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रविवार, 31 जनवरी 2010

परिशिष्‍ट प्रकरण--20

मुहर्रम का त्‍योहार—और मेरी सूई

      मेरे बचपन में मेरे गांव में...जब कभी भी मुसलमानों द्वारा मुहर्रम का त्‍यौहार मनाया जाता है, कुछ लोगों पर पवित्र आत्‍मा सवार हो जाती है। इस पवित्र आत्‍मा को वली कहा जाता है। कुछ लोग ऐसे है जिनको बहुत संत स्‍वभाव का समझा जाता है—उन पर वली सवार हो जाते है। और वे नृत्‍य करते है और चिल्‍लाते है, चीखते है और उनसे तुम सवाल भी पूछ सकते हो।
      और वे भाग कर दूर न चले जाएं, इसलिए उनके हाथ रस्‍सी से बांध दिए जाते है, और दो लोग उनको नियंत्रण में रखते है। बहुत सारे वली होते है। और प्रत्‍येक वली के साथ उसकी अपनी भीड़ होती है। और लोग मिठाइयों और फल उन्‍हें भेंट करने के लिए आते है—किसी को पिछले साल आशिष मिला था और उसके यहां बच्‍चे का, लड़के का जन्‍म हो गया है, किसी को विवाह हो गया है और कोई भविष्‍य के लिए आर्शीवाद लेने आया है।
      इसमें केवल मुसलमान भागीदारी करते है। लेकिन मैंने हमेशा हर प्रकार के मनोरंजन का मजा लिया है। मेरे माता-पिता मुझको कहा करते थे। सुनो यह मुसलमानों का त्‍योहार है और तुमको वहां नहीं होना चाहिए।
      मैं कहता: मैं न हिंदू हूं, न मुसलमान, न जैन और न कुछ और। यह कहने से आपका क्‍या अभी प्राय है कि मैं किसी चींजे का मजा नहीं ले सकता हूं। सभी त्‍यौहार किसी न किसी धर्म के होते है। वस्‍तुत: मैं किसी धर्म का नहीं हूं, इसलिए में सभी त्योहारों में भागीदार हो सकता हूं। इसलिए मैं वहाँ जाता हूं।
      एक बार मैंने एक ऐसे वली की रस्‍सी पकड़ने मे कामयाबी हासिल कर ली जो बस एक साधारण व्‍यक्‍ति था और धोखेबाज था। मेंने उससे पहले ही कह दिया था, यदि तुम मुझको अपनी रस्‍सी नहीं पकड़ने दोगे तो मैं तुम्हारी पोल खोल दूँगा।
      उसने कहा: तुम मेरी रस्‍सी पकड़ सकते हो, और तुम इन मिठाइयों का कुछ हिस्‍सा ले सकते हो, लेकिन किसी से कुछ कह मत देना।
      हम दोनों एक ही व्‍यायामशाला में जाया करते थे—इसी प्रकार से हम मित्र बन गए थे। और उसने स्‍वयं ही मुझको बताया था कि यह सभी कुछ दिखावटी था। तो मैंने कहा: इसका अर्थ हुआ कि मैं वहां आर हा हूं, यदि सब कुछ दिखावटी है तो मुझको इससे भागीदारी करनी पड़ेगी।
      मैं एक लंबी सूई लेकर वहां पहुंच गया, जिससे मैं उसको उछल-कूद करवा सकूं। वह सबसे प्रसिद्ध वली बन गया क्‍योंकि कोई और वली इतना ऊँचा नहीं कूद रहा था।
      जो कुछ भी घटित हो रहा था उसके बारे में वह कुछ कह भी नहीं सकता था—क्‍योंकि वह तो वली की गिरफ्त में था और वली एक सूई से भयभीत नहीं हो सकता था। इसलिए वह कुछ कह भी नहीं पाया और मैं उसको सूई चुभोता रहा। उसको करीब-करीब चार गुना अधिक मिठाई, अधिक फल और अधिक रूपये चढ़ावे में मिल गए....उससे दुआ चाहने वाले अधिक लोग आए।
      उसने कहा: यह भी खूब रही, लेकिन तुमने मुझको बहुत सताया।
      उस दिन से मेरी इतनी मांग हो गई, प्रत्‍येक वली चाहता ता कि उसकी रस्‍सी मुझे दे दी जाए, क्‍योंकि जो भी मुझे अपने सहायक के रूप में पा जाता तुरंत उसी दिन महानतम वली बन जाता।
      दस दिन तक उत्‍सव चलता रहा, और कोई भी वली दुबारा अगले दिन मुझे अपने साथ रखना चाहता था। वे कहा देते, यदि तूम दुबारा आ गए तो मैं यह शहर छोड़ कर भाग जाऊँगा।
      मैंने कहा: इसकी कोई आवश्‍यकता नहीं है। अन्‍य मूढ़ों के द्वारा जो यह नहीं जानते कि क्‍या हो रहा है, मेरी मांग इतनी अधिक है......तुम बस मुझे को अपने हिस्‍से के चढ़ावे में से आधा दे दो—क्‍योंकि फिर भी तुम्‍हारे पास दो गुना शेष रह जाएगा।
      और मैंने पाया कि करीब-करीब प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति धोखेबाज था—क्‍योंकि में प्रत्‍येक को अपनी सूई द्वारा कुदवा रहा था। पूरे नगर में एक भी प्रमाणिक व्‍यक्‍ति नहीं था जो कि अवशिष्ट या ऐसा कुछ हो। वे बस दिखावा कर रहे थे—चिल्‍ला रहे थे, चीख रहे थे, ऐसी बातें कह रहे थे जिनको तुम समझ न सको, लेकिन तुमको इसमें से मतलब निकालना पड़े।
      मौलवी लोग , मुस्‍लिम विद्वान तुमको समझाए गे कि इस बात का अर्थ है: तुम पर कृपा हो रही है। तुम्‍हारी इच्‍छा पूरी हो जाएगी। और कौन फ़िकर करता है कि किसकी इच्‍छा पूरी हुई या नहीं? यदि सौ लोग आते है तो कम से कम पचास लोगों की इच्‍छा तो पूरी होने वाली है। यह पचास लो वापस लौट कर आएंगे और ये पचास लोग इच्‍छा पूरी होने वाली इस बात का प्रचार करेंगे। शेष पचास लोग भी लौट कर आएंगे—उसी वली के पास नही, लेकिन अन्‍य वली यों के पास लौटेंगे जो वहां है, क्‍योंकि पहला वली जिसके पास वे गए काम न आया: शायद वह इतना शक्‍तिशाली न हो।      
      और मेरे वली सर्वाधिक शक्‍तिशाली थे। उनकी शक्‍ति इस बात से तय की जाती थी कि वे कितना ऊँचा कूदे है। वे कितना चीखे है। वे कितना चिल्‍लाए है। सो ये तो में कर ही रहा था।
      और प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति ने मुझसे पूछा कि मेरे वली मेरी और ऐसी विचित्र मुखमुद्राएं क्‍यों बना रहे थे.....
      मैंने कहा: वह एक अध्‍यात्‍मिक भाषा है, उसको तुम नहीं समझोगे।
--ओशो

परिशिष्ट प्रकरण—19

मौन की सुगंध
   मैं बहुत छोटा था, शायद बारह वर्ष का रहा होऊंगा, जब एक बहुत विचित्र व्‍यक्‍ति हमारे घर में आया। मेरे पिता उनको लेकर आए थे। क्‍योंकि वे विद्वान  थे। और न केवल विद्वान थे बल्‍कि उनके अपने कुछ प्रमाणिक अध्‍यात्‍मिक अनुभव भी थे। संभवत: उस समय तक वे संबुद्ध नहीं थे। मेरे लिए बिलकुल ठीक से उनको याद रख पाना संभव नहीं है। मैं उनका चेहरा भी याद नहीं कर पा रहा हूं। उन्‍होने सोचा कि शायद ये रहस्‍यदर्शी कुछ कर पाएंगे, कुछ सुझाव दे पाएंगे, मुझे किसी बात पर राज़ी कर पाएंगे, क्‍योंकि मेरे बारे में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति चिंचित था। यद्यपि मैं उनके घर में रह रहा था। लेकिन उन सभी को लगता था कि मैं उनके मध्‍य एक अजनबी था। और वे गलत भी नहीं थे। और अंतत: मेरी उपस्‍थिति कुछ इस भांति की थी नहीं जैसे कि कोई उपस्‍थित हो।
      मेरे पिता उन सूफी रहस्‍यदर्शी को यह सोच कर घर पर लाए थे कि संभवत: कुछ सहायक हो सकेंगे। और मेरे पिता तो हैरान हो गए,मेरा परिवार भी हैरान हुआ, क्‍योंकि उन सज्‍जन ने जो किया...उन्‍होंने मुझको एक अलग कमरा दे रखा था। जिससे कि मैं उनके लिए सतत उपद्रव न बना रहूँ, क्‍योंकि बस वहां पर बैठे रहना,कुछ भी न करना,उनको बेचैन करने के लिए पर्याप्‍त था—वे सभी कुछ न कुछ कर रहे है, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति कार्य कर रहा है, और मैं आंखें बंद किए बैठा हूं, ध्‍यान कर रहा हूं।
      इस लिए उन्‍होंने मुझे ऐसा कमरा दे रखा था। जिसका प्रवेश द्वार अलग था। वे सूफी मेरे पिता के साथ आए और वे दीवालों को सूँघते रहे, इस कोने पर उस कोने पर मेरे पिता ने कहा: है भगवान, मैं उन्हें लेकर आया था कि वे तुम्‍हें ठीक करे दें। लेकिन वे तुमसे बहुत आगे प्रतीत हो रहे है।
      मेरा पूरा कमरा खाली था। मैंने सदैव खालीपन को प्रेम किया है। क्‍योंकि केवल खालीपन ही नितांत निर्मल हो सकता है। तुम अपने कमरे में चाहे जो कुछ भी एकत्रित करते चले जाओ, आज नहीं तो कल व्‍यर्थ हो जाता है। इसलिए मेरे कमरे में कुछ भी न था।
      मेरे पिता ने उनको देखा,मुझ पर निगाह डाली और उन्‍होंने कहा: मैंने उनको आमंत्रित किया है, इसलिए मुझे देखना चाहिए कि वे क्‍या करते है।
      फिर वे आए और मुझको सुगंध पता चल रही है। और उसकी सुगंध भी पता चल रही है। यह मौन की सुगंध है। मौन की महक है। आपको अनुगृहीत होना चाहिए कि आपको ऐसा पुत्र मिला है। मुझे दोनों को सुधना पडा। जिससे में यह जान सकूं कि यह क्‍या उसकी उपस्थिति से संबंधित है। यह कमरा उसकी उपस्थिति से आपूरित है। उसके लिए बाधा उत्‍पन्‍न न करें। और उन्‍होंने मुझसे यह कह कर क्षमा मांगी: मुझको माफ कर दो, तुम्‍हारे कमरे में आकर मैंने तुम्‍हें बाधा पहुँचाई है।
      मेरे पिता उनको लेकर बाहर चले गए और वे वापस लौटे और कहा: मैं सोचता था कि केवल तुम ही पागल हो, और अधिक पागल लोग भी है—कमरे को सूंघने वाले।
      लेकिन मैंने उनसे कहा: आपका आवास आपका विस्‍तर है। सूक्ष्‍म ढंग से यह आपका प्रतिनिधित्‍व करता है। और आप जिन सज्‍जन को लेकर आए थे, वे निश्‍चित रूप0 से एक महान व्‍यक्‍ति, अंतर्दृष्‍टि और समझ के व्‍यक्‍ति है।
      --ओशो 

परिशिष्ट प्रकरण—18

शिक्षक की शर्तें

      मेरे शिक्षकों में से एक प्रतिदिन अपनी कक्षा इस बात को कह कर शुरू किया करते थे। पहले मेरी शर्तों को सुन लो। मुझे सिर में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है, मुझे पेट में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है। मैं उन चीजों को स्‍वीकार नहीं करता जो मुझे ज्ञात न हो सकें। हां, यदि तुम्‍हें बुखार है, तो मैं इसको स्‍वीकार करता हूं, क्‍योंकि मैं जांच कर सकता हूं कि तुम्‍हारा तापमान बढा हुआ है। इसलिए याद रहे कोई भी ऐसी बात के लिए छुटटी नहीं मिलेगी जो सिद्ध न कि जा सके। कोई डाक्‍टर भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि सिर में दर्द है या नहीं। उन्‍होंने करीब-करीब प्रत्‍येक बात पर रोक लगा दी, क्‍योंकि तुमको दिखने वाली बीमारी प्रस्‍तुत करनी थी। केवल तब ही तुम बाहर जा सकते हो; लेकिन मुझे कुछ उपाय खोजना था, क्‍योंकि यह स्‍वीकार योग्‍य बात नहीं थी।      
      वे एक वृद्ध व्‍यक्‍ति थे, इसलिए मुझे जो भी करना था वह रात में करना था....वे वृद्ध थे लेकिन बहुत शक्‍तिशाली थे, और व्‍यायाम करने के बारे में टहलने के बारे में बहुत नियमित थे, इसलिए वे सुबह जल्‍दी पाँच बजे उठ जाया करते थे। और अंधेरे में ही दूर तक टहलने के लिए निकल जाते थे। इसलिए मुझे बस उनके दरवाजे पर केले के छिलके रखने पड़े। सुबह-सुबह वे गिर पड़े और उनकी पीठ में चोट लग गई। मैं तुरंत वहां पहुंच गया, क्‍योंकि मुझे इस बारे में पता था।
      उन्‍होंने कहा: मेरी पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।
      मैंने कहा: ऐसी किसी बात का उल्‍लेख मत कीजिए जिसको आप सिद्ध न कर सकें।
      उन्‍होंने कहा: लेकिन में इसे सिद्ध कर सकूं या नहीं, मैं आज स्‍कूल आने योग्‍य नहीं रहा।
      तब मैने कहा: आपको कल से अपनी शर्ते बंद करनी पड़ेगी, क्‍योंकि मैं सारे स्‍कूल में पूरी बात फैलाने जा रहा हूं, कि यदि पीठ दर्द स्‍वीकार किया जा सकता है....क्‍या सबूत है आपके पास इसका। तो सिर का दर्द क्‍यो नही?
      उन्‍होंने कहा: मैं सोचता हूं कि यहां पड़े हुए केले के छिलकों से तुम्‍हारा कोई संबंध है।
      मैंने कहा: शायद आप सही है, लेकिन आप सिद्ध नहीं कर सकते, और मैं केवल उन बातों में ही विश्‍वास करता हूं जिनको सिद्ध किया जा सके।
      उन्‍होंने कहा: कम से कम तुम मेरे लिए एक काम तो कर सकते हो, तुम मेरा आवेदन प्रधानाध्‍यापक तक पहुंचा सकते हो।
      मैंने कहा: मैं आपका आवेदन पत्र ले लुंगा, लेकिन स्‍मरण रखें, कि कल से आप उन शर्तों को बंद कर देंगे, क्‍योंकि कभी-कभी मेरे सिर में दर्द होता है, कभी-कभी मेरे पेट में दर्द होता है। क्‍योंकि मैं हर प्रकार के कच्‍चे फल खाने का आदी हूं। जब आप दूसरे के बग़ीचे से फल चुरा रहे होते है तो आप यह नहीं कह सकते कह फल पका हुआ होना चाहिए। और पकने से पहले ही वो फल आप को मिल जाए। जैसे ही वे पक जाते है। उनको लोग ले जाते है। इसलिए मुझे पेट की परेशानी रहती है। और निशिचत रूप से उन्‍होंने उस दिन से इन शर्तों को समाप्ति कर दिया। उन्‍होंने बस मेरी और देखा, मुस्कुराए और अपनी कक्षा आरंभ कर दी।
      छात्र तो बस अचंभित रह गए: इनको क्‍या हो गया? शर्तों का क्या हुआ, मैं उठ खड़ा हुआ और बोला,मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है।
      तुम जा सकते हो। ऐसा पहली बार हुआ था....संध्‍या को जब वे मेरे पिता से मिलने आए तो उन्‍होंने बताया,ऐसा पहली बार हुआ है कि मैंने किसी को पेट दर्द के कारण अवकाश दिया हो.....क्‍योंकि ये लोग इतने कल्‍पनाशील है और नये बहाने खोजने वाले है। और उन्‍होंने मेरे पिता जी से कहा: आपका पुत्र खतरनाक है।
      मैंने कहा: पुन: आप कुछ ऐसा करने का प्रयास कर रहे है जिसे आप सिद्ध नहीं कर सकते,बस आप कल्‍पना कर सकते है। मैं बस सुबह घूमने जा रहा था और मैंने आपको गिरे हुए देखा,और मैं उठने में आपकी सहायता करने चला गया। क्‍या आप सोचते है कि किसी की सहायता करना गलत है।
      मैंने कहा: उसकी खोज आपको करना पड़ेगी—यह आपका मकान है यह बस संयोग है कि मैं सुबह टहलने जा रहा था और मेरे पिता जानते है कि रोज मैं सुबह घूमने के लिए जाता हूं।
      मेरे पिता ने कहा: यह सच है, यह प्रतिदिन टहलने जाता है। लेकिन यह संभव है कि उसने यह किया हो। लेकिन जब तक आप इसे सिद्ध न कर दें, इसका कोई उपयोग नहीं है: हमें उसके सामने चीजों को सिद्ध करना पड़ता है। यदि तर्क से वह जीत जाता है तब भले ही हम सही हों, वह विजेता है और हम पराजित है। इसने हमें आपकी पीठ की चोट के बारे में पूरी बात बता दी थी और यह भी बताया था के आपने तब से अपनी दोनों शर्तों को वापस ले लिया है।
      मेरे पिताजी भी उनके छात्र रहे थे। उन्‍होंने का: यह अजीब है, क्‍योंकि आपने कभी भी उन शर्तों के बीना पढ़ाना आरंभ नहीं क्या था।
      मेरे शिक्षक ने कहा: पहले कभी मेरे पास इस प्रकार का विद्यार्थी नहीं रहा। मुझको अपनी पूरी योजना बदलनी पड़ी, क्‍योंकि उसके साथ विवाद में पड़ना खतरनाक है, उसने मुझे मार डाला होता।   
--ओशो

परिशिष्ट प्रकरण—17

सौ फीट के पूल से छल्‍लांग

      मैंने इस जन्‍म में साहसी होने, प्रखर होने या होने या प्रति भावन होने के लिए आरंभ से ही कुछ अलग कार्य नहीं किया, और कभी इसे साहस प्रखरता प्रतिभा की भांति नहीं सोचा।
      यह तो बाद में धीर-धीरे मैं इस प्रति के प्रति सजग हुआ कि लोग कैसे मंदमति है। यह केवल बाद में प्रतिबिंबित हुआ। पहले मैं जानता ही नहीं था। कि मैं साहसी हूं। मैं सोचा करता था कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति ऐसा ही होना चाहिए। यह तो बाद में ही मुझे स्‍पष्‍ट हो पाया कि प्रत्‍येक  व्‍यक्‍ति वैसा नहीं है।
      अपने बचपन में लिए गए मजों में से एक है—नदी के किनारे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर चढ़कर ओर कूद पड़ना। पड़ोस के अनेक बच्‍चे मेरे साथ आया करते थे। वे इसका प्रयास करते लेकिन वे बस छोर तक जा पाते और वापस लौट पड़ते; ऊँचाई को देख कर वे कहते, अचानक कुछ हो जाता है। मैं उनको बार-बार दिखाता था कि यदि मैं कूद सकता हूं—मेरे पास इस्‍पात की देह नहीं है। और यदि मैं कूदता रहता हूं, जिंदा बच जाता हूं, तो तुम क्‍यों नहीं कूद सकते।      
      वे कहा करते, भरपूर प्रयास करते है हम—और वास्‍तव में वे प्रयास करते थे। मेरे ठीक पड़ोस में एक ब्राह्मण लड़का रहा करता था जो इससे बहुत अपमानित अनुभव करता था, क्‍योंकि वह नहीं कूद पाया था। इसलिए उसने अवश्‍य अपने पिता से कहा होगा, क्‍या किया जाए? क्‍योंकि बहुत अपमानजनक लगता है। वह पहाड़ी के शिखर पर पहुंच जाता और वहां से छलांग लगा देता है। और हम बस देखते रह जाते है। हम देख सकते है कि यदि वह कूद सकता है तो हम भी कूद सकते है। कोई समस्‍या नहीं है इसमें। यदि ऊँचाई उसको नहीं मार पाती तो यह हमें क्‍यों मार डालेगी। लेकिन बस जैसे ही हम साहस एकत्रित करते है। हर संभव प्रयास करते है और हम कूदते के लिए दौड़ते है, अचानक अवरोध आ जाता है।
      यह अवरोध कहां से आता है, हम नहीं जानते,लेकिन बस एक रूकावट है; हमारे भीतर से कोई कहता है, नहीं ये चट्टानें और यह नदी....यदि तुम किसी चट्टान पर गिर गए...या नदी गहरी है। और जब तुम ऊँचाई से गिरते हो तो पहले तुम नदी के बिलकुल निचले तल पर पहुँचेंगे, फिर तुम ऊपर आओगे; तूम और कुछ कर भी नहीं सकते।
      उसके पिता ने कहा: यह कोई अच्‍छी बात नहीं है—क्‍योंकि उसके पिता अच्‍छे पहलवान थे, जिले के विजेताओं में से एक थे। वे एक व्‍यायामशाला चलाते थे। और लोगों को सिखाते थे कि भारतीय ढंग की फ्री स्टाइल कुश्‍ती कैसे लड़ी जाए। यह मुक्‍केबाजी की तुलना में अधिक मानवीय, अधिक कौशल पूर्ण और अधिक कला पूर्ण होती थी।
      यदि बच्‍चा किसी और का रहा होता तो उसने उससे कह दिया होता कि वहां बिलकुल मत जाओ, लेकिन यह आदमी उस प्रकार का नहीं था। उसने कहा: यदि वह कूद सकता है और तुम नहीं कूद सकते, तो यह मेरे लिए बदनामी की बात है। मैं तुम्‍हारे साथ आऊँगा, मैं वहां खड़ा हो जाऊँगा,और चिंता मत करना: जब वह कूदता है तुम भी कूद जाना।
      मुझे ऐसा खयाल जरा भी नहीं था कि मेरे पिता आने वाले है। जब में पहुंचा तो मैंने पिता-पुत्र और कुछ अन्‍या लोगों को देखा जो इसे देखने के लिए एकत्रित हो गए थे। मैंने उन पर एक नजर डाली और अनुमान लगा लिया कि मामला क्‍या है। मैंने उस लड़के से कहा: आज तुमको चिंता करने की आवश्‍यकता नहीं है—अपने पिता को छलांग मारने दो। वे एक महान पहल वाल है। और उनके लिए यह कोई समस्‍या नहीं होगी।
      उसके पिता ने मुझको देखा, क्‍योंकि वे तो बस अपने लड़के को हौसला बढ़ाने के लिए आए थे, जिससे वह कायर न बने। उन्‍होंने कहा: तो मुझको  कूदना पड़ेगा?
      मैंने कहा: जी हां, तैयार रहिए।
      उन्‍होंने नीचे देखा और वे बोले, मैं पहलवान हूं। ये चट्टानें और यह नदी...ओर तुमने कूदने के लिए एक स्‍थान पा लिया है। यहां पर तुम कूदने का अभ्‍यास करते रहे होओगे। कूदने की कोशिश करने वाले व्‍यक्‍ति का अपनी गर्दन या पैर या कुछ भी टूटने वाला है।
      मैंने कहा: आप कूदने के लिए अपने पुत्र को ले आए है।
      उन्‍होंने कहा: परिस्थिति को न जानने के कारण  मैं उसको ले आया हूं। मैंने सोचा कि यदि तुम कूद सकते हो तो वह भी कूद सकता है। उसी आयु का है वह भी। लेकिन यहां पर परिस्थिति को देखते हुए मैं चिंतित था और सोच रहा था कि यदि तुम आज यहाँ नहीं आते तो यह एक बड़ी बात हो जाती, क्‍योंकि यहाँ से कूद कर मेरा लड़का बच नहीं सकता था। लेकिन तुम चतुर हो, तुमने बस मेरे बेटे को अलग कर दिया ओर मुझको फंसा लिया। में प्रयास करूंगा।
      और वह घटना घट गई। वे पहलवान भी जो इतने साहसी थे—वे अपने जीवन भर प्रत्‍येक ढंग से लड़ते रहे थे...लेकिन छोर पर आकर अचानक अवरोध—क्‍योंकि वह ढाल ही इस प्रकार का था, कम से कम पचास फीट नीचे, नदी तीस फीट गहरी थी। और चट्टानें ऐसी थीं कि यह तुम्‍हारे नियंत्रण के बाहर कि तुम कहां जाकर गिरोगे, तुमको किस पत्‍थर से चोट लगेगी। और पहाड़ी के शिखर पर खड़े रहना...हवा इतना ताकतवर थी कि तुम बस मार ही डाले जाओगे।
      वे बस वहीं पर ठहर गए। और उन्‍होंने कहा: मुझको क्षमा करो। और उन्‍होंने अपने पुत्र से कहां: बेटा घर चलो। यह हमारा काम नहीं है। उसी को यह करने दो—शायद उसे कुछ विशेष बात पता हे।
      उस दिन मैनें अपने बारे में अनोखापन अनुभव किया: यह अवरोध मेरे लिए क्‍यों नहीं आता? और मैंने बहुत विचित्र स्‍थानों पर प्रयास किया।
      नदी पर स्‍वभावत: रेलवे पुल सबसे उच्‍च स्थान था। क्‍योंकि बरसात में नदी विस्‍तृत होकर इतनी विराट हो जाती है। कि पुल को सदैव इससे ऊपर रहना चाहिए, इसलिए उसे उच्‍चतम स्‍थान पर बनाया गया था। और पुल पर सदैव दो रक्षक पहरा देते थे। दो कारण थे पहला कि वहां से कूद कर कोई आत्‍म हत्‍या न कर ले, क्‍योंकि वह लोगों के लिए आत्‍म हत्‍या करने का स्‍थान था...वहां से नदी में गिर पड़ना ही पर्याप्‍त था। तुम कभी नदी में जीवत नहीं पहुंच सकते थे। बीच में कहीं तुम्‍हारी श्‍वास खो जाती। यह इतना ऊँचा था कि नीचे देखना ही तुम्‍हें घबड़ाने वाली अनुभूति देने के लिए पर्याप्त था।   
      और दूसरी बात, क्रांतिकारियों को भय था जो बम लगा रहे थे, पुल उड़ा रहे थे। ट्रेनें जला रहे थे। पुल को काट देना क्रांतिकारियों के लिए बहुत लाभदायक था, क्‍योंकि ये पुल प्रांत के दो भागों को जोड़ा करते थे। यदि पुल टूट जाता तो सेना न जा पाती, फिर क्रांतिकारी दूसरे भाग में जहां सेना को कोई मुख्‍यालय न था कुछ भी उपद्रव कर सकती थी। इसलिए ये रक्षक वहां चौबीस घंटे रहा करते थे। किंतु उन्‍होंने मुझको स्‍वीकार कर लिया था।
      मैंने उनको समझाया, मैं न तो आत्‍महत्‍या करना चाहता हूं, न ही मैं तुम्‍हारे पुल को उड़ाने आया हूं। वास्‍तव में चाहता हूं कि पुल की सुरक्षा सावधानी से होती रहे। क्योंकि यह मेरा स्‍थान है। यदि यह पुल न रहा तो मेरा कूदने का उच्चतम बिंदू नष्‍ट हो जाएगा।
      उन्‍होंने कहा: यह तुम्‍हारा अभ्‍यास है।
      मैने कहा: यह मेरा अभ्‍यास है। आप देख सकते है। और एक बार आपने देख लिया तो आप समझ जाएंगे कि मेरी अन्‍य कोई इच्‍छा नहीं है।
      उन्‍होंने कहा: ठीक है हम देखते है।
      मैंने कहा: लो मैं कूद कर दिखाता हूं। और मैं कूद गया और वे इस पर विश्‍वास न कर सके। जब मैं लोट कर वापस आया तो मैंने उनसे पूछा: क्‍या आप कोशिश करना चाहेंगे?
      उन्‍होंने कहा: नहीं,लेकिन तुम्‍हारे लिए यह सदा उपलब्‍ध है, तुम यहां किसी भी समय आ सकते हो। हमने तुमको बहुत सहजता से कूदते हुए देखा है, लेकिन हम नहीं कूद सकते—हमें पता है कि यहां से कूद कर लोग मर गए है।
      वह पुल मौत के पुल के नाम से जान जाता था। और आत्‍महत्‍या करने का वह सरलतम,सहजतम उपाय था। यदि तुमने मरने के लिए जहर भी खरीदा हो, तो कुछ घन तो व्‍यय होगा ही, लेकिन पुल से कूद कर यह बस सरल था। वहां पर नदी अधिकतम गहरी थी और वह तुमको बहा कर दूर ले जाता। किसी को तुम्‍हारी देह भी नहीं मिलती, क्‍योंकि कुछ मील के बाद यह और बड़ी नदी, एक विशाल नदी से मिल जाती थीं—और तुम सदा के लिए विदा हो जाते।
      उन दो रक्षकों के चेहरों पर भय देख कर,इस पहलवान में भय देख कर मैंने बस आश्चर्य करना आरंभ कर दिया, शायद मुझमें अवरोधक नहीं है। शायद उन अवरोधकों को होना चाहिए, क्‍योंकि वे रक्षा करते है। लेकिन जैसे-जैसे मैंने विकसित होना आरंभ किया—और मैं विकसित होता रहा हूं मैं विकसित होता रहा हूं,मैं बूढ़ा नहीं हो रहा था। अपने जन्‍म से मैं विकसित हुआ हूं, विकसित होता हूं, विकसित हो रहा हूं। ऐसा कभी मत सोचना कि मेरी आयु बढ़ रही हू। केवल मूढ़ों को आयु बढ़ती है। अन्‍य प्रत्‍येक का विकास होता है।
      जैसे-जैसे मैंने विकसित होना आरंभ किया और में विगत जीवन और मृत्‍यु के प्रति सजग होने लगा, और मुझे स्‍मरण हो आया कि मैं कितनी सरलता से मर गया था।  मेरी रूचि परमात्‍मा को नहीं बल्‍कि उत्‍साहपूर्वक उन ज्ञात से जिसको मैं देख चुका था। अधिक उस अज्ञात को जानते में थी जो आगे था।
      मैंने कभी पीछे लौट कर नहीं देखा। और मेरे सारे जीवन का यही ढंग है—पीछे न देखना। कोई सार न रहा अब। तुम वापस लौट नहीं सकते,तो क्‍यों समय नष्‍ट करना? मैं सदा आगे देखता रहा हूं। अपने उस जन्‍म की मृत्‍यु के समय भी मैं आगे ही देख रहा था।
--ओशो

शनिवार, 30 जनवरी 2010

परिशिष्ट प्रकरण—16

तैरना एक युक्‍ति है
      मेरे गांव में एक बहुत सुंदर वृद्ध भले व्‍यक्‍ति थे। उनको प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति प्रेम करता था। वे बहुत सरल और बहुत भोले थे, यद्यपि वे अस्‍सी वर्ष के ऊपर के थे। और मेरे गांव के साथ में ही एक नदी बहा करती थी। उन्‍होंने उस नदी में अपना स्‍वयं को एक स्‍थान बना रखा था,  जहां पर वे अपना स्‍नान किया करते थे। गांव में जहां तक कोई भी स्मरण कर पाता था उन्‍हें सदैव उनको वर्षो से प्रतिदिन वहीं पर देखा था। भले ही वर्षा हो, गर्मी हो या शीत ऋतु , इससे कोई अंतर नहीं आत था। भले ही वे अस्‍वस्‍थ हो या स्‍वस्‍थ , जरा भी भेद नहीं पड़ता था। वे प्रात: ठीक पाँच बजे अपने स्‍थान पर होते। और वह नदी का र्स्‍वाधिक गहरा स्‍थान था। इसलिए सामान्‍य: वहां कोई नहीं जाया करता था। और वह स्‍थान गांव से काफी दूर भी था।
      लोग नदी पर जाया करते थे, वह मेरे घर से कोई आधा फर्लांग दूर थी—वह स्‍थान कोई दो मील दूर था। और जैसे कि हमारे यहां पहाड़ियां नदी को घेरे हुए है। तुमको एक पहाड़ पार करना पड़ता है, फिर एक और पहाड़, फिर एक और पहाड़ पर करना पड़ता है, तब तुम उस स्‍थान पर पहुंच सकोगे। लेकिन यह बहुत सुंदर स्थान था। जैसे ही मुझको इसके बारे में पता लगा मैंने वहां जाना आरंभ कर दिया। और हम तुरंत ही मित्र बन गए। क्‍योंकि.....तुम मुझको जानते हो कि मैं किस प्रकार का व्‍यक्‍ति हुं। यदि वे वहां प्रात: पाँच बजे पहुंचते थे तो मैं वहां तीन बजे पहुंच जाता था। एक दिन, दो दिन, तीन दिन ऐसा हुआ। फिर उन्‍होंने कहा: मामला क्‍या है? क्‍या तुमने मुझको हराने की ठान ली है।  
      मैंने कहा: नहीं, यह बात नहीं है,लेकिन मैं यहां तीन बजे ही पहुंचने वाला हुं। जिस तरह आपने पाँच बजे यहां पहुंचने का निर्णय ले रखा है।
      उन्‍होंने कहा: क्‍या तुम जानते हो कि तैरा कैसे जाए?
      मैंने कहा: मुझे नहीं पता, लेकिन आप चिंता न करें। यदि दूसरे लोग तैर सकते है तो मैं भी तैर सकता हूं। यदि आप तैर सकते है तब इसमें समस्‍या ही क्‍या है? एक बात निश्‍चित है, यदि यह मानव के लिए संभव हो तो यह पर्याप्त है। अधिक से अधिक मैं डूब सकता हूं—तो क्‍या? एक दिन तो प्रत्‍येक को मरना ही है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।
      उन्‍होंने कहा: तुम खतरनाक हो। मैं तुम्‍हें सिखाऊंगा कि कैसे तैरा जाए।
      मैंने कहा: नहीं। मैंने उनसे कहां: आप बस यहां बैठे रहे और मैं कूद जाऊँगा। यदि मैं मर रहा होऊं तो मुझको बचाने का प्रयास मत करें, भले ही मैं चिल्‍ला कर आपको आवज दूँ। आप उसे सुनिए गा मत।
      उन्‍होंने कहा: किस प्रकार के बच्‍चे हो तुम। तुम चिल्‍ला रहे होओगे: मुझे बचाओ ओ मुझको तुम्‍हें नहीं बचाना है।
      मैंने कहा: जी हां,में नहीं चिल्‍लाऊंगा। मैं इस बात को पूरी तरह से निशचित ही कर रहा हूं। संभवत: जिस समय मैं डूब रहा होऊं, या मर रहा होऊं या पानी मेरे नाक में और मुंह मैं घुस रहा हो, मैं  चिल्‍लाना आरंभ कर सकता हूं, मुझे बच्‍चाओं। लेकिन मैं स्‍पष्‍ट कह देता हूं: मैं किसी भी हालत में किसी के द्वारा बचाया जाना नहीं चाहता। या तो मैं जान से जाऊँगा कि तैरना क्‍या है या मैं यह जान लुंगा कि तैरना मेरे लिए नहीं है, इसे त्‍याग दूँगा।
      और इससे पहले कि वे मुझे रोके सकें, मैने नदी में छलांग लगा दी। निश्चित रूप से मुझे दो या तीन बार पानी में डुबकी खानी पड़ी। और वे वहां प्रतीक्षा में खड़े हुए थे, जिससे कि यदि में उनको पुकारें....लेकिन मैंने बस अपना हाथ इनकार में हिलाया,बचाने के लिए पुकारने वाला नहीं हुं। तीन या चार बार मैं नीचे डूबा,ऊपर आया,अपने हाथ इधर-उधर फेंके, लेकिन मुझे कोई खयाल ही नहीं कि कैसे तैरा जाये। लेकिन तुम कर क्‍या सकते हो, जब तुम डूब रहे होते हो तो तुम वह प्रत्‍येक संभव कार्य करते हो जो तुम कर सकते हो। और पाँच मिनटों के भीतर ही मैंने तैरने की युक्‍ति जान ली।
      और मैं वापस लौटा और मैंने उनसे कहा: आप मुझे यह सिखाने का आमंत्रण दे रहे थे—जिसे मैं पाँच मिनट में सीख गया। मुझे खतरों उठाना था, और यह तथ्‍य स्‍वीकार करना था: अधिक से अधिक इसका अर्थ है मृत्‍यु।
      तैरना एक युक्‍ति है, यह कोई कला नहीं है जिसे किसी व्‍यक्‍ति को सीखना पड़े। तुमको बस पानी में फेंका भर जाना है। तुम अपने हाथों से छप-छप करोगे और तुम्‍हें अपने हाथ और अपने पैर इधर-उधर फेंकना ही पड़ेंगे। और शीध्र ही तुम पाओगें कि यदि तुम अपने हाथ और पैर एक लयबद्ध ढंग से, सम क्रमिकता में चलाते रहोगे तो पानी स्‍वयं तुम्‍हें ऊपर बनाए रखता है।
      मैंने उन वृद्ध सज्‍जन से कहा: मैंने लाशों को नदी में बहते हुए देखा है। जब एक मुर्दा आदमी तैर सकता है, तो क्‍या आपको मुझसे कहने का यह अर्थ है कि मैं जिंदा हूं और मैं तैर नहीं सकता। मृत व्‍यक्‍ति भी तैरने की यह कला जानता है।
      वर्षा काल में जब नदी में बाढ़ आती थी, ऐसा अनेक बार हो जाता कि पूरे के पूरे गांव नदी में समा जाते—अनेक लोग,पानी में आदमियों की लाशें,जानवरों की लाशें बहती हुई दिखती। इसलिए मैंने कहा: मुर्दा लोग भी तेजी से बहते पानी में डूबते नहीं तैरते चले जाते है। और मैं जीवित हूं इसलिए मुझको इसे अपने आप से सीख लेने का एक अवसर मिलने दो, क्‍योंकि मेरी अनुभूति यह है कि यह केवल एक युक्‍ति है, इससे कौन सी कला हो सकती है। यह कोई शिल्‍पकला नहीं है या कोई ऐसी कठिन कला नहीं है जिसे समझा जाए। जो मुझे दिख पड़ता है वह मामला कुल इतना है कि लोग अपने हाथ चला रहे है—इसलिए मैं भी अपने हाथ चला सकता हूं।
--ओशो

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

परिशिष्ट प्रकरण—15

पहली सतोरी नदी तीर
      पने बचपन के दिनों में मैं प्रात: काल जल्‍दी नदी पर जाया करता था। यह एक छोटा सा गांव का। नदी बहुत अधिक सुस्‍त थी। जैसे कि यह जरा भी प्रवाहित न हो रही हो। प्रति: काल जब सूर्योदय न हुआ हो। तुम देख ही नहीं सकते कि नदी प्रवाहित हो रही है या नहीं,यह इतनी मंद और शांत हुआ करती थी। और प्रात: काल मैं जब वहां कोई न हो,स्‍नान करने वाले अभी तक न आए हों।  वह आत्‍यंतिक रूप से शांत रहती थी। प्रात: काल जब पक्षी भी अभी गा रहे हो—ऊषा पूर्व, कोई ध्‍वनि नहीं, बस एक सन्‍नाटा व्‍याप्‍त रहता है। और नदी पर इधर से उधर तक आम के वृक्षों के सुगंध फैली रहती है।
      मैं नदी के दूरस्‍थ कोने तक बस बैठने के लिए,बस वहां होने के लिए जाया करता था। कुछ करने की अवश्‍यकता नहीं थी, वहां होना ही पर्याप्‍त था; वहां होना ही इतना सुंदर अनुभव था। मैं स्‍नान कर लेता, मैं तैर लेता और जब सूर्य उदय होता तो मैं दूसरे किनारे पर रेत के विराट विस्‍तार में चला जाता और वहां घुप में स्‍वय को सुखाता और वहां लेटा रहता। और जब कभी-कभी सो भी जाता।
      जब मैं लौट कर आता,तो मेरी मां पूछा करती, सुबह के पूरे समय तुम क्‍या करते हो?
      मैं कहता: कुछ भी नहीं,क्‍योंकि वास्‍तव में मैं कुछ भी नहीं करता था।
      और वे कहती: यह कैसे संभव है कि तुम कुछ नहीं कर रहे थे। तुम अवश्‍य ही कुछ न कुछ कर रहे होओगे। और वे सही थीं, और में भी गलत नहीं था।
      मैं कुछ भी नहीं कर रहा था। मैं बस नदी के साथ था। बिना कुछ करते हुए बातों को घटने दे रहा था। यदि तैरना भीतर से आता....याद रखें, यदि तैरना भीतर से आता, तो मैं तैरता,लेकिन यह मेरी और से कोई क्रिया नहीं थी। मैं कुछ कर नहीं रहा था। यदि मुझको सोने जैसा लगता तो मैं सो जाता। घटनाएं घट रही थी। लेकिन कोई कर्ता नहीं था। और सतोरी का पहला अनुभव नदी के किनारे से ही आरंभ हुआ था। मात्र वहां रहने से ही, लाखों चीजें घटित हो गई।
      लेकिन वे जोर देकर पूछती,तुम अवश्‍य ही कुछ कर रहे होओगे।
      तब मैं कहता,ठीक है, मैंने स्‍नान किया और मैंने स्‍वयं को धूप में सुखाया, और तब वे संतुष्‍ट हो जातीं। लेकिन मैं संतुष्‍ट न होता—क्‍योंकि वहां नदी पर जो कुछ भी घटित हुआ था उसे शब्‍दों से अभिव्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता है। मैंने स्‍नान कर लिया। कितना कमजोर और असमर्थ प्रतीत होता है। नदी के साथ खेलते रहना, नदी पर बहते जाना नदी में तैरना, यह इतना गहन अनुभव था बस यह कह देना: मैंने स्‍नान किया है, इससे कोई अर्थ नहीं निकलता। बस इतना भर कह देना: मैं वहां गया, तट पर टेहला,वहां बैठा कुछ भी नहीं बताता।

ओशो

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

परिशिष्ट प्रकरण—14

बोतल का रहस्‍य

      मेरे पिता, जब वे किस समारोह में, किसी विवाह में, किसी जन्‍म-दिवस की दावत में या कहीं और जा रहे होते,तो मुझको साथ ले जाया करते थे। वे मुझे इस शर्त पर ले जाते थे। कि मैं बिलकुल खामोश रहूंगा, अन्‍यथा तुम कृपया घर में ही रहो।
       मैं कहता: लेकिन क्‍यों? मेरे अतिरिक्‍त प्रत्‍येक व्‍यक्ति को बोलने की अनुमति है।
      वे कहते, तुम जानते हो, मैं जानता हूं,और प्रत्‍येक जानता है। कि तुमको बोलने की अनुमति क्‍यों नहीं है—क्‍योंकि तुम एक उपद्रव हो।
      लेकिन, मैं कहता, उन बातों में जितना संबंध मुझसे है आप वचन दें कि आप मेरे मामलों में हस्‍तक्षेप नहीं करेंगे, और मैं बचन देता हूं कि में खामोश रहूंगा।  
      और अनेक बार ऐसा हो गया कि उनको हस्‍तक्षेप करना पडा। उदाहरण के लिए, यदि काई बड़ी उम्र का व्‍यक्‍ति मिल गया—कोई दूर का सबंधी, परंतु भारत में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है—मेरे पिता उसके चरणस्‍पर्श करते और मुझसे कहते,उनके पैर छुओ।
      मैं कहता: आप मेरे मामले में हस्‍तक्षेप कर रहे है। और हमारा समझौता समाप्‍त। मैं इन बुजुर्ग व्‍यक्‍ति के चरण‍ क्‍यों स्पर्श करूं? उनका मस्‍तक स्‍पर्श क्‍यों न करूं, यदि आप उनके चरणस्‍पर्श करना चाहते है तो उनको दुबारा, तिबारा स्‍पर्श कर सकते है। मैं हस्‍तक्षेप नहीं करूंगा। लेकिन मैं चरण क्‍यों स्‍पर्श क्‍यों करूं?
      और इतना उपद्रव पर्याप्त था। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति मुझको समझता कि वे बूढे है। मैं कहता मैंने अनेक बूढे लोगों को देखा है। मेरे मकान के ठीक सामने एक बूढा हाथी है, मैं कभी उसके पैर नहीं छूता। वह हाथी एक पुजारी का है, वह बहुत बूढ़ा हाथी है, मैंने कभी उसके पैर नहीं छुए। और वह समझदार है—मैं सोचता हूं कि इन सज्‍जन से अधिक समझदार है।
      मात्र बूढ़ा हो जाना उनको कोई गुणवता प्रदान नहीं कर देता। मूर्ख सदा मूर्ख रहता है—शायद जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ेगी वह और मूर्ख हो जाएगा। क्‍योंकि तूम वैसे ही बने रहते हो। तुम और विकसित होते चले जाते हो। और मूढ़ जब अधिक आयु का हो जाता है....तो उसकी मूढ़ता बहुगुणित हो जाती है। और यही वह समय है जब वह अति आदरणीय हो जाता है। मैं इन बूढे सज्‍जन के चरणस्‍पर्श नहीं करने जा रहा हूं। जब तक कि यह सिद्ध न कर दिया जाए कि मैं ऐसा क्‍यों करूं?
      एक बार मैं एक अंतिम संस्‍कार में गया; मेरे एक शिक्षक का देहांत हो गया था। वे मेरे संस्‍कृत के शिक्षक थे—बहुत स्‍थूलकाय, दिखने में हास्‍यास्‍पद, जिस तरह के वस्‍त्र पुराने ब्राह्मण, पुरातन काल के बाह्रम्‍ण पहना करते थे। वैसे हास्य पद वस्‍त्र वे बड़ी पगड़ी के साथ पहना करते थे। सारे विद्यालय के लिए वे हंसी का कारण थे। लेकिन वे बहुत सीधे-सादे भी थे। सीधे-सादे व्‍यक्‍ति को हिंदी में भोले कहते है, इस लिए हम लोग उनको भोले कहा कहते थे। जैसे ही वे कक्षा में प्रवेश करते, पूरी कक्षा जोर से उद्घोष करती, जय भोले। भोले जिंदा बाद। और निस्‍संदेह वे पूरी कक्षा को दंडित नहीं कर सकते थे। अन्‍यथा वे किस भांति पढ़ाते,किसको पढ़ाते।
      उनका देहावसान हो गया। इसलिए स्‍वभावत: यह सोचते हुए कि वे मेरे शिक्षक थे—मेरे पिता ने मुझ से समझौते कि बात नहीं की। लेकिन मैं समझौते का पालन न कर सका। क्‍योंकि वहां जो घटित हो गया उसकी मैंने अपेक्षा नहीं की थी—किसी ने उसकी अपेक्षा नहीं की थी। जब हम वहां पहुंचे तो उनका मृत शरीर वहां रखा हुआ था। उनकी पत्‍नी दौड़ती हुई बाहर आई और उनके उपर गिर पड़ी और बोली, हाए मेरे भोले। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति खामोश खड़ा था। लेकिन मैं नहीं। मैंने शांत रहने का भरसक प्रयत्‍न किया, लेकिन मैंने जितना अधिक प्रयास किया वह उतना ही कठिन होता चला गया। मैं ठहाका मार कर हंस पडा और मैंने कहा, यह तो कमाल हो गया।
      मेरे पिता ने कहा: मैंने यह सोच कर कि वे तुम्‍हारे शिक्षक थे और तुम सम्‍मानपूर्ण रहोगे, तुमने चलने से पहले समझोता कि बात नहीं की थी।
      मैंने कहा: मैं उनके प्रति असम्‍मान पूर्ण नही हूं। लेकिन मैं उस संयोग से आवक रह गया हूं। भोले उनका उपनाम था और वे उससे क्रोधित हो उठते थे। अब वे बेचारे मर चुके है। और उनकी पत्‍नी उनको भोले कह कर पुकार रही है। और अब वे कुछ कर भी नहीं सकते। मुझे बस उनके लिए अफसोस हो रहा है।
      मैं अपने पिता के साथ जहां कहीं भी जाता वे हमेशा समझौता करके जाया करते, लेकिन सदैव इसे भंग करनेवाले पहले पक्ष वे ही हुआ करते। क्‍योंकि कोई घटना या कुछ ऐसा हो जाता और उनको कुछ कह देना पड़ता। और उतना पर्याप्‍त होता,क्‍योंकि वही शर्त थी की उनको मेरे मामले में हस्‍तक्षेप नहीं करना था।
      नगर में एक जैन साधु आए हुए थे। जैन साधु ऊंचे आसन पर बैठते है जिससे कि खड़े होकर भी तुम अपने सिर से उनके चरणस्‍पर्श कर सको...कम से कम पाँच फुट, छह फुट ऊंचे आसन, और वे उन पर बैठते है। जैन साधु एक समूह में चलते है, उनको अकेले आवागमन की अनुमति नहीं है। पाँच जैन साधुओं को एक साथ चलना चाहिए। यह प्रयास न कर सके—जब तक के वह सभी षडयंत्र न कर लें। और मैंने उनको षडयंत्र करते और कोकाकोला प्राप्‍त  करते हुए देख लिया था। इसीलिए मुझे यह घटना याद है।
      उनको रात में पानी तक पीने कि अनुमति नहीं है। और मैंने रात में कोक कोला पीते हुए देखा है। वास्‍तव में दिन में कोको कोला पीना खतरनाक था। क्‍योंकि यदि कोई देख ले तो, इसलिए केवल रात में केवल....मैं स्‍वयं ही लेकर गया था, इसलिए इसके बारे में कोई समस्‍या नहीं थी। उनके लिए और कौन लेकिन आता? कोई जैन ऐसा करने को तैयार नहीं होता, लेकिन वे मुझको जानते थे। और वे जानते थे कि कोई भी दुस्साहसी कार्य हो और मैं उसे करने को तैयार रहूंगा।
      तो वहां पर पाँच आसन बने हुए थे। लेकिन एक साधु बीमार था, इसलिए जब मैं अपने पिता के साथ वहां गया तो मैं पांचवें आसन पर चला गया आरे उस पर बैठ गया। मैं अब भी अपने पिता को , और जिस ढंग से उन्‍होंने मुझको देखा था, याद कर सकता हूं.....उनको बोलने के लिए शब्‍द तक नहीं मिल सके; वे बोले, तुमसे क्‍या कहा जाए। और वे मेरे क्रियाकलाप में हस्‍तक्षेप नहीं कर सकें, क्‍योंकि मैंने किसी के साथ‍ कुछ गलत नहीं किया था। बस एक मंच पर, लकड़ी के मंच पर बैठ कर मैं किसी व्‍यक्‍ति या किसी चीज को आहत नहीं कर रहा था। वे मेरे पास आए और उन्‍होंने कहा,ऐसा प्रतीत होता है कि समझौता हो या समझौता न हो तुम करने वाले हो जो तुम करना चाहते हो, इसलिए अब से आगे हम लोग समझौता नहीं करेंगे, क्‍योंकि यह नितांत अनावश्‍यक है।      
      मैंने उस साधु से कहा: आप दो बार सोचें फिर कुछ बोले। बोतल को याद कर लें।–क्‍योंकि उनको कोकाकोला मैंने ही लाकर दिया था।
      उन्‍होंने कहा: हां, यह ठीक है, हमें बोतल याद है। तुम कृपया इस मंच पर जितनी देर बैठना चाहो उतनी देर बैठ सकते हो।  
      मेरे पिता ने कहा: बोतल क्‍या?
      उन्‍होंने कहा: यह पूरी तरह से संतुष्‍ट है। तुम यहां बैठ सकते हो, कोई हानि नहीं है। लेकिन कृपया बोतल के बारे में चुप रहो।
      अब वहां बहुत से लोग उपस्‍थित थे, और वे सभी उत्‍सुक हो उठे....कौन सी बोतल? जब मंदिर से बाहर निकला तो प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति मेरे चारों और एकत्रित हो गया, उन सभी ने कहा: क्‍या है यह बोतल?
      मैंने कहा: यह एक रहस्‍य है। और इन मूर्खों के ऊपर जिनके आप लोग चरणस्‍पर्श करते है। यहीं मेरी शक्‍ति है। यदि मैं चाहूं तो मैं उन लोगों से यह भी कह सकता हूं कि मेरे चरणस्‍पर्श करें, अन्‍यथा बोतल.....ये मूढ़ लोग है।
      रास्‍ते में मेरे पिता ले मुझसे पूछा: तुम बस मुझको बता दो। मैं किसी को भी नहीं बताऊंगा: क्‍या है यह बोतल? क्‍या वे शराब पीते है?
      मैंने कहा: नहीं। अभी मामला इतना नहीं बिगड़ा है, लेकिन यदि वे यहां कुछ दिन और रुके रहे तो मैं उसकी व्‍यवस्‍था भी कर दूँगा। मैं उनको शराब पीने के लिए बाध्‍य कर दूँगा....वरना मैं बोतल का नाम बता दूँगा।
      सारा नगर बोतल के बारे में चर्चा कर रहा था। बोतल का मामला क्‍या है। और वे क्‍यों भय भीत हो गए थे। हमने तो हमेशा सोचा था कि ये लोग कितने आध्‍यात्‍मिक संत है। और इस लड़के ने उनको भयभीत कर दिया। और वे सभी सहमत हो गए थे। कि लड़का वहां मंच पर बैठ सकता है। जो कि शास्‍त्रों के विरूद्ध है। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति मेरे पीछे पडा था वे मुझे रिश्‍वत खिलाने को भी तैयार थे। चाहे जो कुछ भी मांग लो हमे बोतल का राज बात दो—इस बोतल की क्‍या कहानी है।
      मैंने कहा: यह एक रहस्‍य बड़ा रहस्‍य है। और मैं आप लोगों को इसके बारे में कुछ भी नहीं बताऊंगा। आप वहां क्‍यों जाते और अपने साधुओं से क्‍यों नहीं पूछते कि बोतल क्‍या है? मैं भी वहां रह सकता हूं जिससे वे झूठ न बोल सकें—और तब आप जान लेंगे कि  आप किस तरह के लोगों की पूजा करते है।
--ओशो

परिशिष्ट प्रकरण—13

पूर्णत: मुक्‍ति

      मेरे पड़ोस में एक मंदिर था, कृष्‍ण का मंदिर, मेरे मकान से कुछ ही मकान आगे। मंदिर सड़क के दूसरी और था, मेरा मकान सड़क के इस और था। मंदिर के सामने वे सज्‍जन रहा करते थे जिन्‍होंने यह मंदिर बनवाया था। वे बहुत बड़े भक्‍त थे।
      वह मंदिर कृष्‍ण के बाल-रूप का था। क्‍योंकि जब कृष्‍ण युवा हो गए तो उन्‍होंने अनेक उपद्रव ओर ऐसे अनेक प्रश्‍न निर्मित कर दिए,इसलिए ऐसे अनेक लोग हैं जो कृष्‍ण को बाल रूप में पूजते है—इसलिए उस मंदिर  को बालाजी का मंदिर कहा जाता है।
      बालाजी का यह मंदिर उन सज्‍जन के घर के ठीक सामने था जिन्‍होंने इसको बनवाया था। उस मंदिर के और उन सज्‍जन की भक्ति, लगातार चलने वाली भक्‍ति के कारण...वे स्‍नान करते—मंदिर के ठीक सामने एक कुआं था। वहां वे अपना पहला कार्य करते—स्‍नान। फिर वे घंटों अपनी प्रार्थना किया करते; और उनको बहुत धार्मिक समझा जाता था। धीरे-धीरे लोगों ने उनको बालाजी कहना आरंभ कर दिया। यह नाम मेरी स्‍मृति में इस भांति बस गया है कि मुझे स्‍वयं भी उनका असली नाम याद नहीं पड़ता। क्‍योंकि जब तक मुझे मालूम हो पाता कि वे है। तब मैने उनका नाम बालाजी ही सुना था। किंतु यह उनका वास्‍तविक नाम नहीं हो सकता था। यह नाम इस लिए पड़ गया होगा क्‍योंकि उन्‍होंने बालाजी को मंदिर बनवाया था।
      मैं उस मंदिर मैं जाया करता था। क्‍योंकि वह मंदिर बहुत सुंदर और बहुत शांत था। सिवाय इन बालाजी के जो वहां एक सतत उपद्रव थे। और कई घंटों तक—वे धनवान व्‍यक्ति थे,
इसलिए उनको समय की चिंता करने की आवश्‍यकता नहीं थी—तीन घंटे सुबह,तीन घंटे शाम को वे मंदिर के भगवान को सता रहे थे। वहां कोई नहीं जाया करता था। हालांकि यह मंदिर इतना सुंदर था कि वहां अनेक लोग गए होते। वे कुछ और दूर स्‍थित मंदिर में जाया करते थे। क्‍योंकि ये बालाजी ही बहुत अधिक थे। और उनका शोरगुल, इसको शोरगुल ही कहा जा सकता था। यह संगीत न था—उनका गायन इस भाति का था कि यह तुम्‍हें तुम्‍हारे सारे जीवन के लिए गायन को शत्रु बना देता।
      लेकिन मैं वहां जाया करता था, और हमारी मित्रता हो गई। वे वृद्ध व्‍यक्‍ति थे। मैंने कहा: बालाजी, तीन घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को आप क्‍या मांग रहे है? और हर रोज, और उसने आपको अभी तक कुछ दिया नहीं?
      उन्‍होंने कहा: मैं सांसारिक वस्‍तुएं नहीं मांग रहा हूं, मैं अध्‍यात्‍मिक चीजें मांगता हूं। और यह कोई एक दिन का मामला नहीं है। तुम्‍हें अपने सारे जीवन प्रार्थना में लगे रहना पड़ता है और मोत के बाद यह सब दे दिया जाएगा। लेकिन यह निशिचत है कि वह चीजें दी जाएंगी: मैंने मंदिर बनवाया है, मैं प्रभु की सेवा करता हूं। प्रार्थना करता हूं, तुम देख सकते हो कि सर्दी तक में भीगे वस्‍त्रों में भी....भक्‍ति की विशिष्‍ट गुणवता समझी जाती है; भीगे हुए वस्‍त्रों में कंपकंपाना। मेरा अपना खयाल है कि ठिठुरते हुए गीत गाना सरल हो जाता है। तुम कंपकंपाना भूलने के लिए चिल्‍लाने लगते हो।
      मैंने कहा: इसके बारे में मेरा खयाल अलग है, लेकिन मैं आपको बताऊंगा नहीं। बस एक बात मैं बताना चाहता हूं। क्‍योंकि मेरे दादा कहे चले जाते है, ये लोग केवल कायर होते है: ये बालाजी कायर  है। वह दिन के छह घंटे व्‍यर्थ कर रहे है। और इतना छोटा जीवन है यह, और वे कायर है।
      उन्‍होंने कहा: तुम्‍हारे दादा ने कहा कि मैं कायर हूं?
      मैंने कहा: मैं उनको लेकर आ रहा हूं।
      उन्‍होंने कहा: नहीं, उनको मंदिर में मत लेकर आना, क्‍योंकि यह एक बेकार की झंझट होगी—लेकिन मैं कायर नहीं हूं।
      उस मंदिर के पीछे वह मैदान था जिसे भारत में अखाड़ा कहा जाता है। जहां लोग कुश्‍ती करते है, सीखते है। व्‍यायाम करते है। और भारतीय ढंग की कुश्‍ती लड़ते है। मैं वहां जाया करता था—वह मंदिर के ठीक पीछे मंदिर के साथ में ही था—इसलिए वहां के सभी पहलवान मेरे मित्र थे। मैंने उनमें तीन से कहा: आज की रात तुमको मेरी सहायता करनी पड़ेगी।
      उन्‍होंने कहा: किया क्‍या जाना है?  
      मैंने कहा: हमें बालाजी की खाट उठानी है। वे अपने घर के बाहर सोते है, हमें बस उनकी खाट उठा कर लानी है और उस कुएं के उपर रख देनी है।
      उन्‍होंने कहा: अगर वे खाट से कूद पड़ते है या कुछ हो जाता है। तो वे कुएं के भीतर गिर सकते है।
      मैंने कहा: चिंता मत करो,कुआं इतना गहरा नहीं है। मैं कई बार उसके भीतर कूद चूका हूं—यह इतना गहरा भी नहीं है, न ही इतना खतरनाक है। और जहां तक मुझको पता है, बालाजी कूदने वाले भी नहीं है। वे खाट से चिल्‍लाएंगे,खाट पर बैठे रहेंगे, वे अपने बालाजी को पुकारेंगे—मुझे बचाओ।
      कठिनाई से मैं तीन लोगों को राज़ी कर पाया: तुमको इससे कुछ लेना-देना नहीं है। अकेला मैं उनकी खाट उठा कर नहीं ले जा सकता था। और मैं तुम लोगों से इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि तुम सभी ताकतवर लोग हो। यदि वे रास्‍ते के बीच में ही जग जाते है तो कुएं तक पहुंच पाना कठिन हो जाएगा। मैं तुम लोगों की प्रतीक्षा करूंगा। वे नौ बजे सोने चले जाते है। दस बजे तक सड़कें खाली हो जाती है। और ग्‍यारह बजे का समय ठीक है, मौका नहीं गवाना है। ग्‍यारह बजे हम उन को ले जा सकते है।
      केवल दो लोग पहुंचे; एक नहीं आया, इसलिए हम केवल तीन थे। मैंने कहा: कठिन है यह काम। अब खाट का एक हिस्‍सा....ओर अगर बालाजी जाग गये...... मैंने कहा: जरा ठहरो,मुझको अपने दादाजी को बुलाना पड़ेगा।
      और मैंने अपने दादा जी से कहा: यह काम है जो हम करने जा रहे है। आपको हमारी थोड़ी सह सहायता करनी होगी।
      उन्‍हेांने कहा: यह कुछ कठिन है। अपने स्‍वयं के दादा से इस बेचारे के साथ ये करने को कहना, जो किसी को हानि नहीं पहुँचाता है, सिवाय इसके कि यह रोज छह घंटे चीखता-चिल्‍लाता है......हमें इसकी आदत पड़ गई है।
      मैंने कहा: मैं इस बारे में बहस करने नहीं आया हूं। आप बस आ जाएं। आपका यह सहयोग मुझ पर ऋण रहेगा। और किसी भी समय जो कुछ भी आप चाहें आप कह भर दें और में वहीं कर दूँगा। लेकिन इस कार्य के लिए आपको आना पड़ेगा। और यह कोई बड़ा काम नहीं है। बस बारह फुट की सड़क पर करनी है, वह भी बालाजी को बीना जगाए।
      तो वे आ गए। यही कारण है कि मैं कहता हूं, वे बहुत दुर्लभ व्‍यक्‍ति थे—वे उस समय पचहतर वर्ष के थे। वे आ गए। उन्‍होंने कहा: ठीक है, हमें यह अनुभव कर लेने दो और देखने दो क्या होता है।   
      उन दो पहलवानों ने मेरे दादा को देख कर भागना आरंभ कर दिया। मैंने कहा: ठहरो, तुम लोग कहां भागे जा रहे हो।
      उन्‍होंने कहा: तुम्हारे दादा आ रहे है।     
      मैंने कहा: मैं ही बुला कर ला रहा हूं। वे है चौथे व्‍यक्‍ति। यदि तुम भाग जाते हो तो मेरा काम और अटक जाएगा। मेरे दादा और मैं यह काम नहीं कर पाएंगे। हम बालाजी को उठा तो सकते है, लेकिन वे जाग जाएंगे। तुमको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।      
      उन्‍होंने कहा: क्‍या तुमको अपने दादाजी पर भरोसा है? क्‍योंकि वे भी करीब-करीब उतनी ही उम्र के है: हो सकता है दोनों आपस में मित्र भी हों, और कोई दिक्‍कत पैदा हो जाए वे हमारी पोल खोल दे।
      मैंने कहा: मैं भी इसमे शामिल हूं, वे मेरे लिए कोई परेशानी पैदा नहीं करेंगे,इसलिए तुम लोग भयभीत मत होओ,तूम किसी झंझट में नहीं फंसोगे। और वैसे भी वे तुम्‍हारा नाम और तुम्‍हारे बोर में कुछ नहीं जानते।
      हमने बालाजी की चारपाई को उठाया और उनकी चारपाई को उनके छोटे से कुएं के ऊपर रख दिया। वहां पर वे केवल स्‍नान करते थे।  और कभी-कभी मैं उसमें कूद जाता था। जिसके वे बहुत विरोध में थे। लेकिन तुम कर भी क्‍या सकते हो। एक बार में उसके भीतर कूद चुका होता, उनको मुझे बहार निकालने का उपक्रम करना पड़ता था। मैं कहता: अब आप क्‍या कर सकते है। एकमात्र काम यही है कि मुझे बाहर निकाला जाए। और यदि आप मुझे तंग करेंगे तो मैं प्रतिदिन इसमें कुदा करूंगा। और यदि आपने इसके बारे में मेरे परिवार को बता दिया तो आप जानते है कि मैं इसमें कूदने के लिए मित्रों को लेकर आना शुरू कर दूँगा। इसलिए इस समय इस रहस्‍य को हमारे बीच ही रहने दो। आप बाहर स्‍नान करे लें, मैं भीतर स्‍नान कर लेता हूं। इसमें कोई हानि नहीं होगी।
      यह बहुत छोटा से कुआं था। इसलिए खाट उस पर पूरी तरह से बिछ गई। फिर मैंने अपने दादा जी से कहा: आप दूर चले जाए, क्‍योंकि आप पकड़े गए तो सारा नगर यह सोचेगा कि आपने तो हद कर डाली है।
      और तब कुछ दूरी से हमने उनको जगाने के लिए कंकर फेंकना शुरू किए....क्‍योंकि यदि वे सारी रात सोते रहते, जागते नहीं तो वे करवट ले सकते थे और कुएं में गिर सकते थे। या और कोई दुर्धटना भी हो सकती थी। जिस क्षण वे जागे उन्‍होंने इस तरह चीख मारी कि....। हमने उनकी आवाज सुन रखी थी, लेकिन यह चीख...। सारे पड़ोसी इक्कठा हो गए। वे अपनी चारपाई पर बैठे थे। और उन्‍होंने कहा: किसने किया है यह? वे घबराए हुए थे और डरे हुए थे और थर-थर कांप रहे थे।
      लोगों ने कहा: कम से कम खाट से उतर तो आइए, फिर खोजना कि क्‍या हुआ है।
      मैं भीड़ में खड़ा हुआ था और मैं बोला: क्‍या बात है? आप कम से कम अपने बालाजी को तो पुकार सकते थे। लेकिन आपने उनको नहीं पुकार, आपने चीख मारी और आप बालाजी के बारे में सब कुछ भूल गए। आपने जीवन भी प्रतिदिन का छह घंटे का प्रशिक्षण कहां चला गया.....।      
      उनहोंने मुझको देखा और बोले: क्‍या यह भी कोई रहस्‍य कि बात है।   
      मैंने कहा: अब आप को दो रहस्‍य सम्‍हाल कर रखने पड़ेंगे। एक आप कई वर्षो से छिपाए हुए है। अब यह दूसरा रहस्‍य है।
      लेकिन उस दिन से उन्‍होंने मंदिर में तीन घंटे का चिल्‍लाना छोड़ दिया। मैं हैरान रह गया। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अचंभित था। उन्‍होंने कुएं में स्‍नान करना बंद कर दिया और प्रत्‍येक संध्या और प्रात: आकर थोड़ी सी पूजा-अर्चना करने लगे, बस और कुछ नहीं।
      मैंने उनसे कहा: बालाजी क्‍या हो गया?
      उन्‍होंने कहा: मैंने तुमसे झूठ कहा था कि मैं भयभीत नहीं हूं। लेकिन उस रात कुएं के ऊपर जाग पड़ना। अचानक निकली वह चीख मेरी नहीं थी। तुम उस चीख को प्राइमल स्‍क्रीम, आदि चीख कह सकते हो। यह चीख उनकी नहीं थी। यह निश्‍चित रूप से सत्‍य है। वह उनके गहनतम अवचेतन से ही आई थी। उन्‍होंने कहा: उस चीख ने मुझको सजग कर दिया कि वास्‍तव में मैं एक भयभीत व्‍यक्‍ति हूं, और मेरी सभी प्रार्थनाएं ओर कुछ नहीं बल्‍कि ईश्‍वर को मेरी रक्षा करने, मेरी सहायता करने, मुझे बचा लेने के लिए फुसलाने का प्रयास भर है।
      लेकिन तुमने उन सब को नष्‍ट कर दिया, और जो कुछ भी तुमने किया वह मेरे लिए अच्‍छा था। में उस सारी मूढ़ता से छूट गया। मैंने अपने सारे जीवन भर अपने पड़ोसियों को सताया है, और यदि तुमने ऐसा न किया होता, तो शायद मैंने इस तरह से सताना जारी रखा होता। अब में सजग हूं कि मैं भयभीत हूं। और में अनुभव करता हूं कि अपने भय को स्‍वीकार कर लेना  बेहतर है। क्‍योंकि मेरा सारा जीवन अर्थहीन रहा है ओर मेरा भय वैसा ही है।
      केवल उन्‍नीस सौ सत्‍तर में मैं अंतिम बार आपने गांव गया। मेरा  अपनी नानी के साथ ये वादा था कि जब वह मरेंगी—उन्‍होने इसे एक बचन के रूप में लिया था—मैं अवश्‍य आऊँगा। इसलिए मैं चला गया। मैं नगर में इधर-उधर घूम कर लोगों से मिला और तब मैंने बाला जी को देखा। वे बिलकुल भिन्‍न व्‍यक्‍ति दिखाई पड़ रहे थे। मैंने उनसे पूछा: क्‍या हुआ?
      उन्‍होंने कहा: उस चीख ने मुझको पूरी तरह से बदल दिया। मैंने भय को जीना आरंभ कर दिया। ठीक है, यदि मैं कायर हूं तो मैं कायर हूं: मैं इसके लिए उत्‍तरदायी नहीं हूं। यदि भय है तो भय है। मेरा जन्‍म इसके साथ हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे मेरा स्‍वीकार भाव और गहराया, वह भय खो गया और कायरपन मिट गया।
      वास्‍तवमें मैंने मंदिर से नौकर को भी हटा दिया, क्‍योंकि यदि मेरी प्रार्थनाएं नहीं सुनी जा रही है तब नौकर की प्रार्थनाएं कैसे सुन ली जाएंगी....एक नौकर जा पूरे दिन में तीस मंदिरों में जाता है?—क्‍योंकि उसको मंदिर से दो रूपये मिल जाते है। वह दो रूपये के लिए प्रार्थना कर रहा था। इसलिए मैंने उसकी छुटटी कर दी। और पूरी तरह से आराम में हूं। और मैं जरा भी चिंता नहीं करता कि परमात्‍मा है या नहीं। यह उसकी समस्‍या है, मैं चिंता में क्‍यों पडा रहूँ?
      लेकिन अपनी वृद्धावस्‍था में मैं बहुत ताजगीभरा और युवा अनुभव कर रहा हूं। मैं तुमसे मिलना चाहता था। लेकिन में नहीं आ सका। में बहुत बूढा हूं। मैं तुमको धन्‍यवाद देना चाहता था कि तुमने वह शरारत की, वरना मैं लगातार प्रार्थना करता रहता। और मर जाता। और सब कुछ अर्थहीन और व्‍यर्थ था। अब मैं उस व्‍यक्‍ति की भांति मर रहा होऊंगा जो मुक्‍त हो गया। पूर्णत: मुक्‍त हो चुका है। वे मुझको अपने घर के भीतर ले गए पहले भी मैं वहां जा चुका था। सारी धार्मिक पुस्‍तकें हटा दी गई थीं। उन्‍होंने कहा: मैं इन सभी में अब जरा भी उत्‍सुक नहीं रहा।
--ओशो