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शनिवार, 25 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—65 (ओशो)

‘’अन्‍य देशनाओं के लिए जो शुद्धता है वह हमारे लिए अशुद्धता ही है। वस्‍तुत: किसी को भी शुद्ध या अशुद्ध की तरह मत जानों।‘’
     यह तंत्र का एक बुनियादी संदेश है। तुम्‍हारे लिए यह बड़ी कठिन धारणा होगी; क्‍योंकि यह बिलकुल ही गैर-नैतिक धारणा है। मैं इसे अनैतिक नहीं कहूंगा। क्‍योंकि तंत्र को नीति-अनीति से कुछ लेना देना नहीं है। तंत्र कहता है कि शुद्धि-अशुद्धि से कोई मतलब नहीं है। इसकी देशना तुम्‍हें शुद्ध-अशुद्धि के उपर उठने में, दरअसल विभाजन के, द्वंद्व और द्वैत के पार जाने में सहयोग देने के लिए है।   

सोमवार, 20 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—64 (ओशो)

‘’छींक के आरंभ में, भय में, खाई-खड्ड के कगार पर, युद्ध से भागने पर, अत्‍यंत कुतूहल में, भूख के आरंभ में और भूख के अंत में, सतत बोध रखो।‘’
     यह विधि देखने में बहुत सरल मालूम पड़ती है। छींक के आरंभ में, भय में, चिंता में, भूख के पहले या भूख के अंत में सतत बोध रखो।    
      बहुत सी बातें समझने जैसी है। छींकने जैसे बहुत सरल कृत्‍य भी उपाय की तरह काम में लाए जा सकते है। क्‍योंकि वे कितने ही सरल दिखे, दरअसल वे बहुत कठिन और जटिल होते है। और जो आंतरिक व्‍यवस्‍था है, वह बहुत नाजुक चीज है। 

रविवार, 19 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—63 (ओशो)

‘’जब किसी इंद्रिय-विषय के द्वारा स्‍पष्‍ट बोध हो, उसी बोध में स्‍थित होओ।‘’
     तुम अपनी आँख के द्वारा देखते हो। ध्‍यान रहे, तुम अपनी आँख के द्वारा देखते हो। आंखे नहीं देख सकती। उनके द्वारा तुम देखते हो। द्रष्‍टा पीछे छिपा है। भीतर छिपा है; आंखें बस द्वार है। झरोखे है। लेकिन हम सदा सोचते है कि हम आँख से देखते है। हम सोचते है कि हम कान से सुनते है। कभी किसी ने कान से नहीं सुना है। तुम कान के द्वारा सुनते हो। कान से नहीं। सुननेवाला पीछे है। कान तो रिसीवर है।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—62 (ओशो)

  ‘’जहां कहीं तुम्‍हारा मन भटकता है, भीतर या बाहर, उसी स्‍थान पर, यह।‘’
     मन एक द्वार है—यही मन जहां कही भी भटकता है, जो कुछ भी सोचता है। मनन करता है। सपने देखता है। यही मन और यही क्षण द्वार है।
      यही एक अति क्रांतिकारी विधि है, क्‍योंकि हम कभी नहीं सोचते कि साधारण मन द्वार है। हम सोचते है कि कोई महान मन, कोई बुद्ध या जीसस का मन प्रवेश कर सकता है। हम सोचते है कि बुद्ध या जीसस के पास कोई असाधारण मन है। और यह सूत्र कहता है कि तुम्‍हारा साधारण मन ही द्वार है। यही मन जो सपने देखता है। कल्‍पनाएं करता है। ऊलजलूल सोच-विचार करता है। यही मन द्वार है जो कुरूप कामनाओं और वासनाओं से क्रोध और लोभ से खचाखच भरा है। जिसमें यह सब है जो निंदित है। जो तुम्‍हारे बस के बाहर है। जो तुम्‍हें यहां सक वहां भटकाता रहता है। जो सतत एक पागलखाना है। यही मन द्वार है।  

बुधवार, 15 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—61 (ओशो)

  ‘’जैसे जल से लहरें उठती है और अग्‍नि से लपटें, वैसे ही सर्वव्‍यापक हम से लहराता है।‘’
     पहले तो यह समझने की कोशिश करो लहर क्‍या है, और तब तुम समझ सकते हो कि कैसे यह चेतना की लहर तुम्‍हें ध्‍यान में ले जाने में सहयोगी हो सकती है।
      तुम सागर में उठती लहरों को देखते हो। वे प्रकट होती है; एक अर्थ में वे है, और फिर भी किसी गहरे अर्थ में वे नहीं है। लहर के संबंध में समझने की यह पहली बात है। गहरे अर्थ में प्रकट होती है; एक अर्थ में लहर है। लेकिन किसी गहरे अर्थ में लहर नहीं है। गहरे अर्थ में सिर्फ सागर है। सागर के बिना लहर नहीं हो सकती। और जब लहर है भी तो भी यह सागर ही है। लहर रूप भर है। सत्‍य नहीं है। सागर सत्‍य है। लहर केवल रूप है।

सोमवार, 13 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—60 (ओशो)

साक्षित्व की चौथी विधि--
     ’विषय और वासना जैसे दूसरों में है वैसे ही मुझमें है। इस भांति स्‍वीकार करके उन्‍हें रूपांतरित होने दो।‘’
      यह विधि बहुत सहयोगी हो सकती है। जब तुम क्रोधित होते हो तो तुम सदा अपने क्रोध को उचित मानते हो। लेकिन जब कोई दूसरा क्रोधित होता है तो तुम उसकी सदा आलोचना करते हो। तुम्‍हारा पागलपन स्‍वाभाविक है; दूसरे का पागलपन विकृति है। तुम जो भी कहते हो वह शुभ है—शुभ नहीं तो कम से कम उसे करना जरूरी था। तुम अपने कृत्‍य के लिए सदा कुछ औचित्‍य खोज लेते हो, उसे तर्कसम्‍मत बना लेते हो। और जब वहीं काम दूसरा करता है तो वही औचित्‍य, वहीं तर्क लागू नहीं होता है।

शनिवार, 11 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—59 (ओशो)



साक्षित्व की तीसरी विधि--
’’प्रिय, न सुख में और न दुःख में, बल्‍कि दोनों के मध्‍य में अवधान को स्‍थित करो।‘’
      प्रत्‍येक चीज ध्रुवीय है। अपने विपरीत के साथ है। और मन एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव पर डोलता रहता है। कभी मध्‍य में नहीं ठहरता।
      क्‍या तुमने कोई ऐसा क्षण जाना है जब तुम न सुखी हो और न दुखी? क्‍या तुमने कोई ऐसा क्षण जाना है जब तुम न स्‍वास्‍थ थे न बीमार? क्‍या तुमने कोई ऐसा क्षण जाना है जब तुम न यह थे न वह। जब तुम ठीक माध्‍य में थे, ठीक बीच में थे?

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—58 (ओशो)

साक्षित्व की दूसरी विधि--
     ‘’यह तथा कथित जगत जादूगरी जैसा या चित्र-कृति जैसा भासता है। सुखी होने के लिए उसे वैसा ही देखो।‘’
     यह सारा संसार ठीक एक नाटक के समान है, इसलिए इसे गंभीरता से मत लो। गंभीरता तुम्‍हें उपद्रव में डाल देगी। तुम मुसीबत में पड़ोगे। इसे गंभीरता से मत लो। कुछ गंभीर नहीं है। सारा संसार एक नाटक मात्र है।
       अगर तुम सारे जगत को नाटक की तरह देख सको तो तुम अपनी मौलिक चेतना को पा लोगे। उस पर धूल जमा हो जाती है। क्‍योंकि तुम अति गंभीर हो। यह गंभीरता ही समस्‍या पैदा करती है। और हम इतने गंभीर है कि नाटक देखते हुए भी हम धूल जमा करते रहते है। किसी सिनेमाघर में जाओ और दर्शकों को देखो। फिल्‍म को मत देखो, फिल्‍म को भूल जाओ पर्दे की तरफ मत देखो, हाल में जो दर्शक है उन्‍हें देखो। कोई रो रहा होगा। कोई हंस रहा होगा। किसी की कामवासना उत्‍तेजित हो रही होगी। सिर्फ लोगो को देखो। वे क्‍या कर रहे है। उन्‍हें क्‍या हो रहा है। पर्दे पर छाया-चित्रों के सिवाय कुछ भी नहीं है—धूप छांव का खेल है। पर्दा खाली है। लेकिन वे उत्‍तेजित क्‍यों हो रहे है?

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—57 (ओशो)

साक्षित्व की पहली विधि--
     ‘’तीव्र कामना की मनोदशा में अनुद्विग्‍न रहो।‘’
     जब तुम्‍हें कामना घेरती है, चाहे पकड़ती है, तो तुम उत्‍तेजित हो जाते हो, उद्विग्न हो जाते हो। यह स्‍वाभाविक है। जब चाह पकड़ती है तो मन डोलने लगता है। उसकी सतह पर लहरें उठने लगती है। कामना तुम्‍हें खींचकर कहीं भविष्‍य में ले जाती है; अतीत तुम्‍हें कहीं भविष्‍य में धकाता है। तुम उद्विग्‍न हो जाते हो, बेचैन हो जाते हो। अब तुम चैन में न रहे। चाह बेचैनी है, रूग्‍णता है।
यह सूत्र कहता है: ‘’तीव्र कामना की मनोदशा में अनुद्विग्‍न रहो।‘’
लेकिन अनुद्विग्‍न कैसे रहा जाए? कामना का अर्थ ही उद्वेग है। अशांति है; फिर अनुद्विग्‍न कैसे रहा जाए? शांत कैसे रहा जाए? और वह भी कामना के तीव्रतम क्षणों में।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

राहुल पर मार का हमला—कथा यात्रा

राहुल गौतम बुद्ध का बेटा था। राहुल के संबंध में थोड़ा जान लें। फिर इस दृश्‍य को समझना आसान हो जायेगा।
          जिस रात बुद्ध ने घर छोड़ा, महा अभिनिष्क्रमण किया, राहुल बहुत छोटा था। एक ही दिन का था। अभी-अभी पैदा हुआ था। बुद्ध घर छोड़ने के पहले गए थे यशोधरा के कमरे में इस नवजात बेटे को देखने। यशोधरा अपनी छाती से लगाए राहुल को सो रही थी। चाहते थे, देख ले राहुल का मुंह, क्‍योंकि फिर मिले देखने ल मिले। लेकिन इस डर से की अगर राहुल के और पास गए, उसका मुंह देखने की कोशिश की, कहीं यशोधरा जग न जाए, जग जाए, तो रोएगी, चीखेगी, चिल्‍लाएगी, जाने न देगी। इसलिए चुपचाप द्वार से ही लोट गए थे।

रविवार, 5 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—56 (ओशो)

आत्‍म-स्‍मरण की चौथी विधि—
            ‘’भ्रांतियां छलती है, रंग सीमित करते है, विभाज्‍य भी अविभाज्‍य है।‘’
     यह एक दुर्लभ विधि है। जिसका प्रयोग बहुत कम हुआ है। लेकिन भारत के एक महानतम शिक्षक शंकराचार्य ने इस विधि का प्रयोग किया है। शंकर ने तो अपना पूरा दर्शन ही इस विधि के आधार पर खड़ा किया है। तुम उनके माया के दर्शन को जानते हो। शंकर कहते है कि सब कुछ माया है। तुम जो भी देखते, सुनते या अनुभव करते हो, सब माया है। वह सत्‍य नहीं है। क्‍योंकि सत्‍य को इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता।

शनिवार, 4 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—55 (ओशो)

आत्‍म-स्‍मरण की तीसरी विधि—
     ‘’जब नींद अभी नहीं आयी हो और बाह्य जागरण विदा हो गया हो, उस मध्‍य बिंदू पर बोधपूर्ण रहने से आत्‍मा प्रकाशित होती है।‘’
     तुम्‍हारी चेतना में कई मोड़ आते है, मोड़ के बिंदु आते है। इन बिंदुओं पर तुम अन्‍य समयों की तुलना में अपने केंद्र के ज्‍यादा करीब होते हो। तुम कार चलाते समय गियर बदलते हो और गियर बदलते हुए तुम न्‍यूट्रल से गुजरते हो। यह न्‍यूट्रल गियर निकटतम है।
      सुबह जब नींद विदा हो रही होती है और तुम जागने लगते हो। लेकिन अभी जागे नहीं हो, ठीक उस मध्‍य बिंदु पर तुम न्‍यूट्रल गियर में होते हो। यह एक बिंदु है जहां तुम न सोए हो और न जागे हो, ठीक मध्‍य में हो; तब तुम न्‍यूट्रल गियर में हो। नींद से जागरण में आते समय तुम्‍हारी चेतना की पूरी व्‍यवस्‍था बदल जाती है। वह एक व्‍यवस्‍था से दूसरी व्‍यवस्‍था में छलांग लेती है। और इन दोनों के बीच में कोई व्‍यवस्‍था नहीं होती, एक अंतराल होता है। इस अंतराल में तुम्‍हें अपनी आत्‍मा की एक झलक मिल सकती है।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—54 (ओशो)

आत्‍म-स्‍मरण की दूसरी विधि--
     ‘’जहां-जहां, जिस किसी कृत्‍य में संतोष मिलता हो, उसे वास्‍तविक करो।‘’
     तुम्‍हें प्‍यास लगी है, तुम पानी पीते हो, उससे एक सूक्ष्‍म संतोष प्राप्‍त होता है। पानी को भूल जाओ। प्‍यास को भी भूल जाओ और जो सूक्ष्‍म संतोष अनुभव हो रहा है उसके साथ रहो। उस संतोष से भर जाओ, बस संतुष्‍ट अनुभव करो।
      लेकिन मनुष्‍य का मन बहुत उपद्रवी है। वह केवल असंतोष और अतृप्‍ति अनुभव करता है। वह कभी संतोष को अनुभव नहीं करता। अगर तुम असंतुष्‍ट हो तो तुम उसे अनुभव करोगे और अंसतोष से भर जाओगे।