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शनिवार, 26 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--37)

अध्याय—सैंतीस


 मुर्शिद लोगों को आग और खून की बाढ़ से सावधान करते हैं
बचने का मार्ग बताते हैं, और अपनी नौका को जल में उतारते हैं

मीरदाद : क्या चाहते हो तुम मीरदाद से? वेदी को सजाने के लिये सोने का रत्न —जटित दीपक? परन्तु मीरदाद न सुनार है, न जौहरी, आलोक—स्तम्भ और आश्रय वह भले ही हो।
या तुम तावीज चाहते हो बुरी नजर से बचने के लिये?  
हां, तावीज मीरदाद के पास बहुत हैं, परन्तु किसी और ही प्रकार के।

या फिर तुम प्रकाश चाहते हो ताकि अपने —अपने पूर्व —निश्चित मार्ग पर सुरक्षित चल सकी? कितनी विचित्र बात है। सूर्य है तुम्हारे पास, चन्द्र है, तारे हैं, फिर भी तुम्हें ठोकर खाने का और गिरने का डर है? तो फिर तुम्हारी आंखें तुम्हारा मार्गदर्शक बनने के योग्य नहीं हैं, या तुम्हारी आंखों के लिये प्रकाश बहुत कम है। और तुममें से ऐसा कौन है जो अपनी आंखों के बिना काम चला सके? कौन है जो सूर्य पर कृपणता का दोष लगा सके?

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--36)

अध्याय—छत्तीस

नौका — दिवस तथा उसके धार्मिक अनुष्ठान
जीवित दीपक के बारे में बेसार के सुलतान का सन्देश

नरौंदा : जब मुर्शिद बेसार से लौटे तब से शमदाम उदास और अलग —अलग सा रहता था। किन्तु जब नौका —दिवस निकट आ गया तो वह उल्लास तथा उत्साह से भर गया और सभी जटिल तैयारियों का, छोटी से छोटी बातों तक का. नियन्त्रण उसने स्वयं सँभाल लिया।
अगर —बेल के दिवस की तरह नौका —दिवस को भी एक दिन से बढ़ा कर उल्लास —भरे आमोद—प्रमोद का पूरा सप्ताह बना लिया गया था जिसमें सब प्रकार की वस्तुओं तथा सामान का तेजी के साथ व्यापार होता था।

इस दिन के अनेक विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं : बलि चढ़ाये जाने वाले बैल का वध, बलि—कुण्ड की अग्नि को प्रज्वलित करना, और उस अग्नि से वेदी पर पुराने दीपक का स्थान लेने वाले नये दीपक को जलाना। यह पूरा कार्य मुखिया स्वयं बड़ी औपचारिकता के साथ करता है. जनसमूह उसका हाथ बटाता है और अन्त में हर व्यक्ति नये दीपक से एक मोमबत्ती जलाता है; ये मोमबत्तियाँ बाद में बुझा दी जाती हैं और दुष्ट आत्माओं के विरुद्ध तावीजों के रूप में सावधानी के साथ रख ली जाती हैं। धर्मक्रियाओं की समाप्ति पर मुखिया का भाषण देना एक प्रथा है।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--35)

अध्याय—पैंतीस

परमात्मा की राह पर प्रकाश — कण

मीरदाद : इस रात के सन्नाटे में मीरदाद परमात्मा की ओर जाने वाली तुम्हारी राह पर कुछ प्रकाश —कण बिखेरना चाहता है।
विवाद से बचो। सत्य स्वयं प्रमाणित है; उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जिसे तर्क और प्रमाण के सहारे की आवश्यकता होती है, उसे देर—सवेर तर्क और प्रमाण के द्वारा ही गिरा दिया जाता है।

किसी बात को सिद्ध करना उसके प्रतिपक्ष का खण्डन करना है। उसके प्रतिपक्ष को सिद्ध करना उसका खण्डन करना है। परमात्मा का कोई प्रतिपक्ष है ही नहीं। फिर तुम कैसे उसे सिद्ध करोगे या कैसे उसका खण्डन करोगे?
यदि जिह्वा को सत्य का वाहक बनाना हो तो उसे कभी मूसल, विषदन्त, वातसूचक, कलाबाज या सफाई करने वाला नहीं बनाना चाहिये। बेजुबानों को राहत देने के लिये बोलो। अपने आप को राहत देने के लिये मौन रहो।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--34)

अध्याय—चौंतीस


 माँ— अण्डाणु

मीरदाद : मीरदाद चाहता है कि इस रात के सन्नाटे में तुम एकाग्र —चित्त होकर माँ—अण्डाणु के विषय में विचार करो।
स्थान और जो कुछ उसके अन्दर है एक अण्डाणु है जिसका खोल समय है। यही माँ —अण्डाणु है।
जैसे धरती को वायु लपेटे हुए है, वैसे ही इस अण्डाणु को लपेटे हुए है विकसित परमात्मा. विराट परमात्मा — जीवन जो कि अमूर्त, अनन्त और अकथ है।

इस अण्डाणु में लिपटा हुआ है कुण्डलित परमात्मा, लघु— परमात्मा — जीवन जो मूर्त है, किन्तु उसी तरह अनन्त और अकथ।
भले ही प्रचलित मानवीय मानदण्ड के अनुसार माँ —अण्डाणु अमित है, फिर भी इसकी सीमाएँ हैं। यद्यपि यह स्वयं अनन्त नहीं है, फिर भी इसकी सीमाएँ हर ओर अनन्तता को छूती हैं।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--33)

अध्याय—तैंतीस

रात्रि — अनुपम गायिका

नरौंदा : पर्वतीय नीड़ के लिये, जिसे बर्फीली हवाओं और बर्फ के भारी अम्बारों ने पूरे शीतकाल में हमारी पहुँच से परे रखा था, हम सब इस प्रकार तरस रहे थे जिस प्रकार कोई निर्वासित व्यक्ति अपने घर के लिये तरसता है।
हमें नीड़ में ले जाने के लिये मुर्शिद ने बसन्त की एक ऐसी रात चुनी जिसके नेत्र कोमल और उज्ज्वल थे, जिसकी साँस उष्ण और सुगन्धित थी, जिसका हृदय सजीव और सजग था।

वे आठ सपाट पत्थर, जो हमारे बैठने के काम आते थे, अभी —तक वैसे ही अर्ध —चक्र के आकार में रखे थे जैसे हम उन्हें उस दिन छोड़ .गये थे जब मुर्शिद को बेसार ले जाया गया था। स्पष्ट था कि उस दिन से कोई भी नीड़ में नहीं गया था।
हममें से प्रत्येक अपने —अपने स्थान पर बैठ गया और मुर्शिद के बोलने की प्रतीक्षा करने लगा। परन्तु वे खामोश थे। पूर्णिमा का चन्द्र भी, जिसकी किरणें मानों हमारा स्वागत कर रही थीं, आशा के साथ मुर्शिद के ओंठों की ओर टकटकी लगाये हुए था।

गुरुवार, 24 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--32)

अध्याय—बत्तीस

पाप और आवरण
मीरदाद : पाप के विषय में तुम्हें बता दिया गया है, और यह तुम जान जाओगे कि मनुष्य पापी कैसे बना।
तुम्हारा कहना है, और वह सारहीन भी नहीं है, कि परमात्मा का प्रतिबिम्ब और प्रतिरूप मनुष्य यदि पापी है, तो स्पष्ट है कि पाप का स्रोत स्वय परमात्मा ही है। इस तर्क में भोले —भाले लोगों के लिये एक जाल है, और तुम्हें, मेरे साथियो, मैं जाल में फँसने नहीं दूँगा। इसलिये मैं इस जाल को तुम्हारे रास्ते से हटा दूँगा. ताकि तुम इसे अन्य मनुष्यों के रास्ते से हटा सकी।

परमात्मा में कोई पाप नहीं, क्या सूर्य का अपने प्रकाश में से मोमबत्ती को प्रकाश देना पाप है? न ही मनुष्य में पाप है, क्या एक मोमबत्ती के लिये धूप में जल कर अपने आप को मिटा देना और इस प्रकार सूर्य के साथ मिल जाना पाप है?

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--31)

अध्याय—इकत्तीस

निज घर के लिये महाबिरह

मीरदाद : धुन्ध के समान है निज घर के लिये महाविरह। जिस प्रकार समुद्र और धरती से उठी धुन्ध समुद्र तथा धरती पर ऐसे छा जाती है कि उन्हें कोई देख नहीं सकता, इसी प्रकार हृदय से उठा महाविरह हृदय पर ऐसे छा जाता है कि उसमें और कोई भावना प्रवेश नहीं कर सकती।
और जैसे धुन्ध स्पष्ट दिखाई देने वाले यथार्थ को आँखों से ओझल करके स्वयं एकमात्र यथार्थ बन जाती है. वैसे ही यह विरह मन की अन्य भावनाओं को दबा कर स्वय प्रमुख भावना बन जाता है।
और यद्यपि विरह उतना ही आकारहीन, लक्ष्यहीन तथा अन्धा प्रतीत होता है जितनी कि धुन्ध, फिर भी द्वन्द की तरह ही इसमें अनन्त अजात आकार भरे होते हैं, इसकी दृष्टि स्पष्ट होती है तथा इसका लक्ष्य सुनिश्चित।
ज्वर के समान है यह महाविरह। जैसे शरीर में सुलगा जर शरीर के विष को भस्म करते हुए धीरे —धीरे उसकी प्राण —शक्ति को क्षीण कर देता है, वैसे ही अन्तर की तड़प से जनमा यह विरह मन के मैल तथा मन में एकत्रित हर अनावश्यक विचार को नष्ट करते हुए मन को निर्बल बना देता है।

मंगलवार, 22 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--30)

अध्याय—तीस

मुर्शिद मिकेयन का स्वम्न सुनाते हैं

नरौंदा : मुर्शिद के बेसार से लौटने से पहले और उसके बाद काफी समय तक हमने मिकेयन को एक मुसीबत में पड़े व्यक्ति की तरह आचरण करते देखा। अधिकतर वह अलग रहता, न कुछ बोलता, न खाता और कम ही अपनी कोठरी से बाहर निकलता। अपना भेद वह मुझे भी नहीं बता रहा था। और हम सब चकित थे कि मुर्शिद उसे बहुत चाहते हैं. फिर भी वे उसकी पीड़ा को कम करने के लिये न कुछ कह रहें है न कुछ कर रहे हैं।

एक दिन जब मिकेयन तथा बाकी साथी अँगीठी के चारों ओर बैठे आग ताप रहे थे, मुर्शिद ने निज घर के लिये महाविरह के विषय में प्रवचन आरम्भ किया।
मीरदाद : एक बार किसी ने एक सपना देखा। और वह सपना यह था.
उसने अपने आप को एक चौड़ी. गहरी खामोशी से बहती नदी के हरे —भरे तट पर खड़े देखा। तट हर आयु के और हर बोली बोलने वाले स्त्री —पुरुषों और बच्चों के विशाल समूहों से भरा हुआ था।. सबके पास अलग —अलग नाप तथा रंग के पहिये थे जिन्हें वे तट पर ऊपर और नीचे की ओर ठेल रहे थे।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--29)

अध्याय—उनतीस


शमदाम साथियों को मना कर
अपने साथ मिलाने का असफल यत्न करता है
मीरदाद चमत्कारपूर्ण ढंग से लौटता है
और शमदाम के अतिरिक्त
सब साथियों को विश्वास का चुम्बन प्रदान करता है

नरौंदा : जाड़े ने हमें आ दबोचा था, बहुत फ्लू, बर्फीले, कँपा देने वाले जाड़े ने।
खामोश, साँस रोके खड़े थे बर्फ में लिपटे पहाड़। केवल नीचे वादियों में दिखाई देते थे मुरझाई हरियाली के खण्ड और, कहीं—कहीं बल खाती सागर की ओर वही जा रही तरल चाँदी की कोई रेखा।
सातों साथी कभी आशा की तो कभी सन्देह की लहरों के थपेड़े खा रहे थे।
मिकेयन मिकास्तर तथा जमोरा इस आशा का दामन थामे हुए थे कि मुर्शिद अपने वचन के अनुसार लौट आयेंगे। बैद्य, हिम्बल तथा अबिमार मुर्शिद के लौटने के बारे में अपने सन्देह को पकड़े बैठे थे। किन्तु सब एक भयानक खालीपन तथा वेदनापूर्ण निरर्थकता का अनुभव कर रहे थे।

सोमवार, 21 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--28)

अध्याय—अट्ठाईस

बेसार का सुलतान
शमदाम के साथ नीड़ मे आता है
युद्ध और शान्ति के विषय में सुलतान और मीरदाद में वार्तालाप
शमदाम मीरदाद को जाल में फँसाता है

नरौंदा : मुर्शिद ने अपनी बात समाप्त की ही थी और हम उनके शब्दों पर विचार कर रहे थे, तभी बाहर भारी पद—चाप और उसके साथ दबे स्वर में कुछ अस्पष्ट बातचीत सुनाई दी। शीघ्र ही दो विशालकाय सिपाहां, जो एड़ी से चोटी तक शस्त्रों से सज्जित थे, द्वार पर आये और उसके दोनों ओर खड़े हो गये। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं जो धूप में चमक रही थीं।
उनके बाद राजचिह्नों से सज्जित एक युवा सुलतान आया जिसके पीछे—पीछे शमदाम सकुचाया —सा चला आ रहा था, और शमदाम के पीछे थे दो और सिपाही।
सुलतान दूधिया पर्वत—माला के सबसे अधिक शक्तिशाली और दूर तक विख्यात शासकों में से एक था। वह क्षण भर के लिये द्वार पर रुका और उसने अन्दर एकत्रित व्यक्तियों के चेहरों को ध्यानपूर्वक देखा। फिर अपनी बड़ी —बड़ी, चमकती हुई आंखें मुर्शिद पर टिकाते हुए उसने बहुत नीचे तक मस्तक झुकाया और कहा :

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--27)

अध्यायसत्ताईस

सत्य का उपदेश क्या सबको दिया जाना चाहिये
या कुछ चुने हुए व्यक्तियों को?
अगर — बेल के दिवस से एक दिन पहले
अपने लुप्त होने का भेद मीरदाद प्रकट करता है
और झूठी सत्ता की चर्चा करता है

नरौंदा : प्रीति—भोज जब स्मृति —मात्र रह गया था. उसके काफी समय बाद एक दिन सातों साथी पर्वतीय नीड़ में मुर्शिद के पास इकट्ठे हुए थे। उस दिन की स्मरणीय घटनाओं पर जब साथी विचार कर रहे थे तो मुर्शिद चुप रहे। कुछ साथियों ने उत्साह के उस महान उद्वेग पर आश्चर्य प्रकट किया जिसके साथ जनसमूह ने मुर्शिद के वचनों का स्वागत किया था।
कुछ और ने शमदाम के उस समय के विचित्र तथा रहस्यपूर्ण व्यवहार पर टिप्पणी की जब सैकडों ऋण —आलेख नौका के कोषागार से निकाल कर सबके सामने नष्ट कर दिये गये थे, शराब के सैकड़ों मर्तबान और मटके तहखानों में से निकाल कर दे दिये गये थे और अनेक मूल्यवान उपहार लौटा दिये गये थे, क्योंकि उस समय शमदाम ने किसी प्रकार का विरोध — जिसका हमें डर था — नहीं किया था, बल्कि चुपचाप, बिना हिले —डुले, आँखों से आंसुओं की धारा बहाते हुए सब —कुछ देखता रहा था।

रविवार, 20 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--26)

अध्याय—छबीस

अंगूर—बेल के दिवस पर आये
यात्रियों को मीरदाद प्रभावशाली उपदेश देता है
और
नौका को कुछ अनावश्यक भार से मुक्त करता है

मीरदाद : देखो मीरदाद को — अंगूर की उस बेल को जिसकी फसल अभी तक नहीं काटी गई, जिसका रस अभी तक नहीं पिया गया। अपनी फसल से लदा हुआ है मीरदाद। पर, अफसोस, लुनेरे दूसरी ही अगर —वाटिकाओं में व्यस्त हैं।
और रस की बहुलता से मीरदाद का दम घुट रहा है। लेकिन पीने और पिलाने वाले दूसरी ही शराबों के नशे में चूर हैं।

हल, कुदाल और दराँती चलाने वालो, तुम्हारे हलों, कुदालों और दराँतियों को. मैं आशीर्वाद देता हूँ।
आज तक तुमने क्या जोता है, क्या खोदा है, क्या काटा है '

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--25)

अध्याय—पच्चीस

अगर — बेल का दिवस और उसकी तैयारी
उससे एक दिन पहले मीरदाद लापता पाया जाता है

नरौंदा : अंगूर—बेल का दिवस निकट आ रहा था और हम नौका के निवासी, जिनमें मुर्शिद भी शामिल थे, बाहर से आये स्वयंसेवी सहायकों की टुकड़ियों के साथ रात —दिन बड़े प्रीतिभोज की तैयारियों में जुटे थे। मुर्शिद अपनी सम्पूर्ण शक्ति से और इतने अधिक उत्साह के साथ काम कर रहे थे कि शमदाम तक ने स्पष्ट रूप से सन्तोष प्रकट करते हुए इस पर टिप्पणी की।
नौका के बड़े —बड़े तहखानों को बुहारना था और उनकी पुताई करनी थी और शराब के बीसियों बड़े—बडे मर्तबानों और मटकों को साफ करके यथास्थान रखना था ताकि उनमें नई शराब भरी जा सके।
उतने ही और मर्तबानों और मटकों को, जिनमें पिछले साल के अंगूर की फसल से बनी शराब रखी थी, सजा कर प्रदर्शित करना था ताकि ग्राहक शराब को आसानी से चख और परख सकें. क्योंकि हर अंगूर—बेल के दिवस पर गत वर्ष की शराब बेचने की प्रथा है।

शनिवार, 19 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--24)

अध्याय—चौबीस

खाने के लिये मारना क्या उचित है?
ब शमदाम और कसाई चले गये तो मिकेयन ने मुर्शिद से पूछा :
मिकेयन : खाने के लिये मारना क्या उचित नहीं है मुर्शिद?
मीरदाद : मृत्यु से पेट भरना मृत्यु का आहार बनना है। दूसरों की पीड़ा पर जीना पीड़ा का शिकार होना है। यही आदेश है प्रभु —इच्छा का। यह समझ लो और फिर अपना मार्ग चुनो मिकेयन।
मिकेयन : यदि मैं चुन सकता तो अमरपक्षी की तरह वस्तुओं की सुगन्ध पर जीना पसन्द करता, उसके मांस पर नहीं।

मीरदाद : तुम्हारी पसन्द सचमुच उत्तम है। विश्वास करो, मिकेयन, वह दिन आ रहा है जब मनुष्य वस्तुओं की सुगन्ध पर जियेंगे जो उनकी आत्मा है' उनके रक्त—मांस पर नहीं। और तड़पने वालों के लिये वह दिन दूर नहीं।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--23)

अध्याय—तेईस

मीरदाद सिम—सिम को स्वस्थ करता है
और बुढ़ापे के बारे में चर्चा करता है

नरौदा : नौका की पशुशालाओं की सबसे बूढ़ी गाय सिम —सिम पाँच दिन से बीमार थी और चारे या पानी को मुँह नहीं लगा रही थी। इस पर शमदाम ने कसाई को बुलवाया। उसका कहना था कि गाय को मार कर उसके मास और खाल की बिक्री से लाभ उठाना अधिक समझदारी है, बनिस्बत इसके कि गाय को मरने दिया जाये और वह किसी काम न आये।

जब मुर्शिद ने यह सुना तो गहरे सोच में ड़ब गये, और तेजी से सीधे पशुशाला की ओर चल पड़े तथा सिम—सिम के थान पर जा पहुँचे। उनके पीछे—पीछे सातों साथी भी वहाँ पहुँच गये।
सिम—सिम उदास और हिलने —डुलने में असमर्थ —सी थी। उसका सिर नीचे लटका हुआ था, आँखें अधमुँदी थीं, शरीर के बाल सख्त और कान्ति —हीन थे। किसी ढीठ मक्खी को उडाने के लिये वह कभी —कभी अपने कान को थोड़ा —सा हिला देती थी।

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--22)

अध्याय—बाईस

मीरदाद जमोरा को उसके रहस्य के भार से मुक्त करता है
और पुरुष तथा स्त्री की, विवाह की, ब्रह्मचर्य की
तथा आत्म— विजेता की
बात करता है

मीरदाद : नरौंदा मेरी विश्वसनीय स्मृति। क्या कहते हैं तुमसे ये कुमुदिनी के फूल?
नरौंदा : ऐसा कुछ नहीं जो मुझे सुनाई देता हो, मेरे मुर्शिद।
मीरदाद : मैं इन्हें कहते सुनता हूँ, ''हम नरौंदा को प्यार करते हैं और अपने प्यार के प्रतीक—स्वरूप अपनी सुगन्धित आत्मा उसे प्रसन्नतापूर्वक भेंट करते हैं। ''नरौंदा मेरे स्थिर हृदय! क्या कहता है तुमसे इस सरोवर का पानी?

नरौंदा : ऐसा कुछ नहीं जो मुझे सुनाई देता हो, मेरे मुर्शिद।
मीरदाद : मैं इसे कहते सुनता हूँ, ''मैं नरौंदा से प्यार करता हूँ बुझाता हूँ, इसलिये मैं उसकी प्यास और उसके प्यारे कुमुदिनी के फूलों की प्यास भी।''

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--21)

अध्याय—इक्कीस

पवित्र प्रभु — इच्छा
घटनाएँ जैसे और जब घटती हैं वैसे
और तब क्यो घटती हैं?

मीरदाद : कैसी विचित्र बात है कि तुम, जो समय और स्थान के बालक हो, अभी तक यह नहीं जानते कि समय स्थान की शिलाओं पर अंकित की हुई ब्रह्माण्ड की स्मृति है।
यदि इन्द्रियों द्वारा सीमित होने के बावजूद तुम अपने जन्म और मृत्यु के बीच की कुछ विशेष बातों को याद रख सकते हो तो समय, जो तुम्हारे जन्म से पहले भी था और तुम्हारी मृत्यु के बाद भी अनिश्चित काल तक रहेगा, कितनी अधिक बातों को याद रख सकता है?

मैं तुमसे कहता हूँ, समय हर छोटी से छोटी बात को याद रखता है— केवल उन बातों को ही नहीं जो तुम्हें स्पष्ट याद हैं, बल्कि उनको भी जिनसे तुम पूरी तरह अनजान हो।
क्योंकि समय कुछ भी नहीं भूलता; छोटी से छोटी चेष्टा, श्वास —निःश्वास, या मन की तरंग तक को नहीं। और वह सब —कुछ जो समय की स्मृति में अंकित होता है स्थान में मौजूद पदार्थों पर गहरा खोद दिया जाता है।

बुधवार, 16 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--20)

अध्याय—बीस

मरने के बाद हम कहां जाते हैं?
पश्चात्ताप

मिकास्तर : मुर्शिद, मरने के बाद हम कहाँ जाते हैं?
मीरदाद : इस समय तुम कहाँ हो, मिकास्तर?
मिकास्तर : नीड़ में।
मीरदाद : तुम समझते हो कि यह नीड़ तुम्हें अपने अन्दर रखने के लिये काफी बड़ा है? तुम समझते हो कि यह धरती मनुष्य का एकमात्र घर है?
तुम्हारा शरीर, चाहे वह समय और स्थान की सीमा में बँधा हुआ है, समय और स्थान में विद्यमान हर पदार्थ में से लिया जाता है।
तुम्हारा जो अंश सूर्य में से आता है, वह सूर्य में जीता है। तुम्हारा जो अंश धरती में से आता है, वह धरती में जीता है। और ऐसा ही अन्य सभी ग्रहों और उनके बीच के पथहीन शून्यों के साथ भी है।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--19)

अध्याय—उन्नीस

तर्क और विश्वास
अहं को नकारना अहं को उभारना है
समय के पहिये को कैसे रोका जाये
रोना और हँसना

बैबून : क्षमा करें, मुर्शिद। आपका तर्क अपनी तर्कहीनता से मुझे उलझन में डाल देता है।
मीरदाद : हैरानी की बात नहीं,, कि तुम्हें 'न्यायाधीश' कहा गया है। किसी मामले के तर्क-संगत का विश्वास हो जाने पर ही उस पर निर्णय दे सकते हो।
तुम इतने समय तक न्यायाधीश रहे हो,  तो भी क्‍या अब तक यह नहीं जान पाये कि तर्क का एकमात्र उपयोग मनुष्य को तर्क से छुटकारा दिलाना और उसको विश्वास की ओर प्रेरित करना है जो दिव्य ज्ञान की ओर ले जाता है।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--18)

अध्याय—अठारह

हिम्बल के पिता की मृत्यु
तथा जिन परिस्थितियों में उसकी मृत्‍यु उन्हें मीरदाद
दिव्य शक्ति के द्वारा जान है
वह मृत्यु की बात करता है
समय सबसे बड़ा मदारी है
समय का चक्र, उसकी हाल और उसकी धुरी

नरौंदा : एक लम्बे समय के बाद, जब बहुत—सा जल पहाड़ों से नीचे बहता हुआ समुद्र में जा मिला था, हिम्बल के सिवाय बाकी सब साथी एक बार फिर नीड़ में मुर्शिद के चारों ओर इकट्ठे हुए।
मुर्शिद प्रभु—इच्छा पर चर्चा कर रहे थे। किन्तु अकस्मात् वे रुक गये और बोले,

मीरदाद : हिम्बल संकट में है और वह सहायता के लिये हमारे पास आना चाहता है, किन्तु संकोच के कारण उसके पैर इस ओर उठ नहीं पा रहे हैं। जाओ अबिमार उसकी सहायता करो।