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रविवार, 30 जनवरी 2011

अरविंद का आजादी में योगदान—गांधी जी से अधिक


     श्री अरविंद को किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की स्‍वतंत्रता के संघर्ष की आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब छोड़कर आप पांडिचेरी में बैठ गए आँख बंद करके। वर्ष में एक बार आप निकलते है दर्शन देने को। आप जैसा संघर्षशील, तेजस्‍वी, व्‍यक्‍ति जो जीवन के घनेपन में खड़ा था और जीवन को रूपांतरित कर रहा था, वह अचानक इस भांति पलायनवादी होकर अंधेरे में क्‍यों छिप गया? आप कुछ करते क्‍यों नहीं? क्‍या आप सोचते है कि करने को कुछ नहीं बचा, या करने योग्‍य कुछ नहीं है? या समाज की और मनुष्‍य की समस्‍याएं हल हो गई है और आप विश्राम कर सकते है? समस्‍याएं तो बढ़ती चली जाती है। आदमी कष्‍ट में है, दुःख में है, गुलाम है, भूखा है, बीमार है, कुछ करिए।
      यही लाओत्‍से कह रहा है। श्री अरविंद ने कहा, कि मैं कुछ कर रहा हूं, और जो पहले मैं कर रहा था वह अपर्याप्‍त ता; अब जो कर रहा हूं वह पर्याप्‍त है।
      वह आदमी चौका होगा जिसने पूछा। यह किस प्रकार का करना है कि आप अपने कमरे में आँख बंद किए बैठे है, इससे क्‍या होगा?
      तो अरविंद कहते है कि जब मैं करने में लगा था तब मुझे पता नहीं था कि कर्म तो बहुत ऊपर-ऊपर है, उससे दूसरों को नहीं बदला जा सकता। दूसरों को बदलना हो तो इतने स्‍वयं के भी तर प्रवेश कर जाना जरूरी है जहां से कि सूक्ष्‍म तरंगें उठती है, जहां से कि जीवन का आविर्भाव होता है। और अगर वहां से मैं तरंगों को बदल दूँ तो वे तरंगें जहां तक जायेगी—और तरंगें अनंत तक फैलती चली जाती है।
      रेडियो की ही आवाज नहीं घूम रही है पृथ्‍वी के चारों ओर, टेलीविजन के चित्र ही हजारों मील तक नहीं जा रहे है; सभी तरंगें अनंत की यात्रा पर निकल जाती है। जब आप गहरे में शांत होत है तो आपकी झील से शांत तरंगें उठने लगती है; वे शांत तरंगें फैलती चली जाती है। वे पृथ्‍वी को छुएगा, चाँद को छुएँ गी, तारों और ब्रह्मांड में व्‍याप्‍त हो जाएंगी। और जितनी सूक्ष्‍म तरंग का कोई मालिक हो जाए उतना ही दूसरों में प्रवेश क्षमता आ जाती है।
      तो अरविंद ने कि अब मैं महा कार्य में लगा हूं। तब मैं क्षुद्र कार्य में लगा था। अब मैं उस महा कार्य में लगा हूं जिसमें मनुष्‍य से बदलने को कहना न पड़े और बदलाहट हो जाए। क्‍योंकि मैं उसके ह्रदय में सीधा प्रवेश कर सकूंगा। अगर मैं सफल होता हूंसफलता बहुत कठिन बात है—अगर मैं सफल होता हूं तो एक नए मनुष्‍य का, एक महा मानव का जन्‍म निश्‍चित है।
       लेकिन जो व्‍यक्‍ति पूछने गया था वह असंतुष्‍ट ही लौटा होगा। यह सब बातचीत मालूम पड़ती है। ये सब पलायन वादियों के ढंग और रूख मालूम पड़ते है। खाली बैठे रहना पर्याप्‍त नहीं है, अपर्याप्‍त है।
      इसलिए लाओत्‍से कहता है, ‘’महा चरित्र अपर्याप्‍त मालूम पड़ता है।‘’
      इसलिए हम पूजा जारी रखेंगे गांधी की, अरविंद को हम धीरे-धीरे छोड़ते जाएंगे। लेकिन भारत की आजादी में अरविंद का जितना हाथ है उतना किसी का भी नहीं है। पर वह चरित्र दिखाई नहीं पड़ सकता। आकस्‍मिक नहीं है कि पंद्रह अगस्‍त को भारत को आजादी मिली; वह अरविंद का जन्‍म दिन है। पर उसे देखना कठिन है। और उसे सिद्ध करना तो बिलकुल असंभव है। क्‍योंकि उसको सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। जो प्रकट स्‍थूल में नहीं दिखाई पड़ता उसे सूक्ष्‍म में सिद्ध करने का भी कोई उपाय नहीं है। भारत की आजादी में अरविंद को कोई योगदान है। इसे भी लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। कोई लिखता भी नहीं। और जिन्‍होंने काफी शोरगुल और उपद्रव मचाया है, जो जेल गए है, लाठी खाई है, गोली खाई है। जिनके पास ताम्रपत्र है। वे इतिहास के निर्माता है।
      इतिहास अगर बह्म घटना ही होती तो ठीक है; लेकिन इतिहास की एक आंतरिक कथा भी है। तो समय की परिधि पर जिनका शोरगुल दिखाई पड़ता है एक तो इतिहास है उनका भी। और एक समय कि परिधि के पार, कालातीत, सूक्ष्म में जो काम करते है, उनकी भी कथा हे। लेकिन उनकी कथा सभी को ज्ञात नहीं हो सकती। और उनकी कथा से संबंधित होना भी सभी के लिए संभव नहीं है। क्‍योंकि वे दिखाई ही नहीं पड़ते। वे वहां तक आते ही नहीं जहां चीजें दिखाई पड़नी शुरू होती है। वे उन स्‍थूल तक पार्थिव तक उतरते ही नहीं जहां हमारी आँख पकड़ पाए। तो जब तक हमारे पास ह्रदय की आंख न हो, उनसे कोई संबंध नहीं जुड़ पाता। इतिहास हमारा झूठा हे। अधूरा है, और क्षुद्र है। हम सोच भी नहीं सकते कि बुद्ध ने इतिहास में क्‍या किया। हम सोच भी नहीं सकते कि क्राइस्‍ट ने इतिहास में क्‍या किया। लेकिन हिटलर न क्‍या किया वह हमें साफ है; माओ ने क्‍या किया वह साफ है। गांधी ने क्‍या किया वह साफ है। जो परिधि पर घटता है वह हमें दिख जाता है।
‘’महा चरित्र अपर्याप्‍त मालूम पड़ता है, ठोस चरित्र दुर्बल दिखता है।‘’
      गहरी दृष्‍टि चाहिए। ठोस चरित्र दुर्बल दिखाई देता है। इस मनोवैज्ञानिक का थोड़ा ख्‍याल में ले लें। असल में दुर्बल चरित्र का व्‍यक्‍ति हमेशा ठोस दीवारें अपने आस-पास खड़ी करता है; ठोस चरित्र का व्‍यक्‍ति दीवार खड़ी नहीं करता। उसकी कोई जरूरत नहीं है; पर्याप्‍त है वह स्‍वयं।
ओशो
ताओ उपनिषाद, भाग—4
प्रवचन—77