असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर
माथेरान, दिनांक 21-10-67 सुबह
(अति-प्राचीन प्रवचन)
प्रवचन-आठवां-(सृजन का सूत्र)
मेरे प्रिय आत्मन्,
मनुष्य एक तिमंजिला मकान है। उसकी एक मंजिल तो भूमि के ऊपर है, बाकी दो मंजिल जमीन के नीचे। उसकी पहली मंजिल में, जो
भूमि के ऊपर है, थोड़ा प्रकाश है। उसकी दूसरी मंजिल में,
जो जमीन के नीचे दबी है और भी कम प्रकाश है। और उसकी तीसरी मंजिल
में जो बिलकुल भूगर्भ में छिपी है, पूर्ण अंधकार है, वहां कोई प्रकाश नहीं है।
इस तीन मंजिल के मकान में--जो कि मनुष्य है, अधिक लोग ऊपर की मंजिल में ही जीवन को व्यतीत कर देते हैं। उन्हें नीचे की
दो मंजिलों का न तो कोई पता होता है, न खयाल होता है। ऊपर की
मंजिल बहुत छोटी है। नीचे की दो मंजिलें बहुत बड़ी हैं। और जो अंतिम अंधेरा भवन है
नीचे, वही सबसे बड़ा है--वही आधार है सारे जीवन का।


