कुल पेज दृश्य

एस धम्‍मो संनतनो--(भाग-04) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एस धम्‍मो संनतनो--(भाग-04) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 30 जुलाई 2018

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-039)

अश्रद्धा नहीं, आत्‍मश्रद्धा—प्रवचन—उन्तालिसवां


सूत्र:


अससद्धो अकतज्‍जू च संधिच्‍देदो च यो नरी।
हतावकसो वंतासो स वे उत्‍तम पोरिसो ।।88।।

गामे वे यदि वारज्‍जे निन्‍ने वा यदि वा थले।
वत्‍थरहंतो विहरंति तं भूमि रामणेय्यकं ।।89।।

रमणीयानि अरज्‍जानि यत्‍थ न रमते जनो।
वीतरागा रमिस्‍संति न ते कामगवेसिनो।।90।।


म्‍मपद के एक अत्यंत अनूठे सूत्र में आज प्रवेश होता है। सूत्र इतना अनूठा है कि बुद्ध के अतिरिक्त वैसा वक्तव्य कभी किसी दूसरे व्यक्ति ने न दिया है, न देगा।
बुद्ध की सारी विशिष्टता इस सूत्र में समाहित है—उनकी क्रांति, उनके देखने का अनूठा ढंग, उनकी बिलकुल नई पहुंच।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-038)

कछ खुला आकाश!—प्रवचन—अडतिसवां

पहला प्रश्‍न—

जब तक वासना है, कामना है, क्या तभी तक साधना है।


स्‍वभावत: रोग है तो औषधि है। स्वास्थ्य आया, औषधि व्यर्थ हुई। स्वास्थ्य में भी कोई औषधि लिए चला जाए तो घातक है। जो रोग को मिटाती है, वही रोग को फिर पैदा करेगी।
मार्ग की जरूरत है, मंजिल दूर है तब तक; मंजिल आ जाए फिर भी जो चलता चला जाए, तो जो चलना मंजिल के पास लाता था, वही फिर दूर ले जाएगा।
और प्रश्न महत्वपूर्ण है, क्योंकि अक्सर ऐसा ही होता है। बीमारी तो छूट जाती है, औषधि पकड़ जाती है। क्योंकि मन का तर्क कहता है, जिसने यहां तक पहुंचाया, उसे कैसे छोड़ दें? जो इतने दूर ले आया, उसे कैसे छोड़ दें? जिसके सहारे इतना कुछ पाया, कहीं उसके छोड़ने से वह खो न जाए।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-041)

शब्द: शून्य के पंछी—प्रवचन—इक्तालिसवां


सूत्र:
 

सहस्‍समपि चे वाचा अनत्‍थपदसंहिता।
एकं अत्‍थपदं सेय्यो यं सुत्‍वा उपसम्‍मति ।।91।।

यो सहस्‍सं सहस्‍सेन संगामे मानुसे जिने।
एकं च जेयमत्‍तानं से वे संगामजुत्‍तमो ।।92।।

अत्‍ता हवे जितं सेय्यो या चायं इतरा पज्ञा।
अत्‍तदन्‍तस्‍य पोसस्‍स निच्‍चं सज्‍जतचारिनो ।।93।।

नेव देवो न गन्‍धब्‍बो न मारो सह ब्रह्मुना।
जितं अपजितं कयिरा तथारूपस्‍स जन्‍तुना ।।94।।

मासे-मासे सहस्‍सेन यो यजेथ सतं समं।
एकं च भवितत्‍तानं मुहूत्‍तमपि पूजये।
सा येव पूजना सेय्या यं चे पस्‍ससतं हुतं ।।95।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-040)

चरैवेति-चरैवेति—प्रवचन—चालिसवां 

पहला प्रश्न:

     आप कैसे समझेंगे कि मैं प्रेम में हूं और मैं कैसे समझ कि आपने मेरा प्रेम स्वीकारा?

प्रेम हो तो छिपाए भी नहीं छिपता; और प्रेम न हो तो कितना ही बताओ, बताया नहीं जा सकता।
प्रेम के होने में ही उसकी अभिव्यक्ति है। जैसे सूरज निकलता है, तब सूरज के होने का और क्या प्रमाण चाहिए? सूरज का होना ही काफी प्रमाण है।
प्रेम की रोशनी सूरज से भी ज्यादा है; तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती, क्योंकि सूरज को देखने के लिए तो तुम्हारे पास आंख है, प्रेम को देखने के लिए तुम्हारे पास आंख नहीं। प्रेम हो तो छिपाए नहीं छिपता। प्रेम का होना इस जगत में सबसे सघनीभूत घटना है; उससे ज्यादा सूक्ष्म कुछ भी नहीं है, उससे ज्यादा विराट भी कुछ नहीं है। प्रेम यानी परमात्मा की झलक।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-037)

उपशांत इंद्रियां और कुशल सारथी—प्रवचन—सैंतिसवां



सूत्र:

यस्‍सिन्‍द्रियानि समथं गतानि अस्‍सा यथा यथा सारथिना सुदंता।


पहीनमानस्‍स अनासवस्‍स देवापि तस्‍स पिहृयंति तादिनो ।।85।।


पठवीसमो नौ विरूज्‍झतिइंदरवीलूपमो तादि सुब्‍बतो।
रहदो व अपेत—कद्दमो संसारान भंवति तादिनो ।।86।।

संतं अस्‍स मनं होति संता वाचा न कस्‍स च।
सम्‍मदज्‍जा विमुत्‍तस्‍स अपसंतस्‍स तादिनो।।87।।



      संसार तो एक बाजार है; स्वयं को छोड़कर  सभी कुछ वहां मिलता है। जो पाने योग्य है, उसे छोड़कर  सभी कुछ वहां पाया जा सकता है। जिसे पाकर और पाने की सब चाह चली जाती है, बस उसी को तुम वहां न पा सकोगे। बहुत कुछ वहां मिलता है, सभी कुछ वहां मिलता है, लेकिन जो भी वहां मिलता है, उससे और पाने की चाह बढ़ती चली जाती है। जल कुछ ऐसा मिलता है कि प्यास घटती नहीं, जलन बुझती नहीं, तृप्ति आती नहीं; जैसे जल नहीं, प्यास की आग में संसार घी बनकर पड़ता चला जाता है।

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--036)

अंतश्चक्षु खोल—(प्रवचन—छत्‍तीसवां)

पहला प्रश्न :


मेरे व्यक्तित्व के दो हिस्से हैं; एक प्रतिदिन जमीन पर लेटकर आपको साष्टांग प्रणाम करता है और उससे सुखी होता है; और दूसरा प्राय: प्रतिदिन ही पूछ बैठता है कि तुम्हें क्या पता कि ये भगवान ही हैं! क्या दोनों मेरे अहंकार के हिस्से हैं और क्या श्रद्धा निर—अहंकार में ही जन्म लेती है?

न जहां तक है, वहां तक द्वंद्व भी रहेगा। मन बिना द्वंद्व के ठहर भी नही सकता; पलभर भी नहीं ठहर सकता। मन के होने का ढंग ही द्वंद्व है। वह उसके होने की बुनियादी शर्त है।
अगर तुम्हारे मन में प्रेम होगा तो साथ ही साथ कदम मिलाती घृणा भी होगी। जिस दिन घृणा विदा हो जाएगी, उसी दिन प्रेम भी विदा हो जाएगा।

एस धम्‍मों सनंतनो--(प्रवचन--035)

जीवन ही मार्ग है—(प्रवचन—पैतीसवां)  

सारसूत्र:

गतद्धिनो विसोकस्स विप्‍पमुतस्‍स सब्बाधिा।
सबगंथप्पहीनस्स परिलाहो न बिज्जति ।।81।।

उय्यज्‍जन्‍ति सतीमन्तो न निकेते रमति ते।
हंसा' व पल्‍ललं हित्वा ओकमोकं जहन्ति तो ।।82।।

ये सं सन्निचयो नत्थि ये परिज्जातभोजना ।
सुज्‍जतो अनिमित्तो व विमोक्खो यस्स गोचरो।
आकासे' व सकुन्तानं गति तेसं दुरन्नया ।।83।।


यस्सा'सवा परिक्सीणा आहारे व अनिस्सतो ।
सुज्‍जातो अनिमितो व विमोक्खो यस्स गोचरो।
आकासे'  व सकुन्तानं पदं तेस दुरन्नयं ।।84।।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--034)

प्यासे को पानी की पहचान--(प्रवचन—चौतीसवां)

पहला प्रश्‍न—


क्‍या आपने धर्म को पूरी तरह पा लिया है? क्या आप एक सदगुरू हैं? क्या आप परमात्मा को मुझ तक लाने में समर्थ है?

दीवानों की बस्ती में कोई समझदार आ गया! समझदारी से उठाए गए प्रश्नों का कोई मूल्य नहीं। नीचे लिखा है, सत्य का एक जिज्ञासु। न तो जिज्ञासा है, न खोज है; मान्यताओं से भरा हुआ मन होगा।
      जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि ईश्वर है। जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि धर्म है। जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि सदगुरु है। जिज्ञासु प्रश्न थोड़े ही पूछता है, जिज्ञासु अपनी प्यास जाहिर करता है।

      प्रश्न दो ढंग से उठते हैं : एक तो प्यास की भांति; तब उनका गुणधर्म और। और एक जानकारी से, बुद्धि भरी है कूडा—करकट से, उसमें से प्रश्न उठ आते हैं। पहला प्रश्न, 'क्या आपने धर्म को पूरी तरह पा लिया है?'

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--033)

एकला चलो रे—(प्रवचन—तैतीसवां)

सारसूत्र:

ये चखो सम्‍मदक्‍खाने धम्‍मे धम्‍मानुवत्‍तिनो ।
ते जना पारमेस्‍सन्‍ति मच्‍युधेय्यं सुदुत्‍तरं ।।77।।

कण्‍हं धम्‍मं विप्‍पहाय सुक्‍कं भविथ पंड़ितो ।
ओका अनौकं आगम्‍म विवेके यत्‍थ दूरमं ।।78।।

तत्रभिरतिमिच्‍छेय्य हित्‍वा कामे अकिंचनो ।
परियोदपेय्य अत्‍तनं चित्‍तक्‍लेसेहि पंड़िता ।।79।।

ये सं सम्‍बोधि-अड्गे सु समा चितं सुभावितं ।
आदान-परिनिस्‍सग्‍गे अनुपादाय ये रता।
रवीणासवा जुतीमंतो ते लोके परिनिब्‍बुता ।।80।।

रविवार, 6 नवंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--032)

तू आप है अपनी रोशनाई—(प्रवचन—बत्‍तीसवां)

पहला प्रश्‍न—

मेरी समझ में कुछ नहीं आता। कभी लगता है कि पूछना क्या है, सब ठीक है; और कभी प्रश्न ही प्रश्न सामने होते हैं।

मझ की बहुत बात भी नहीं। समझने का बहुत सवाल भी नहीं। जो समझने में ही उलझा रहेगा, नासमझ ही बना रहेगा।
      जीवन कुछ जीने की बात है, स्वाद लेने की बात है। समझ का अर्थ ही होता है कि हम बिना स्वाद लिए समझने की चेष्टा में लगे हैं, बिना जीए समझने की चेष्टा में लगे हैं। बिना भोजन किए भूख न मिटेगी। समझने से कब किसकी भूख मिटी? और भूख मिट जाए तो समझने की चिंता कौन करता है!

      आदमी ने एक बड़ी बुनियादी भूल सीख ली है—वह है, जीवन को समझ के द्वारा भरने का। जीवन कभी समझ से भरता नहीं; धोखा पैदा होता है।
      प्रेम करो तो प्रेम को जानोगे। प्रार्थना करो तो प्रार्थना को जानोगे।
      अहंकार की सीढ़िया थोड़ी उतरो तो निरहंकार को जानोगे।
      डूबो, मिटो, तो परमात्मा का थोड़ा बोध पैदा होगा।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--031)

तप्रज्ञ, सत्पुरुष है—(प्रवचन-इक्‍तीसवां)  

 सारसूत्र:

सब्‍बत्थ वे सप्‍परिसा चजान्ति न कामकामा लपयन्ति संतो
सुखेन फुठ्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पंडिता दस्सयन्ति ।।74।।

न अत्‍तहेतु न परस्स हेतु न पुत्‍तमिच्‍छे न धनं न रठ्ठं ।
नइच्‍छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो सीलवा पन्जवा धम्मिको सिया ।।75।।

अप्‍पका ते मनुस्‍सेयु ये जना पारगामिनो ।
अथायं इतरा पजा तीरमेवानुधावति ।।76।।
क प्राचीन कथा है जंगल की राह से एक जौहरी गुजरता था। देखा उसने राह में, एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चल रहा है। चकित हुआ! पूछा कुम्हार से, कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा, आठ आने मिल जाएं तो बहुत। लेकिन जौहरी को लोभ पकड़ा। उसने कहा, चार आने में दे—दे, पत्थर है, करेगा भी क्या?

एस धम्‍मो सनंतनो--ओशो (भाग--04)

एस धम्‍मो सनंतनो
भाग—4

ओशो




 एक ऐसी यात्रा पर तुम्‍हें ले चल रहा हूं, जिसकी शुरूआत तो है, लेकिन जिसका अंत नहीं। एक अंतहीन यात्रा है जीवन की; उस अनंत यात्रा का नाम परमात्‍मा है। उस अनंत यात्रा को खोज लेने की विधियों का धर्म है। एस धम्‍मो सनंतनो।


ओशो