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बुधवार, 24 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-16)

एक और अद्वैत ब्रह्म—सोलहवां प्रवचन

सूत्र :

समाधातुं वाह्मादृष्ट्या प्रारब्‍धं वदीत श्रुति:।
न तु देहादिसत्यत्व बोधनाय विपीश्चताम्।। 60।।
पीरपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमीवक्तियम्।
सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्यम्।। 611।
प्रत्कोकरसं पूर्णमनन्‍त सर्वतोमुखम्।
अहेयमुनपादेयमनधेयमनाश्रयम्।। 62।।
निर्गुण निष्क्रियं सूक्ष्‍मं निर्विकल्प निरंजनम्।
अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम्।। 63।।
सत्समृद्धं स्वत: सिद्ध शुद्धं बुद्धिमनीदृशम्।
एकमेवढ़यं ब्रह्म नेह नानाऽस्ति किंचन।। 64।।
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखीडतम्।
स सिद्ध: सुसुखं तिष्ठन् निर्विकल्पात्मनाऽत्मत्रि।। 65।।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-15)

मेरे का सारा जाल कल्‍पित है—पंद्रहवां प्रवचन

 सूत्र :
 प्रारब्‍धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थिति।
देहात्मभावो नैवेष्ट: प्रारब्धं त्यज्यतामत:।। 56।।
प्रारब्‍धकल्पनाsप्यस्य देहस्य अति रेष हि।। 57।।
अध्यस्तस्य कुतस्य असत्यस्य कुतोजनिः।
अजातस्य कुतो नाश: प्रारब्‍धमसत: कुत:।। 58।।
ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि।
तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् ।। 59।।


प्रारब्ध कर्म तो उसी समय सिद्ध होता है, जब देह के ऊपर आत्म—बुद्धि होती है। पर देह के ऊपर आत्म—भाव रखना तो कभी इष्ट नहीं है, इसलिए देह के ऊपर की आत्म—बुद्धि को तज कर प्रारब्ध कर्म का त्याग करना।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-14)

आकाश के समान असंग है जीवन्‍मुक्‍त–चौदहवां प्रवचन

सूत्र:

स्यमसंगमुदासीनं परिज्ञाय नत्रो यथा।
न श्लिष्यते यति: किंचित् कदाचिद्भाविकर्मभि:।। 51।।
न नभो घटोयोगेन सुरणन्धेन लिप्यते।
तथऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धमैंनेव लिप्यते।। 52।।
ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्‍धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति।
यदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टवाणवत्।। 53।।
व्याघ्रबुद्धया विनिर्मुक्तो वाण: पश्चातु गोमतै।।
न तिष्ठति भिनत्येव लक्ष्मं वेगेन निर्भरम्।। 54।।
अजरोऽस्टयमरोऽध्स्मीति व आत्मानं प्रयद्यते।
तदात्मना तिष्ठतोध्स्य कुत: प्रारब्ध कल्पना।। 55।।

रविवार, 21 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-13)

जीवन्‍मुक्‍त है संत—तेरहवां प्रवचन


सूत्र :

न प्रत्यग्ब्लणोभेदं कथधिद च्छसर्गयो:।
प्रज्ञथा यो विजानाति स जीवन्मुक्ल इष्यते।। 46।।

साधुभि: पूज्यमनेsस्मिन् पीड्यमानेऽपि दुर्जनै:।

सक्यावो भवेद्यस्य स जीवमुक्‍त इष्‍यते।। 47।।

विज्ञातब्रह्मतत्वस्य यथापूर्व न संसृति:।

अस्ति चेन्‍न स विज्ञातब्रह्माभावो बहिर्मुख:।। 48।।

सुखाद्यनुभवो यावत् तावत् प्रारख्यीमष्यते।

फलोदय: क्रियापूर्वो निकियो न हि कुत्रचित्।। 49।।

अहं ब्रह्मोति विज्ञानात् कल्पकोटिशतर्जितम्।

संचितं विलयं याति प्रबोधान् स्वप्नकर्मयत्।। 50।।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-12)

वैराग्‍य आनंद का द्वार है—बारहवां प्रवचन

      सूत्र :

वासनाsनुदयो भोग्ये वैरण्यस्य तदाsविधि:
अहंभावावोदयभावो बोधक्य परमावधि:।। 41।।
लीनवृत्तेरनुत्पीत्तर्मर्यादोपरतेस्तु    सा।
स्थिऋज्ञो यतिरयं य: सदानन्दमश्नुते।। 42।।
ब्रह्मण्‍येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिक्रिय:।
ब्रह्मात्‍मनो     शोधितयोरेकभावावगाहिनी।। 43।।
निर्विकल्पा व चिन्मात्रा वृत्तिःप्रज्ञेति कथ्यते।
सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते।। 44।।
देहेन्द्रियेच्छंभाव        इदंभावस्तदन्यके।
यस्य नो भवत: क्यापि स जींवन्मुक्त इष्‍यते।। 45।।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-11)

धर्म—मेध समाधि—ग्‍यारहवां प्रवचन

     सूत्र :


वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचरह:।

स्मरणादनुम।ईयन्ते व्युइप्प्थतस्य समुइप्प्थता:।। 36।।

अनादाविह संसारे संचिता: कर्मकोटय:।

अनेन विलयं यान्‍ति शुद्धो धर्मोऽभिवर्धते।। 37।।

धर्ममेधमिमं प्राहु: समाधि यप्तोवित्तम।:।

वर्षत्येष यथा धमर्त्मृतधारा: सहसश:।। 38।।

अमुना वासनाजाले निःशेष प्रीवलायिते।

समूलोन्मूलिते. पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये।। 39।।

वाक्यस्मृतिबद्धं सत् प्राक् परोक्षावमासते।

करामलकवद्बोधमपरोक्षं      प्रसूयते।। 40।।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-10)

सत्‍य की यात्रा के चार चरण—(प्रवचन—दसवां)

सूत्र :



इत्‍थं वाक्यैस्तदर्थानसंधानं श्रवणं भवेत।

युक्ता सभावितत्वा संधानं मननं तु तत्।। 33।।

ताभ्यां निर्विचिकित्‍सेकत्सेध्थें चेतस: स्थायितस्य तत्।

एकतानत्वमेतीद्ध निदिध्यासनमुच्यते।। 34।।

ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्धयैयैकगे।चरम्।

निवातदीपवच्चितं समाधिरभिंधीयतै।। 35।।


इस प्रकार’तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव—ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है।
इस श्रवण और मनन द्वारा निस्संदेह हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतान बनना, यह निदिध्यासन है।

फिर ध्याता तथा ध्यान का त्याग करके चित्त केवल एक ध्येय को ही विषय रूप माने और वायुरहित स्थान में रखे हुए दीए के समान निश्चल बन जाए, उसको समाधि कहते हैं।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-09)

ब्रह्म की छाया संसार है—नौवां प्रवचन

सूत्र :

मायोपष्टिर्जगद्योंनि: सर्वज्ञत्वादिलक्षण:।

पारोक्ष्यशबल: सत्याद्यात्मकस्तत्पदत्मिधः।। 30।।

आलम्बतनया भाति योsस्मत्सत्ययशब्दये।:।

अंतःकरणसंत्मईन्नबा: एधः अ त्वपदत्मिधः।। 31।।

मायाऽविद्ये विहायैव उपाधी परजींवयो:।

अखंड सच्चिदानन्दं परं क्ल विलक्ष्मते।। 32।।


मायारूप उपाधि वाला, जगत का उत्पत्ति स्थान, सर्वज्ञता आदि लक्षणों से युक्त, परोक्षपन से मिश्र और सत्य आदि स्वरूप वाला जो परमात्मा है, वही तत् शब्द से प्रसिद्ध है।

और जो मैं ऐसे अनुभव तथा शब्द का आश्रय जान पड़ता है, जिसका ज्ञान अंतःकरण से मिथ्या है, वह (जीव) त्वम् शब्द से पुकारा जाता है।
इस परमात्मा को माया और जीव को अविद्या—ऐसी दो उपाधि हैं, इनको त्याग करने से अखंड सच्चिदानंद परम ब्रह्म ही जान पड़ता है।'

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-08)

वैराग्‍य का फल ज्ञान है—आठवां प्रवचन

सूत्र :
 चित्तमूलो विकल्येष्यं चित्तभावे न कश्चन।
अतश्चित्तं समोधोहि प्रत्‍यग्रूपे परत्श्मिनि। 26।।
अखडानंदमात्मनं विज्ञाय स्वस्वरूपत:।
बहिरंत: सदानंदरसास्यादनमात्मीन।। 27।।
वैरण्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरीत: फलम्।
स्यानंदानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरते: फलम्।। 28।।
यद्युत्तरोत्तरभावे पूर्वपूर्वं तु निष्फलम्।
निवृफ्रि परमा तृप्‍तिरानन्द।एऽनुपम: स्वत:।। 29।।

 इस विकल्प (भेद) का मूल चित्त है, अगर चित्त न हो तो कोई भेद है ही नहीं, इसलिए प्रत्यक  स्‍वरूप परमात्मा में तू चित्त को एकाग्र कर दे।
अखंड आनंदरूप आत्मा को स्वस्वरूप जान कर इस आत्मा में ही बाहर और भीतर सदा आनंद रस का तू स्वाद ले।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-07)

चैतन्‍य का दर्पण—(प्रवचन—सातवां)

सूत्र :

स्वात्‍मन्यारोपितशेषाभासवस्तुनिरासित:।
स्वयमेव परब्रह्म पूर्णम्हयमीक्रयम्।। 21।।
असत्कल्पो विकल्पो यं विश्वीमत्येकवस्तुनि।
निर्विकारे निराकरे निर्विशेषेर्भिदा कुत:।। 22।।
द्रष्टा दर्शनदृश्याटिभावशन्ये निरामये।
कल्यार्णव इवात्यन्तं परिपूणें चिदात्‍मनि।। 23।।
तेजसींव तमो यत्र विलीनं भ्रांतिकारणम्।
अडइत।ईये परे तन्वे निर्विशेषेर्भिदा कुतः।। 24।।
एकतमके परे तन्वे भेदकर्ता कथं वमेत्।
सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेद: केनावलोकित:।। 25।।

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-06)

जीवन एक अवसर है—छठवां प्रवचन

सूत्र :

जीवतो यस्य कैवस्यं विंदेहोऽयि स केवल:।

समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानध।। 16।।

ओं' अज्ञानहदयग्रन्धेर्नि: शेषीवलयस्तदा।

समाधिन।ऽविकल्पेन यदापुद्वैतल्मदर्शनम्।। 17।।

अत्रात्मन्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन्।

उदासीनतय। तेषु तिष्ठेद्घटपटादिवत्।। 18।।

च्छादिस्तम्स पर्यन्त मृषामात्रा उपनय:।

ततः पूर्ण स्यात्मनं पश्येदेकल्मना स्थितम्।। 19।।

स्वयं च्छा स्वयं विष्णु: स्वयीमन्त्र: स्वयम् शिव:।

स्वयं विश्वमिदं सर्व स्यस्मादन्यन्न किंचन्।। 20।।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-05)

वासना का नाश ही मोक्ष है—पांचवां प्रवचन

सूत्र :

अहंकारग्रहान्मुक्त: स्वरूपमुपपद्यते।
चंद्रवत्विमल: पूर्ण सदानन्द: स्वक्यंभ:।। 11।।
क्रियानाशाद्वेच्‍चिन्‍तानाशी तस्मद्धासनाक्षय:।
वासनाध्पक्षयोमोक्षः स जीवन्मुक्तिरिष्यते।। 12।।
सर्वत्र सर्वत: सर्व ब्रह्ममान्नावलोकनम्।
सद्भावभावनादाढद्वासनात्नश्यमनुते।। 13।।
प्रमादो च्छनिष्ठायां न कर्तव्य: कदाचन।
प्रमादो कृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः।। 14।।
यथाsपकृष्ठं शैवालं क्षणमात्र न तिष्ठति।
आवृणोति तथा माया प्राज्ञा वाsपि परांगमुखम्।। 15।।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-04)

अमृत का जगत—चौथा प्रवचन

सूत्र :


मातायित्रोर्मलोद्भूतं मलमासमयं वपु:।
त्यक्त्वा चण्डालवद्दूरं ब्रह्मभूयं कृती भव।।6।।
घटाकाशं महाकाशं इवात्मानम् परात्मीन।
विलाप्याखंडभावेनं तयणीं भव सदा मुने।।7।। 
स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूव सदात्मना।
ब्रह्मांडमपि पिंडाडं त्यज्यतां मलभांडवत्।।8।।
चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्।
निवेश्य लिंगमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा।।9।।
यत्रैष जगदाभासो दर्पशन्त: पुरं यथा।
तदब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भवानघ।।10।।

 यह शरीर माता—पिता के मैल में से उत्पन्न हुआ है और मल तथा मास से ही भरा है, इसलिए इसे चंडाल की तरह त्याग कर ब्रह्मरूप होकर तू कृतार्थ हो।

हे मुनि! महाकाश में घटाकाश की तरह परमात्मा में आत्मा को एकरूप करके अखंड भाव से सदा शांत रही।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन-03)

नेति—नेति—तीसरा प्रवचन

सूत्र :

ज्ञत्‍वा स्वयं प्रत्यगात्मनं ब्रुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्।
सौध्हमित्येव तद्वृत्या स्वान्यत्रात्ममीतं व्यजेत्।।2।।
लोकानुवर्तनं त्यक्‍त्‍वा त्‍यक्‍त्‍वा देहानुवर्तनम्।
शास्त्रानुवर्तनम् त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं करु।।3।।
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या क्यों नश्यीत योहीनः।
यक्त्‍या श्रुत्या स्वानभत्या ज्ञात्वा सावत्म्यिमात्मन:।।4।।
निंद्राय लोकवार्ताया शब्दादेरात्मीवस्मृते:।
क्वचिन्नावसरं दत्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ।।5।।

 अपने को बुद्धि और उसकी वृत्ति का साक्षी—प्रत्यगात्मा जान कर वह मैं ही हूं—ऐसी वृत्ति द्वारा  (अपने सिवाय ) सब पदार्थों के ऊपर से आत्म—बुद्धि का त्याग करना।
लोक का अनुसरण करना छोड कर देह का अनुसरण भी छोड़ देना, इसके पश्चात शास्त्र का अनुसरण छोड़ कर आत्मा के ऊपर का अध्यास भी छोड़ देना।

अपनी ही आत्मा में स्थित 'होकर युक्ति, श्रवण तथा स्वानुभव द्वारा अपने को ही सबका आत्मरूप जान कर योगी का मन नाश होता है।
निद्रा को, लोगों की बातों को, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि विषयों को तथा आत्मा के विस्मरण को किसी स्थल पर अवसर दिए बिना हृदय में आत्मा का चिंतन करना।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म-उपनिषद--(प्रवचन--02)

परमात्‍मा मझधार है—दूसरा प्रवचन

सूत्र :

अंत:  शरीरे  निहतो  गुहायामज   एको    नित्यमस्य।
पृथिवी शरीरं व: पृखूइवीमंतरे संचरन् यं पृद्धइवी न  वेद।
यस्याप: शरीरं योएध्पोऽन्तरे संचरन् यमापो न    विदुः।
यस्य तेज: शरीरं यस्तेजोऽन्तरे संचरन् यं तेजो   वेद।
यस्य वायु: शरीर यो वमुमन्तरे  संचरन् यं  वायुर्न  वेद।
यस्याकाश: शरीरं व आकाशमन्तरेसंचरन् यमाकाशो न वेद।
यस्य मन: शरीर  यो  मनोध्न्तरे संचरन्  यं मनो न वेद।
यस्य बुद्धि: शरीर यो  बुद्धिमन्तरे संचरन्  यं  बुद्धिर्न वेद।
यस्याहंकार: शरीरं योध्हंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद।
यस्य चित्त शरीर यश्चित्तमन्तरे संचरन् यमीचत्तं न वेद।
यस्याव्यक्सं शरीरं योध्व्यक्तमन्तरे संचरन् यमध्यक्लं न वेद।
यस्याक्षरं शरीर येष्क्षरमन्तरे  संचरन्   यमक्षरं न वेद।
यस्य मृत्यु: श्प्रीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद।
त्र एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाम्मा दिव्यो देव नारायण:।
अहं   समेति   यो   भावो        देहाक्षाद्यवनल्मीन।
अध्यासो   यं   निरस्तव्यो   विदुषो  च्छनिष्ठया ।।1।।

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन--01)

                  आध्‍यात्‍म उपनिषद-ओशो 


जीवन के द्वार की कुंजी—पहला प्रवचन


                        शांति पाठ

ओम शं नो मित्र: शै वरुण:। शै नो भवर्त्यम।। शं न इंद्रो बृहस्पति:। शं नो विष्णुरुक्रम:।
नमे। क्यणे। नमस्ते वाये।। त्वमेव प्रत्यक्ष ब्लासि त्वमेव प्रत्यक्ष क्ल वादिष्यामि।
            ऋत वादिष्यामि। सत्यं वादिष्यामि। तन्मामवतु।
            ऋक्लारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।
                       
                  ओम शांतिः शांतिः शांति:।


ओम, हमारे लिए सूर्य देवता कल्याणकारी हों। वरुण कल्याणकारी हों, अर्यमा कल्याणकारी                    हों, इंद्र और बृहस्पति भी कल्याणकारी हों, विष्णु कल्याणकारी हों।