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मंगलवार, 29 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-13

‘’या कल्‍पना करो कि मयूर पूंछ के पंचरंगे वर्तुल निस्‍सीम अंतरिक्ष में तुम्‍हारी पाँच इंद्रियाँ है। अब उनके सौंदर्य को भीतर ही घुलने दो। उसी प्रकार शून्य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ कल्‍पना करो, जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए। तब दूसरे के लिए तुम्‍हारी कामना सच हो जाती है।‘’
     ये सारे सूत्र, भीतर के केंद्र को कैसे पाया जाए, उससे संबंधित है। उसके लिए जो बुनियादी तरकीब, जो बुनियादी विधि काम में लायी गयी है, वह यह है कि तुम अगर बाहर कहीं भी, मन में, ह्रदय में या बाहर की किसी दीवार में एक केंद्र बना सके और उस पर समग्रता से अपने अवधान को केंद्रित कर सके और उस बीच समूचे संसारा को भूल सके और एक वहीं बिंदू तुम्‍हारी चेतना में रह जाए। तो तुम अचानक अपने आंतरिक केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। यह कैसे काम करता है, इसे समझो। तुम्हारा मन एक भगोड़ा है, एक भाग दौड़ ही है। वह कभी एक बिंदु पर नहीं टिकता है। वह निरंतर कहीं जा रहा है। गति कर रहा है।

सोमवार, 28 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-12

शिथिल होने की तीसरी विधि:
     जब किसी बिस्‍तर या आसमान पर हो तो अपने को वजनशून्‍य हो जाने दो—मन के पार।
     तुम यहां बैठे हो; बस भाव करो कि तुम वजनशून्‍य हो गए हो। तुम्‍हारा वज़न न रहा। तुम्‍हें पहले लगेगा कि कहीं यहां वज़न है। वजनशून्‍य होने का भाव जारी रखो। वह आता है। एक क्षण आता है। जब तुम समझोगे कि तुम वज़न शून्‍य हो। वज़न नहीं है। और जब वज़न शून्‍य नहीं रहा तो तुम शरीर नहीं रहे। क्‍योंकि वज़न शरीर का है; तुम्‍हारा नहीं, तुम तो वज़न शून्‍य हो।

रविवार, 27 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-11

शिथिल होने की दूसरी विधि:
      जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।
      यह बहुत सरल दिखता है। लेकिन उतना सरल है नहीं। मैं इसे फिर से पढ़ता हूं, ‘’ जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।‘’ यक एक उदाहरण मात्र है। किसी भी चीज से काम चलेगा। इंद्रियों के द्वार बंद कर दो जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो। और तब—तब घटना घट जाएगी। शिव कह क्‍या रहे है?

तंत्र-सूत्र—विधि-10

शिथिल होने की पहली विधि:
     प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।
      शिव प्रेम से शुरू करते है। पहली विधि प्रेम से संबंधित है। क्‍योंकि तुम्‍हारे शिथिल होने के अनुभव में प्रेम का अनुभव निकटतम है। अगर तुम प्रेम नहीं कर सकते हो तो तुम शिथिल भी नहीं हो सकते हो। और अगर तुम शिथिल हो सके तो तुम्‍हारा जीवन प्रेमपूर्ण हो जाएगा।

शुक्रवार, 25 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-09

नौवीं विधि:
      मृतवत लेटे रहो। क्रोध में क्षुब्‍ध होकर उसमे ठहरे रहो। या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो। या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।
      ‘’मृतवत लेटे रहो।‘’
      प्रयोग करो कि तुम एकाएक मर गए हो। शरीर को छोड़ दो, क्‍योंकि तुम मर गए हो। बस कल्‍पना करो कि मृत हूं, मैं शरीर नहीं हूं, शरीर को नहीं हिला सकता। आँख भी नहीं हिला सकता। मैं चीख-चिल्‍ला भी नहीं सकता। न ही मैं रो सकता हूं, कुछ भी नहीं कर सकता। क्‍योंकि मैं मरा हुआ हूं। और तब देखो तुम्‍हें कैसा लगता है। लेकिन अपने को धोखा मत दो। तुम शरीर को थोड़ा हिला सकते हो, नहीं, हिलाओ नहीं। लेकिन मच्‍छर भी आ जाये, तो भी शरीर को मृत समझो। यह सबसे अधिक उपयोग की गई विधि है।

तंत्र-सूत्र—विधि-08

आठवीं श्‍वास विधि:
आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।
     इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्‍हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्‍द बहुत फर्क पैदा करता है।
      ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर.....।‘’
      भीतर आने वाली श्‍वास को एक संधि स्‍थल है। जहां वह मुड़ती है। इन दो संधि-स्‍थलों—जिसकी चर्चा हम कर चुके है—के साथ यहां जरा सा भेद किया गया है। हालांकि यह भेद विधि में तो जरा सा ही है, लेकिन साधक के लिए बड़ा भेद हो सकता है। केवल एक शर्त जोड़ दी गई है—‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक’’, और पूरी विधि बदल गयी।

बुधवार, 23 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-07

सातवीं श्‍वास विधि:
     ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।
     तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो।
      ‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ।‘’
      अगर तुम तीसरी आँख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्‍य में स्‍थिर सूक्ष्‍म श्‍वास को, अदृश्‍य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह उर्जा, वह प्रकाश बरसता है।
      ‘’जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा—जब वह वर्षा तुम्‍हारे ह्रदय तक पहुँचेगी—‘’तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

सोमवार, 21 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-06

सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ। इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिन में नया जन्‍म होगा।
     ‘’सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ...।‘’
      श्‍वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्‍वास भी तर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए, वहां एक अंतराल होता है।
      ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए।‘’ यह छठी विधि निरंतर करने की है। इसलिए कहा गया है, ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए....’’ जो भी तुम कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्‍वासों के अंतराल में थिर रखो। लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है।

रविवार, 20 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-05

भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।
     यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो।
      ‘’भृकुटियों के बीच  अवधान को स्‍थिर करो।‘’

शनिवार, 19 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—04

या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वय: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन है।
    लेकिन तब तो यह विधि सब के लिए कठिन है, क्‍योंकि शिव कहते है कि ‘’केवल अशुद्ध के लिए कठिन है।‘’
      लेकिन कौन शुद्ध है? तुम्‍हारे लिए यह कठिन है; तुम इसका अभ्‍यास नहीं कर सकते। लेकिन कभी अचानक इसका अनुभव तुम्‍हें हो सकता है। तुम कार चला रहे हो और अचानक तुम्‍हें लगता है कि दुर्धटना होने जा रही है। श्‍वास बंद हो जाएगी। अगर वह बाहर है तो बाहर ही रह जाएगी। और भी अगर वह भीतर है तो वह भीतर ही रह जायेगी। ऐसे संकट काल में तुम श्‍वास नहीं ले सकते: तुम्‍हारे बस में नहीं है। सब कुछ ठहर जाता है। विदा हो जाता है।

तंत्र-सूत्र—विधि—03

या जब कभी अंत: श्वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में  विलीन होती है, उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करो।
    हम केंद्र और परिधि में विभाजित है। शरीर परिधि है। हम शरीर को, परिधि को जानते है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि कहां केंद्र है। जब बहिर्श्‍वास अंत:श्‍वास में विलीन होती है। जब वे एक हो जाती है। जब तुम यह नहीं कह सकते कि यह अंत:श्वास है कि बहिर्श्‍वास, जब यह बताना कठिन हो कि श्‍वास भीतर जा रही है कि बाहर जा रही है। जब श्‍वास भी तर प्रवेश कि बाहर की तरफ मुड़ने लगती है, तभी विलय का क्षण है। तब श्‍वास जाती है और न भीतर आती है। श्‍वास गतिहीन है। जब वह बहार जाती है, गतिमान है, जब वह भीतर आती है, गतिमान है। और जब वह दोनों में कुछ भी नहीं करती है। तब वह मौन है, अचल है। और तब तुम केंद्र के निकट हो। आने वाली और जाने वाली श्‍वासों का यह विलय विंदु तुम्‍हारा केंद्र है।

शुक्रवार, 18 मई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—02

जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है—इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो।
     थोड़े फर्क के साथ यह वही विधि है; और अब अंतराल पर न होकर मोड़ पर है। बाहर जाने वाली और अंदर जाने वाली श्‍वास एक वर्तुल बनाती है। याद रहे, वे समांतर रेखाओं की तरह नहीं है। हम सदा सोचते है कि आने वाली श्‍वास और जाने वाली श्‍वास दो समांतर रेखाओं की तरह है। मगर वे ऐसी है नहीं। भीतर आने वाली श्‍वास आधा वर्तुल बनाती है। और शेष आधा वर्तुल बाहर जाने वाली श्‍वास बनाती है।

बुधवार, 16 मई 2012

तंत्र-सूत्र--विधि—01

शिव कहते है:
हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है।
श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व--
श्रेयस् है, कल्‍याण है।
     आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। इसलिए पहले हम श्‍वास-क्रिया के संबंध में थोड़ा समझ लें और विधियों में प्रवेश करेंगे।
      हम जन्‍म से मृत्‍यु के क्षण तक निरंतर श्‍वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्‍म और मृत्‍यु के बीच श्‍वास क्रिया अचल रहती है। बच्‍चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह। बीमार होगा। उसका शरीर रूग्‍ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच आदमी श्‍वास भर सतत लेता रहेगा।

मंगलवार, 15 मई 2012

विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो
      विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है। वह दार्शनिक भी नहीं है। तंत्र शब्‍द का अर्थ है। विधि, उपाय, मार्ग। इस लिए यह एक वैज्ञानिक ग्रंथ है। विज्ञान ‘’क्‍यों‘’ की नहीं, ‘’कैसे’’ की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है। यह अस्‍तित्‍व क्‍यों है? विज्ञान पूछता है, यह आस्‍तित्‍व कैसे है? जब तुम कैसे का प्रश्‍न पूछते हो, तब उपाय, विधि, महत्‍वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्‍यर्थ हो जाती है। अनुभव केंद्र बन जाता है।
      विज्ञान का मतलब है चेतना है। और भैरव का विशेष शब्‍द है, तांत्रिक शब्‍द, जो पारगामी के लिए कहा जाता है। इसीलिए शिव को भैरव कहते है, और देवी को भैरवी—वे जो समस्‍त द्वैत के पार चले जाते है।

रविवार, 13 मई 2012

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्--
     कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी। क्‍यों?
क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता।

कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि

कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति:
     यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क को भूख की सूचना देता है। और फिर मस्‍तिष्‍क हम तक इसकी सूचना पहुँचाता है। उसके पास कुछ अपने संकेत होते है। उदाहरण के लिए, जब हमें प्‍यास लगती है, तो मस्‍तिष्‍क ही गले में प्‍यास की अनुभूति को जगा देता है। जब शरीर को पानी चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क गले में प्‍यास के लक्षण जगा देता है। और हमको प्‍यास लगने लगती है। जब हमें भोजन चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क पेट में कुछ निर्मित करने लगता है। और भूख सतानें लगती है।

शनिवार, 12 मई 2012

मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’
सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा।
     तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देख कर जाना जा सकता है।
      उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते है। और वह घटना बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। मैं नौ महीने कहता हूं—क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में इसमे थोड़ी भिन्‍नता होती है। यह निर्भर करता है: समय का जो अंतराल गर्भधारण और जन्‍म के बीच मौजूद रहता है।

शुक्रवार, 11 मई 2012

अन्‍ना कैरेनिना: लियो टॉलस्टॉय (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास---
     अन्‍ना कैरेनिना रशियन समाज की एक संभ्रांत महिला की कहानी है। जो अनैतिक प्रेम संबंध जोड़कर अपने आपको बरबार कर लेती है। इस उपन्‍यास में टॉलस्‍टॉय कदम-कदम पर यह दिखाता है कि समाज कैसे स्‍त्री और पुरूष के विषय में दोहरे मापदंड रखता है। अन्‍ना के सगा भाई ऑब्‍लान्‍स्‍की के अनैतिक प्रेम संबंध होते है, और न केवल वह अपितु उसके स्‍तर के कितने ही पुरूष खुद तो पत्‍नी से धोखा करते है, लेकिन अपनी पत्‍नियों से वफादारी की मांग करते है। समाज चाहता है कि पत्‍नी अपने पति की बेवफाई को भूल जाये और उसे माफ कर दे।

स्‍वार्थ पर संयम संपन्न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्‍न पुरूष उपलब्‍ध होता है—पतंजलि

‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्--
तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।
     पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’
      स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग पहचानने का प्रयास करो—परार्थ, दूसरों से अलग। और यह मत सोचना कि जो लोग तुम से अलग है, बहार है, वहीं दूसरे है। वे तो दूसरे है ही। लेकिन तुम्‍हारा शरीर भी दूसरा है। एक दिन तुम्‍हारा शरीर भी मिट्टी में मिल जायेगा। शरीर भी इस पृथ्‍वी का अंश है। तुम्‍हारी श्‍वास भी तुम्‍हारी नहीं है। वह भी दूसरों के द्वारा दी हुई है; वह हवा में वापस लौट जायेगी। बस कुछ थोड़े समय के लिए ही तुम्‍हें श्‍वास दी गयी है। वह श्‍वास उधार मिली हुई है। तुम्‍हें उसे लौटाना ही होगा। तुम यहां नहीं रहोगे। लेकिन तुम्‍हारी श्‍वास यहीं हवाओं में रहेगी। तुम  यहां नहीं रहोगे, लेकिन तुम्‍हारा शरीर पृथ्‍वी में रहेगा। मिट्टी-मिट्टी में मिल जाएगी। जिसे अभी तुम अपना रक्‍त समझते हो, वह नदियों में प्रवाहित हो रहा होगा। सभी कुछ यहीं समाहित हो जाएगा।

बुधवार, 9 मई 2012

जरूथुस्‍त्र--

एक बार पर्शिया का राज विशतस्‍या,  जब युद्ध जीतकर लौट रहा था, तो वह जरथुस्त्र के निवास के निकट जा पहुंचा। उसने इस रहस्‍यदर्शी संत के दर्शन करने की सोची। राज ने जरथुस्त्र के पास जाकर कहा, ‘’मैं आपके पास इसलिए अया हूं कि शायद आप मुझे सृष्‍टि और प्रकृति के नियम के विषय में कुछ समझा सकें। मैं यहां पर अधिक समय तो नहीं रूक सकता हूं, क्‍योंकि मैं युद्ध स्‍थल से लौट रहा हूं। और मुझे जल्‍दी ही अपने राज्‍य में वापस पहुंचना है, क्‍योंकि राज्‍य के महत्वपूर्ण मसले महल में मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।

रविवार, 6 मई 2012

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्—पतंजलि योग सूत्र

ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है।
      और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही एक मात्र ऐसा तारा है, जो पूर्णतया गति विहीन है, उसमें कोई गति नहीं है, वह थिर है। लेकिन यह बात सच नहीं है। उसमें गति है, लेकिन उसकी गति बहुत धीमी होती है। लेकिन फिर भी यह बहुत प्रतीकात्‍मक है: हमको अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेना है जो कि गति विहीन हो, जिसमे किसी प्रकार की गति न हो, पूरी तरह थिर हो। वहीं हमारा स्‍वभाव है, केवल वहीं हमारी वास्‍तविक अस्‍तित्‍व है। हमारा सच्‍चा स्‍वरूप है: ध्रुव तारे जैसा—गति विहीन, पूर्णरूपेण गति। क्‍योंकि जब भीतर कहीं गति नहीं होती है, तब शाश्‍वतता होती है। जब गति होती है, समय भी होता है।

शक्‍तियां है जो मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है—पतंजलि (योग-सूत्र)

ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी।
      जो व्‍यक्‍ति बह्या संसार की और बढ़ रहा होता है, वह चंद्र से सूर्य की और से होता हुआ संसार में जा रहा होता है। और जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं के भीतर जा रहा है, उसकी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और, और फिर चंद्र से भी पार की तरफ जा रही होती है। जो व्‍यक्‍ति अंतस की यात्रा पर जा रहा होता है। और एक वह व्‍यक्‍ति जो बह्या संसार की यात्रा पर जो रहा होता है उनके लक्ष्‍य और उद्देश्‍य एकदम अलग-अलग होते है, एकदम विपरीत होते है।

शनिवार, 5 मई 2012

आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--

ऊर्जा बह्मांड़—

आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?
       इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।
       सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।

शुक्रवार, 4 मई 2012

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है। हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर लेना—इतना ही। लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है। और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है। उन पांचों भागों को समझ लेना, वे बहुत महत्‍वपूर्ण है।
पहला है प्राण,
दूसरा है अपान,
तीसरा है समान,
चौथा उदान,
पाँचवाँ है व्‍यान।
      यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है। और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है।

बुधवार, 2 मई 2012

एक काली अमावस—लादेन (कविता)

काल बन कर निगल गई
उस काली परछाई को
हो गई जो समय के गर्त में दफ़न
जो समझता था अपने को काल का पर्यायवाची
कलंक-कलुषित जीवन
मिटा दिया उस काल ने फिर एक बार
कि शायद ले सके कोई सुंदर रूप
कोई मां भर से उस कुरूप चेहरे पर
फिर से एक नया रंगरूप
और खिला सके उसके ह्रदय में भी
प्रेम का कोई नया अंकुर
तपीस कम कर दे उस
धधकते दावा कूल की

मंगलवार, 1 मई 2012

गाड़रवारा—एक परिक्रमा---(भाग--1)

मुल्‍ला जी—(आनंद मोहम्‍मद)
      मुल्‍ला जी, हां ये नाम सुन का आप भी जरूर थोड़ा चोंकोगे। मैं भी उसे देख कर थोड़ी दे के लिए अवाक सा रह गया। मन पर चल रहा विचारों का शोर थोड़ी देर के लिए थम गया था, वह पथ कुछ क्षण के लिए सूना हो गया था। मैं उसे अपलक देखा ही रह गया। सफेद नमाजी टोपी, चेहरे पर हल्‍की दाढ़ी, रंग का थोड़ा सांवला, मोटे होठ, और गहरी काली आंखे.....जो आपको कुछ क्षण के लिए किसी गहरे-शीतल एकांत में ले जायेंगे। जी हां, ‘’ओशो’’ का एक सन्‍यासी का नाम है, मुल्‍ला जी( आनंद मोहम्‍मद) जो एक कट्टर मुसलिम परिवार में पैदा हुआ। और अपने लड़क पन में ही बगावत कर ओशो से जूड़ गया। जिस उम्र में बच्‍चें को कुछ समझ नहीं होती, या यूं कह लो वह यार दोस्‍तों में मौज़ मस्‍ती कर के अपने जीवन को खत्‍म कर रहे होता है। उस समय यह अंजान और बेबूझी सी उस डगर वर बालक ओशो के उस अथाह समुद्र में कैसे गोते लगा गया, गोते ही नहीं लगाये, वह संन्‍यास ले कर उस में पूर्णता से डूब भी गया।