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रविवार, 2 सितंबर 2018

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रवचन-05)

पांचवां-प्रवचन-(ओशो) 

अहंकार का भ्रम

मेरे प्रिय आत्मन्!
कोई दो हजार वर्ष पहले यूनान में एक फकीर था, डायोजनीज। बड़ा अजीब फकीर था। आधी जिंदगी हाथ में एक लालटेन लिए दिन की दोपहरी में घूमा करता था! लोग उससे पूछते कि हाथ में लालटेन क्यों लिए हो, जब कि सूरज आकाश में प्रकाशित है और पृथ्वी रोशनी से भरी है। तो वह कहता कि हाथ में लालटेन लिए इसलिए घूमता हूं ताकि मैं किसी मनुष्य को खोज सकूं। लेकिन भरी दोपहरी में लालटेन लेकर घूमने से भी मुझे कोई मनुष्य नहीं मिला। फिर उसने नगर छोड़ दिया और एक छोटी सी गुफा में एक कुत्ते के साथ निवास करने लगा। एक रात उसका जीवन मैं पढ़ता था। वह किताब बंद करके मैं सो गया और मैंने एक सपना देखा।

सपने में मैंने देखा कि डायोजनीज अपनी गुफा में बैठा है अपने कुत्ते के साथ, और मैं भी उसकी गुफा में मौजूद हूं। मैंने डायोजनीज से पूछा कि मैंने सुना है कि तुम आदमी को खोजते-खोजते थक गये और तुम्हें कोई आदमी नहीं मिला। जमीन पर जो इतने आदमी दिखायी पड़ते हैं, ये क्या हैं? वह डायोजनीज बोलाः वे केवल आदमी की शक्लें हैं, आदमी की आत्माएं नहीं। और मैं ऊब गया हूं। आदमी का साथ मैंने छोड़ दिया और अब मैं इस कुत्ते के साथ रहने लगा हूं!

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रवचन-04)

प्रवचन -चौथा -(ओशो) 

स्वयं का साक्षात

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक बहुत पुराने नगर में एक बहुत पुराना चर्च था। उस चर्च की दीवालें गिरनी शुरू हो गई थीं। उस चर्च के नीचे खड़ा होना खतरनाक था। उस चर्च में आने वाले लोगों ने धीरे-धीरे आना बंद कर दिया। उस बड़े भवन के पास से निकलना भी खतरे की बात थी। वह भवन किसी भी क्षण गिर सकता था। हवाओं के छोटे झोंके भी उस भवन को कंपा देते थे और वर्षा में जब बादल गरजते और बिजलियां चमकतीं, तो नगर के लोग बार-बार सोच लेते कि शायद वह चर्च गिर गया है।
अंततः उस चर्च के संयोजकों, संरक्षकों की कमेटी की बैठक हुई, उन्होंने कुछ प्रस्ताव पास किये। उनका पहला प्रस्ताव था कि पुराने चर्च को गिरा दिया जाना चाहिए। सभी इस पर सहमत थे। उनका दूसरा प्रस्ताव था कि नया चर्च बनाया जाना चाहिए। इससे भी सभी लोग सहमत थे।
उनका तीसरा प्रस्ताव था कि पुराने चर्च के सामान से ही नया चर्च बनाया जाना चाहिए। इस पर भी सभी लोग सहमत थे। और चैथा प्रस्ताव था, जब तक नया चर्च बन जाए, तब तक पुराना चर्च नहीं गिराया जाना चाहिए। इस पर भी सभी सहमत थे।

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रवचन-03)

तीसरा-प्रवचन-(ओशो)

होश से क्रांति

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य कैसे द्वंद्व में, कैसे विरोध में, कैसी जड़ता में ग्रस्त है! किन कारणों से मन की, मनुष्य की पूरी संस्कृति की यह दुविधा है?
पहली बातः हम जब तक जीवन की समस्याओं को सीधा देखने में समर्थ नहीं होंगे और निरंतर पुराने समाधानों से, पुराने सिद्धांतों से अपने मन को जकड़े रहेंगे, तब तक कोई हल, कोई शांति, कोई आनंद या कोई साक्षात्कार असंभव है। आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति इसके पहले कि जीवन सत्य की खोज में निकले, अपने मन को समाधानों और शास्त्रों से मुक्त कर ले। उनका भार मनुष्य के चित्त को ऊध्र्वगामी होने से रोकता है। इन समाधानों से अटके रहने के कारण दुविधा पैदा होती है।

 और दूसरी बातः हम अत्याधिक आदर्शवाद से भरे हों, तो जीवन में पाखंड को जन्म मिलता है। हम वैसे दिखना और होना चाहते हैं, जैसे हम नहीं हैं। हम दूसरे लोगों का अनुसरण, दूसरे लोगों की अनुकृति बनना चाहते हैं। और तब जीवन स्वंय की सृजनात्मकता, क्रिएटिविटी खो देता है। तब हम नकल होकर, कापियां होकर रह जाते हैं।

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रवचन-02)

दूसरा-प्रवचन-(ओशो)

मनुष्य विक्षिप्त क्यों है?

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक प्रदर्शनी में बहुत भीड़-भाड़ थी। बहुत नई-नई चीजें देखने को आई थीं। बहुत लोग उस प्रदर्शनी को देखने गये थे। एक आदमी एक कंगारू को भी लाया था प्रदर्शनी में दिखाने को। उसके झोपड़े के बाहर भी बड़ी भीड़ थी। लेकिन एक परिवार बड़े विचार में पड़ा था। पति बहुत चिंतित था, पत्नी भी बहुत चिंतित थी। वे सभी देखना चाहते थे। लेकिन उनके अठारह बच्चे और वे दो...कुल बीस थे। दस नये पैसे टिकट थी। लेकिन फिर भी बीस लोंगो के दो रुपये हो जाते थे। जो आदमी कंगारू प्रदर्शित कर रहा था, वह भी उनकी परेशानी देख कर उनके पास आया और उसने कहाः आप बड़े परेशान हैं?

उस आदमी ने कहाः बीस हैं हम...अठारह मेरे बच्चे हैं, मेरी पत्नी और मैं। कुछ सस्ते में दिखाना नहीं हो सकेगा? कुछ कंसेशन रेट पर दिखाना नहीं हो सकता? उस आदमी ने कहा, ‘ये अठारह बच्चे आपके ही हैं? ’ उस पिता ने कहा, ‘मेरे ही बच्चे हैं।’ तो उसने कहा, ‘फिर फिक्र मत करिए। कंगारू आपको देख कर बड़ा प्रसन्न होगा। हम उसे बाहर ले आते हैं आपको देखने। और दस पैसे ये सम्हालिये कंगारू के देखने के!’

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रवचन-01)

पंथ प्रेम को अटपटो-(प्रश्नोत्तर) 

पहला-प्रवचन-(ओशो)

ब्रह्मचर्य और समाधि

मेरे प्रिय आत्मन्!
सभी महत्वपूर्ण चीजों के संबंध में भ्रांतियां हो जाती हैं। जो भी व्यर्थ है, उसके संबंध में कभी भ्रांति नहीं होती। जो बात जितनी सार्थक है, उतनी भ्रांति पैदा होती है। उसका कारण यह है कि जो जितनी व्यर्थ है, हमारी सबकी समझ के भीतर होती है। और जो जितनी सार्थक है, हमारी समझ के पार पड़ जाती है, बात आगे निकल जाती है। तो जमीन के संबंध में कोई बात हो, तो भ्रांति नहीं होगी; आकाश के संबंध में बात हुई, तो भ्रांति शुरू हो जाती है। तो जितनी ऊंची बात है, उतनी मिसअंडरस्टैंडिंग होनी अनिर्वाय है। क्योंकि हम तो वहीं से पकड़ सकते हैं, जहां हम हैं। और हम वही समझ सकते हैं, जो हम समझ सकते हैं। जो हमारी समझ के पार है, उसको भी समझने की कोशिश करते हैं, इसी से भ्रांति पैदा होती है।

अब जैसे सेक्स तो मनुष्य की समझ के भीतर है; ब्रह्मचर्य उसकी समझ के बिल्कुल बाहर है। तो वह जो भी ब्रम्हचर्य का अर्थ लेगा, वह किसी न किसी तरह से सेक्स सेंटर्ड होगा। जो भी अर्थ लेगा, वह यौन केंद्रित होगा और वहीं से भ्रांति शुरू हो जाएगी। ब्रह्मचर्य का कोई संबंध यौन से नहीं है। कोई भी संबंध। हां, ब्रह्मचर्य के परिणाम में जरूर यौन प्रभाव पड़ते हैं।