दिनांक
19 जूलाई 1976;
श्री
रजनीश आश्रम
पूना।
प्रश्नसार:
पहला
प्रश्न :
प्यारे
भगवान! अब
वहां न कोई
खोज रही और न
कोई तलाश रही
वह सब कुछ बंद
कर दिया मैने
उसमें कुछ भी
तो विशिष्ट
नहीं पाया, लेकिन अब
मैं अपने को
स्वतंत्र
पाता है जैसे सभी
से मुक्त हो
गया हूं मैं
अपने काम धंधे
पर बाहर जाता जरूर
हूं पर बिना
किसी
व्यग्रता के यह
मेरे लिए
वरदान और आशीर्वाद
जैसा है? और
मैं यहां आपकी
उपस्थिति में
उमड़ती कृतज्ञता
की एक बाढ़ का
अनुभव करता
हूं।
यहां खोजने
के लिए कुछ भी
विशिष्ट या
खास नहीं है।
किसी विशिष्ट
की खोज ही
भ्रमपूर्ण है, पूरी तरह
से एक धोखा है।
मन कुछ
विशिष्ट चीज
की खोज करना
चाहता है, मन
के साथ यही समस्या
है। परमात्मा
कोई विशिष्ट
चीज अथवा कोई
विशिष्ट अस्तित्व
नहीं है।


