पशु पक्षियों का भी
अपना एक स्वतंत्र आस्तित्व होता है। लेकिन वह जहां पर रहते है। उस स्थान के साथ-साथ
उनका वहां रहने वाले उन लोगों से भी अपना पन जुड़ जाता है। वह उस सब में समाहित हो कर अपने को भी उसी परिवार या स्थान
का सदस्य ही मानते चले आते है। पीढ़ी दर पीढ़ी। मुझे
याद है शायद बात 1980 से भी पहले कि है। जब मेरी मां जीवित थी। तब हम पुरूष लोग सब
उस बैठक में ही सोते थे। उसे सब ‘’घेर’’ के नाम से पुकारते थे। वहां गाय-भैंसे बैल आदि सब बंधे होते थे। यानि पेड़
पौधे मनुष्य के साथ-साथ उनके रहने के भी मकान। यानि की वह बहुत ही बड़ी जगह होती थी। करीब वह
जगह 1500 से ले कर 2000 गज तो आराम से रही ही होगी। क्योंकि मेरी छोटे चाचा और हम
एक साथ तो नहीं रहते थे परंतु स्थान का बटवारा होने पर भी दरवाजे और चार दीवारी एक
ही थी। क्योंकि चाची मेरी मां की सगी बहन
थी। जिसे हम मौसी कहते थे। उस समय से लेकर आज करीब 60 साल गुजर गये। एक बुल-बुल
जोड़े को मैं तब से देखता हुआ आया हूं। मां जब घेर में जाती तो कैसे वह मां के साथ
संवाद करती थी। क्योंकि मां दूध निकलना या गोबर पानी करना मां या बहनों की जिम्मेदारी
थी। जब मां जाती तो मुझे कहते की छत पर जाकर उसके बर्तन में पानी भर दे। क्योंकि वहां
सीढियां नहीं थी। इस लिए दीवार के बाहर निकले पत्थरों का सहारा ले कर मां तो नहीं चढ़
सकती थी। मैं उसके लिए पानी भरता था और मां जरूरी उनके लिए बाजरा, या रात की बची रोटी को मोर उन रोटी को टूकड़े छत पर फेंक देती थी।
समय बदला, भीड़ बढ़ती गई। स्थान के बटवारे होते चले गये। और कंकरीट की उंची इमारतें बनती चली गई। आज तो ये हाल है। गांव का क्या पूरे शहर का की गलियां जो पहले छांव को तरसती थी। आज धूप को तरसती है। बुर्जुग औरतें कभी हमारे घर के आंगन में जो नीम का वृक्ष था उस नीचे बैठ कर दिन भी थकान मिटाने के साथ-साथ कुछ हाथ का काम या बातचीत करती रहती थी। आज भी उसी वंशावली की बुल-बुल हमारे ओशोबा हाऊस में रहती है। क्योंकि यहां पर वृक्ष है। सुरक्षा है। जो प्राणी चाहे वह पशु हो या पक्षी एक बार मानव के संग साथ रहने के आदि हो जाते है। तब वह जंगल में आपने को अच्छा महसूस नहीं करते।


















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