इक्कीसवां-- प्रवचन
सतगुरु कृपा अगम भयो हो
सारसूत्र:
सब्द सनेह लगावल हो, पावल गुरु रीती।पुलकि-पुलकि मन भावल हो, ढहली भ्रम-भीती।।
सतगुरु कृपा अगम भयो हो, हिरदय बिसराम।
अब हम सब बिसरावल हो, निस्चय मन राम।।
छूटल जग ब्योहरवा हो, छूटल सब ठांव।
फिरब चलब सब थाकल हो, एकौ नहिं गांव।।
यहि संसार बेइलवत हो, भूलो मत कोइ।
माया बास न लागे हो, फिर अंत न रोइ।।
चेतहु क्यों नहिं जागहु हो, सोवहु दिनराति।
अवसर बीति जब जइहै हो, पाछे पछिताति।।
दिन दुइ रंग कुसुम है हो, जनि भूलो कोइ।
पढ़ि-पढ़ि सबहिं ठगावल हो, आपनि गति खोइ।।
सुर नर नाग ग्रसित भो हो, सकि रह्यो न कोइ।
जानि बूझि सब हारल हो, बड़ कठिन है सोइ।।
