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मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन-- सत्र- ( 8 )

विद्रोह धर्म की बुनियाद 

      दुनिया में केवल जैन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो आत्‍महत्‍या का आदर करता है। अब यह हैरान होने की तुम्‍हारी बारी है। निश्चित ही वे इसे आत्‍महत्‍या नहीं कहते। वे इसको सुंदर धार्मिक नाम देते है—संथारा। मैं इसके खिलाफ हूं। खासकर जिस ढंग से यह किया जाता है—यह बहुत ही क्रूर और हिंसात्‍मक है। यह आश्‍चर्य की तो बात है कि जो धर्म अहिंसा में विश्‍वास करता है। वह धर्म संथारा, आत्‍महत्‍या का उपदेश देता है। तुम इसको धार्मिक आत्‍म हत्‍या कह सकते हो। लेकिन आत्‍महत्‍या तो आत्‍महत्‍या ही है। नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। आदमी तो मरता ही है।
      मैं इसके खिलाफ क्‍यों हूं, मैं किसी आदमी के आत्‍महत्‍या करने के अधिकार के विरोध में नहीं हूं। नहीं, यह तो मनुष्‍य का मूलभूत अधिकार होना चाहिए। अगर मैं जीवित रहना नहीं चाहता तो किसी दूसरे को  मुझे जीवित रखने का कोई अधिकार नहीं है। मैं जैनियों के आत्‍महत्‍या के विचार के विरोध में नहीं हूं। लेकिन वह विधि...उनकी विधि है कुछ न खाना, खाना छोड़ देते है, बिलकुल नहीं खाते। इस प्रकार बेचारे आदमी को मरने में करीब-करीब नब्‍बे दिन लगते है। यह यातना है। सताना है, तुम इसे और नहीं सुधार सकते, इससे अधिक कष्‍ट सोचा भी नहीं जा सकता। अडोल्‍फ हिटलर को लोगो को सताने का बढ़ीया तरीका नहीं सूझा।

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

अमृत कण


संक्रांति की घड़ी---

आज जितनी शुभ घड़ी है इतनी कभी न थी, क्‍योंकि सामूहिक नींद टूट गर्इ है,
अब सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद तोड़ने का सवाल है। पहले तो व्‍यक्तिगत नींद तो थी ही।
सामूहिक नींद भी थी। अब कम से कम सामूहिक नींद का बोझ हट गया है।
अब ता सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद है, तुम जरा करवट ले सकते हो,
जरी झकझोर सकते हो अपने को, तो उठ आने में देर न लगेगी।
इधर मैं अनेक लोगों पर ध्‍यान के प्रयोग करके कहता हूं तुमसे,
यह कोई सैद्धांतिक बात बात नहीं कह रहा हूं, समय बहुत अनुकूल है।                      सच हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद समय अनुकूल होता है।
जैसे एक साल में पृथ्‍वी का एक चक्‍कर पूरा होता है, सूरज का।
ऐसे पच्‍चीस सौ सालों में हमार सूर्य किसी एक महा सूर्य का एक चक्र पूरा करता है।
हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद संक्रमण की घड़ी आती है।
पच्‍चीस सौ साल पहले बुद्ध हुए, महावीर हुए, लाओत्से, कनफयूशियस,
च्‍वांगत्‍सु, लीहत्‍सु, जरथुस्‍त्र, साक्रेटीज, सारी दुनियां बुद्धो से भर गई,
उसके भी पच्‍चीस सौ साल पहले कृष्‍ण, मोजेज, भीष्‍म पितामह, पतंजलि जैसे
बुद्ध पुरूष देखे, ये संक्रांति की घड़ी  करीब है।
और संक्रांति की घड़ी का अर्थ होता है, जब सामूहिक नशा टूट जाता है।
सिर्फ व्यक्तिगत नशे के तोड़ने की जरूरत रहती है,
उसे तोड़ना बहुत कठिन नहीं है, आसान है।
इससे ज्‍यादा आसान कभी भी नहीं होगा।
कभी ऐसा होता है कि नाव ले जानी हो उस पार तो
पतवार चलानी पड़ती है, और ऐसा होता है,
कि पतवार नहीं चलानी पड़ती सिर्फ पाल खोल दो,
हवा अपने आप नाव को उस तरफ ले जाती है।

----ओशो  


शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

स्‍वणिम बचपन-- ( 7)

सत्र-07 जैन मुनि से संवाल

गुड़िया को मालूम है कि मैं नींद में बोलता हूं, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं किससे बोलता हूं। सिर्फ मैं जानता हूं यह। बेचारी गुड़िया, मैं उससे बातें करता हुं और वह सोचती है और चिंता करती है कि क्‍यों बोल रहा हूं और किससे बोल रहा हूं। लेकिन उसे पता नहीं कि मैं इसी तरह उससे बातें करता हूं। नींद एक प्राकृतिक बेहोशी है। जीवन इतना कटु है कि हर आदमी को रात में कम से कम कुछ घंटे नींद की गोद में आराम करना पड़ता है। और उसको आश्‍चर्य होता है कि मैं सोता भी हूं या नहीं। उसके आश्‍चर्य को मैं समझ सकता हूं। पिछले पच्‍चीस सालों से भी अधिक समय से मैं सोया नहीं हूं।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन-- सत्र-( 6 )

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 सत्र---6  नानी—नानी का प्रेम....

       लेकिन दुर्भाग्‍य से ‘सैड’ शब्‍द से फिर उस जर्मन आदमी एकिड़ सैड कि याद आ गइ, है भगवान, उसे मैं जीवन में फिर कभी कुछ कहने वाला नहीं था। मैं उसकी पुस्‍तक से यह जानने की कोशिश कर रहा था कि उसको मुझमें ऐसा क्‍या गलत दिखाई दिया कि जिसके आधार पर वह यह कह रहा है कि मैं एनलाइटेंड नहीं हूं। उत्‍सुकता वश मैं यह देखना चाहता था कि उसने क्‍यों इस तरह का निष्‍कर्ष निकाला। और जो मुझे मालूम हुआ वह सचमुच हंसने जैसा है। मैं इल्युमिनटेड हूं, ऐसा मानने का उसका कारण यह है कि मैं जो कह रहा हूं वह निश्चित ही समस्‍त मानवता के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। लेकिन मैं एनलाइटेंड नहीं हूं, ऐसा मानने का उसका कारण है मेरे बोलने का ढंग से मैं बोलता है।
      क्‍योंकि ऐसा लगता है जैसे कि यह व्‍यक्ति अनेक एनलाइटेंड लोगों से मिल चुका है। अनेक एनलाइटेंड लोगों को जानता है। मेरे बोलने के ढंग इसे उन लोगों जैसा नहीं लगता है।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--सत्र ( 5 )

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सत्र—5  ‘’नमो अरिहंताणं.....
जब बचपन में मैं अपने नाना के पास रहता था तो यही मेरा तरीका था, और फिर भी मैं सज़ा से पूरी तरह सुरक्षित था। उन्‍होंने कभी नहीं कहा कि यह करो और वह मत करो। इसके विपरीत उन्‍होंने अपने सबसे आज्ञाकारी नौकर भूरा के मेरी सेवा में मेरी सुरक्षा के लिए नियुक्‍त कर दिया। भूरा अपने साथ सदा एक बहुत पुरानी बंदूक रखता था। और थोड़ी दूरी पर मेरे साथ- साथ चलता था। लेकिन गांव वालों को डराने के लिए इतना काफी था। मुझे अपनी मनमानी करने का मौका देने के लिए इतना काफी था।
      कुछ जो भी तुम सोच सकते हो.....जैसे भैंस पर उलटी सवारी करना, और भूरा पीछे-पीछे चल रहा  है। बहुत समय बाद विश्वविद्यालय के म्‍यूजियम में मैंने भेस पर उलटे बैठे हुए लाओत्से की मूर्ति देखी। मैं इतनी जोर से हंसा की म्‍यूजियम का निदेशक भागा हुआ आया कि क्‍या हो गया, क्‍या कुछ गड़बड़ है, क्‍योंकि मैं हंसी के कारण पेट पकड़ कर जमीन पर बैठा हुआ था। उसने पूछा ‘क्‍या कोई तकलीफ है।’

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

स्‍वीणिम बचपन-- सत्र ( 4 )

सत्र—4    खजुराहो
मैं तुमसे उस उस समय कि बात कर रहा था जब ज्‍योतिषी से मिला जो अब संन्‍यासी हो गया था। उस समय  मैं चौदह वर्ष का था और अपने दादा के साथ था। मेरे नाना अब नहीं रहे थे। उस वृद्ध भिक्षु, भूतपूर्व‍ ज्‍योतिषी ने मुझसे पूछा, ‘मैं धंधे से ज्‍योतिषी हूं, लेकिन शौक से मैं हाथ, पैर और माथे की रेखाएं इत्‍यादि‍ भी पढ़ता हुं। तुम यह कैसे बता सके कि मैं संन्‍यासी बनुगां, पहले मैंने सन्‍यास के बारे में सोचा भी नहीं था। तुम्‍हीं ने इसका बीज मेरे भीतर डाला और तब से मैं केवल संन्‍यास के बारे में ही सोचता हूं। तुमने ये कैसे किया।’
      मैंने अपने कंधे बिचकाए। आज भी यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं कैसे करता हूं, तो मैं सिर्फ कंधे बिचका सकता हूं। क्‍योंकि मैं कुछ करता नहीं, कोई प्रयास नहीं करता। में तो बस जो हो रहा है उसे होने देता हूं। सिर्फ चीजों से आगे-आगे रहने की कला सीखने की जरूरत है, ताकि सब लोग समझें कि तुम उन्‍हें कर रहे हो। अन्‍यथा कोई कुछ कर नहीं रहा है, विशेषकर उस दुनिया में जिससे मेरा संबंध है।
      उस बूढ़े ज्‍योतिषी से मैंने कहा: ‘मैंने बस तुम्‍हारी आंखों में झाँका और इतना पवित्रता देखी कि मुझे विश्‍वास ही नहीं हुआ कि तुम अभी तक संन्‍यासी नहीं हुए हो। अब तक तो तुम्‍हें हो जाना चाहिए था। पहले ही बहुत देर हो चुकी थी।’
      एक अर्थों में संन्‍यास के लिए हमेशा बहुत देर हो जाती है और दूसरे अर्थों में संन्‍यास हमेशा समय से पहले होता है। और दोनों बातें एक साथ सच है।
      अब बूढ़े आदमी की बारी थी अपने कंधे बिचकाने की। उसने कहा: ‘तुम मुझे उलझन में डाल रहे हो। मेरी आंखें कैसे तुम्‍हें बता सकती थी।’

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--सत्र ( 3 )

सत्र—3 ( ज्‍योतिषी की भविष्यवाणी)

       
      बार-बार सुबह का चमत्‍कार.....सूरज और पेड़ । संसार बर्फ के फूल की तरह हैं: इसको तुम अपने हाथ में लो और यह पिघल जाता है—कुछ भी नहीं बचता, सिर्फ गीले हाथ रह जाते है। लेकिन अगर तुम देखो, सिर्फ देखो, तो बर्फ का फूल भी उतना ही सुंदर है जितना संसार में कोई दूसरा फूल। और यह चमत्‍कार हर सुबह होता है, हर दोपहर, हर शाम, हर रात, चौबीस घंटे, दिन-रात होता है.....चमत्‍कार। और लोग परमात्‍मा को पूजने मंदिरों, मसजिदों और गिरजाघरों में जाते है। यह दुनिया मूर्खों से भरी हानि चाहिए—माफ करो, मूर्खों से नहीं वरन मूढ़ों से—असाध्‍य, इतने मंद बुद्धि लोगों से।
      क्‍या परमात्‍मा को खोजने के लिए मंदिर जाने की जरूरत है, क्‍या वह अभी और यहीं नहीं है।
      खोज का खयाल ही मूढ़तापूर्ण है। खोज तो उसकी करते है जो दूर है। और परमात्‍मा तो इतने करीब है, तुम्‍हारी ह्रदय की घड़कना से भी अधिक करीब है। कोई स्‍त्रष्‍टा नहीं है, केवल सृजन की ऊर्जा है। लाखों रूपों में वह ऊर्जा प्रकट होती, पिघलती, मिलती, प्रकट होती, अदृश्‍य होती, एकत्रित होती और फिर बिखर जाती है।
      इस लिए मैं कहता हूं कि पुरोहित सत्‍य से बहुत दूर है और कवि बहुत नजदीक है। निश्चित ही कवि को भी वह उपलब्‍ध नहीं है। केवल रहस्‍यदर्शी ही उसे उपलब्‍ध करता है...; ‘उपलब्‍ध’ शब्‍द ठीक नहीं है, या यूं कहो कि उसे मालूम हो जाता है कि वह सदा से बही है।

मूलबंध : ब्रह्रम्चदर्य – उपलब्धि की सफलतम विधि

जीवन ऊर्जा है, शक्ति है। लेकिन साधारणत: तुम्‍हारी जीवन-ऊर्जा नीचे की और प्रवाहित हो रही है। इसलिए तुम्‍हारी सब जीवन ऊर्जा अनंत वासना बन जाती है। काम वासना तुम्‍हारा निम्‍नतम चक्र है। तुम्‍हारी ऊर्जा नीचे गिर रही है। और सारी ऊर्जा काम केन्‍द्र पर इकट्ठी हो जाती है। इस लिए तुम्‍हारी सारी शक्ति कामवासना बन जाती है। एक छोटा सा प्रयोग, जब भी तुम्‍हारे मन में कामवासना उठे तो, ड़रो मत शांत होकर बैठ जाऔ। जोर से श्‍वास को बहार फेंको—उच्‍छवास। भीतर मत लो श्‍वास को— क्‍योंकि जैसे भी तुम भीतर गहरी श्‍वास को लोगे, भीतर जाती श्‍वास काम ऊर्जा को नीचे की धकाती है।
जब सारी श्‍वास बहार फिंक जाती है, तो तुम्‍हारा पेट और नाभि‍ वैक्‍यूम हो जाती है, शून्‍य हो जाती है। और जहां कहीं शून्‍य हो जाता है, वहां आसपास की ऊर्जा शून्‍य की तरफ प्रवाहित होने लगती है। शून्‍य खींचता है, क्‍योंकि प्रकृति शून्‍य को बरदाश्‍त नहीं करती, शून्‍य को भरती है। तुम्‍हारी नाभि के पास शून्‍य हो जाए, तो मूलाधार से ऊर्जा तत्‍क्षण नाभि की तरफ अठ जाती है, और तुम्‍हें बड़ा रस मिलेगा—जब तुम पहली दफ़ा अनुभव करोगे कि एक गहन ऊर्जा बाण की तरह आकर नाभि‍ में उठ गई। तुम पाओगें, सारा तन एक गहन स्‍वास्‍थ्‍य से भर गया। एक ताजगी, ठीक वैसी ही ताजगी का अनुभव करोगे जैसा संभोग के बाद उदासी का होता है। वैसे ही अगर ऊर्जा नाभि की तरफ उठ जाए, तो तुम्‍हें हर्ष का अनुभव होगा। एक प्रफुल्‍लता घेर लेगी। ऊर्जा का रूपांतरण शुरू हुआ, तुम ज्‍यादा शक्तिशाली, ज्‍यादा सौमनस्‍यपूर्ण, ज्‍यादा उत्‍फुल्‍ल, सक्रिय, अन-थके, विश्रामपूर्ण मालूम पड़ोगे। जैसे गहरी नींद के बाद उठे हो, और ताजगी ने घेर लिया है।
इसे अगर तुम निरंतर करते रहे, अगर इसे तुमने सतत साधन बना ली—और इसका कोई पता किसी को नहीं चलता; तुम इसे बाजार में खड़े हुए कर स‍कते हो, तुम दुकान पर बैठे हुए कर सकते हो, दफ़तर में काम करते हुए कर सकते हो, कुर्सी पर बैठे हुए, कब तुमने चुपचाप अपने पेट को को भीतर खींच लिया। एक क्षण में ऊर्जा ऊपर की तरफ स्‍फुरण कर जाती है। अगर एक व्‍यक्ति दिन में कम से कम तीन सौ बार, क्षण भर को भी मूलबंध लगा ले, कुछ महीनों के बाद पाएगा, कामवासना तिरोहित हो गई। तीन सौ बार करना बहुत कठिन नहीं है। यह मैं सुगमंतम मार्ग कह रहा हूँ, जो ब्रह्मचर्य की उपलब्धि का हो सकता है। फिर और कठिन मार्ग हैं, जिनके लिए सारा जीवन छोड़ कर जाना पड़ेगा। पर कोई जरूरत नहीं है। बस, तुमने एक बात सीख ली कि ऊर्जा कैसे नाभि तक जाए शेष तुम्‍हें चिंता नहीं करनी है। तुम ऊर्जा को, जब भी कामवासना उठे नाभि में इक्ट्ठा करते जाओ। जैसे-जैसे ऊर्जा बढ़ेगी नाभि में, अपने आप ऊपर की तरफ उठने लगेगी। जैसे बर्तन में पानी बढ़ता जाए, तो पानी की सतह ऊपर उठती जाए।
असली बात मूलाधार का बंद हो जान है। घड़े के नीच का छेद बंद हो गया, ऊर्जा इकट्ठी होती जाएगी, घड़ा अपने आप भरता जाएगा। एक दिन अचानक पाओगें कि धीरे-धीरे नाभि के ऊपर ऊर्जा आ रही है, तुम्‍हारा ह्रदय एक नई संवेदना से आप्‍लावित हुआ जा रहा है। जिस दिन ह्रदय चक्र पर आएगी तुम्‍हारी ऊर्जा, तुम पाओगें कि तुम भर गये प्रेम से। तुम जहां भी ऊठोगे, बैठोगे, तुम्‍हारे चारों तरफ एक हवा बहने लगेगी प्रेम की। दूसरे लोग भी अनुभव करेंगे कि तुममें कुछ बदल गया है। तुम अब वह नहीं रहे हो, तुम किसी और तरंग पर बैठ गये हो। तुम्‍हारे साथ कोई और लहर भी आती है—कि उदास प्रसन्‍न हो जाते है, कि दुःखी थोड़ी देर को दुःख भूल जाते है, कि अशांत शांत हो जाते है, कि तुम जिसे छू देते हो, उस पर ही एक छोटी सी प्रेम की वर्षा हो जाती है। लेकिन, ह्रदय में ऊर्जा आएगी, तभी यह होगा।
ऊर्जा जब बढ़ेगी, ह्रदय से कंठ में आएगी, तब तुम्‍हारी वाणी में माधुर्य आ जाएगा। तब तुम्‍हारी वाणी में एक संगीत, एक सौंदर्य आ जाएगा। तुम साधारण से शब्‍द बोलोगे और उन शब्‍दों में काव्‍य होगा। तुम दो शब्‍द किसी से कह दोगे और उसे तृप्‍त कर दोगे। तुम चुप भी रहोगे, तो तुम्‍हारे मौन में भी संदेश छिप जाएंगे। तुम न भी बोलोगे तो तुम्‍हारा अस्तित्‍व बोलेगा। ऊर्जा कंठ पर आ गई।
ऊर्जा ऊपर उठती जाती है। एक घड़ी आती है कि तुम्‍हारे नेत्र पर ऊर्जा का आविर्भाव होता है। तब तुम्‍हे पहली बार दिखाई पड़ना शुरू होता है। तुम अंधे नहीं होते। उससे पहले तुम अंधे हो। क्‍योंकि उसके पहले तुम्‍हें आकार दिखाई पड़ते है, निराकार नहीं दिखाई पड़ता; और वही असली में है। सब आकारों में छिपा है‍ निराकार। आकार तो मूलाधार में बंधी हुई ऊर्जा के कारण दिखाई पड़ते है। अन्‍यथा कोई आकार नहीं है।
मूलाधार अंधा चक्र है। इस लिए तो कामवासना को अंधी कहते है। वह अंधी है। उसके पास आँख बिलकुल नहीं है। आँख तो खुलती है—तुम्‍हारअसली आँख, जब तीसरे नेत्र पर ऊर्जाकर प्रकट होती है। जब लहरे तीसरे नेत्र को छूने लगती हैं। तीसरे नेत्र के किनारे पर जब तुम्‍हारी ऊर्जा की लहरे आकर टकराने लगती है, पहले दफ़ा तुम्‍हारे भीतर दर्शन की क्षमता जागती है। दर्शन की क्षमता, विचार की क्षमता का नाम नहीं है। दर्शन की क्षमता देखने की क्षमता है। वह साक्षात्‍कार है। जब बुद्ध कुछ कहते है, तो देख कर कहते है। वह उनका अपना अनुभव है। अनानुभूत शब्‍दों का क्‍या अर्थ है ? केवल अनुभूत शब्‍दों में सार्थकता होती है।
ऊर्जा जब तीसरी आँख में प्रवेश करती है। तो अनुभव शुरू होता है, औरसे व्‍यक्ति के वचनों में तर्क का बल नहीं होता, सत्‍य का बल होता है। ऐसे व्‍यक्ति के वचनों में एक प्रामाणिकता होती है, जो वचनों के भीतर से आती है। किन्‍हीं बाह्रा प्रमाणों के आधार पर नहीं। ऐसे व्‍यक्ति के वचन को ही हम शास्‍त्र कहते है। ऐसे व्‍यक्ति के वचन वेद बन जाते है। जिसने जाना है, जिसने परमात्‍मा को चखा है, जिसने पीया है, जिसने परमात्‍मा को पचाया है, जो परमात्‍मा के साथ एक हो गया है।
फिर ऊर्जा और ऊपर जाती है। सहस्‍त्रार को छूती है। पहला सबसे नीचा केंद्र मूलाधार चक्र है, मूलबंध, और अंतिम चक्र है, सहस्‍त्रार। क्‍योंकि वह ऐसा है, जैसे सहस्‍त्र पंखुडि़यों वाला कमल। बड़ा सुंदर है, और जब खिलता है तो भीतर ऐसी ही प्रतीति होती है, जैसे पूरा व्‍यक्तित्‍व सहस्‍त्र पंखूडि़यों वाला कमल हो गया है। पूरा व्‍यक्तित्‍व खिल गया ।
जब ऊर्जा टकराती है सहस्‍त्र से, तो उसकी पंखुडि़यां खिलनी शुरू हो जाती है। सहस्‍त्रार के खिलते ही व्‍यक्तित्‍व से आनंद का झरना बहने लगता है। मीरा उसी क्षण नाचने लगती है। उसी क्षण चैतन्‍य महाप्रभु उन्‍मुक्‍त हो नाच उठते है। चेतना तो प्रसन्‍न होती ही है, रोआं-रोआं शरीर का आन्ंदित हो उठता है। आनंद की लहर ऐसी बहती है कि मुर्दा भी—शरीर तो मुर्दा है—वह भी नाचते लगता है।



ओशो—‘’कहै कबीर दीवाना’’  

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

नमस्काकर का अदभुत ढ़ंग—

इस देश ने नमस्‍कार का एक अद्भुत ढंग निकाल।‍
दुनिया मैं वैसा कहीं भी नहीं है।
इसे देश ने कुछ दान दिया है मनुष्‍य की चेतना को, अपूर्व।
यह देश केला है जब दो व्‍यक्ति नमस्‍कार करते है,
तो दो काम करते है।
एक तो दोनों हाथ जोड़ते है।
दो हाथ जोड़ने का मतलब होता है: दो नहीं एक।
दो हाथ दुई के प्रतीक है, द्वैत के प्रतीक है।
उन दोनों को हाथ जोड़ने का मतलब होता है, दो नहीं एक है।
उस एक का ही स्‍मरण दिलाने के लिए
दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्‍कार करते है।
और, दोनों को जोड़ कर जो शब्‍द उपयोग करते है।
वह परमात्‍मा का स्‍मरण होता है।
कहते है: राम-राम, जयराम, या कुछ भी,
लेकिन वह परमात्‍मा का नाम होता है।
दो को जोड़ा कि परमात्‍मा का नाम उठा।
दुई गई कि परमात्‍मा आया।
दो हाथ जुड़े और एक हुए कि फिर बचा क्‍या: हे राम।
 --ओशो

सत्यी का अवतरण--


सत्‍य जब भी अवतरित होता है,
तब व्‍यक्ति के प्राणों पर अवतरित होता है।
सत्‍य भीड़ के ऊपर अवतरित नहीं होता।
सत्‍य को पकड़ने के लिए व्‍यक्ति का प्राण ही बीणा बनता है।
वही से झंकृत होता है सत्‍य।
भीड़ के पास उधार बातें होती है, जो कि असत्‍य हो गई है।
भीड़ के पास किताबें है, जो कि मर चुकी है।
भीड़ के पास महात्‍माओं, तीर्थंकरों, अवतारों के नाम है।
जो सिर्फ नाम है, जिनके पीछे अब कुछ भी नहीं बचा,
सब राख हो गया है।
भीड़ के पास परंपराएं है, भीड़ के पास याददाश्‍तें है।
भीड़ के पास हजारों-लाखों साल की आदतें है।
लेकिन भीड़ के पास वह चित नहीं है।
जो मुक्‍त होकर सत्‍य को जान सकता है,

जो भी काई उस चित को उपलब्‍ध करता है, तो अकेले में,

व्‍यक्ति की तरह उस चित को उपलब्‍ध करना पड़ता है।

--ओशो

देह का सम्मांन करो--

मैं चाहता हूं कि तुम इस सत्‍य को ठीक-ठीक

अपने अंतस्‍तल की गहराई में उतार लो।
देह का सम्‍मान करे, अपमान न करना।
देह को गर्हित न कहना: निंदा न करना।
देह तुम्‍हारा मंदिर है।
मंदिर के भीतर देवता भी विराजमान है।
मगर मंदिर के बिना देवता भी अधूरा होगा।
दोनों साथ है, दोनों समवेत,
एक स्‍वर में आबद्ध, एक लय में लीन।
यह अपूर्व आनंद का अवसर है।
इस अवसर को तूम खँड़ सत्‍यों में तोड़ो।



--ओशो

प्रेम को जानने का उपाय---


पत्थर  को सुंदर मूर्ति में निर्मित कर लेना,

प्रेम को जानने का एक उपाय है।

साधारण शब्‍दों को जाड़ कर एक गीत रच लेना,

प्रेम को जानने का एक उपाय है।

नाचना, कि सितार बजाना, कि बांसुरी पर एक तान छेड़ना,

--ये सब प्रेम के ही रूप है।

--ओशो

सत्यू के मार्ग पर---

ध्‍यान रहे—असत्‍य के मार्ग पर,
सफलता मिल जाए तो व्‍यर्थ है,
असफलता भी मिले तो सार्थक है।
सवाल मंजिल का नहीं,
सवाल कहीं पहुंचने का नहीं,
कुछ पाने का नही—
दिशा का नहीं, आयाम का नहीं।
कंकड़-पत्‍थर इकट्ठे भी कर लिए किसी ने,
तो क्‍या पाया।
और हीरों की तलाश में खो भी गए,
तो भी बहुत कुछ पा लिया जाता है—
उस खोने में भी,
अंनत की यात्रा पर जो निकलता है,
वे डूबने को भी उबरना समझते है।




--ओशो

पृथ्वी् पर क्रांति--

पृथ्‍वी के दूर-दूर देशों से आए हुए ये लोग,
आने वाली पूरी पृथ्‍वी पर क्रांति के पहले प्रतीक है।
यह छोटी घटना नही है, बीज तो छोटा ही होता है।
जब वृक्ष बनेगा और बादलों को छुएगा,
तब तुम पहचान पाओगें, कितनी क्षमता छिपी थी एक बीज में,
एक बीज पुरी पृथ्‍वी को हरियाली से भर सकता है।
क्‍योंकि एक बीज में वृक्ष, फिर एक वृक्ष में अनंत बीज,
फिर एक-एक बीज में अनंत बीज।
एक बीज सारी पृथ्‍वी को फूलों से रंग सकता है।
और एक संन्‍यासी सारी पृथ्‍वी को गैरिक कर सकता है।
एक बुद्ध सारी पृथ्‍वी को बुद्धत्‍व की और अनुप्राणित कर सकता है। 

--ओशो

सृजन कठिन है—विध्वंस आसान

इस दुनिया में जो लोग बना नहीं सकते,
वे मिटाने में लग जाते है,
जो कविता नहीं रच सकते, वे आलोचक हो जाते है।
जो धर्म का अनुभव नहीं कर सकते, वे नास्तिक हो जाते है।
जो ईश्‍वर की खोज नहीं कर सकते, वे कहते है—ईश्‍वर है ही नहीं।
अंगूर खट्टे है,
इनकार करना आसान है, स्‍वीकार करना कठिन।
जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते है—समर्पित होए क्यों।
मनुष्‍य की गरिमा उसके संकल्‍प में है, समर्पण में नहीं।
जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते है--,
कायर समर्पित होते है, बहादुर, वीर तो लड़ते है।
ध्‍यान रखान, सृजन कठिन है, विध्‍वंस आसान है।
जो माइकलएंजलो नहीं हो सकता
वह अडोल्‍फ हिटलर हो सकता है।
जो कालिदास नहीं हो सकता,
वह जौसेफ़ स्‍टैलिन हो सकता है।
जो बानगाग नहीं हो सकता, वह माओत्‍से तुंग हो सकता है।
विध्‍वंस आसान है। 
--ओशो


ध्यातन है अंतर्यात्रा।

और जिसकी अंतर् याता सफल है,
उसकी बहिर्यात्रा भी सफल हो जाती है।
क्‍योंकि फिर वे ही आंखे,
भीतर के रस को लेकर बाहर देखती है।
वो उस पाम रस का अनुभव होने लगता है।
जिस दिन तुम्‍हें अपनी पत्‍नी में परमात्‍मा दिखाई पड़े,
अपने पति में परमात्‍मा दिखाई पड़े
अपने बच्‍चें में परमात्‍मा दिखाई पड़े।
उस दिन जानना कि धम्र का जन्‍म हुआ है।
उस दिन जानना कि संन्‍यास हुआ, इससे पहले नहीं।
उससे पहले सब पलायन है,
कायता है, भगोड़ा पन है।




--ओशो

धर्म नहीं—धार्मिकता

धर्म सिद्धांत नहीं है।
धर्म फिर क्‍या है?
धर्म ध्‍यान है, बोध है, बुद्धत्‍व है।

इसलिए मैं धार्मिकता की बात नहीं करता हूं।

चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है।

इस लिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए,

मुसलमान पैदा हो गए।

अगर धर्म की जगह धार्मिकता की बात फैले,

तो फिर ये भेद अपने आप गिर जाएंगे।

धार्मिकता कहीं हिंदू होती है,

कि मुसलमान या ईसाई होती है।

धार्मिकता तो बस धार्मिकता होती है।

स्‍वास्‍थ्‍य हिंदू होता है, कि मुसलमान, कि ईसाई।

प्रेम जैन होता है, बौद्ध होता है, कि सिक्‍ख ।

जीवन, अस्तित्‍व इन संकीर्ण धारणाओं में नहीं बंधता।

जीवन सभी संकीर्ण धारणाओं का अतिक्रमण करता है।

उनके पार जाता है।
 - 
--ओशो

भगवान नहीं--भगवत्‍ता




भगवान पर जोर नहीं देता हूं,
भगवता पर जोर देता हूं।
भग वत्ता का अर्थ हुआ,
नहीं कोई पूजा करनी है,
नहीं कोई प्रार्थना,
नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है,
न पूजा के थाल सजाने है,
न अर्चना, न विधि-विधान, यज्ञ-हवन,
वरन अपने भीतर वह जो जीवन की सतत धारा है।
उस धारा का अनुभव करना है,
वह जो चेतना है, चैतन्‍य है।
वह जो प्रकाश है स्‍वयं के भीतर,
जो बोध की छिपी हुई दुनियां है,
वह जो बोध का रहस्‍यमय संसार है,
उसका साक्षात्‍कार करना है,
उसके साक्षात्‍कार से जीवन सुगंध से भर जाता है।
ऐसी सुगंध से जो फिर कभी चुकती नहीं।
उस सुगंध का नाम भग वत्ता है।
परम रस का अनुभव--

--ओशो