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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–10)

प्रेम है एक मृत्यु—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 19 जूलाई 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
पहला प्रश्न :
प्यारे भगवान! अब वहां न कोई खोज रही और न कोई तलाश रही वह सब कुछ बंद कर दिया मैने उसमें कुछ भी तो विशिष्ट नहीं पाया, लेकिन अब मैं अपने को स्वतंत्र पाता है जैसे सभी से मुक्त हो गया हूं मैं अपने काम धंधे पर बाहर जाता जरूर हूं पर बिना किसी व्यग्रता के यह मेरे लिए वरदान और आशीर्वाद जैसा है? और मैं यहां आपकी उपस्थिति में उमड़ती कृतज्ञता की एक बाढ़ का अनुभव करता हूं।
यहां खोजने के लिए कुछ भी विशिष्ट या खास नहीं है। किसी विशिष्ट की खोज ही भ्रमपूर्ण है, पूरी तरह से एक धोखा है। मन कुछ विशिष्ट चीज की खोज करना चाहता है, मन के साथ यही समस्या है। परमात्मा कोई विशिष्ट चीज अथवा कोई विशिष्ट अस्तित्व नहीं है।

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–09)

अपने अंदर के अरूप में स्थित हो जाओ—(प्रवचन—नौंवां)

दिनांक 18 जूलाई 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
बाऊल गीत:
ओ मैरे हृदय!
तू अपने आपको उस वेष में सज्जित कर
जिसमें सभी स्त्रियोचित सार तत्व हों,
तू अपनी प्रकृति और आदतों को बदल कर
ठीक उन्हें उनके विपरीत बना ले।
तभी, जैसे लाखों करोड़ों सूर्यों का विस्फोट होगा
और उसकी चमक तथा प्रकाश में
वह अरूप, हर कहीं विविध रूपों में दिखाई देगा।
तू वह देख सकेगा
लेकिन केवल तभी
यदि तू स्वयं अपने अंदर के
अरूप में स्थित हो जाए।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–08)

मैं केवल तुम्हारे लिए ही अस्तित्व में बना हुआ हूं—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 17 जूलाई 1976,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न:
जब कोई व्यक्ति तुमसे घृणा करता है, तो तुम क्या करो?
चाहे कोई व्यक्ति तुमसे घृणा करे या कोई व्यक्ति तुमसे प्रेम करे, तुम्हें इससे कोई फर्क पड़ना ही नहीं चाहिए। यदि तुम ‘हो ‘, तो तुम वैसे ही बने रहते हो, और ‘ तुम नहीं हो ‘ तब तुम तुरंत बदल जाते हो। यदि तुम हो ही नहीं, तब कोई भी व्यक्ति तुम्हें खींच सकता है, तुम्हें धक्का दे सकता है: तब कोई भी व्यक्ति तुम्हारा कोट पकड़ कर धकिया सकता है और तुम्हें बदल सकता है। तब तुम एक गुलाम हो, तब तुम मालिक नहीं हो। तुम्हारी मालकियत तब शुरू होती है, जब बाहर जो कुछ भी घटना घटे, वह तुम्हें बदलती नहीं, तुम्हारा आंतरिक वातावरण और आबोहवा वैसी ही बनी रहती है।

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–07)

वे वासना को वासना से ही मारते हैं—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 16 जूलाई 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

बाऊलगीत:
जो लोग मर गये हैं
पर फिर भी वे पूरी तरह जीवित है,
और वे प्रेम के अनुभवों
और उसकी सुवास को भली भांति जानते हैं,
वे लोग ही जीवन—मृत्यु की इस सरिता को देखते हुए
अखण्ड सत्य को खोजते हैं, और वे लोग ही
इस नदी को पार कर लेंगे।
हवा के विरुद्ध चलोग हुए
प्रसन्नता पाने की
उनकी कोई चाह ही नहीं है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–06)

अभी यह क्षण समय का भाग नहीं है—(प्रवचन—छट्ठवां)

दिनांक 15 जूलाई, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रशनसार—
पहला प्रश्न:
मुझे कैसे प्रार्थना करनी चाहिए? मैं प्रार्थना करने में जो कुछ अनुभव करता है, मैं नहीं जानता कि अपने इस प्रेम की मैं किस तरह ठीक से अभिव्यक्त करूं?

 प्रार्थना कोई विधि नहीं है, वह कोई संस्कार नहीं है, और न वह कोई औपचारिकता है। यह हृदय का सहज स्वाभाविक उमड़ता उद्रेक है, इसलिए यह पूछो ही मत—कैसे? क्योंकि यहां कैसे जैसा कुछ है ही नहीं, और ' न कैसे जैसा ' कुछ हो भी सकता है।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

आनंद योग–(दि बिलिव्ड-02)–(प्रवचन–05)

आज इतना ही। जीवन रहते हुए मरना—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 14 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
बाऊलगीत—
यह मनुष्य का शरीर जो श्वांस लेता है,
प्राणवायु पर ही जीवित रहता है।
और उसके पार वह अदृश्य दूसरा
जो पहुंच के बाहर है—
वह विश्राम करता है।
और दो के मध्य में
एक और मनुष्य रहस्य कडी की भांति गतिशील है
जिसका शरीर मन, हृदय और भावों का अनुसरण करता हुआ
आराधना ही में रत रहता है।
इन तीनों के बीच
यह एक लीला हो रही है

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

आनंद योग--(दि बिलिव्ड-02)--(प्रवचन--04)

मध्‍य में रूकने का स्‍मरण रहे—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 13 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
पहला प्रश्न :
प्यारे ओशो! मैने सुना है:..... एक मनोवैज्ञानिक
अपने ही जुड़वां पुत्रों के साथ एक प्रयोग करना चाहत था!
वह उन्‍हें अपने साथ समूह चिकित्सा के कमरे में ले गया और
प्रत्येक लड़के को स्वयं अलग—अलग कमरे में रखा! आइक
के कमरे में उसने टी: वी: पर पर विज्ञापित, कठिनता से बिकने
वाले खिलौनों का ढेर इक्‍कठा कर रखा था। क्‍योंकि परीक्षण से
वह नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण का, शिकायतें करने वाला

गुरुवार, 31 मार्च 2016

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड-02)–(प्रवचन–03)

अपनी आंखें बंद करो और उसे पकडने का प्रयास करो—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 12 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।

बाउल गाते हैं—
वासना की सरिता में
कभी डुबकी लगाना ही मत
अन्यथा तुम किनारे तक पहुंचोगे ही नहीं,
यह उग्र तूफानों से भरी हुई वह नदी है—
जिसके किनारे हैं ही नहीं।
क्या तुम उस मानुष को
अपने ही अंदर देखना चाहते हो?
यदि हां, तो अपने ही घर के अंदर जाओ
जो अत्यंत सुंदर और रूपमान है।
उस तक जाने के सभी मार्ग

बुधवार, 30 मार्च 2016

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड-02)–(प्रवचन–02)

जब संदेह न होकर विश्‍वास होता है—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 11 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
      1—विश्‍वास करने के निर्णय से विश्‍वास उत्‍पन्‍न क्‍यों नहीं होता?
      2—बाउल, एक तांत्रिक, एक भक्‍त और एक सूफी के मध्‍य.....क्‍या अंतर?
      3—अनुभव और अनुभतियों का अनुसरण करो?
      4—सहष्‍णुता में, स्‍थगित करने में और मात्र मूढ़ता के मध्‍य क्‍या अंतर है?
      5—आपका व्‍यवहार विवेक के प्रति कैसा है?

रविवार, 27 मार्च 2016

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड-02)--(प्रवचन--01)

जड़े और फूल एक ही है—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 10 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
सूत्र—
बाउल गाते हैं
उत्सव आनंद में डूबे साहसी दीवानों का
रस और माधुर्य जब एक स्वर्णपात्र में इकट्ठा हो जाता है
तभी उसका मूल्य समझ में आता है कि
वह श्रेष्ठतम है। पूजा प्रार्थना फलप्रद होकर तभी
विकसित करती है
जब तुम्हारा पात्र तैयार और शुद्ध हो। वही प्रेमी सत्य को
उपलब्ध होता है
जो समग्रता से प्रेम करता है।
इसे बार—बार प्रयास कर असफल होने वाला व्यक्ति ही

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड-02)-ओशो

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)
(अंग्रेजी पुस्‍तक ‘’The Beloved Vol-2’’ बाउल संतो के क्रांति गीत का हिंदी अनुवाद स्‍वामी ज्ञान भेद द्वारा)
परमात्‍मा तुम्‍हारे चारों और है,
और तुम हमेशा उससे चूक रहे हो,
परमात्‍मा के पास केवल एक ही काल है—
और वह है वर्तमान उसके लिए
भूतकाल और भविष्‍यकाल
का अस्‍तित्‍व ही नहीं है।
मनुष्‍य, वर्तमान न रहकर,
भूत या भविष्‍य में रहता है,
परमात्‍मा भूत और भविष्‍य
में न रहकर वर्तमान में रहता है,
इसलिए दोनों का मिलन कैसे हो?
हम भिन्‍न आयामों में जी रहे है।
या तो परमात्‍मा, भूत और भविष्‍य
में रहना शुरू कर दे तब यह मुलाकात हो जाती है,