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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-12

भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-बारहवां
ए टाक गिवन एट आजोल, इंडिया
डिस्कोर्स नं० १२

वाचक--गांधी जी का कभी कभी मजाक करते हैं तो ऐसा नहीं है कि गांधी जी ने इस देश का निरीक्षण किया, पर्यटन किया और करुणा की वजह से उन्होंने जीवन में जो जरूरी थी इतनी चीजों से चलाकर वह सादगी का विचार किया था वह करुणा की वजह से किया नहीं है वह।

ओशो—करुणा की वजह से हो या ना हो। इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता, मेरे लिए यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं कि गांधी जी ने किस वजह से सादगी अखतियार की, मेरे लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सादगी का रुख मुल्क को गरीब बनाता है। मेरे लिए वह महत्त्वपूर्ण नहीं है। वह गांधी जी की व्यक्तिगत बात है, वह करुणा के साधे रह रहे हैं, या उनको कोई ओपशेशन है इसलिए साधे रह रहे हैं, या दिमाग खराब है इसलिए साधे रह रहे हैं। इससे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। वह गांधी जी की निजी बात है। मेरे लिए प्रयोजन जिस बात से है वह यह है कि जो मुल्क सादगी को प्रतिष्ठा देता है। वह मृत संपन्न नहीं हो सकता।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-11

भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-ग्यारहवां
ए टाक गिवन इन बोम्बेइण्डिया।
डिस्कोर्स नं० ११

मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक नए भारत की ओर इस संबंध में, मैं थोड़ी-सी बातें आपसे कहना चाहूंगा। पहली बात तो यह कि भारत को हजारों वर्ष तक कि यह पता ही नहीं था कि वह पुराना हो गया  है। असल में पुराने होने का पता ही तब चलता है। जब हमारे पड़ौसी नए हो जाएं। पुराने के बोध के लिए किसी का नया हो जाना जरूरी है।
भारत को हजारों वर्ष तक यह पता नहीं था कि वह पुराना हो गया है। इधर इस सदी में आकर हमें यह प्रतीति होनी शुरू हुई है कि हम पुराने हो गए हैं। इस प्रतीति को झुठलाने की हम बहुत कोशिश करते हैं। क्योंकि यह बात मन को वैसे ही दुःख देती है। जैसे किसी बूढ़े आदमी को जब पता चलता है कि वह बूढ़ा हो गया है तो दुःख शुरू होता है।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-10

भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-10
ए टाक गिवन इन बोम्बे इंडिया
डिस्कोर्स नं० १०

एक बहुत पुराने नगर में, उतना ही पुराना एक चर्च था। वह चर्च इतना पुराना था कि उस चर्च में भीतर जाने के लिए प्रार्थना करने वाले भयभीत होते थे। उसके किसी भी क्षण गिर पड़ने की संभावना थी। आकाश में बादल गरजते थे तो चर्च के अस्थि पंजर कंप जाते थे। हवाएं चलती थी तो लगता था चर्च अब गिरा, अब गिरा।
ऐसे चर्च में कौन प्रवेश करता, कौन प्रार्थना करता? धीरे-धीरे उपासक आने बंद हो गए। चर्च के संरक्षकों ने कभी दीवारों का पलस्तर बदला, कभी खिड़की बदली, कभी द्वार रंगे। लेकिन न द्वार रंगने से, न पलस्तर बदलने से, न कभी यहां ठीक कर देने से, न कभी वहां ठीक कर देने से। वह चर्च इस योग्य न हुआ कि उसे जीवित माना जा सके। वह मुर्दा ही बना रहा।

रविवार, 10 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-09

भारत का भविष्य—ओशो
ए टाक गिवन इन राजकोट इंडिया
(नोट-प्रवचन एक से सात तक उपलब्ध नहीं है)
डिस्कोर्स नं० ९
प्रवचन-09

मेरे प्रिय आत्मन् ,
जैसे, जैसे शाम के संबंध में बहुत से प्रश्न आए। कुछ मित्रों ने पूछा है कि भारत सैकड़ों वर्षों से दरिद्र है इस दरिद्रता में, इस दरिद्रता में तो गांधीवाद का हाथ नहीं हो सकता है। वह क्यों दरिद्र है इतने वर्षों से? गांधीवाद का हाथ तो नहीं है लेकिन गांधीवाद जैसी ही विचारधाराएं इस देश को हजारों साल से पीड़ित किए हुए हैं।
उन विचारधाराओं का हाथ है। न कोई हमसे शर्त करता है कि इन विचाराधाराओं को हम क्या नाम देते हैं? दो विचारधाराओं पर ध्यान दिलाना जरूरी है। एक तो भारत में कोई तीन-चार हजार वर्षों से संतोष की, कंटेंनटमेंट की जीवनधारणा को स्वीकार किया है। संतुष्ट रहना है जितना है उसमें संतोष कर लेना है। जो भी है उसमें भी तृप्ति मान लेनी है।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-08

भारत का भविष्य—(ओशो)
ए रेडियो टाक बाए ओशो,
(नोट-प्रवचन एक से सात तक उपलब्ध नहीं है)
डिस्कोर्स नं० ८
प्रवचन-08
(उदगोश्किाओं में बतचीत का माहौल)

नोकरानी-- . . . तुम कुछ नहीं करती पर मैं तो बहुत कुछ करना भी चाह रही हूं बीबी जी, सच।
मालकिन---हां, लेकिन फिर वही बात की आपने आप करना चाह रही हैं। या कुछ कर रही हैं। मैं तो यह जानना चाहती हूं।
नोकरानी--बीबी जी, देखिए देश विवाह हमारा पहला कर्तव्य है, पहला धर्म है बस इसी के लिए हम कुछ योजनाएं बना रहे हैं।
मालकिन---हां, यानि की और भी उपयोग हैं आपके पास . . .
नोकरानी--मेरी भी पड़ौसने भी अपना सहयोग दे रही हैं।
मालकिन---. . . भई वाह. . .

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-30

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

तीसवां प्रवचन
देख कबीरा रोया

एक आदमी को परमात्मा का वरदान था कि जब भी वह चले, उसकी छाया न बने, उसकी छाप न पड़े। वह सूरज की रोशनी में चलता तो उसकी छाया नहीं बनती थी। जिस गांव में वह था, लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। उसके परिवार के लोगों ने उसको घर से बाहर कर दिया। उसके मित्र और प्रियजन उसको देख कर डरने और भयभीत होने लगे। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन गई कि उसे गांव के बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा। वह बहुत हैरान हुआ, तो उसने परमात्मा से प्रार्थना की कि मैंने केवल छाया खो दी है, और लोग मुझसे इतने भयभीत हो गए हैं, लेकिन लोग तो आत्मा भी खो देते हैं, और तब भी उनसे कोई भयभीत नहीं होता है।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-28

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

अट्ठाईसवां प्रवचन
अनिवार्य संतति-नियमन

प्रश्न: आप तीसरी बार यहां आए हैं। आपकी दो बातों का हम पर असर रहा--एक तो आप बुद्धिनिष्ठा की हिमायत करते हैं और दूसरी विचारनिष्ठा की बात करते हैं आप। गुरु को मानने के लिए आप मना करते हैं।

मैं तो इतना कह रहा हूं कि जो खबरें मेरे बाबत पहुंचाई जाती हैं, वे इतनी तोड़ते-मरोड़ते हैं, इतनी बिगड़ कर पहुंचाई जाती हैं--जब आप मुझे कहते हैं तो मुझे हैरानी हो जाती है। वह जो पत्रकारों से नारगोल में बात हुई थी, उनसे सिर्फ मजाक में मैंने कहा; उनसे सिर्फ मजाक में मैंने यह कहा कि जिसको तुम लोकतंत्र कह रहे हो, इस लोकतंत्र से तो बेहतर हो कि पचास साल के लिए कोई तानाशाह बैठ जाए। यह सिर्फ मजाक में कहा। और उनकी बेवकूफी की सीमा नहीं है, जिसको उन्होंने कहा कि मैं पचास साल के लिए देश में तानाशाही चाहता हूं। मैं जो कह रहा हूं, उनमें से ही किसी ने कहा कि आज जो बातें कहते हैं, इससे तो आपको कोई गोली मार दे तो क्या हो? मैंने तो सिर्फ मजाक में कहा कि बहुत अच्छा हो जाएगा, फिर गांधी से मेरा मुकाबला हो जाए। उन सबने छाप दिया कि मैं गांधी से मुकाबला करना चाहता हूं।

रविवार, 3 सितंबर 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-27

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

सत्ताईसवां प्रवचन
गांधी पर पुनर्विचार

मेरे प्रिय आत्मन्!
डॉ. राममनोहर लोहिया मरणशय्या पर पड़े थे। मृत्यु और जीवन के बीच झूलती उनकी चेतना जब भी होश में आती तो वह बार-बार एक ही बात दोहराते। बेहोशी में, मरते क्षणों में वे बार-बार यह कहते सुने गए। मेरा देश सड़ गया है, मेरे देश की आत्मा सड़ गई है। यह कहते हुए उनकी मृत्यु हुई। पता नहीं उस मरते हुए आदमी की बात आप तक पहुंची है या नहीं पहुंची। लेकिन राममनोहर लोहिया जैसे विचारशील व्यक्ति को यह कहते हुए मरना पड़े कि मेरा देश सड़ गया, मेरे देश की आत्मा सड़ गई है, तो कुछ विचारणीय है।
क्यों सड़ गई है देश की आत्मा? किसी देश की आत्मा सड़ कैसे जाती है? जिस देश में विचार बंद हो जाता है उस देश की आत्मा सड़ जाती है। जीवन का प्रवाह है, विचार का प्रवाह है।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-25

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

पच्चीसवां प्रवचन
समाजवाद: परिपक्व पूंजीवाद का परिणाम

प्रश्न: आपने अभी-अभी ऐसा कहा था कि हमारे यहां अभी सोशलिज्म की जरूरत नहीं है। अभी जो कैपिटलिज्म है, वह यहां फ्लरिश होना चाहिए। उसके बारे में क्या आप कुछ विस्तार से प्रकाश डालेंगे?

हां, मेरी ऐसी दृष्टि है कि समाजवाद पूंजीवाद की परिपक्व अवस्था का फल है। और समाजवाद यदि अहिंसात्मक और लोकतांत्रिक ढंग से लाना हो तो पूंजीवाद परिपक्व हो, इसकी पूरी चेष्टा की जानी चाहिए। पूंजीवाद की परिपक्वता का अर्थ है, एक औद्योगिक क्रांति--कि देश का जीवन भूमि से बंधा न रह जाए, और देश का जीवन आदिम उपकरणों से बंधा न रह जाए। आधुनिकतम यंत्रीकरण हो तो संपत्ति पैदा हो सकती है। और संपत्ति जब अतिरिक्त मात्रा में पैदा होती है, तभी उसका वितरण भी हो सकता है, और विभाजन भी हो सकता है।

शनिवार, 2 सितंबर 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-24

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

चौबीसवां प्रवचन
राष्ट्रभाषा: अ-लोकतांत्रिक

प्रश्न: परमात्मा तक जाने के लिए क्या विश्वास के द्वारा ही जाया जा सकता है?

मेरी समझ ऐसी है कि परमात्मा और विश्वास का कोई संबंध ही नहीं है। और जो भी विश्वास करता है, उसको मैं आस्तिक नहीं कहता। विश्वास का मतलब है कि जिसे हम नहीं जानते हैं, उसे मानते हैं। और मेरा कहना है कि जिसे हम नहीं जानते, उसे मानने से बड़ा पाप नहीं हो सकता। अगर कोई ईश्वर को इनकार करता है और कहता है कि मुझे अविश्वास है, तो भी मैं कह रहा हूं कि वह गलत बात कह रहा है। क्योंकि जब तक उसने खोज न लिया हो, समस्त को खोज न लिया हो और ऐसा पा न लिया हो कि ईश्वर नहीं है, तब तक ऐसा कहना ठीक नहीं कि विश्वास है। और एक आदमी कहता है, मुझे विश्वास है, हालांकि मैंने जाना नहीं, देखा नहीं, लेकिन विश्वास करता हूं।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-23

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

तेईसवां प्रवचन
गांधी की रुग्ण-दृष्टि

मेरे प्रिय आत्मन्!
जॉर्ज बर्नार्डशा ने एक छोटी सी किताब लिखी है। वह किताब सूक्तियों की मैक्सिम्स की किताब है। उसमें पहली सूक्ति उसने बहुत अदभुत लिखी है। पहला सूत्र उसने लिखा है: द फर्स्ट गोल्डन रूल इज़ दैट देअर आर नो गोल्डन रूल्स। पहला स्वर्ण-सूत्र यह है कि जगत में स्वर्ण-सूत्र हैं ही नहीं।
यह मुझे इसलिए स्मरण आता है कि जब मैं सोचते बैठता हूं, गांधी-विचार पर बोलने के लिए, तो पहली बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि गांधी-विचार जैसी कोई विचार-दृष्टि है ही नहीं। गांधी-विचार जैसी कोई चीज नहीं है। "गांधी-विश्वास' जैसी चीज है, "गांधी-विचार' जैसी चीज नहीं है। गांधी के विश्वास हैं कुछ, लेकिन गांधी के पास कोई वैज्ञानिक दृष्टि और कोई वैज्ञानिक विचार नहीं है। गांधी के विश्वासों को ही हम अगर गांधी-विचार कहें, तो बात दूसरी है। क्योंकि विचार का पहला लक्षण है--संदेह। विचार शुरू होता है संदेह से। विचार की यात्रा ही चलती है डाउट, संदेह से। और गांधी संदेह करने को जरा भी राजी नहीं हैं।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-22

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

बाईसवां प्रवचन
विचार-क्रांति की भूमिका

प्रश्न: पिछली बार जब अहमदाबाद आए थे तो आपको सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए थे। तथा आपकी विचारधारा समाचारपत्रों में भी प्रकाशित हुई थी। उनमें से कुछ लोगों का कहना है कि आपके विचार कम्युनिस्ट विचारधारा से बहुत मेल खाते हैं और उसके बहुत समीप हैं। कृपया इस संबंध में आप अधिक प्रकाश डालें।

पहली बात तो यह है कि मेरी दृष्टि में कोई भी विचारशील आदमी किसी न किसी रूप में कम्युनिज्म के निकट होगा ही। यह असंभव है, इससे उलटा होना। और अगर हो तो यह तो वह आदमी विचारशील न होगा, या बेईमान होगा।
उसके कुछ कारण हैं।
जैसे, यह बात अब स्वीकार करनी असंभव है कि दुनिया में किसी तरह की आर्थिक असमानता चलनी चाहिए। यह बात भी स्वीकार करनी असंभव है कि दुनिया किसी तरह के वर्गों में विभक्त रहे। प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी रूप में जीवन में विकास का समान अवसर मिले, इसके लिए भी अब कोई विरोध नहीं होता। और मेरी समझ में, आज ही नहीं, मैं तो बुद्ध को, महावीर को, क्राइस्ट को, सबको कम्युनिस्ट कहता हूं। उन्हें कोई पता नहीं था।

बुधवार, 30 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-21

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

इक्कीसवां प्रवचन,
गांधीवादी कहां हैं?

मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं निरंतर सोचता रहा, व्हेअर आर द गांधीयंस? गांधीवादी कहां हैं? लेकिन मेरे भीतर सिवाय एक उत्तर के और कुछ शब्द नहीं उठे। मेरे भीतर एक ही उत्तर उठता रहा--वहीं हैं, जहां हो सकते थे। यही सोचते हुए रात मैं सो गया और सोने में मैंने एक सपना देखा। उसी से मैं अपनी बात शुरू करना चाहता हूं। शायद यही सोचते हुए सोया था कि गांधीवादी कहां हैं, इसलिए वह सपना निर्मित हुआ होगा।
मैंने देखा कि राजधानी के एक बहुत बड़े बगीचे में जहां गांधीजी की प्रतिमा खड़ी है, मैं उस पत्थर की प्रतिमा के नीचे पड़ी बेंच पर बैठा हूं। दोपहर है और बगीचे में सन्नाटा है, कोई भी नहीं है। मैं सोचने लगा कि गांधीजी से ही क्यों न पूछ लिया जाए कि गांधीवादी कहां हैं? लेकिन इसके पहले कि मैं पूछता, मैंने देखा कि गांधीजी की प्रतिमा कुछ बड़बड़ा रही है। तो मैं गौर से सुनने लगा।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-20

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

बीसवां प्रवचन
वैज्ञानिक विकास और बदलते जीवन-मूल्य

प्रश्न: इस औद्योगिक युग में आत्म-अभिव्यक्ति के द्वारा मनुष्य आत्म-साक्षात्कार कैसे करे?

दोत्तीन बातें--एक तो मनुष्य सदा से ही औद्योगिक रहा है, इंडस्ट्रियल रहा है। चाहे वह छोटे औजार से काम कर रहा हो या बड़े औजार से काम कर रहा हो--छोटे पैमाने पर काम कर रहा हो, बड़े पैमाने पर काम कर रहा हो, आदमी जब से पृथ्वी पर है तब से इंडस्ट्रियल एक साथ है, वह आदमी के साथ ही था। और जैसे आज हम लगता है कि दो हजार साल पहले आदमी इंडस्ट्रियल नहीं था, दो हजार साल हम भी इंडस्ट्रियल नहीं मालूम होंगे।
पहले तो बात यह समझ लेने जैसी है कि मेरी समझ ही यह है कि आदमी, आदमी होने की वजह से ही इंडस्ट्रियल है। आदमी को पशु से जो बात भिन्न करती है वह उसका यंत्रों का उपयोग है। वह कितने ही छोटे पैमाने पर हो, यह दूसरी बात है। लेकिन हमेशा से आदमी उद्योग में लगा है।

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-19

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

उन्नीसवां प्रवचन
परस्पर-निर्भरता और विश्व नागरिकता

नॉन-प्राडक्टिव वेल्थ के लिए हम टैक्सेस ज्यादा लगाएं और प्राडक्टिव वेल्थ के लिए हम जितना प्रमोशंस दे सकें, दें। दो ही तो उपाय हैं। अगर एक आदमी लाख रुपया पाया है मुफ्त में तो उस पर टैक्स भारी होना चाहिए और एक आदमी लाख रुपये से कुछ प्रॉडयूस कर रहा हो, डेढ़ लाख पैदा कर रहा हो तो उस पर टैक्सेस कम होने चाहिए। अभी हालतें उलटी हैं अगर आप लाख रुपया अपने घर में रख कर कुछ भी नहीं कमाते तो आपको कोई टैक्सेशन नहीं है और अगर आप डेढ़ लाख कमाते हैं तो आप पर टैक्सेशन हैं। अभी अगर वेल्थ को क्रिएट करते हैं तो आपको दंड देना पड़ता है टैक्सेशन के रूप में। अगर आप वेल्थ को रोक कर बैठ जाएं तो उसका कोई दंड नहीं है!

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-18


देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

अठारहवां प्रवचन
प्रेम-विवाह: जातिवाद का अंत

हमारे यहां चूंकि जातिवाद का राजकरण है--जो हिंदू है, वह हिंदू को वोट देता है, जो मुस्लिम है वह मुस्लिम को वोट देता है। हमारे यहां बहुत कौमें हैं। आपके खयाल में इसको मिटाने के लिए क्या करना चाहिए?

दोत्तीन बातें करना चाहूंगा। एक तो जातीय दंगे को साधारण दंगा मानना शुरू करना चाहिए। उसे जातीय दंगा मानना नहीं चाहिए, साधारण दंगा मानना चाहिए। और जो हम साधारण दंगे के साथ व्यवहार करते हैं वही व्यवहार उस दंगे के साथ भी करना चाहिए, क्योंकि जातीय दंगा मानने से ही कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं, इसलिए जातीय दंगा मानने की जरूरत नहीं है। जब एक लड़का एक लड़की को भगा कर ले जाता है, वह मुसलमान हो कि हिंदू, कि लड़की हिंदू है कि मुसलमान है--इस लड़के और लड़की के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिए, जो कोई लड़का किसी लड़का को भगा कर ले जाए, और हो। इसको जातीय मानने का कोई कारण नहीं है।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-17

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

सत्रहवां प्रवचन
असली अपराधी: राजनीतिज्ञ

आज तक आपने जो किया है, उसका मिशन क्या-क्या है--आपका उद्देश्य क्या है? महाबलेश्वर शिविर में मैं आ चुका हूं।

दोत्तीन बातें हैं। हमारे समाज की और हमारे देश की एक जड़ मनोदशा है, जहां चीजें ठहर गई हैं, बहुत समय से ठहर गई हैं। उनमें कोई गति नहीं रह गई। कोई दो ढाई हजार वर्ष से हम सिर्फ पुनरुक्ति कर रहे हैं। दो ढाई हजार वर्ष से हमने नये का स्वागत बंद कर दिया है, पुराने की ही पुनरुक्ति कर रहे हैं। तो मेरे काम का पहला हिस्सा पुराने की पुनरुक्ति को तोड़ता है। और पुराने की पुनरुक्ति का हमारा मन टूटे, तो ही हम नये के स्वागत के लिए तैयार हो सकते हैं, वह दूसरा हिस्सा है। तो पहला तो पुराने को पकड़ने की हमारी जो आकांक्षा है, और जो नये का भय है, ये दो हिस्से हैं। पुराने को तोड़ देने का और नये के स्वागत के लिए मार्ग खोलने का।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-16

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

सोलहवां प्रवचन
विध्वंस: सृजन का प्रारंभ

यह सवाल नहीं है। पहली बात तो यह कि मैं निपट एक व्यक्ति की भांति, जो मुझे ठीक लगता है वह में कहूं। न तो मेरी कोई संस्था है, न कोई संगठन। हां, कोई संगठन बना कर मेरी बात उसे ठीक लगती है और लोगों तक पहुंचाए, तो वैसा संगठन जीवन जागृति केंद्र है। वह उसका संगठन है, जिन्हें मेरी बात ठीक लगती है और वे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन मैं उस संगठन का हिस्सा नहीं हूं और उस संगठन का मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं है, इसलिए वह संगठन रोज मुश्किल में है। क्योंकि कल मैंने कुछ कहा था, वह संगठन के लोगों को ठीक लगता था। आज कुछ कहता हूं, नहीं ठीक लगता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। मेरी तो उनसे कोई शर्त नहीं है, उनसे मैं बंधा हुआ नहीं हूं, इसलिए जितनी प्रवृत्तियां चलती हैं, जिन्हें मेरी बात ठीक लगती है, उनके द्वारा चलती हैं।
मेरे द्वारा तो सिर्फ एक ही प्रवृत्ति चलती है कि जो मुझे ठीक लगता है, वह मैं कहता रहता हूं।

रविवार, 20 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-15

 देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

पंद्रहवां प्रवचन
भौतिक समृद्धि अध्यात्म का आधार

जो ठीक है और सच है वह मुझे कहना ही पड़ेगा। इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं। आखिर जो सत्य है, लोगों को उसके साथ आना पड़ेगा--चाहे वे आज दूर जाते हुए मालूम पड़ें। और लोग पास हैं इसलिए मैं असत्य नहीं बोल सकता। क्योंकि सच जब भी बोला जाएगा, तब भी प्राथमिक परिणाम उसका यही होगा कि लोग दूर भागेंगे। क्योंकि हजारों वर्षों की धारणा में वे पले हैं, उस पर चोट पड़ेगी। सत्य का हमेशा ही यही परिणाम हुआ है। सत्य हमेशा डिवास्टेंटिंग है। एक अर्थ है कि वह जो हमारी धारणा है उसको तो तोड़ डालेगा। और अगर धारणा तोड़ने से हम बचना चाहें तो हम सत्य नहीं बोल सकते। जान कर मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाह रहा हूं। डेलिब्रेटली मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन सत्य जितनी चोट पहुंचाता है उसमें मैं असमर्थ हूं, उतनी चोट पहुंचेगी। उसको बचा भी नहीं सकता हूं। फिर मैं कोई राजनीतिक नेता नहीं हूं कि मैं इसकी फिक्र करूं कि लोग मेरे पास आएं, कि मैं इसकी फिक्र करूं कि पब्लिक ओपिनियन क्या है?

शनिवार, 19 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-14

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

चौदहवां प्रवचन
पूंजीवाद का दर्शन

इस वक्त तकलीफ यह है कि समाजवादी तो कह रहा है, और पूंजीवाद चुप है, वह सब देख रहा है। अपने घर में बैठ कर कह रहा है कि यह क्या हो रहा है। तब वह मर ही जाएगा, कोई उपाय नहीं है।

समाजवादी आपके पास आकर कहता नहीं है कि आप गलत बात कर रहे हैं?

मुझसे कोई आकर कहे तो मैं सदा तैयार हूं समझने को, अपनी बात समझाने को। अगर आप किसी बात को ठीक से कह रहे हैं और ठीक है बात, तो बहुत कठिनाई है एंटी सोशलिज्म की बात में। तो फिलासफी नहीं बना सकेंगे आप, इसलिए कहते हैं। जब तक आपके पास अपने आर्ग्युमेंट न हों...सोशलिज्म के पास अपने आर्ग्युमेंट हैं इसलिए आप परेशानी में पड़ जाते हैं। आपके पास आर्ग्युमेंट हैं इसलिए आप परेशानी में पड़ जाते हैं। आपके पास आर्ग्युमेंट नहीं हैं। और बिना आर्ग्युमेंट के आप जब कुछ कहते हैं तो ऐसा लगता है कि सिर्फ आपका इंट्रेस्ट है इसलिए आप बकवास कर रहे हैं।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-13

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

तेरहवां प्रवचन
समाजवाद: पूंजीवाद का विकास

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरे खयाल में तो अगर कोई बात सत्य है, उपयोगी है, तो सत्य अपना माध्यम खोज ही लेता है। नहीं अखबार थे तब की दुनिया में, सत्य मरा नहीं। बुद्ध के लिए कोई अखबार नहीं था, महावीर के लिए कोई अखबार नहीं था, क्राइस्ट के लिए कोई अखबार नहीं था। तो भी क्राइस्ट मर नहीं गए। अगर बात में कुछ सच्चाई है, तो सत्य अपना माध्यम खोज लेगा। अखबार भी उसका माध्यम बन सकता है। लेकिन अखबार की वजह से कोई सत्य बचेगा, ऐसा नहीं है। या अखबार की वजह से कोई असत्य बहुत दिन तक रह सकता है, ऐसा भी नहीं है। माध्यम की वजह से कोई चीज नहीं बचती है, कोई चीज बचने योग्य हो, तो माध्यम मिल जाता है। अखबार भी मिल ही जाएगा। नहीं मिले, तो भी इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। हम जो कह रहे हैं, वह सत्य है, इसकी चिंता करनी चाहिए। अगर वह सत्य है तो माध्यम मिलेगा।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-12

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

बारहवां प्रवचन
समाजवाद का पहला कदम: पूंजीवाद

जैसे ही समाज में सुविधा बढ़ती है, सुख बढ़ता है, धन बढ़ता है, वैसे ही परेशानी बढ़ती है। जब आप भी सुखी थे तो आपमें भी परेशान आदमी पैदा हुआ है। हरे राम जो आप भज रहे थे, वह आपके सुखी समाज ने पैदा किया था, वह गरीब आदमी ने पैदा नहीं किया था। वह बुद्ध या महावीर जैसे अमीर घर के बेटे जाकर हरे राम कर रहे थे। एक गरीब आदमी इतना परेशान है कि और परेशान होने का उसे उपाय नहीं है। इसलिए यह जो आप सोचते हैं, एस्केपिज्म नहीं है, यह सुविधा है जो कि आपको...होता क्या है, कठिनाई क्या है, मुझे एक तकलीफ है, मुझे खाना नहीं मिल रहा, तो मेरा चौबीस घंटा तो खाना जुटाने में व्यतीत होता है। मुझे रहने को मकान नहीं है, तो मैं उसमें परेशान हूं, और मेरे सारे सपने इसके होते हैं कि मुझे खाना कैसे मिल जाए, मकान कैसे मिल जाता है, कपड़ा कैसे मिल जाए, एक औरत कैसे मिल जाए?

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-11

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

ग्यारहवां प्रवचन
गांधीवाद ही नहीं, वाद मात्र के विरोध में हूं

आपके प्रवचनों से जो सारा ही गुजरात में एक हलचल मच गई है। तो इसमें आप खुलासा कर सकते हैं?

किस संबंध में? कुछ एक-एक बात...

अगर गांधीजी के बारे में बोलेंगे और किसी व्यक्ति के बारे में बोलेंगे, तो आपको बोला है, इस गैर-संदिग्ध होगी यह। आज तो हमने सुना, तो उसमें कोई गैर-संदिग्ध नहीं होती है। न आपने गांधीजी की निंदा की है, न ही क्राइस्ट की। मगर यह गैर-संदिग्ध हो गई है सारे गुजरात में कि आपने गांधीजी की निंदा की या नेहरू जी की निंदा की, तो इसमें आप कुछ खुलासा कर सकते हैं?

किसी व्यक्ति की निंदा करने का मेरे मन में कोई सवाल ही नहीं है। और व्यक्ति की निंदा का कोई प्रयोजन भी नहीं है। वाद की जरूर मेरे मन में बहुत निंदा है। वाद, संप्रदाय--चाहे वह राजनैतिक हो, चाहे धार्मिक हो, सब तरह के बाड़े टूटने चाहिए, और मनुष्य का मन सोचने-समझने के लिए मुक्त होना चाहिए।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-10

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

दसवां प्रवचन
मेरी दृष्टि में रचनात्मक क्या है?
मेरे प्रिय आत्मन्!

बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं। एक मित्र ने पूछा है कि मैं बोलता ही रहूंगा, कोई सेवा कार्य नहीं करूंगा, कोई रचनात्मक काम नहीं करूंगा, क्या मेरी दृष्टि में सिर्फ बोलते ही जाना पर्याप्त है?

इस बात को थोड़ा समझ लेना उपयोगी है। पहली बात तो यह कि जो लोग सेवा को सचेत रूप से करते हैं, कांशसली, उन लोगों को मैं समाज के लिए अहितकर और खतरनाक मानता हूं। सेवा जीवन का सहज अंग हो छाया की तरह, वह हमारे प्रेम से सहज निकलती हो, तब तो ठीक; अन्यथा समाज-सेवक जितना समाज का अहित और नुकसान करते हैं, उतना कोई भी नहीं करता है।
समाज-सेवा भी अहंकारियों के लिए एक व्यवसाय है। दिखाई ऐसा पड़ता है कि समाज-सेवक विनम्र है; सबकी सेवा करता है; लेकिन सेवक के अहंकार को कोई देखेगा तो पता चलेगा कि सेवक भी सेवा करके मालिक बनने की पूरी चेष्टा में संलग्न होता है।

रविवार, 13 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-09

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

नौवां प्रवचन
गांधी का चिंतन अवैज्ञानिक है

...व्यवहार करते हैं। ये दोनों तरकीबें हैं। जिंदा आदमी को मार डालो और मरे हुए आदमी की पूजा करो। ये छूटने के रास्ते हैं, ये बचने के रास्ते हैं। फिर पूजा भी हम उसी की करते हैं जिसे हमने बहुत सताया हो। पूजा मानसिक रूप से पश्चात्ताप है। वह प्रायश्चित्त है। जिन लोगों को जीते जी हम सताते हैं, उनके मरने के बाद पूरा समाज उनकी पूजा करता है; ऐसे प्रायश्चित्त करता है। वह जो पीड़ा दी है, वह जो अपराध किया है, वह जो पाप है भीतर, उस पाप का प्रायश्चित्त चलता है, फिर हजारों साल तक पूजा चलती है। पूजा किए गए अपराध का प्रायश्चित्त है। लेकिन वह भी अपराध का ही दूसरा हिस्सा है।
गांधी को जिंदा रहते में हम सताएंगे, न सुनेंगे उनकी, लेकिन मर जाने पर हम हजारों साल तक पूजा करेंगे। यह गिल्टी कांसियंस, यह अपराधी चित्त का हिस्सा है यह पूजा। और फिर इस पूजा के कारण हम सोचने-विचारने को राजी नहीं होंगे। पहले भी हम सोचने-विचारने को राजी नहीं होते। गांधी जिंदा हों तो हम सोचने-विचारने को राजी नहीं हैं।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-06

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

छठवां-प्रवचन
तोड़ने का एक और उपक्रम

मेरे प्रिय आत्मन्!
मित्रों ने बहुत से प्रश्न से पूछे हैं। एक मित्र ने पूछा है: महापुरुषों की आलोचना की बजाय उचित होगा कि सृजनात्मक रूप से मैं क्या देखना चाहता हूं देश को, समाज को, उस संबंध में कहूं।

लेकिन आलोचना से इतने भयभीत होने की क्या बात है। क्या यह वैसा ही नहीं है हम कहें कि पुराने मकान को तोड़ने की बजाय नये मकान को बनाना ही उचित है? पुराने को तोड़े बिना नये को बनाया कब किसने है? और कैसे बना सकता है? विध्वंस भी रचना की प्रक्रिया का हिस्सा है। तोड़ना भी बनाने के लिए जरूरी हिस्सा है। अतीत की आलोचना भविष्य में गति करने का पहला चरण है और जो लोग अतीत की आलोचना से भयभीत होते हैं, वे वे ही लोग हैं जो भविष्य में जाने में सामर्थ्य भी नहीं दिखा सकते हैं।
लेकिन इतना भय क्या है? सृजनात्मक आलोचना, एक क्रिएटिव क्रिटिसिज्म से इतना भय क्या है? क्या हमारे महापुरुष इतने छोटे हैं कि उनकी आलोचना से हमें भयभीत होने की जरूरत पड़े। और अगर वे इतने छोटे हैं तब तो उनकी आलोचना जरूर ही होनी चाहिए, क्योंकि उनसे हमारा छुटकारा हो जाएगा। और अगर वे इतने छोटे नहीं हैं तो आलोचना से उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है।