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रविवार, 23 अप्रैल 2017

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-05

ध्यान है अक्रिया—(पाँचवाँ-प्रवचन)

पांचवां प्रवचन
बंबई, दिनांक 10 मार्च, 1970


 मेरे प्रिय आत्मन,
कल मैंने कहा कि ध्यान अक्रिया है, तो एक मित्र ने पूछा है कि वे समझ नहीं सके कि ध्यान अक्रिया कैसे है? क्योंकि जो हम करेंगे, वह तो क्रिया ही होगी, अक्रिया कैसे होगी?
मनुष्य की भाषा के कारण बहुत भूल पैदा होती है। हम बहुत—सी अक्रियाओं को भी भाषा में क्रिया समझे हुए हैं। जैसे हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति ने जन्म लिया। ' सुनकर ऐसे लगता है, जैसे जन्म लेने में उसको भी कुछ करना पडा होगा। जन्मना एक क्रिया है। हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति मर गया', तो ऐसा लगता है कि मरने में उसे कुछ करना पडा होगा। हम कहते हैं कि 'कोई सो गया', तो ऐसा लगता है कि सोने में उसे कुछ करना पडा होगा। नींद क्रिया नहीं है, मृत्यु क्रिया नहीं है, जन्म क्रिया नहीं है, लेकिन भाषा में वे क्रियाएं बन  जाती हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-04

ध्यान है : साक्षी—भाव—(चौथा-प्रवचन)

चौथा प्रवचन
बंबई; दिनांक 25 फरवरी,1970
प्रश्न :

ध्यान के समय मन एकाग्र नहीं होता, तो क्या करूं?

नहीं; पहली तो यह बात आपके खयाल में नहीं आयी कि एकाग्रता ध्यान नहीं है। मैंने कभी एकाग्रता करने को नहीं कहा। ध्यान बहुत अलग बात है। साधारणत: तो यही समझा जाता है कि एकाग्रता ध्यान है। एकाग्रता ध्यान नहीं है। क्योंकि एकाग्रता में तनाव है। एकाग्रता का मतलब यह है कि सब जगह से छोड्कर एक जगह मन को जबरदस्ती रोकना। एकाग्रता सदा जबरदस्ती है; इसमें कोएर्सन है। क्योंकि मन तो भागता है, और आप कहते हैं : 'नहीं भागने देंगे ' तो आप और मन के बीच एक लडाई शुरू हो जाती है। और जहां लडाई है, वहां ध्यान कभी नहीं होगा। क्योंकि लडाई ही तो उपद्रव है, हमारे पूरे व्यक्तित्व की। कि वह पूरे वक्त कॉनफ्लिक्ट है, द्वंद्व है, संघर्ष है। और मन को ऐसी अवस्था में छोडना है, जहां कोई कॉनफ्लिक्ट ही नहीं है, तब ध्यान में आप जा सकते हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-03

ध्यान मंदिर है: मनुष्‍य का मंगल—तीसरा प्रवचन

तीसरा प्रवचन
साधना शिविर, तुलसीश्याम,
सौराष्ट्र; दिनांक 6 फरवरी, 1966


प्रश्न :

मैं यह पूछना चाहता हूं कि हम लोग जो फंड्स इकट्ठा करने का सोच रहे हैं कि पंद्रह लाख रुपये के करीब इकट्ठा करें, तो इसके लिए आपका मकसद क्या है? ऐसा करने से जीवन जागृति केंद्र का सब जगह से क्या फायदा है, इस बारे में आप समझायें।

बहुत—सी बातें हैं। एक तो जैसी स्थिति में हम आज हैं, ऐसी स्थिति में शायद दुबारा इस मुल्क का समाज कभी भी नहीं होगा। इतने संक्रमण की, ट्रांजीशन की हालत में हजारों, सैकडों वर्षों में एकाध बार समाज आता है—जब सारी चीजें बदल जाती हैं, जब सब पुराना नया हो जाता है। ये क्षण सौभाग्य भी हो सकते हैं और दुर्भाग्य भी। जरूरी नहीं है कि नया हर हालत में ठीक ही होता है। पुराना तो हर हालत में गलत होता है, लेकिन नया हर हालत में ठीक नहीं होता। और जब पुराना टूटता है, तो हजार विकल्प, आल्टरनेटिब्स होते हैं। दुर्भाग्य बन सकता है, अगर गलत विकल्प चुन लिया। इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-02

ध्यान का द्वार : सरलता—(दूसरा-प्रवचन)


साधना शिविर, तुलसीश्याम,
सौराष्ट्र; दिनांक 4 फरवरी, 1966

जिसे परमात्मा के दर्शन शुरू हो जायेंगे, वह एक पक्षी का गीत सुनेगा, तो उस गीत में भी उसे परमात्मा की वाणी सुनायी पड़ेगी। वह एक फूल को खिलते देखेगा, तो उस फूल के खिलने में भी परमात्मा की सुवास, परमात्मा की सुगंध उसे मिलेगी। उसे चारों तरफ एक अपूर्व शक्ति का बोध होना शुरू हो जाता है। लेकिन यह होगा तभी, जब मन हमारा इतना निर्मल और स्वच्छ हो कि उसमें प्रतिबिंब बन सके, उसमें रिफ्लेक्यान बन सके।
तुमने देखा होगा झील पर कभी जाकर। अगर झील पर बहुत लहरें उठती हों तो आकाश में चांद हो, तो फिर झील पर चांद का कोई प्रतिबिंब नहीं बनता। और अगर झील बिलकुल शांत हो, उसमें कोई लहर न उठती हो, दर्पण की तरह चुप और मौन हो, तो फिर चांद उसमें दिखायी पड़ता है। और जो चांद झील में दिखायी पड़ता है, वह उससे भी सुंदर होता है, जो ऊपर आकाश में होता है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-01

ध्‍यान है: अंतस—क्रांति-(पहला-प्रवचन)

दिनांक 25 फरवरी, सन् 1970

श्री रजनीश, बंम्बई,
प्रश्न :
साक्षीभाव क्या है? उसे हम जगाना चाहते हैं। क्या वह भी चित्त का एक अंश नहीं    होगा? या कि चित्त से परे होगा?

  प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, और ठीक से समझने योग्य है। साधारणत: हम जो भी जानते हैं, जो भी करते हैं, जो भी प्रयत्न होगा, वह सब चित्त से होगा, मन से होगा, माइंड से होगा। अगर आप राम—राम जपते हैं, तो जपने की क्रिया मन से होगी। अगर आप मंदिर में पूजा करते हैं, तो पूजा करने की क्रिया मन का भाव होगी। अगर आप कोई ग्रंथ पढ़ते हैं, तो पढ़ने की क्रिया मन की होगी। और आत्मा को जानना हो, तो मन के ऊपर जाना होगा। मन की कोई क्रिया मन के ऊपर नहीं ले जा सकती है। मन की कोई भी क्रिया मन के भीतर ही रखेगी।
स्वाभाविक है कि मन की किसी भी क्रिया से, जो मन के पीछे है, उससे परिचय नहीं हो सकता। यह पूछा है, यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी? नहीं, अकेली एक ही क्रिया है, जो मन की नहीं है, और वह साक्षीभाव है। इसे थोड़ा समझना जरूरी है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-ओशो

चल हंसा उस देस

—ओशो
श्री रजनीश द्वारा 1966 एवं 1970 में
दिए गए सात अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन.

मन सतत परिवर्तनशील है, और साक्षी सतत अपरिवर्तनशील है। इसलिए साक्षीभाव मन का हिस्सा नहीं हो सकता। और फिर, मन की जो—जो क्रियाएं हैं, उनको भी आप देखते हैं। आपके भीतर विचार चल रहे हैं, आप शांत बैठ जायें, आपको विचारों का अनुभव होगा कि वे चल रहे हैं; आपको दिखायी पड़ेंगे, अगर शांत भाव से देखेंगे तो विचार वैसे ही दिखाई पड़ेंगे, जैसे रास्ते पर चलते हुए लोग दिखायी पड़ते हैं। फिर अगर विचार शून्य हो जायेंगे, विचार शांत हो जायेंगे, तो यह दिखायी पड़ेगा कि विचार शांत हो गये हैं, शून्य हो गये हैं; रास्ता खाली हो गया है। निश्चित ही जो विचारों को देखता है, वह विचार से अलग होगा। वह जो हमारे भीतर देखने वाला तत्व है, वह हमारी सारी क्रियाओं से, सबसे भिन्न और अलग है।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-10

अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
दसवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
तीन मुक्ति-सूत्रों के संबंध में सुबह मैंने आपसे बात की। सत्य को जानने की दिशा में, या आनंद की उपलब्धि में, या स्वतंत्रता की खोज में मनुष्य का चित्त सीखे हुए ज्ञान से, अनुकरण से और वृत्तियों के प्रति मरूच्छा से मुक्त होना चाहिए, यह मैंने कहा।
इस संबंध में बहुत से प्रश्न आए हैं। उन पर हम विचार करेंगे।

बहुत से मित्रों ने पूछा है कि यदि शास्त्रों पर श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तब तो हम भटक जाएंगे, फिर तो कैसे ज्ञान उपलब्ध होगा?

ऐसा प्रश्न स्वाभाविक है। मन को यह खयाल आता है कि यदि महापुरुषों पर, शास्त्रों पर श्रद्धा न करेंगे तो भटक जाएंगे। मगर बड़े आश्चर्य की बात है, हम यह नहीं सोचते कि श्रद्धा करते हुए भी हम भटकने से कहां बच सके हैं। विश्वास करते हुए भी क्या हम भटक नहीं रहे हैं? भटक नहीं गए हैं? विश्वास हमें कहां ले जा सका है। विश्वास कहीं ले जा भी नहीं सकता। क्यों?

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-09

अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
नौवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक संध्या एक पहाड़ी सराय में एक नया अतिथि आकर ठहरा। सूरज ढलने को था, पहाड़ उदास और अंधेरे में छिपने को तैयार हो गए थे। पक्षी अपने निबिड़ में वापस लौट आए थे। तभी उस पहाड़ी सराय में वह नया अतिथि पहुंचा। सराय में पहुंचते ही उसे एक बड़ी मार्मिक और दुख भरी आवाज सुनाई पड़ी। पता नहीं कौन चिल्ला रहा था? पहाड़ की सारी घाटियां उस आवाज से...लग गई थीं। कोई बहुत जोर से चिल्ला रहा था--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।
वह अतिथि सोचता हुआ आया, किन प्राणों से यह आवाज उठ रही है? कौन प्यासा है स्वतंत्रता को? कौन गुलामी के बंधनों को तोड़ देना चाहता है? कौनसी आत्मा यह पुकार कर रही? प्रार्थना कर रही?
और जब वह सराय के पास पहुंचा, तो उसे पता चला, यह किसी मनुष्य की आवाज नहीं थी, सराय के द्वार पर लटका हुआ एक तोता स्वतंत्रता की आवाज लगा रहा था।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-08

अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
आठवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
सत्य की यात्रा पर मनुष्य का सीखा हुआ ज्ञान ही बाधा बन जाता है, यह पहले दिन की चर्चा में मैंने कहा। सीखा हुआ ज्ञान दो कौड़ी का भी नहीं। और जो सीखे हुए, पढ़े हुए ज्ञान के आधार पर सोचता हो कि जीवन के प्रश्न को हल कर लेगा, वह नासमझ ही नहीं, पागल है। जीवन के ज्ञान को तो स्वयं ही पाना होता है किसी और से उसे नहीं सीखा जा सकता।
दूसरे दिन की चर्चा में मैंने आपसे कहा कि जिसका अहंकार जितना प्रबल है वह स्वयं के और परमात्मा के बीच उतनी ही बड़ी दीवाल खड़ी कर लेता है। मैं हूं, यही भाव, जो सबमें छिपा है उससे नहीं मिलने देता। अहंकार की बूंद जब परमात्मा के सागर में स्वयं को खोने को तैयार हो जाती है तभी उसे जाना जा सकता है जो सत्य है और सबमें है। यह मैंने दूसरे दिन आपसे कहा।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-07

अंतर की खोज-(विविध)
ओशो
सातवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक अत्यंत वीरानी पहाड़ी सराय में मुझे ठहरने का मौका मिला था। संध्या सूरज के ढलते समय जब मैं उस सराय के पास पहुंच रहा था, तो उस वीरान घाटी में एक मार्मिक आवाज सुनाई पड़ रही थी। आवाज ऐसी मालूम पड़ती थी जैसे किसी बहुत पीड़ा भरे हृदय से निकलती हो। कोई बहुत ही हार्दिक स्वर में, बहुत दुख भरे स्वर में चिल्ला रहा था: स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। और जब मैं सराय के निकट पहुंचा, तो मुझे ज्ञात हुआ, वह कोई मनुष्य न था, वह सराय के मालिक का तोता था, जो यह आवाज कर रहा था।
मुझे हैरानी हुई। क्योंकि मैंने तो ऐसा मनुष्य भी नहीं देखा जो स्वतंत्रता के लिए इतने प्यास से भरा हो। इस तोते को स्वतंत्र होने की ऐसी कैसी प्यास भर गई? निश्चित ही वह तोता कैद में था, पिंजड़े में बंद था। और उसके प्राणों में शायद मुक्त हो जाने की आकांक्षा अंकुरित हो गई थी।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-06

अंतर की खोज-(विविध)
ओशो

छठा-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
एक राजा शिकार को निकला था। जंगल में रास्ता भटक गया, रात हो गई, अपने साथियों से बिछुड़ गया। दूर थोड़ा सा प्रकाश दिखाई पड़ा, उस ओर गया, पाया कि जंगल के बीच ही एक छोटी सी सराय थी। वह उसमें ठहरा। सुबह उसने उस सराय के मालिक को कहा, क्या कुछ अंडे मिल सकेंगे? अंडे उपलब्ध थे। उसने सुबह अंडे लिए, दूध लिया और पीछे पूछा कि क्या दाम हुआ? उस सराय के बूढ़े मालिक ने कहा, सौ रुपये। वह राजा हैरान हो गया। उसने बड़ी महंगी चीजें जीवन में खरीदी थीं लेकिन दो अंडों के दाम सौ रुपये होंगे इसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। उसने उस सराय के मालिक को कहा, आर एग्स सो रेयर हियर? क्या अंडे इतनी मुश्किल से यहां मिलते हैं कि सौ रुपये उनके दाम हो जाएं? वह बूढ़ा मालिक हंसा और उसने कहा, एग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। उसने कहा, अंडे तो मुश्किल से नहीं मिलते, लेकिन राजा बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-05

अंतर की खोज-(विवि

ओशो
पांचवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। अनेक प्रश्न एक जैसे हैं, इसलिए कुछ थोड़े से प्रश्नों में सभी प्रश्नों को बांट कर आपसे चर्चा करूंगा तो आसानी होगी।
मैंने कल कहा: विश्वास धर्म नहीं है, वरन विचार और विवेक धर्म है। श्रद्धा अंधी है। और जो अंधा है वह सत्य को नहीं जान सकेगा।

इस संबंध में बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं और उनमें पूछा गया है कि यदि हम श्रद्धा न रखेंगे, यदि हम विश्वास न रखेंगे, तब तो हमारा मार्ग भटक जाएगा।

यह वैसा ही है जैसे एक अंधे आदमी को हम कहें कि तुम अपने हाथ में जो लकड़ी लिए घूमता है, अपनी आंखों का इलाज करवा ले और इस लकड़ी को फेंक दे, तो वह अंधा आदमी कहे, माना मैंने कि आंखों का इलाज तो मुझे करवा लेना है लेकिन लकड़ी को अगर मैं फेंक दूंगा तो भटक जाऊंगा। बिना लकड़ी के तो मैं चल ही नहीं पाता हूं। निश्चित ही अंधा आदमी बिना लकड़ी के नहीं चल पाता है लेकिन आंख वाले आदमी को लकड़ी की कोई भी जरूरत नहीं है।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-04

अंतर की खोज-(विविध)
ओशो

चौथा-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं संध्या की इस बातचीत को शुरू करूंगा।
एक राजदरबार में एक बहुत अनूठे आदमी का आना हुआ। उस आदमी का अनूठापन इस बात में था कि उसने उस सम्राट को कहा, तुम इतनी बड़े पृथ्वी के अकेले मालिक हो, तुमसे बड़ा सम्राट कभी हुआ नहीं, तो यह शोभा नहीं देता है कि तुम मनुष्यों जैसे वस्त्र पहनो। मैं तुम्हारे लिए देवताओं के वस्त्र लाकर दे सकता हूं।
देवताओं के वस्त्र न तो कभी देखे गए थे और न सुने गए थे। राजा के अहंकार को प्रेरणा मिली और उसने कहा, कितना भी खर्च करना पड़े, कोई भी व्यवस्था करनी पड़े, मैं तैयार हूं, लेकिन देवताओं के वस्त्र मुझे चाहिए। वह व्यक्ति राजी हो गया कि छह महीने के भीतर मैं वस्त्र लाकर दे दूंगा, लेकिन जो भी खर्च उठाना पड़ेगा; कितना ही खर्च हो उसकी कोई गिनती न रखी जाए, छह महीने के बाद मैं वस्त्र ला दूंगा। राजा राजी हो गया। उसके दरबारियों ने समझा कि यह निरा धोखा है। देवताओं के वस्त्र कहां से लाए जा सकते हैं? यह सिर्फ राजा को लूटने का उपाय है।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-03

अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
तीसरा-प्रवचन
एक छोटी सी कहानी से मैं आने वाली इन तीन दिनों की चर्चाओं को शुरू करूंगा।
एक राजधानी में एक संध्या बहुत स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। सारा नगर दीयों से सजाया गया था। रास्तों पर बड़ी भीड़ थी और देश का सम्राट खुद गांव के बाहर एक संन्यासी की प्रतीक्षा में खड़ा था। एक संन्यासी का आगमन हो रहा था। और जो संन्यासी आने को था नगर में, सम्राट के बचपन के मित्रों में से था। उस संन्यासी की दूर-दूर तक सुगंध पहुंच गई थी। उसके यश की खबरें दूर-दूर के राष्ट्रों तक पहुंच गई थीं। और वह अपने ही गांव में वापस लौटता था, तो स्वाभाविक था कि गांव के लोग उसका स्वागत करें। और सम्राट भी बड़ी उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा में नगर के द्वार पर खड़ा था।
संन्यासी आया, उसका स्वागत हुआ, संन्यासी को राजमहल में लेकर सम्राट ने प्रवेश किया। उसकी कुशलक्षेम पूछी। वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटा था। राजा ने अपने मित्र उस संन्यासी से कहा, सारी पृथ्वी घूम कर लौटे हो, मेरे लिए क्या ले आए हो? मेरे लिए कोई भेंट?

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-02

अंतर की खोजे-(विविध)

ओशो
दूसरा-प्रवचन
मनुष्य के मन पर शब्दों का भार है; और शब्दों का भार ही उसकी मानसिक गुलामी भी है। और जब तक शब्दों की दीवालों को तोड़ने में कोई समर्थ न हो, तब तक वह सत्य को भी न जान सकेगा, न आनंद को, न आत्मा को। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं।
सत्य की खोज में--और सत्य की खोज ही जीवन की खोज है--स्वतंत्रता सबसे पहली शर्त है। जिसका मन गुलाम है, वह और कहीं भला पहुंच जाए, परमात्मा तक पहुंचने की उसकी कोई संभावना नहीं है। जिन्होंने अपने चित्त को सारे बंधनों से स्वतंत्र किया है, केवल वे ही आत्माएं स्वयं को, सत्य को और सर्वात्मा को जानने में समर्थ हो पाती हैं।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-01

अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
पहला-प्रवचन
एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करूंगा।
एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए आमंत्रित किया। वह फकीर बड़ी खुशी से राजी हो गया। लेकिन मस्जिद में जाने के बाद, जहां कि गांव के बहुत से लोग इकट्ठा हुए थे, उस फकीर ने मंच पर बैठ कर कहा: मेरे मित्रो, मैं जो बोलने को हूं, जिस संबंध में मैं बोलने वाला हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? बहुत से लोगों ने एक साथ कहा: नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। वह फकीर मंच से नीचे उतर आया और उसने कहा: ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना मैं पसंद न करूंगा, जो कुछ भी नहीं जानते। जो कुछ भी नहीं जानते हैं उस विषय के संबंध में जिस पर मुझे बोलना है, उनके साथ कहां से बात शुरू की जाए? इसलिए मैं बात शुरू ही नहीं करूंगा। वह उतरा और वापस चला गया।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-122

एस धम्‍मो सनंतनो—प्रवचन—122

      प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

यह मोह क्या है? उससे इतना दुख पैदा होता है, फिर भी वह छूटता क्यों नहीं है?

नुष्‍य शून्य होने की बजाय दुख से भरा होना ज्यादा पसंद करता है।
भरा होना ज्यादा पसंद करता है। खाली होने से भयभीत है। चाहे फिर दुख से ही क्यों न भरा हो। सुख न मिले, तो कोई बात नहीं है। दुख ही सही। लेकिन कुछ पकड़ने को चाहिए। कोई सहारा चाहिए।
दुख भी न हो, तो तुम शून्य में खोने लगोगे। सुख का किनारा तो दूर मालूम पड़ता है, दुख का किनारा पास। वहीं तुम खड़े हो। जो पास है, उसी को पकड़ लेते हो कि कहीं खो न जाओ। कहीं इस अपार में लीन न हो जाओ!
कहते हैं न. डूबते को तिनके का सहारा। दुख तुम्हारा तिनका है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-121

जागो और जीओ—प्रवचन—121

सूत्र:

आसा यस्‍य न विज्‍जन्‍ति अस्‍मिं लोके परम्‍हि च।
निरासयं विसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।324।।

अस्‍सालया न विज्‍जन्‍ति अज्‍जाय अकथंकथी।
अमतोगधं अनुप्‍पतं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।325।।

योध पुज्‍जज्‍च पापज्‍च उभो संगं उपच्‍चगा।
असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्रह्मणं ।।326।।

चन्‍दंव विमलं सुद्धं विप्‍पसन्‍नमनाविलं।
नन्‍दीभवपरिक्‍खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्माणं ।।327।।

हित्‍वा मानुसकं योगं दिब्‍बं योगं उपच्‍चगा ।
सब्‍बयोगविसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।328।।

पुब्‍बेनिवासं यो वेदि सग्‍गापायज्‍च पस्‍सति ।
अथो जातिखयं पत्‍तो अभिज्‍जवासितो मुनि
सब्‍बवोसितवोसानंतमहं ब्रमि ब्राह्माणं ।।329।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-120

अप्प दीपो भव!—प्रवचन—120

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

मैं तुम्हीं से पूछती हूं? मुझे तुमसे प्यार क्यों है?
कभी तुम जुदा न होओगे, मुझे यह ऐतबार क्यों है?

पूछा है मा योग प्रज्ञा ने।
प्रेम के लिए कोई भी कारण नहीं होता। और जिस प्रेम का कारण बताया जा सके, वह प्रेम नहीं है। प्रेम के साथ क्यों का कोई भी संबंध नहीं है। प्रेम कोई व्यवसाय नहीं है। प्रेम के भीतर हेतु होता ही नहीं। प्रेम अकारण भाव—दशा है। न कोई शर्त है, न कोई सीमा है।
क्यों का पता चल जाए, तो प्रेम का रहस्य ही समाप्त हो गया। प्रेम का कभी भी शास्त्र नहीं बन पाता। इसीलिए नहीं बन पाता। प्रेम के गीत हो सकते हैं। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं, कोई सिद्धांत नहीं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-119

ब्राह्मणत्व के शिखर—बुद्ध—प्रवचन—119

सूत्र:


न ब्राह्मणस्‍सेतदकिज्‍चि सेय्यो यदा निसेधो मनसो पियेहि।
यतो यतो हिंसमानो निवत्‍तति ततो ततो सम्‍मति एव दुक्‍खं ।।318।।

न जटाहि न गोत्‍तेहि न जच्‍चा होति ब्राह्मणो।
यम्‍हि सच्‍चज्‍च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो ।।319।।

किं ते जटाहि दुम्मेध! किं ते अजिनसाटिया।
अब्‍भन्‍तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्‍जसि ।।320।।

सब्‍बसज्‍जोजनं छेत्‍वा यो वे न परितस्‍सति।
संगातिगं विसज्‍जुत्‍तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।321।।

छेत्‍वा नन्‍दिं वरत्‍तज्‍च सन्‍दामं सहनुक्‍कमं।
उक्‍खित्‍तपलिधं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।322।।

अक्कोसं बधबन्धज्व अदुट्ठो यो तितिक्सति ।
खन्तिबलं बलानीकं तमहं ब्रमि ब्राह्मण ।।323।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-118

समग्र संस्कृति का सृजन—प्रवचन—118

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

पूर्व के और खासकर भारत के संदर्भ में एक प्रश्न बहुत समय से मेरा पीछा कर रहा है। वह यह कि जिन लोगों ने कभी दर्शन और चिंतन के, धर्म और ध्यान के गौरीशंकर को लांघा था, वे ही कालांतर में इतने ध्वस्त, और पतित, और विपन्न कैसे हो गए? भगवान, इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

स्वाभाविक ही था। अस्वाभाविक कभी होता भी नहीं। जो होता है, स्वाभाविक है। यह अनिवार्य था। यह होकर ही रहता। क्योंकि जब भी कोई जाति, कोई समाज एक अति पर चला जाता है, तो अति से लौटना पड़ेगा दूसरी अति पर। जीवन संतुलन में है, अतियों में नहीं। जीवन मध्य में है और आदमी का मन डोलता है पेंडुलम की भांति। एक अति से दूसरी अति पर चला जाता है। भोगी योगी हो जाते हैं; योगी भोगी हो जाते हैं। और दोनों जीवन से चूक जाते हैं।