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रविवार, 31 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—20

मुहर्रम का त्‍योहार—और मेरी सूई

      मेरे बचपन में मेरे गांव में...जब कभी भी मुसलमानों द्वारा मुहर्रम का त्‍यौहार मनाया जाता है, कुछ लोगों पर पवित्र आत्‍मा सवार हो जाती है। इस पवित्र आत्‍मा को वली कहा जाता है। कुछ लोग ऐसे है जिनको बहुत संत स्‍वभाव का समझा जाता है—उन पर वली सवार हो जाते है। और वे नृत्‍य करते है और चिल्‍लाते है, चीखते है और उनसे तुम सवाल भी पूछ सकते हो।
      और वे भाग कर दूर न चले जाएं, इसलिए उनके हाथ रस्‍सी से बांध दिए जाते है, और दो लोग उनको नियंत्रण में रखते है। बहुत सारे वली होते है। और प्रत्‍येक वली के साथ उसकी अपनी भीड़ होती है। और लोग मिठाइयों और फल उन्‍हें भेंट करने के लिए आते है—किसी को पिछले साल आशिष मिला था और उसके यहां बच्‍चे का, लड़के का जन्‍म हो गया है, किसी को विवाह हो गया है और कोई भविष्‍य के लिए आर्शीवाद लेने आया है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—19

मौन की सुगंध
   मैं बहुत छोटा था, शायद बारह वर्ष का रहा होऊंगा, जब एक बहुत विचित्र व्‍यक्‍ति हमारे घर में आया। मेरे पिता उनको लेकर आए थे। क्‍योंकि वे विद्वान  थे। और न केवल विद्वान थे बल्‍कि उनके अपने कुछ प्रमाणिक अध्‍यात्‍मिक अनुभव भी थे। संभवत: उस समय तक वे संबुद्ध नहीं थे। मेरे लिए बिलकुल ठीक से उनको याद रख पाना संभव नहीं है। मैं उनका चेहरा भी याद नहीं कर पा रहा हूं। उन्‍होने सोचा कि शायद ये रहस्‍यदर्शी कुछ कर पाएंगे, कुछ सुझाव दे पाएंगे, मुझे किसी बात पर राज़ी कर पाएंगे, क्‍योंकि मेरे बारे में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति चिंचित था। यद्यपि मैं उनके घर में रह रहा था। लेकिन उन सभी को लगता था कि मैं उनके मध्‍य एक अजनबी था। और वे गलत भी नहीं थे। और अंतत: मेरी उपस्‍थिति कुछ इस भांति की थी नहीं जैसे कि कोई उपस्‍थित हो।
      मेरे पिता उन सूफी रहस्‍यदर्शी को यह सोच कर घर पर लाए थे कि संभवत: कुछ सहायक हो सकेंगे। और मेरे पिता तो हैरान हो गए,मेरा परिवार भी हैरान हुआ, क्‍योंकि उन सज्‍जन ने जो किया...उन्‍होंने मुझको एक अलग कमरा दे रखा था। जिससे कि मैं उनके लिए सतत उपद्रव न बना रहूँ, क्‍योंकि बस वहां पर बैठे रहना,कुछ भी न करना,उनको बेचैन करने के लिए पर्याप्‍त था—वे सभी कुछ न कुछ कर रहे है, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति कार्य कर रहा है, और मैं आंखें बंद किए बैठा हूं, ध्‍यान कर रहा हूं।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—18

शिक्षक की शर्तें

      मेरे शिक्षकों में से एक प्रतिदिन अपनी कक्षा इस बात को कह कर शुरू किया करते थे। पहले मेरी शर्तों को सुन लो। मुझे सिर में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है, मुझे पेट में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है। मैं उन चीजों को स्‍वीकार नहीं करता जो मुझे ज्ञात न हो सकें। हां, यदि तुम्‍हें बुखार है, तो मैं इसको स्‍वीकार करता हूं, क्‍योंकि मैं जांच कर सकता हूं कि तुम्‍हारा तापमान बढा हुआ है। इसलिए याद रहे कोई भी ऐसी बात के लिए छुटटी नहीं मिलेगी जो सिद्ध न कि जा सके। कोई डाक्‍टर भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि सिर में दर्द है या नहीं। उन्‍होंने करीब-करीब प्रत्‍येक बात पर रोक लगा दी, क्‍योंकि तुमको दिखने वाली बीमारी प्रस्‍तुत करनी थी। केवल तब ही तुम बाहर जा सकते हो; लेकिन मुझे कुछ उपाय खोजना था, क्‍योंकि यह स्‍वीकार योग्‍य बात नहीं थी।
     
      वे एक वृद्ध व्‍यक्‍ति थे, इसलिए मुझे जो भी करना था वह रात में करना था....वे वृद्ध थे लेकिन बहुत शक्‍तिशाली थे, और व्‍यायाम करने के बारे में टहलने के बारे में बहुत नियमित थे, इसलिए वे सुबह जल्‍दी पाँच बजे उठ जाया करते थे। और अंधेरे में ही दूर तक टहलने के लिए निकल जाते थे। इसलिए मुझे बस उनके दरवाजे पर केले के छिलके रखने पड़े। सुबह-सुबह वे गिर पड़े और उनकी पीठ में चोट लग गई। मैं तुरंत वहां पहुंच गया, क्‍योंकि मुझे इस बारे में पता था।
      उन्‍होंने कहा: मेरी पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—17

सौ फीट के पूल से छल्‍लांग

      मैंने इस जन्‍म में साहसी होने, प्रखर होने या होने या प्रति भावन होने के लिए आरंभ से ही कुछ अलग कार्य नहीं किया, और कभी इसे साहस प्रखरता प्रतिभा की भांति नहीं सोचा।
      यह तो बाद में धीर-धीरे मैं इस प्रति के प्रति सजग हुआ कि लोग कैसे मंदमति है। यह केवल बाद में प्रतिबिंबित हुआ। पहले मैं जानता ही नहीं था। कि मैं साहसी हूं। मैं सोचा करता था कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति ऐसा ही होना चाहिए। यह तो बाद में ही मुझे स्‍पष्‍ट हो पाया कि प्रत्‍येक  व्‍यक्‍ति वैसा नहीं है।
      अपने बचपन में लिए गए मजों में से एक है—नदी के किनारे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर चढ़कर ओर कूद पड़ना। पड़ोस के अनेक बच्‍चे मेरे साथ आया करते थे। वे इसका प्रयास करते लेकिन वे बस छोर तक जा पाते और वापस लौट पड़ते; ऊँचाई को देख कर वे कहते, अचानक कुछ हो जाता है। मैं उनको बार-बार दिखाता था कि यदि मैं कूद सकता हूं—मेरे पास इस्‍पात की देह नहीं है। और यदि मैं कूदता रहता हूं, जिंदा बच जाता हूं, तो तुम क्‍यों नहीं कूद सकते।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—16

तैरना एक युक्‍ति है
      मेरे गांव में एक बहुत सुंदर वृद्ध भले व्‍यक्‍ति थे। उनको प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति प्रेम करता था। वे बहुत सरल और बहुत भोले थे, यद्यपि वे अस्‍सी वर्ष के ऊपर के थे। और मेरे गांव के साथ में ही एक नदी बहा करती थी। उन्‍होंने उस नदी में अपना स्‍वयं को एक स्‍थान बना रखा था,  जहां पर वे अपना स्‍नान किया करते थे। गांव में जहां तक कोई भी स्मरण कर पाता था उन्‍हें सदैव उनको वर्षो से प्रतिदिन वहीं पर देखा था। भले ही वर्षा हो, गर्मी हो या शीत ऋतु , इससे कोई अंतर नहीं आत था। भले ही वे अस्‍वस्‍थ हो या स्‍वस्‍थ , जरा भी भेद नहीं पड़ता था। वे प्रात: ठीक पाँच बजे अपने स्‍थान पर होते। और वह नदी का र्स्‍वाधिक गहरा स्‍थान था। इसलिए सामान्‍य: वहां कोई नहीं जाया करता था। और वह स्‍थान गांव से काफी दूर भी था।
      लोग नदी पर जाया करते थे, वह मेरे घर से कोई आधा फर्लांग दूर थी—वह स्‍थान कोई दो मील दूर था। और जैसे कि हमारे यहां पहाड़ियां नदी को घेरे हुए है। तुमको एक पहाड़ पार करना पड़ता है, फिर एक और पहाड़, फिर एक और पहाड़ पर करना पड़ता है, तब तुम उस स्‍थान पर पहुंच सकोगे। लेकिन यह बहुत सुंदर स्थान था। जैसे ही मुझको इसके बारे में पता लगा मैंने वहां जाना आरंभ कर दिया।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—15

पहली सतोरी नदी तीर
      पने बचपन के दिनों में मैं प्रात: काल जल्‍दी नदी पर जाया करता था। यह एक छोटा सा गांव का। नदी बहुत अधिक सुस्‍त थी। जैसे कि यह जरा भी प्रवाहित न हो रही हो। प्रति: काल जब सूर्योदय न हुआ हो। तुम देख ही नहीं सकते कि नदी प्रवाहित हो रही है या नहीं,यह इतनी मंद और शांत हुआ करती थी। और प्रात: काल मैं जब वहां कोई न हो,स्‍नान करने वाले अभी तक न आए हों।  वह आत्‍यंतिक रूप से शांत रहती थी। प्रात: काल जब पक्षी भी अभी गा रहे हो—ऊषा पूर्व, कोई ध्‍वनि नहीं, बस एक सन्‍नाटा व्‍याप्‍त रहता है। और नदी पर इधर से उधर तक आम के वृक्षों के सुगंध फैली रहती है।
      मैं नदी के दूरस्‍थ कोने तक बस बैठने के लिए,बस वहां होने के लिए जाया करता था। कुछ करने की अवश्‍यकता नहीं थी, वहां होना ही पर्याप्‍त था; वहां होना ही इतना सुंदर अनुभव था। मैं स्‍नान कर लेता, मैं तैर लेता और जब सूर्य उदय होता तो मैं दूसरे किनारे पर रेत के विराट विस्‍तार में चला जाता और वहां घुप में स्‍वय को सुखाता और वहां लेटा रहता। और जब कभी-कभी सो भी जाता।
      जब मैं लौट कर आता,तो मेरी मां पूछा करती, सुबह के पूरे समय तुम क्‍या करते हो?
      मैं कहता: कुछ भी नहीं,क्‍योंकि वास्‍तव में मैं कुछ भी नहीं करता था।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—14

बोतल का रहस्‍य
मेरे पिता, जब वे किस समारोह में, किसी विवाह में, किसी जन्‍म-दिवस की दावत में या कहीं और जा रहे होते,तो मुझको साथ ले जाया करते थे। वे मुझे इस शर्त पर ले जाते थे। कि मैं बिलकुल खामोश रहूंगा, अन्‍यथा तुम कृपया घर में ही रहो।
       मैं कहता: लेकिन क्‍यों? मेरे अतिरिक्‍त प्रत्‍येक व्‍यक्ति को बोलने की अनुमति है।
      वे कहते, तुम जानते हो, मैं जानता हूं,और प्रत्‍येक जानता है। कि तुमको बोलने की अनुमति क्‍यों नहीं है—क्‍योंकि तुम एक उपद्रव हो।
      लेकिन, मैं कहता, उन बातों में जितना संबंध मुझसे है आप वचन दें कि आप मेरे मामलों में हस्‍तक्षेप नहीं करेंगे, और मैं बचन देता हूं कि में खामोश रहूंगा।  
      और अनेक बार ऐसा हो गया कि उनको हस्‍तक्षेप करना पडा। उदाहरण के लिए, यदि काई बड़ी उम्र का व्‍यक्‍ति मिल गया—कोई दूर का सबंधी, परंतु भारत में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है—मेरे पिता उसके चरणस्‍पर्श करते और मुझसे कहते,उनके पैर छुओ।
      मैं कहता: आप मेरे मामले में हस्‍तक्षेप कर रहे है। और हमारा समझौता समाप्‍त। मैं इन बुजुर्ग व्‍यक्‍ति के चरण‍ क्‍यों स्पर्श करूं? उनका मस्‍तक स्‍पर्श क्‍यों न करूं, यदि आप उनके चरणस्‍पर्श करना चाहते है तो उनको दुबारा, तिबारा स्‍पर्श कर सकते है। मैं हस्‍तक्षेप नहीं करूंगा। लेकिन मैं चरण क्‍यों स्‍पर्श क्‍यों करूं?

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—13

पूर्णत: मुक्‍ति

      मेरे पड़ोस में एक मंदिर था, कृष्‍ण का मंदिर, मेरे मकान से कुछ ही मकान आगे। मंदिर सड़क के दूसरी और था, मेरा मकान सड़क के इस और था। मंदिर के सामने वे सज्‍जन रहा करते थे जिन्‍होंने यह मंदिर बनवाया था। वे बहुत बड़े भक्‍त थे।
      वह मंदिर कृष्‍ण के बाल-रूप का था। क्‍योंकि जब कृष्‍ण युवा हो गए तो उन्‍होंने अनेक उपद्रव ओर ऐसे अनेक प्रश्‍न निर्मित कर दिए,इसलिए ऐसे अनेक लोग हैं जो कृष्‍ण को बाल रूप में पूजते है—इसलिए उस मंदिर  को बालाजी का मंदिर कहा जाता है।
      बालाजी का यह मंदिर उन सज्‍जन के घर के ठीक सामने था जिन्‍होंने इसको बनवाया था। उस मंदिर के और उन सज्‍जन की भक्ति, लगातार चलने वाली भक्‍ति के कारण...वे स्‍नान करते—मंदिर के ठीक सामने एक कुआं था। वहां वे अपना पहला कार्य करते—स्‍नान। फिर वे घंटों अपनी प्रार्थना किया करते; और उनको बहुत धार्मिक समझा जाता था। धीरे-धीरे लोगों ने उनको बालाजी कहना आरंभ कर दिया। यह नाम मेरी स्‍मृति में इस भांति बस गया है कि मुझे स्‍वयं भी उनका असली नाम याद नहीं पड़ता।
क्‍योंकि जब तक मुझे मालूम हो पाता कि वे है। तब मैने उनका नाम बालाजी ही सुना था। किंतु यह उनका वास्‍तविक नाम नहीं हो सकता था। यह नाम इस लिए पड़ गया होगा क्‍योंकि उन्‍होंने बालाजी को मंदिर बनवाया था।

बुधवार, 27 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—12

बहादुर या कायर मास्‍टर

    मेरे हाई स्‍कूल में, वहां विद्यालय भवन में दो इमारतें थी। और उनके बीच में  कम से कम बीस फिट  का फासला था। मुझे लकड़ी का एक ऐसा पटिया मिल गया जो बीस फिट लंबा था। पहले मैं इसे भूमि पर रख देता और अपने मित्रों से कहता, तुम इस पर चल सकते हो? और प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति इसपर बिना गिरे चल पाने में समर्थ था। और तब मैं लकड़ी के उस पटिये को उन दो इमारतों पर पुल की भांति रख देता था, और मेरे अतिरिक्‍त कोई उस पर चलने का प्रयास तक करने को तैयार नहीं होता।
      मैं कहा करता, अजीब मामला है यह,    क्‍योंकि उसी पटिये पर तुम चल चुके हो और तुम गिरे नहीं थे।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—11

ओम, ओम.....का नाद और दंड

      पने प्राइमरी स्‍कूल में उस समय मैं चौथी कक्षा में था, मेरे एक शिक्षक थे...स्‍कूल में यह उनकी कक्षा में मेरा पहला दिन था, और मैंने कुछ गलत किया भी नहीं था, मैं वहीं कर रहा था जो तुम ध्‍यान में किया करते हो: ओम, ओम....., लेकिन भीतर-भीतर मुंह बंद करके। मेरे कुछ मित्र थे, और मैंने उनको भिन्‍न—भिन्‍न स्‍थानों पर बैठने के लिए कह रखा था। जिस से वह  शिक्षक जान न सके कि ध्‍वनि कहां से आ रही है। एक समय यह ध्‍वनि यहां से आ रही होती, दूसरे समय यह वहां से आ रही होती, फिर एक बार यहीं से आ रही होती। वह खोजते रहे कि ध्‍वनि कहां से आ रही थी। इसलिए मैंने उनको कहा हुआ था, अपने मुंह बंद रखो और भीतर ओम का जाप करते रहो।
      एक क्षण को तो वे इसको जान नही पाए। मैं बिलकुल पीछे बैठा था। सारे अध्‍यापक चाहते थे कि में उनके सामने बैठा करूं जिससे वे मुझ पर निगाह रख सकें। और मैं सदा पीछे बैठना चाहता था। जहां तुम कई  और काम कर सकते हो, यह अधिक सुविधाजनक है। वे सीधे ही मेरे पास आए। अवश्‍य ही उन्‍हें तीसरी कक्षा के शिक्षक ने यह बता दिया होगा कि ‘’ आप इस लड़के पर निगाह रखें। इसलिए उन्‍होंने कहा: हालांकि मैं जान नहीं पा रहा हूं कि वे लोग क्‍या कर रहे है जो यह सब कर रहे है। तुम ही यह कर रहे होओगे।‘’
      मैंने कहा: क्‍या? मैं क्‍या कर रहा हूं? आपको मुझे बताना पड़ेगा। बस यह कहना तुम क्‍या कर रहे हो, से कोई अर्थ नहीं निकलता है। क्‍या.....?

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—10

दंड या पुरस्‍कार

      क्षियों को सुनते-सुनते मुझे स्‍मरण हो आता है.....होई स्‍कूल में बस मेरी कक्षा के बाहर ही आम के अनेक वृक्ष थे। और आम के वृक्षों पर कोयलें अपना घोंसला बनाया करती है। जिसकी पुकार इस समय आ रही है, वहीं है कोयल, और कोयल की बोली में मधुर और कुछ भी नहीं है।
      इसलिए मैं खिड़की के पास पक्षियों की ओर, वृक्षों की और बाहर देखता हुआ बैठा करता था, और मेरे शिक्षक बहुत अधिक नाराज रहा करते थे। वे कहा करते,तुम्‍हें ब्‍लैक बोर्ड की और देखना पड़ेगा।
      मैं कहता,यह मेरा जीवन है और मुझको यह चुनने का पुरा अधिकार है कि कहां देखना है। बाहर कितना सुंदर है—पक्षी गीत गा रहे ह,और ये पुष्‍प, और ये वृक्ष, और वृक्षों की पत्‍तियों से छन-छन कर आती हुई यह धूप—तो मैं ऐसा नहीं सोचता कि आपका ब्‍लैक बोर्ड कहीं से इनका स्‍थानापन्‍न बन सकता है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—09

मैं निर्वासित व्‍यक्‍ति था

      ब मैं अपनी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ा करता था। उस समय मेरा घर विद्यालय से बहुत निकट था। इसलिए जब विद्यालय के आरंभ होने की घंटी बजती, मेरे लिए वह स्‍नानागार मैं जाने का समय होता। मेरा पूरा परिवार दरवाजा खटखटा रहा होता, और मैं खामोश रहता—किसी बात का उत्‍तर भी न देता।
      यह प्रतिदिन का क्रम था कि प्रधानाध्‍यापक मुझे ले जाने आया करते थे, क्‍योंकि मैं अपनी स्‍वयं की इच्‍छा से नहीं जाता था। और वे आ जाते, और पिता कहते, करें क्‍या? आप इस घंटी को बजाना बंद कर दीजिए, क्‍योंकि जिस क्षण इसे बजाते है वह तुरंत स्‍नानागार में चला जाता है। और दरवाजा बंद कर लेता है। और फिर निरर्थक है यह कि आप कुछ कर सकें, क्‍योंकि आप जो कुछ भी करते रहो, वह उत्‍तर नहीं देगा।
      अंतत: विद्यालय ने घंटी न बजाने का निर्णय ले लिया। और प्रधानाध्‍यापक आया करते थे—पहले मुझको पकड़ लिया जाता था और तब अन्‍य बच्‍चों के लिए घंटी बजा दी जाती थी।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन--( सत्र--50 )

 निकलंक-- दीवाना था मेेेेरा 

      यह अच्‍छा है कि मैं देख नहीं सकता.....पर मुझे पता है कि क्‍या हो रहा है। पर मैं क्‍या कर सकता हूं—तुम्‍हें तुम्‍हारी टेकनालॉजी के हिसाब से चलना होगा। और मेरे जैसे आदमी के साथ स्‍वभावत: तूम बड़ी मुश्‍किल में हो। मैं बंधा हूं और तुम्‍हारी कोई मदद नहीं कर सकता।
      आशु, क्‍या तुम कुछ कर सकती हो? तुम्‍हारी थोड़ी सी हंसी उसे शांत रखने में मदद करेगी। वह बहुत अजीब बात है कि जब कोई और हंसने लगता है तो पहला आदमी रूक जाता है। उनको नहीं, पर मुझे कारण साफ है। जो हंस रहा होता है वह तुरंत सोचता है कि वह कुछ गलत कर रहा है। और तुरंत गंभीर हो जाता है।
      जब तुम देखो कि देव गीत रास्‍ते से थोड़ भटक रहा है तो हंसों, हरा दो उसे। वह नारी मुक्‍ति का सवाल है। और अगर तुम अच्‍छी हंसी हंसों तो वह तुरंत अपने नोट लेना शुरू कर देगा। तुमने अभी शुरू भी नहीं किया और वह अपने होश में आ गया।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन-- (सत्र--49 )

नीम का पेड़ और भूत

      च्‍छा, मैं उस आदमी को याद करने की कोशिश कर रहा था। मुझे उसका चेहरा तो दिखाई दे रहा है। किंतु शायद मैंने उसका नाम जानने की कभी कोशिश नहीं की। इसलिए मुझे वह याद नहीं है। मैं तुम्‍हें वह सारी कहानी सुनाता हूं।
      जब मेरी नानी ने देखा कि मुझे स्‍कूल भेजने से कोई फायदा नहीं । मैं पढ़ता-वढ़ाता नहीं हूं, केवल शैतानी ही करता हूं तो उन्‍होने मेरे माता-पिता को यह समझाने की कोशिश की कि वह लड़का दूसरे लड़कों के लिए एक मुसीबत बन गया है। लेकिन कोई उनकी बात सुनने को तैयार ही न था। यह उस समय की बात है जब मैंने हाईस्‍कूल में प्रवेश किया था। उन्‍होंने कहा: यह रोज कोई न कोई शरारत करता है। यह स्‍कूल भी कभी-कभी जाता है, रोज नहीं। इस प्रकार यह क्‍या सीखेगा। शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए इसके पास समय ही नहीं है। क्‍योंकि यह सदा अपने लिए और दूसरों के लिए कोई न कोई मुसीबत खड़ी कर देता है।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 48)

महर्षि महेश योगी यों सबसे अधिक चालाक

      मैं तुम लोगों को यह बता रहा था कि मैं स्‍कूल नियमित रूप से हाजिरी लगाने नहीं जाता था। मैं तो वहां कभी-कभी जाता था। और वह भी उस समय जब मुझे कोई शैतानी सूझती,शरारत और शैतानी करने में मुझे बड़ा मजा आता था और एक प्रकार से यही आरंभ था मेरे शेष जीवन के ढंग का।
      मैंने कभी कुछ गंभीरता से नहीं लिया। अभी भी ऐसा ही हूं। अगर मुझे छूट दी जाए तो मैं तो अपनी मृत्‍यु पर भी खूब हंसूगा। परंतु भारत में पिछले पच्‍चीस वर्ष तक मुझे गंभीर आदमी का पार्ट अदा करना पडा—यह अभिनय कुछ लंबा ही चला। थोड़ा मुश्‍किल था किंतु मैंने यह अभिनय इस प्रकार किया कि मैं तो गंभीर बना रहा परंतु मैंने अपने आस पास के लोगों को गंभीर नहीं होने दिया। इसी से मैंने अपने आपको बचा लिया। अन्‍यथा ये गंभीर लोग तो ज़हरीले साँपों से भी अधिक ज़हरीले होते है।

रविवार, 17 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 47)

 स्‍कूल का हाथी फाटक और शरारते

    मैं अपने प्राइमरी स्‍कूल की बात कर रहा था। मैं वहां कभी-कभार ही जाता था। मेरे न जाने से स्‍कूल के सब लोगों को बडी राहत मिलती थी और मैं भी उन्‍हें तकलीफ देना नहीं चाहता था। मैं तो उनको शत-प्रतिशत राहत देना चाहता था। क्‍योंकि मुझे भी उनमें बहुत प्रेम था—मेरा मतलब है लोगों से, वहां के अध्‍यापकों से,अन्‍य नौकरों से तथा मालियों से। कभी-कभी मैं उनसे मिलना चाहता था, खासकर जब तब मैं उनको को विशेष चीज दिखाना चाहता तो मैं वहां चला जाता। एक छोटा बच्‍चा चाहता है कि वह अपनी खास चीजें अपने प्रियजनों को दिखाए। किंतु ये चीजें खतरनाक भी होती थीं। अभी भी मुझे यह याद करके बहुत हंसी आती है।
      उस दिन की याद मेरे मन में बिलकुल ताजा है। वह याद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी। शायद अब वह क्षण आ गया है जब दूसरों के साथ इस अनुभव के मजे को बांटा जा सकता है। यह घटनाओं का एक शृंखला है....

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 46)

सत्‍य साईं बाबा तो अति साधारण जादूगर

      ठीक है। मैं प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन से शुरूआत करता हूं। कितनी देर वह घटना इंतजार कर सकती है। पहले ही बहुत इंतजार कर चुकी है। सच मैं स्‍कूल में मेरा प्रवेश दूसरे दिन हुआ। क्‍योंकि काने मास्‍टर को निकाल दिया गया था। इसलिए सब लोग खुशी मना रहे थे। सब बच्‍चे खुशी से नाच रहे थे। मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था। किंतु उन्‍होंने मुझे बताया तुम्‍हें काने मास्‍टर के बारे में मालूम नहीं है। अगर वह मर जाए तो हम सारे शहर में मिठाई बांटें गे और अपने घरों में दिए जलाएंगे।
      और मेरा इस प्रकार स्‍वगत हुआ जैसे कि मैंने कोई महान कार्य किया हो। सच तो यह है कि मुझे काने मास्‍टर के लिए थोड़ी सहानुभूति भी हो रही थी। वह कितना ही बुरा था, हिंसक था किंतु था तो मनुष्‍य ही। और मनुष्‍य की सारी कमज़ोरियाँ स्‍वभाविक है। यह उसकी गलती ने थी कि उसकी एक आँख थी और चेहरा भी बहुत कुरूप था। और मैं जो कहना चाहता हूं।

रविवार, 10 जनवरी 2010

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 45 )

महात्‍मा गांधी से भेट
     

     .के.। सारी दुनिया स्‍तब्‍ध रह गई जब जवाहर लाल नेहरू रेडियो पर महात्‍मा गांधी की मृत्‍यु की सूचना देते समय एकाएक रो पेड। यह तैयार किया गया भाषण नहीं था। वे अपने ह्रदय से बोल रहे थे। और अगर अचानक  उनके आंसू उमड़ पड़े तो वे क्‍या करतेऔर अगर कुछ क्षणों के लिए उन्‍हें रूकना पडा तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं था। यह तो उनकी महानता थी। अन्‍य कोई मूढ़ राजनीतिज्ञ अगर चाहता भी तो ऐसा नहीं कर सकता था। क्‍योंकि उनके सैक्रेटरी को अपने तैयार किया गए भाषण में यक भी लिखना पड़ता कि अब रोना शुरू कीजिए और रोते-रोते थोड़ा रुकिए ताकि लोग समझें कि यह रोना सच्‍चा है जवाहरलाल ऐसे किसी भाषण को पढ़ नहीं रहे थे। सच तो यह है कि उनके सैक्रेटरी बहुत चिंतित थे। कई बरसों बाद उनका एक सैक्रेटरी संन्‍यासी बन गया था। उसने यह बताया कि हम लोगों ने एक भाषण तैयार किया था परंतु उन्‍होंने उसको हमारे मुहँ पर फेंकते हुए कहा: बेवक़ूफ़ों, क्‍या तुम समझते हो कि मैं तुम्‍हारा लिखा हुआ भाषण पढ़ूंगा।
      मैं तुरंत पहचान गया कि जवाहरलाल उन थोड़े से व्‍यक्‍तियों में से एक है जो अति संवेदनशील होते हुए भी दूसरों की सहायता के लिए अपने पद का उपयोग करते है। ये दूसरों की सेवा करते है। ये जनता का शोषण नहीं करते।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 44)

मस्‍तो की भविष्‍य वाणी—मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनेगा

      कल मुझे अचरज हो रहा था कि परमात्‍मा ने इस दुनियां को छह दिनों में कैसे बना लिया। मुझे अचरज इस लिए हो रहा था, क्‍योंकि मैं तो अभी प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही अटका हुआ हूं, दूसरे दिन के पार भी जा सका। और उसने यह कैसी दुनिया बनाई है। शायद यह यहूदी था, क्‍योंकि यहूदियों ने ही इस विचार को फैलाया है।
      हिंदू एक परमात्‍मा में नहीं वरन अनेक परमात्मा में विश्‍वास करते है। सच तो यह है कि पहले जब उनको यह विचार सुझा तो उन्‍होंने उतने ही देवताओं की  गणना की जतनी उस समय भारतीयों की जनसंख्‍या थी। उस समय भी उनकी संख्‍या कम नहीं थी। तैंतीस करोड़ थी। हिंदुओं के मतानुसार प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को अपना एक परमात्‍मा होना चाहिए। वे तानाशाह नहीं थे। वे प्रजातांत्रिक थे—पहले के हिंदू तो बहुत अधिक प्रजातांत्रिक थे।
      हजारों साल पहले उन्‍होंने एक ऐसे अलौकिक संसार की कल्‍पना की थी जिसमें उतने ही जीवित लोग थे जितने इस पृथ्‍वी पर। बहुत बड़ा काम किया था उन्‍होंने। तैंतीस करोड़ देवताओं की गणना करना आसान नहीं है। और तुम्‍हें हिंदू देवताओं के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। वे बिलकुल वैसे है जैसे मनुष्‍य हो सकते है—बहुत चालाक,कमीने, राजनीतिज्ञ,हर प्रकार के शोषण करने बाले। परंतु किसी ने किसी प्रकार किसी ने जनगणना कर ही ली।  

सोमवार, 4 जनवरी 2010

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 43 )

मृत्‍यु के बाद भी मैं उपल्‍बध रहूंगा

      ओके.। मुझे हमेशा इत बात पर आश्‍चर्य हुआ है कि परमात्‍मा ने इस दुनिया को छह दिनों में कैसे बना दिया। ऐसी दुनिया, शायद इसीलिए अपने बेटे को जीसस कहा। अपने ही बेटे के लिए ये कैसा नाम चुना? उसने जो किया उसके लिए यह किसी दूसरे को सज़ा देना चाहता था। किंतु दूसरा कोई तो वहां था नहीं। होली घोस्‍ट तो सदा गैर-हाजिर रहता है। वह तो घोड़े की पीठ पर बैठा रहता है। इसीलिए मैंने चेतना को उसे खाली करने को कहा है। क्‍योंकि किसी घोड़े पर बैठना जिस पर पहले से ही कोई बैठा हो, ठीक नहीं है। मेरा मतलब है कि घोड़े के लिए ठीक नहीं है। और चेतना के लिए भी। जहां तक होली घोस्‍ट का सवाल है, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। मुझे होली घोस्‍ट से या अन्‍य प्रकार के भूतों से काई हमदर्दी नहीं है। मैं जीवित लोगों के साथ हूं।
      भूत तो मृत की छाया है और अगर वह होली या पावन है तो भी उसका क्‍या फायदा। और वह बदसूरत भी है। चेतना, मुझे होली घोस्‍ट की जरा भी चिंता नहीं थी। अगर तुम उस पर सवार हो जाओ तो मुझे कोई आपत्‍ति नहीं है। होली घोस्‍ट की सवारी करो, परंतु यह कुर्सी तो एक पूरे आदमी के लिए भी नहीं बनी है। यह बैठने के लिए बनी ही नहीं है। आधा आदमी ही बैठ सकता है। यह इस तरह बनी हुई है कि कोई इस पर बैठ कर सो न सके।

रविवार, 3 जनवरी 2010

स्‍वर्णिम बचपन - (सत्र-- 42)

जवाहरलाल बोधिसत्‍व थे

      ओके. । मैं क्‍या बता रहा था तुम्‍हें?
      आप बता रहे थे कि सत्य भक्त और मोरार जी देसाई किसी प्रकार आपके दुश्‍मन बन गए। वे और अंत में आपने यह कहा था कि मोरार जी देसाई कह आंखों से धूर्तता और चालाकी झलकती रही थी। और यह आपको अच्‍छी तरह याद है।
      ठीक है, उसे याद न रखना ही अच्‍छा है। शायद इसीलिए मुझे याद नहीं आ रहा था, अन्‍यथा मेरी याददाश्‍त खराब नहीं है। कम से कम ऐसा किसी ने आज तक मुझसे कहा नहीं है। यहां तक कि जो लोग मुझसे सहमत नहीं हे वे भी कहते है कि मेरी स्‍मृति आश्‍चर्यजनक है। जब मैं सारे देश में घूम रहा था तो उस समय मुझे हजारों लोगों के चेहरे और नाम याद रहते थे—और इतना ही नहीं मैं जब उनसे दुबारा मिलता था तो मुझे यह भी याद रहता था कि इससे पहले में उनसे कहां मिला था और हम लोगों में क्‍या बातचीत हुई था। भले ही वह बातचीत दस पंद्रह वर्ष पहले हुई हो। मेरी बात को सुन कर लोग हैरान हो जाते थे। अच्‍छा है मेरी स्‍मृति में बहीं गड़बड़ होती है जहां होनी चाहिए—मोरार जी देसाई पर।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

सवर्णिम बचपन--( सत्र-41 )

चौबीस तीर्थकर एक भेड़ परम्‍परा
     
      ओं. के. । मैं जो तुम्‍हें बताना चाहता था उसे बताना शुरू भी न कर सका। शायद ऐसा नहीं ही होना था क्‍योंकि कई बार मैंने उसकी चर्चा करने की कोशिश कि किंतु कर नहीं सका। परंतु यह मानना पड़ेगा कि यह सत्र बहुत ही सफल रहा, लाभदायक रहा। हालांकि न कुछ कहा गया, न कुछ सुना गया। अच्‍छा खासा हंसी-मजाक होता रहा परंतु मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं कारावास में हूं।
      तुम लोग सोच रहे होगें कि मैं क्‍यों हंसा। अच्‍छा है कि मेरे सामने कोई दर्पण नहीं है। एक दर्पण का इंतजार करो। कम से कम यह इस स्‍थान को वैसा बना देगा जैसा इसको होना चाहिए। परंतु यह बहुत ही अच्छा रहा। मैं बहुत ही हलका महसूस कर रहा हूं। शायद वर्षो से मैं नहीं हंसा। मेरे भीतर कुछ इस सुबह की प्रतीक्षा कर रहा था। किंतु में उस दिशा में कोई कोशिश नहीं कर रहा था....शायद किसी और दिन।