प्रेम नदी के तीरा-(अंतरंग-बार्ताएं)
सोलहवां-प्रवचन-(ओशो)
लीला का अर्थ है वर्तमान में जीना
एक तो वर्तमान से एकाकार होने के लिए मैंने नहीं कहा है। एकाकार तो मैं कहता हूं किसी से भी मत होना। क्योंकि एकाकार होने का मतलब मूच्र्छा के और कुछ भी नहीं हो सकता। जब तक तुम्हें होश है तब तक तुम एकाकार कैसे होओगे? जब तुम बेहोश हो तभी हो सकते हो। यानी जब तक भी तुम्हें होश है, तब तक तुम अलग हो। तुम एकाकार हो कैसे सकते हो? इसलिए मूच्र्छित व्यक्ति के सिवाय एकाकार कोई कभी नहीं होता या निद्रा में होता है। प्रकृति से एकाकार हो जाता है।तो मैं तो एकाकार होने के बिलकुल विरोध में हंू। तल्लीनता के बिलकुल विरोध में हूं। मेरा कहना बिलकुल उलटा है। मैं यह कहता हूं, वर्तमान के प्रति जागरूक होना--एकाकार नहीं। अवेयरनेस आॅफ दि प्रेजेंट, आईडेंटिटी नहीं। वह जो वर्तमान क्षण है, हमारे पास से जो गुजर रहा है, उसके प्रति पूरे जागरूक होना। फिर इस वर्तमान क्षण के प्रति जागरूक होने में बहुत बार दिखाई पड़ता है कि भविष्य की बात है यह, लेकिन हो सकता है समस्या वर्तमान में हो।
जैसे कि कल मुझे ट्रेन पकड़नी है। लेकिन टिकट तो आज खरीदनी है। ट्रेन तो कल ही पकडूंगा, आज कोई उपाय भी नहीं है पकड़ने का। ट्रेन तो कल ही पकडूंगा न, आज तो कोई उपाय नहीं है।


