जाना होगा। गुरु केवल मार्ग-निर्देश कर सकता है। मार्ग तो सबके लिए एक है, लेकिन यात्रियों के गंतव्य पर पहुंचने के साधन अलग-अलग होंगे।
ओ अजित-हृदय, तू किसको चुनता है? चक्षु-सिद्धांत के समतान अर्थात चतुर्मुखी ध्यान को या छः पारअमताओं के बीच से तू अपनी राह बनाएगा, जो सदगुण के पवित्र द्वार हैं और जो ज्ञान के सप्तम चरण बोधि और प्रज्ञा को उपलब्ध कराते हैं?

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) --ओशो

समाधि के सप्‍त द्वार
(ब्‍लावट्स्‍की)
ओशो

ब्‍लावट्स्‍की की यह पुस्‍तक समाधि के सप्‍त द्वार वेद, बाइबिल, कुरान, महावीर, बुद्ध के वचनों की हैसियत की है।
मैंने इस पुस्‍तक को जानकर चुना। क्‍योंकि इधर दो सौ वर्षो में ऐसी न के बराबर पुस्‍तकें है, जिनकी हैसियत बेद, कुरान बइबिल, धम्‍मपद, गीता और  उपनिषद की हो। इन थोड़ी दो—चार पुस्‍तकों में यह पुस्‍तक है समाधि के सप्‍त द्वार।
और यह पुस्‍तक आपके लिए जीवन की आमूल क्रांति सिद्ध हो सकती है।
इस पुस्‍तक का किसी धर्म से भी कोई संबंध नहीं  है—इसलिए भी मैंने चुना है—न यह हिंदू है न यह मुसलमान है, न यह ईसाई है। यह पुस्‍तक शुद्ध धर्म है।

ब्‍लावट्स्‍की की यह किताब साधारण नहीं है। उसने इसे लिखा नहीं, उसने सुना और देखा है। यह उसकी कृति नहीं है। वरन आकाश में जो अनंत—अनंत बुद्धो की छाप छूट गयी है। उसका प्रतिबिंब है।