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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

मार्ग की अनुभुतियां- (बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-)

 बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-

पशु पक्षियों का भी अपना एक स्वतंत्र आस्तित्व होता है। लेकिन वह जहां पर रहते है। उस स्थान के साथ-साथ उनका वहां रहने वाले उन लोगों से भी अपना पन जुड़ जाता है। वह उस सब में समाहित हो कर अपने को भी उसी परिवार या स्थान का सदस्य ही मानते चले आते है। पीढ़ी दर पीढ़ी। मुझे याद है शायद बात 1980 से भी पहले कि है। जब मेरी मां जीवित थी। तब हम पुरूष लोग सब उस बैठक में ही सोते थे। उसे सब ‘’घेर’’ के नाम से पुकारते थे। वहां गाय-भैंसे बैल आदि सब बंधे होते थे। यानि पेड़ पौधे मनुष्य के साथ-साथ उनके रहने के भी मकान।  यानि की वह बहुत ही बड़ी जगह होती थी। करीब वह जगह 1500 से ले कर 2000 गज तो आराम से रही ही होगी। क्योंकि मेरी छोटे चाचा और हम एक साथ तो नहीं रहते थे परंतु स्थान का बटवारा होने पर भी दरवाजे और चार दीवारी एक ही थी। क्योंकि चाची  मेरी मां की सगी बहन थी। जिसे हम मौसी कहते थे। उस समय से लेकर आज करीब 60 साल गुजर गये। एक बुल-बुल जोड़े को मैं तब से देखता हुआ आया हूं। मां जब घेर में जाती तो कैसे वह मां के साथ संवाद करती थी। क्योंकि मां दूध निकलना या गोबर पानी करना मां या बहनों की जिम्मेदारी थी। जब मां जाती तो मुझे कहते की छत पर जाकर उसके बर्तन में पानी भर दे। क्योंकि वहां सीढियां नहीं थी। इस लिए दीवार के बाहर निकले पत्थरों का सहारा ले कर मां तो नहीं चढ़ सकती थी। मैं उसके लिए पानी भरता था और मां जरूरी उनके लिए बाजरा, या रात की बची रोटी को मोर उन  रोटी को टूकड़े छत पर फेंक देती थी।

समय बदला, भीड़ बढ़ती गई। स्थान के बटवारे होते चले गये। और कंकरीट की उंची इमारतें बनती चली गई। आज तो ये हाल है। गांव का क्या पूरे शहर का की गलियां जो पहले छांव को तरसती थी। आज धूप को तरसती है। बुर्जुग औरतें कभी हमारे घर के आंगन में जो नीम का वृक्ष था उस नीचे बैठ कर दिन भी थकान मिटाने के साथ-साथ कुछ हाथ का काम या बातचीत करती रहती थी। आज भी उसी वंशावली की बुल-बुल हमारे ओशोबा हाऊस में रहती है। क्योंकि यहां पर वृक्ष है। सुरक्षा है। जो प्राणी चाहे वह पशु हो या पक्षी एक बार मानव के संग साथ रहने के आदि हो जाते है। तब वह जंगल में आपने को अच्छा महसूस नहीं करते।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

यादें और जीवन का बहा-मनसा-मोहनी

 यादें और जीवन का बहा-


जीवन को अगर हम देखे तो वह यादों का एक बहाव ही पाओगे। परंतु कुछ मील के पत्थर हमारे पूरे जीवन की दशा को प्रतिवर्तन कर देते है। ऐसी ही एक याद आज की यानि की 23 जनवरी 1979 जो आज से 47 साल पहले घटी थी। कैसा मधुर उन्माद आज भी मन के आंगन में गुदगुदाहट सी होने लग जाती है। जब जीवन के उन क्षणों को याद कर रहा हूं। वैसे तो हमारे जीवन की जिसने हमारे जीवन को ये मार्ग दिया या आज जहां हम खड़े है। उसकी भिन्न-भिन्न यादें है। या तिथि है। क्योंकि एक महा बाद यानि 26 फरवरी को 1976 को हम और मोहनी मिले थे। यानि अब करीब 50 साल का हमारा साथ हो रहा है। और यही साथ हमें ओशो के मार्ग पर लेकर गया है। शायद मैं भी इस मार्ग पर अकेला नहीं चल सकता था। और न ही मोहनी ही। परंतु जब दोनों ही अधूरे थे तो ओशो के मार्ग पर चल कर हम एक पूर्ण हुए। और दोनों ने जैसे जीवन के दक्षिणायन की यात्रा एक साथ शुरू की उसी तरह से जीवन का उत्तरायण पर भी एक साथ चले। यानि 23 जनवरी 1994 को पूना से एक ही दिन सन्यास लिया।

शनिवार, 8 नवंबर 2025

ओम बोधि कम्यून और हथिया पिरामिड (देहरादून) -भाग-02

ओम बोधि कम्यून और हथियारी पिरामिड (देहरादून)

भाग -02

भारी कदमों से मैं मा मुक्ति के पास से उठ कर थका हार बाहर आया। सामने स्वामी अनुपम जी मेरा इंतजार ही कर रहे थे। शायद वह हालात को पहले से ही जानते थे। परंतु उनकी अपनी मजबूरी है। हालांकि ये उनके विश्राम का टाइम था। परंतु शायद उसे भी इस घटना को देख कर कुछ अजीब लगा होगा। वरना तो वह क्यों मेरा सामान मेरे साथ ले जाकर कमरे में रखवाता। कितने कमरे खाली है जगह है या नहीं ये तो स्वामी अनुपम की ड्यूटी है की कमरे देना पैसे आदि लेना। इस में मां मुक्ति का हस्तक्षेप न के बराबर होना चाहिए। परंतु शायद इस बार उसे भी जरूर कुछ डाट खाना पड़ी होगी। कि तुम हम से पूछे बिना कैसे कमरे में सामान ले गये।

खेर उनके के पास एक गाड़ी वाले का नम्बर था। उसने उसे फोन मिलाया और पूछा की गाड़ी है। उसने पूछा हां है कहां जाना है। तब स्वामी जी ने मुझे से पूछा की गंगा धाम या कहीं और तब मैंने कहां की नहीं हथियारी में ओशो पिरामिड चले जाते है। वहां का एकांत भी बहुत गहरा है। उपर से जमना का किनारा। मैं जानता था की मोहनी नीचे यमुना तक नहीं उतर सकेगी। फिर भी वहां के उतार चढ़ाव काफी नीचे थे। परंतु गंगा धाम में भी तो यहीं सब था। वहां हमेशा भीड़ ही रहती है। आखिर एक घंटे के इंतजार के बाद गाड़ी आई। 2000/-किराया मांगा। ज्यादा दूरी नहीं थी। परंतु उसे हमें छोड़ कर वापस भी तो आना था।

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

ओम बोधि कम्यून और हथियारी पिरामिड (देहरादून) -भाग-01

ओम बोधि कम्यून और हथियारी पिरामिड (देहरादून)
मार्ग की मधुर अनुभुतियां -
भाग-01

जीवन में जो घटता है वह हम पर नहीं घटना घटती है समय पर इस लिए उसका होना न होने का पता हमें घटते हुए नहीं चलता। परंतु जरूरी नहीं है वह आपके लिए अशुभ ही हो। लेकिन सच यह है कि जब कुछ भी घटता है हम उसे  दुर्घटना ही मान लेते है। परंतु सत्य में ऐसा होता नहीं है। समय के पार जब हम उसे देखते है तो  वह आप के लिए अति उत्तम होता है।

ये अभी घटा एक का एक अनुभव आप को लिख रहा हूं। पिछले आठ साल से मोहनी बीमार चल रही है, इस लिए दोनों का साथ बाहर निकलना बहुत कम हो गया है। परंतु अचानक दो महीने से मोहनी स्वास्थ महसूस कर रही है। तब सोचा कुछ दिनों के लिए साथ निकले। सो हमने देहरादून ‘’ओम बोधिसत्व कम्यून’’ जाने का निर्णय लिया। वह आश्रम स्वामी नरेंद्र बोधिसत्व की उर्जा से लवरेज है। और हमारे लिए वह घर के समान था। हां एक बात और भी थी कि 30 नवम्बर को स्वामी नरेंद्र जी ने शरीर छोड़ा था, तब सोचा इससे सुंदर क्या होगा। सो हमने 24 तारीख की टिकट करा ली। तो हम बहुत हंसते खेलते। डेढ़ बजे के करीब आश्रम पहुंच गये। वहां खाने की तैयारी हो रही थी। मां दिव्या (जो मां मुक्ति की छोटी बहन है) गेट पर ही मिल गई। वह इस तरह से देख रही थी की हम कोई अजनबी है। हालांकि वह और उसका मित्र स्वामी कृष्णा वेदांत हमारे ओशोबा हाऊस आ चूकी है। ध्यान भी किया और साथ में खाना भी खाया। और आश्रम में तो हम कितनी ही बात मिले है। हम वहां करीब 1998 से जा रहे है।

बुधवार, 30 जुलाई 2025

प्रकृति की जीवेष्णा या जिजीविषा-(मनसा-मोहनी)

 

प्रकृति की जीवेष्णा या जिजीविषा-

कल काफी दिन में घर से बाहर जाना हुआ। वैसे घुमने के लिए तो ही जाता हूं। परंतु बहुत जल्दी रात के अंधेरे में। तब प्रकृति को देखना एक अलग ही अनुभव होता है। सोई सी कुछ अलसाई सी जैसे कोई नींद में ही हवा के कारण झूम रहा है। आप अगर होश से देखोगे तो आपको पता चलेगा की रात को पेड़ हाव में जिस तरह से झूमते है और दिन में वह किस तरह से झूमते है। इनमें बहुत भेद होता है। दिन वह जागे से नाचते से लगते है। और रात को वह अलसाये से खामोश ऊंघते से दिखते है।  काफी दिन से कुछ कविता ओर कहानियां संजो कर उन्हें एक पुस्तक रूप दे रखा था। बस आलस्य के कारण घर से निकलने का मन हो ही नहीं रहा था। सोचा चलो चलते है प्रकाश के पास और ये काम भी खत्म करते है। क्योंकि जब भी कम्पयूटर खोलता तो वो पुस्तकें धूर कर देखती की जैसे उन्हें कैद में रख हुआ है। मौसम तो कुछ-कुछ ठीक था। आसमान में बादल एक दूसरे साथ खेलते दौड़ते से लग रहे थे। सुबह मधुर समीर बह रही थी। अकसर मुझे  नोएडा प्रकाश के पास जब भी जाना होता है तो मैं हमेशा मेट्रो तक पैदल ही जाता हूं। मुझे मेट्रो से सफर करना बहुत आनंदाई महसूस होता हे। राजेंद्र पैलेस का स्टेशन घर से करीब चार किलो मीटर है।

सोमवार, 9 जून 2025

मास्टर मदन - अभूतपूर्व प्रतिभा के धनी

 

मास्टर मदन - अभूतपूर्व प्रतिभा के धनी संगीतकार

मास्टर मदन (28 दिसंबर 1927 को जन्मे - 5 जून 1942 को मृत्यु) की याद करते हुए, जो स्वतंत्रता से पहले के भारतीय गज़ल और गीत गायक हैं, आज उनकी पुण्यतिथि है। उनके जीवन में उन्होंने केवल आठ गाने रिकॉर्ड किए, और ये अब आमतौर पर उपलब्ध हैं। उनका जन्म 28 दिसंबर 1927 को पंजाब के जालंधर जिले के खान खाना नामक एक गांव में हुआ, जो अब नवां शहर में है। यह गांव अकबर के प्रसिद्ध दरबारी अब्दुल रहीम खान-ए-खाना द्वारा स्थापित किया गया था, जो एक prolific लेखक थे। उनकी मृत्यु 5 जून 1942 को हुई, reportedly दूध में पारे के विषाक्तता के कारण, जब वे शिमला में थे। 'यूं ना रह रहकर हमें तड़पाइए’ और ‘हैरत से ताक रहा है जेहन वफा मुझे’ ये दो गज़लें मास्टर मदन की आठ साल की छोटी उम्र में रिकॉर्ड की गई थीं, जो 78 rpm ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर हैं, यह बीते वर्षों की अमर संगीत का अनमोल संग्रह है। संगीत में थोड़ी भी रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति इन दोनों सागर निजाम की गज़लों से परिचित है, जो अद्वितीय बाल प्रतिभा-मास्टर मदन द्वारा गाई गई हैं, जिनकी मृत्यु सिर्फ पंद्रह। साल की उम्र में हुई। ये दो गज़लें निश्चित रूप से साठ-पچہ साल बाद भी जादू को बनाए रखती हैं, जो HMV द्वारा 'गज़ल का सफर' शीर्षक से जारी किए गए दस CDs के संग्रह से स्पष्ट है। इस संग्रह में मास्टर मदन की ये दो गज़लें शामिल हैं, साथ ही पिछले शताब्दी के अधिकांश प्रसिद्ध गज़ल गायक के रिकॉर्डिंग भी हैं। इस संग्रह को प्रसिद्ध गायक जगजीत सिंह ने संपादित किया। पिछले सदी के अंत तक, सिर्फ मास्टर मदन के ये दो गाने उपलब्ध थे। हालांकि, कुछ उत्साही संगीत संग्रहकर्ताओं के प्रयासों के बाद, हमें उनके छह और शानदार प्रस्तुतियों का पता चला। इस प्रकार, उनके सही स्वर में गानों का संग्रह आठ तक उपलब्ध हो गया। प्रसिद्धि के जीवन के बारे में कुछ पंक्तियाँ। मास्टर मदन का जन्म 26 दिसंबर, 1927 को पंजाब के एक पारंपरिक सिख परिवार में 'खांखाना' नामक गाँव में हुआ, जिसे अब्दुल रहीम खांखाना ने बनाया और नाम दिया, जो जालंधर जिले में स्थित है।

शनिवार, 10 मई 2025

मधुर यादें-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) - भाग-03

मार्ग की मधुर यादें-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) 

भाग-03 धूनी

मेहरा बाद एक सूखी और खुश्क जमीन है जहां पर बरसात बहुत ही कम होती है। कहते है मेहेराबाद में मेहेर बाबा की धूनी एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक परंपरा है। इस परम्परा को मेहेर बाबा द्वारा एक संशोधित रूप में अपनाया गया था। यह उन कुछ प्रामाणिक धार्मिक संकल्पों में से एक है, जिसे मेहेर बाबा ने स्वयं अपने सामने किया। आज भी यह कार्यक्रम हर महीने की 12 तारीख की शाम को लोअर मेहेराबाद के मेहेर पिलग्रिम सेंटर के पास बाबा द्वारा स्थापित परंपराओं के अनुसार किया जाता है, ओर प्रति माह होने वाले कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण केंद्रबिंदु होता है। मेहेर बाबा की धूनी पहली बार 10 नवंबर 1925 को जलाई गई थी, जब कुछ ग्रामीणों ने मेहेर बाबा से एक भयंकर सूखे के बारे में मदद मांगी, जिसने उनकी फसलों को खतरे में डाल दिया था। इस धुनी को जलाने की परंपरा आज भी जारी है और इसे मेहेर बाबा के आध्यात्मिक कार्य का प्रतीक माना जाता है।

धुननी के बारे में यहां एक कथा है कि...

सितंबर का महीना था - मेहराबाद में मानसून का अंतिम चरण। जून के पहले सप्ताह से शुरू होने वाले पहले तीन महीनों के दौरान बारिश बहुत कम बिलकुल न के बराबर हुई थी, जिससे सूखे की आशंका थी, अगर द्वितीयक मानसून धारा नहीं आई।

गुरुवार, 8 मई 2025

मधुर यादें-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) - भाग-02

मार्ग की मधुर यादें-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) 



भाग-02 (स्वछंद आवारगी)

आज जो (एम पी आर) मेहेराबाद बना है, आजादी से पहले वहां पर पहले अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी। परंतु आजादी के बाद सरकार ने इसे मेहर बाबा को उपहार स्वरूप दे दिया। क्योंकि ये जमीन पुराने मेहेराबाद से एक दम से सटी है। जो एक दम से वीरान थी। वहां न कोई पेड़ पौधा ही उकता था। पानी की वहां हमेशा करम रहती है। बरसात भी वहां कम ही होती है। इन दोनों के बीच से पूना रेल व हाईवे गुजरता है। अब  जिसके नीचे से एक सुंदर पथ मार्ग बना दिया है। इस MPR  (मेहर पिल ग्राम रिट्रीट) से पुराने मेहेराबाद आप बीच अंदर से भी जा आ सकते है। वैसे तो पूरा मेहेर बाबा का आश्रम कई किलोमीटर में फैला हुआ है। परंतु जहां मेहेर बाबा  की समाधि है वह दोनों आश्रमों की एक दम से मध्य में है।  परंतु चाहे नया हो या पुराना दोनों ही अति सुंदर कलात्मक शांति अपने में समेटे हुए है। पुराने मेहरा बाद में करीब रहने खाने का 250 रूपये ही लगते हे। इसलिए अगर देखे तो पुराने मेहेराबाद उर्जा क्षेत्र ध्यान के लिए अति गहरी है। क्योंकि समाधि के पास या पुराने मेहेराबाद में ही अधिक दिनों तक भगवान मेहर बाबा रहे थे। मुझे तो वहां का एक-एक स्थान उर्जा से लवरेज हे। आप कहीं भी एकांत जंगल में बैठ जाये आप अचानक गहरे ध्यान में डूबने लग जाओगे।

मंगलवार, 6 मई 2025

मधुर यादें-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) - भाग-01

मार्ग की अनुभुतिया-( मेहेराबाद महाराष्ट्र) 


भाग-01

पूना का एक माह का आवास काल अति सुंदर रहा। तब बेटी ने कहां की पापा आप ध्यान में जो ठहराव मिला है उसे गहरे जाने के लिए आप मेहेराबाद चले जाये तो अति उत्तम होगा। हम आप की वहां की बुकिंग करा देते हे। मैं इससे पहले मेहेराबाद कभी नहीं आया था। पूना के पास ही है, करीब 125  किल मीटर होगा। पूना से अमरावती जाने वाली ट्रेन जो 11-20 पर चलती है। और मैं एक बज कर 20 मिनट पर मेहेराबाद पहुंच गया। वहां से आटो ले कर। MPR  (मेहर पिल ग्राम रिट्रीट) ये रेहने के लिए नया स्थान बनाया है। वैसे पुराना जो पूना हाईवे से सटा है। जहां पहले महर बाबा रहते थे। उसे मेहेराबाद कहते है। सड़क से इसकी दूरी 8-9 किलोमीटर है। परंतु अंदर से अगर आओ तो केवल दो किलोमीटर है। परंतु सामान के साथ तो आपको बाहर से ही आना होगा।

दफ्तर में पहुंचने पर वहां काम करने वाले मित्र ने कहां की आपका खाना रखा है। पहले आप खाना खाकर आये बाद में आप दफ्तर का काम करे। व्यवहार बहुत मधुर था वहां के लोगों का। मैंने आठ दिन के पैसे दे दिये। 400+300 खाने के। खाने में सुबह नाश्ता चाय। दोपहर का नाश्ता श्याम की चाय और रात का खाना। खाना यहां का बहुत सुस्वाद है। तीन चार तरह की सब्जियां, दो-तीन तरह का सलाद।

शनिवार, 3 मई 2025

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-06)

 मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)  


(तीसरा चरण-मोन ध्यान)

पूना आवास-(भाग-06)

ध्‍यान के पहने दो चरण गुजर चूके थे। परंतु विश्‍वास ही नहीं हो रहा था की वो सब अनुभव इस मन इस देह पर से गुजरा है। अचेतन तक उस सब से अनभिग था। ओशो से जूड़े इस लम्‍बे अंतराल में ध्‍यान के अभूतपूर्व अनुभव है। कदम-कदम पर विषमय के साथ आनंद बरस रहा था। परंतु इस सब का न तो मन को पता था और नहीं ही इस सब की पहले मन ने कल्‍पना थी। बेटी बोधि उन्‍मनी की जिद के कारण यहां आया। वह तो आठ साल पहले ही मुझे ध्यान के लिए भेज रही थी। उस समय तो मोहनी बीमार भी नहीं हुई थी। परंतु मुझे लगा की इस सब ध्यान की मुझे जरूरत ही नहीं है। क्योंकि लम्बे अंतराल से लगातार पूना ध्यान के लिए आ जा रहे थे। और हमारा घर भी ध्यान के लिए अति सहयोगी है। आज भी वहां नित एक या दो ध्यान तो हम करते ही रहते है। बहुत सरल और सहज गति से हम सब ध्यान में साथ सहयोग के साथ  बरसो से चल ही रहे थे। ध्यान से जो जीवन में बदलाव हो रहे थे, मन एक दम से जो मिल रहा था उस से तृप्‍त था। परंतु तब मैं नहीं आया। परंतु इस बार तो वह जिद्द पर ही अड़ गई की मम्‍मी की बीमारी के ये सात-आठ साल के कारण तो आप एकांत में जी रहे है इस तरह से आप भी बीमार हो जायेंगे। और उसने मेरी एक न सूनी और आज सोचता हूं तो ये उसने सच ही एक महान कार्य किया। अब मन से उसका ये उपकार एक उपहार एक आनंद दे रहा है। की मेरी जिद्द गलत थी। हम बड़े है इस का मतलब हम सही है ये जरूरी नहीं।

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-05)

 मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)


(ध्‍यान का दूसरा चरण रोना )

पूना आवास-(भाग-05)

हंसी का पहला सप्ताह जिस सहजता से गुजरा। उस से मन की  जो चालबाजी थी, वह कमजोर पड़ गई। हंसी का वो झरना अब भी अंदर सहज बह रहा था। मानो अंदर सब तरल हो गया। सच ये सात दिन पल में ही गुजर गये। मानो समय की गति अपने अलग आयाम में चली गई। ये सब लिख रहा हूं परंतु जो घटा था उसके लिए शब्‍द बहुत ही छोटे और पराये-पराये लग रहे है। क्‍योंकि इसे मैंने वहीं पूना में बैठ कर लिख लिया था इसलिए वहां की कुछ महक कुछ झलक इन शब्‍दों में बसी रह गई है। वरना तो यहां आते-न आते वो सब काफूर हो गया है। बस अब उस लिखे को टाईप भर कर रहा हूं। फिर भी टूटी फूटी तुतलाती बोली में लिखने की कोशिश कर रहा हूं। उसे ही आप अधिक समझ कर पढ़ना ही नहीं उसमें उतरने की कोशिश करना।

अगला सप्ताह शुरू हुआ रोने का। आज समाधि पर हल्के-नीले-हरे रंग के पिल्लों चादर बिछी थी। आज समाधि सब रंग रूप बदला हुआ बहुत सुंदर और ह्रदय को एक ठहराव दे रहा था। ध्‍यान करने में आपके आस पास का माहोल भी कितना महत्‍वपूर्ण होता है। एक तो समाधि दूसरा ओशो ने जैसे जो कहां था ये लोग उसी तरह से ध्‍यान को कराते हे। अपना कुछ भी उस में विलय या लिप्त नहीं करते। जो पिछले सप्ताह गुजरा था ध्‍यान में वह एक संकल्प एक साहास दे रहा था। कहीं से एक साहस एक शक्‍ति अपने आप आती सी महसूस हो रही थी। की हंस लिए तो रोना शायद इतना कठिन नहीं होगा।

रविवार, 27 अप्रैल 2025

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-04)

मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)


पूना आवास-(भाग-04)

ध्‍यान का समय तीन घंटे था। मन अब भी बार-बार अपना जाल बून रहा था कि देखा मैंने तो पहले ही कहा था की ये तुम से नहीं हो सकेगा। चले थे तीन घंटे हंसने। मन की जहां मृत्‍यु की संभावना होती है वह अपने बचाव के लिए तुरंत कोई नया नाटक शुरू कर देता है। साधक को  हमेशा इस बाता के प्रति सजग रहना चाहिए। जो मन हमारा सहयोगी हो सकता है वहीं हमारा सबसे बड़ी बाधा ही नहीं दुश्मन भी है। मन से  ही मनुष्‍य  कहलाता है और वह अंतिम समय तक अपना प्रभुत्‍व छोड़ना बिलकुल नहीं चाहेगा। 

ध्‍यान में अधिक साधक नहीं थे, और उन  में से भी कुछ  तो  लेट  कर  सो गये। क्‍योंकि हंसना  रोना एक संप्रेषण है ये फैलता है। एक दूसरे को प्रभावित  करता है, एक आदमी  हंस  रहा है या रो रहा है या उदास है तो आप पास भी उसकी तरंगे  प्रभावित कर रही होती थी। परंतु ध्‍यान कराने वाले कॉर्डिनेटर "समन्वयक" या "ताल-मेल बैठाने वाला इस विषय में तटस्थ थे। जब आप ताकत लगा कर ध्‍यान नहीं करना चाहते तो आपके साथ कोई जबरदस्‍ती नहीं है। परंतु कुछ साधक हंसने का पूर्ण प्रयास कर रहे थे। खास कर ध्‍यान कराने वाले तो अपने उपर पूरी ताकत लगा कर ध्‍यान में डूबने  की कोशिश कर रहे थे।

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-03)

मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)
 

पूना आवास-(भाग-03 )

(उपसंहार)

जीवन काल में ओशो से जुड़ने के बाद 35 साल की यात्रा जो की है। उस का अगर निचोड़ निकाला जाये तो आज गुजरे ओशो मिस्‍टिक रोज के 35 दिन बहुत भार पड़ रहे है। जैसे पूरे जीवन के ध्‍यान में जो मक्खन निकल रहा है। ये उसी का नतीजा है। मैं ऐसा बिलकुल नहीं कहा रहा की उन 35 सालों में ध्‍यान में कुछ गति नहीं हुई। वह तो हर पल, हर दिन नया आकाश नया आयाम देती ही आ रही है। परंतु अब कुछ ऐसा मिला है जिस न तो मन समझ पा रहा है और न ही मस्‍तिष्‍क उसकी व्याख्या कर पा रहा है।

ओशो मिस्‍टिक रोज- उर्जा का कमाल है, मानव शरीर का सबसे महत्‍व पूर्ण अंग अगर कुछ है तो वह नाभि है, हम जीवन नाभि से ही प्राप्त करते है। मां के पेट में हम न तो भोजन लेते है, न ही हमारा दिल ही धड़कता है। फिर भी जीवन अपनी गति बनाये रखता है। इस लिए जीवन के बाद भी हम जो भी दबाते है, वह नाभि में ही एक भय के रूप में जमा होता चला जाता है। जिस प्रकार हमें जीवन नाभि देता है उसी प्रकार नाभि ही हमें मृत्‍यु को केन्द्र भी है।

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-02)

मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)




पूना भाग-02

उस रात के समय तो को तो आश्रम में कोई खास ध्‍यान नहीं हो रहा था। केवल पश्‍चात्‍य संगीत और फूहड़ नृत्य जो मुझे अधिक नहीं भाता। सो नहाने के बाद थोड़ा आश्रम में धूम पुरानी यादों में कुछ क्षण जिया। और उसके बाद थोड़ी सी खिचड़ी और दाल खाई और फिर कुछ लिखा फिर प्रवचन लगा कर सो गया। रात को मुझे जल्‍दी सोने की आदत है। क्‍योंकि फिर सुबह जल्‍दी उठना भी होता है। अकसर सुबह तीन बजे मेरी आँख खुल जाती है। उठने के बाद सबसे पहले थोड़ा पानी पिया और उसके बाद केतली में चाय बनाई और फिर बाहर घूमने के लिए निकल पड़ा। जो मेरी घर पर भी दिनचर्या थी। घर पर भी जल्‍दी उठ कर मैं और मोहनी साथ घूमने निकल पड़ते है। इस बार उमर ख्‍याम में ठहरने का मोका मिला था। सच ही उमर ख्‍याम को तो ओशो की चित्र कला की प्रदर्शनी के लिए सजाया व बना रखा था। पूरे गलियारे सीढ़ियों या कमरों में जहां भी नजर जाती थी केवल ओशो की बनी पेंटिंग ही लगी थी। कुछ तो ऐसी थी जो मैं पहली बार देख रहा था। ये अंग्रेज सच चीजों को कलात्मक से बनाने में माहिर है।

उसके बाद आकर नहाया और चोगा पहन कर ओशो की समाधि पर शांत ध्‍यान के लिए चला गया। वहां से जब तक आया, तब तक विजिटिंग सेंटर (स्‍वागत कक्ष)  खुलाने का समय हो गया था। इसलिए मैं कार्ड बनवाने के लिए चला गया। मेरे पास पुराना कार्ड था इस लिए बनने में अधिक देर नहीं लगी और फिर पैसे जमा करने के लिए अंदर जाकर जहां कार्य ध्‍यान के आफिस चला गया। तब वहां जाकर मैंने पैसे जमा करने के लिए बिल निकलवाया। वहां पर एक विदेशी लड़की बैठी थी।

ओशो मिस्टिक रोज़) पूना आवास –(भाग-01)

मधुर यादें-( ओशो मिस्टिक रोज़)




पूना आवास –(भाग-01)

इस बार लम्‍बे अंतराल के बाद पूना जाना का सौभाग्‍य हुआ। पिछली बार पूना 2018 में शायद सितम्बर माह में गया था। उस के बाद कुछ ऐसा घटा की पूना जाने का अवसर आया ही नहीं। ओशो से जुड़ने के बाद ये मेरे जीवन में पहली बार है, जब इतने दिनों तक पूना नहीं जा पाया। वरना तो काम करते हुए भी हर साल पूना तो जाना ही होता था। और अब तो सब कामों से मुक्‍त हूं। फिर भी जीवन में ऐसा अंतराल आना एक अनहोनी जैसा लग रहा है। असल में हमारा मन अपने को बचाने के नये-नये बहाने तलाश लेता है। क्‍योंकि पूना में इस बीच कुछ ऐसा घटा पहले तो करोना काल, फिर स्वीमिंग पूल बेचने वाली बात। जिससे मन बहुत आहत हुआ था। क्‍योंकि मेरा सबसे अच्‍छा ध्‍यान तैरना ही होता था। अब जो वहां पर नहीं था। इसलिए मैंने निर्णय लिया की जब तक तरूण ताल खुल नहीं जाता तब तक पूना नहीं जाऊंगा। परंतु अंदर से एक तड़प थी। इस सब में सहयोग दिया बेटी ने। की पापा आप को पूना जाना ही चाहिए। मैं मम्‍मी के पास हूं। इस बीमारी में आप 6-7 साल से मम्‍मी के पास हो। तो अब आप के लिए तो पूना जाना अति अनिवार्य है। अब मेरे पास इस का कोई उत्‍तर नहीं था। सच कहूं तो मैं खूद ही जाना चाहता था। क्‍योंकि बेटी ने 1999 में मिस्‍टिक रोज किया था। लेकिन हम खूद 35 साल से ओशो से जूड़े रहे फिर भी नहीं कर पाये थे। तब बेटी ने कहां की पापा सब ध्‍यान-ध्‍यान है परंतु मिस्‍टिक रोज कोई ध्‍यान नहीं है। वह अंतस के चित की गहराई में उसकी सफाई करता है। ये ध्‍यान एक प्रकार की थेरेपी है। आप को और मम्‍मी को तो इसे बहुत पहले कर लेना चाहिए था। अब आप की कोई बात नहीं सूनी जायेगी और उसने मार्च माह के लिए मेरी बुकिंग कर दी।

मिस्‍टिक रोज हर माह पूना में 11 तारीख को शुरू होता है। सच मोहनी की बीमारी ने तन मन को बहुत थका दिया था। इतने सालों से बाहर खूले में निकलने का मोका भी नहीं मिला था। जब भी बाहर जाना होता था तो मोहनी के स्‍वास्‍थ के लिए ही बाहर जाना होता था। मन में एक भय और उमंग एक साथ था। पहली बार ऐसा होगा की पूना में पूरा एकांत वास होगा। अंदर रहने का एक अलग ही अनुभव था।

सोमवार, 9 सितंबर 2024

लिंग भेद और मानव शरीर-(गहरी चर्चा) -मनसा-मोहनी

 लिंग भेद और मानव शरीर-

अध्यात्मिक जगत और लिंगिये भेद-शायद आप को ये जानकर अति विषमय होगा, परंतु अध्यात्मिक जगत रहस्यों के साथ एक वैज्ञानिक भी है। खास कर हिंदु धर्म। हम चक्र और उसके रंग, सूर, ताल और उस चक्र की परिणति स्त्री है या पुरूष की इस पर बहुत बात कर चुके है परंतु चक्र और उसके लिंग के भेद की कम ही बात करते है। क्योंकि यह अति गूढ़ रहस्य है। जिसे हर व्यक्ति को जानना जरूरी नहीं है। इस लिए इसे गूढ़ रहस्य कहा जाता है। जो कोई व्यक्ति जब अध्यात्म जगत में प्रवेश करता है वह इस जाने तो सही है या उसे ही केवल इसे जानना चाहिए। क्योंकि संसार में इस लिंग भेद के कारण कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

पहला शरीर और लिंग विभाजन-

अगर हम गहरे से जाने तो मानव शरीर के हम तीन विभाजन कर सकते है। पहला विभाजन एक लिंगिये कहेंगे- पहले एक लिंगिये शरीर का पहला प्रकार हम देखते है तो वह बाहर भी आसानी से दिखाई देता है।  जिस शरीर के पास एक ही लिंग होता है, यानि एक ही लिंग शरीर चाहे वह पुरूष को हो या स्त्री का, वह पुरूष या स्त्री में से कोई भी हो सकता है। जिसे हम हिजड़ा या किन्नर के नाम से जानते है। अब ये कैसे और क्यों यह प्रकृति का एक गहरा विभाजन है। ऐसा शरीर मानव चेतना के विकार से मिला या प्रकृति की कोई भूल है। परंतु हम इस पर बाद में बात कर सकते है। अब इस तरह का शरीर जो एक लिंगिये होता है। वह न समाज के, न प्रकृति के, न ही अध्यात्म के जगत में प्रवेश कर सकता है।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

अहंकार के सात द्वार-(मनसा मोहनी)

अहंकार के सात द्वार-(मनसा मोहनी)


कुछ दिन पहले हम सात द्वारों के बारे में बात कर रहे थे – कि हम अहंकार को कैसे पोषित करते है। अहंकार कैसे बनता है, अहंकार का भ्रम कैसे मजबूत होता है। इसके बारे में कुछ बातें गहराई से जानना हम सब के लिए मददगार होगा। जिस प्रकार हमारे शरीर में सात चक्र है, तो प्रत्येक चक्र का एक सूर है एक ताल है, लय है। इसी प्रकार हर चक्र का एक रंग है। ठीक इसी प्रकार हर चक्र को एक अहंकार भी है। ये सून कर आप को थोड़ा अजीब जरूर लगेगा।

तो अब एक-एक द्वार से हम अहंकार को समझने की कोशिश करते है। अहंकार से डरना नहीं चाहिए। लेकिन जिस तरह से एक तलवार आप की रक्षा कर सकती है। वह आपकी गर्दन भी काट सकती है। हर उर्जा के दो रूप होते है। इस गहरे से समझना होगा।

रविवार, 28 जुलाई 2024

होना और न होना -(भाग- 02) - मनसा-मोहनी दसघरा

 मार्ग की अनुभूतियां-भाग-2

(होना और न होना)

न होने का स्वाद जब कोई मनुष्य जानता है तो शायद उससे बढ़ कर कोई अनुभूति नहीं होती है। इसे प्रत्येक मनुष्य ने कई भिन्न-भिन्न आयामों में एक झलक के रूप में जरूर जाना होता है। खास कर प्रेम में, तो प्रत्येक ने इसकी झलका पाई होती है। इसी सब के कारण से अध्यात्म का जन्म होता है। कि इस न होने को कैसे अधिक लम्बा किया जाये। प्रेम के जिस क्षण के हजारवें हिस्से में मनुष्य इस जानता है उसे शब्दों में व्यक्ति नहीं किया जा सकता है। परंतु वहां न विचार होते है न ही विचार करने वाला। योगियों ने इस सब के अनुभव को स्थाई बनाने के लिए ध्यान की विधियों की खोज की। आज तो मनुष्य, खेल से, खतरे से, विस्मय से, रोमांच से, गति से, उंचाई से...भिन्न-भिन्न तरह से जानना चाहता है। और जानता भी है। परंतु जब  मैं कोई खेल या क्रिकेट खेलता था तब पहली बार मैंने इस न होने के आनंद को जाना था।  की इस न होना का सुस्वाद क्या होता है। जब तेज गति की बोल बैट के मिड़ल में लग कर चार-छ: रन के लिए जाती थी कुछ क्षण के लिए विचार बंद हो जाते थे। कितना आनंद आता था। शायद सभी खेलने वाले इस आनंद को अलग-अलग तरह से अनुभव करते है। परंतु क्यों शायद वह नहीं जानते की कैसे ये प्राप्त हुआ। वो इस केवल खेल का माध्यम ही जानते है।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

होना और न होना -(भाग-01) - मनसा-मोहनी दसघरा

मार्ग की अनुभूति-मनसा-मोहनी

(होना और न होना) -भाग-01

अध्यात्म जगत का अगर सरल और सिधा विभाजन करें तो होना-या-न होना सबसे आसान विभाजन है। संसार में हम केवल होने के लिए आये है। हमें कुछ करना है, होना है, नाम रोशन करना है। कुछ बन के दिखाना है। यही संसार का नियम है और यहीं जीवन है।

दूसरा संन्यास का मार्ग न कुछ होगा। यानि अपने अहं को मिटाना। न कुछ होना।

"कुछ भी नहीं होने से क्या प्रभाव पड़ता है?" जब हम इस मार्ग में प्रवेश करते है तो , "यह भय पैदा करता है।"

जीवन भी कैसा है और क्यों है इसे समझना कितना कठिन है। न होने की ये प्रक्रिया प्रत्येक के जीवन में प्रवेश नहीं करती। क्योंकि इसके लिए या तो आप को प्रेम में डूबना होगा या फिर ध्यान में वह कम ही लोग इस मार्ग पर चलते है। सौभाग्य से हमारे जीवन में न कुछ होने की प्रक्रिया तब से ही शुरू हो गई थी जब है दोनों मिले थे। यानि मैं और मोहनी प्रेम में उतरे थे।  मेरा और मोहनी का मिलना केवल प्रकृति की ही देन था। न वह जानती थी और न ही मैं जानता था की हम क्यों मिले है। और कल क्या होगा। बस हम दोनों ने अपने को प्रकृति के हाथों छोड़ दिया। जो भी मन की सारी चालबाजी या खेल को अपने तक नहीं आने दिया था। यही से जीवन एक रहस्य की और अग्रसर हो गया। क्योंकि प्रेम का मार्ग इतना सीधा नहीं होता। वह आपको अंधेरी अंजान कंदराओं की और ले जायेगा। जो अपने न देखी होंगी और न सूनी होगी। यानि एक अंजान डगर। केवल साथ तो एक दूसरे का प्रेम।  

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

कृपया रहस्यदर्शी और सद्गुरु के बीच के अंतर पर प्रकाश डालें -प्रिय ओशो

प्रिय ओशो,


कृपया रहस्यदर्शी और सद्गुरु के बीच के अंतर पर प्रकाश डालें।

एक प्राचीन तिब्बती दृष्टांत है। इसमें कहा गया है, "जब सौ लोग लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयास करते हैं तो केवल दस ही यात्रा शुरू करते हैं; और दस में से केवल एक ही लक्ष्य तक पहुँच पाता है।" और वे कुछ लोग जो लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं, वे गुरु बनने में सक्षम नहीं होते। वे सभी रहस्यवादी हैं। उन्होंने जाना है, उन्होंने देखा है, उन्होंने पाया है, लेकिन वे सत्य की ओर किसी और की मदद नहीं कर सकते। वे अपने अनुभव की व्याख्या नहीं कर सकते। रहस्यवादी और गुरु एक ही अवस्था में होते हैं, लेकिन गुरु स्पष्टवादी होता है। वह उन तरीकों और साधनों, युक्तियों को खोज लेता है, जिनसे उस ओर संकेत किया जा सके, जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

रहस्यदर्शी गूंगा है। उसने मीठा चखा है; ऐसा नहीं है कि उसे पता नहीं कि मीठा है। वह मिठास से भरा हुआ है, लेकिन वह इसके बारे में कुछ नहीं कह सकता, वह बस गूंगा है।

गुरु स्पष्टवक्ता हैं।

और यह दुनिया की सबसे महान कला है।