(सदमा - उपन्यास)
नेहालता ने घर पहुंच कर अपने माता-पिता से पेंटल का परिचय कराया की ये हमारे ही कालेज में हमारे साथ पढ़ते थे। परंतु ये हमारे सीनियर थे दो कक्षा आगे, पढ़ाई में हमारे कॉलेज में सबसे अच्छे विद्यार्थी थे। आज अचानक गली के मोड़ पर जाते हुए मिल गये। तो इन्हें घर ले आई। और सूनो गिरधारी लाल जी आज मेहमान आये है हमारे घर। इनके लिए कुछ खास बनाओ या इन से पूछ लो की इन्हें क्या पसंद है। तब पेंटल ने कहा जो भी मिलेगा वह प्रसाद स्वरूप ही होगा। नेहालता ने कहां की ये हमारे काका गिरधारी लाल खान बहुत ही अच्छा बनाते है। कहो तो तब तक एक चाय हो जाये। और गिरधारी को चाय के लिए बोल दिया और दोनों ड्राइंग रूम में बैठ गये। मां-पिता भी पास थे इसलिए वे कुछ बात नहीं कर पा रहे थे। वो जो उन्होंने बात करनी थी उसके लिए तो एकांत और निजता चाहिए। चलों फिर समय निकाल कर मिला जायेगा।
दिन में सब ने खाना
खाया और कुछ देर के लिए सब ने विश्राम किया और श्याम चाय पीने के बाद पेंटल ने
कहां की अब चलता हूं। आजा का दिन बहुत खुशगवार गुजरा जिस की उम्मीद नहीं थी। एक
बात मुझे जान कर अति प्रसन्नता हुई की कॉलेज के दिनों में तुम इन संस्कारों की
नहीं थे। तुम पढ़ने में बहुत तेजी और बौद्धिकता तुम्हारी बहुत उच्च थी। परंतु बुरा
मत मानना तुम उन कम्युनिस्टों के चक्कर में अपना जीवन खराब कर रही थी। ये तो अच्छा
हुआ की वह तुम्हारा आखिरी साल था। वरना तो वह तुम्हें बरबाद कर देते। वह जो शिक्षा
देते है उससे तो आदमी पशु तल से भी नीचे चलता जाता है। उसमें न संस्कार है न
शिक्षा। चलो अच्छा हुआ वो समय चला गया और तुम उनके रंग में नहीं रंगी। वरना वे तो
तुम जैसी पैसे वाली लड़की को बर्बाद कर के ही दम लेते है। इन सब पर तो उनका जीवन
टीका है। और हंसते हुए नेहालता ने अपना सर नीचा कर लिया और आपने सच कहा ऐसी बात ही
थी। कुछ-कुछ आपका संग साथ भी सहयोग दे रहा था। अच्छा और बुरा साहित्य जानने और
पढ़ने में मैं आपको अपना गुरु मानती हूं। तब नेहालता ने कहां आप सच कह रहे है। वह
जीवन का एक ऐसा मोड़ होता है की मनुष्य जानता है परंतु बहुत कम परंतु उसे आगे का
कुछ पता नहीं होता। वह अंधेरे में तीर चला रहा होता है। एक प्रकार से तैरना का सूख
तो मिल गया परंतु सागर कितना गहरा इससे तो अब कोई फर्क नहीं पड़ता परंतु उस की
लम्बाई कितनी है। इस का तो जरा भी ज्ञान नहीं है। तब नेहालता ने कहा की मम्मी मैं
इन्हें बाहर तक छोड़ के आती हूं। पेंटल ने नेहालता के माता-पिता के चरण स्पर्श किए
और बिदाई ली।
और बहार आकर
नेहालता ने गुस्से में पेंटल की पीठ पर एक मुक्का मारा की तुम बहुत खराब हो ये सब
बाते पापा के सामने कहने की क्या जरूरत थे। और दोनों हंस दिये। घर से थोड़ी दूर
जाने पर नेहालता ने अपना फोन नम्बर पेंटल को दिया और उसका फोन नम्बर और पता लिख
लिया। कि हम कब मिलते है और कहां मैं आप को फोन कर के बहुत जल्दी बता दूंगी। और
दोनों दोस्तों ने खुशी से हाथ मिलाये और चल दिये। पेंटल को दूर तक जाते हुए
नेहालता देखती रही। उस पेड़ की छाव में भी उसे अपने आस पास अच्छे आदमियों के होने
का एहसास हो रहा था। जब तक की पेंटल आंखों से ओझल नहीं हो गया वह देखती रही की यादें
भी तो ऐसी है जो दूर की होती है वह कितनी छोटी होती है। परंतु सच क्या वो छोटी
होती है या हम उसे दूर के कारण कम आंक रहे है। वह अति गहरे में होती है। परंतु
कितनी मधुर उसे कॉलेज के दिन याद आ गये जब कैंटीन के पीछे पत्थरों पर बैठ कर चाय
पीते थे। न वह बचपन था न अभी समझ आई थी। परंतु कॉलेज की पढ़ाई भी एक तरह साहास और
संकल्प देती है। आदमी एक स्वतंत्रता की और बढ़ रहा होता है। न उसकी कोई ड्रेस कोड़
होता है। न उसे कोई कहने वाला होता है। की आप दिन में कितनी क्लास अटेंड़ कर रहे
हो। एक मोड़ होता है,
जीवन का जो की मनुष्य में एक संतुलन भर जाता है। वह अपना भला बुरा
सोचने लगता है। उसे मार्ग की अनुभूति होती है कि किसी और उसे जाना है। और सच ही
पेंटल अपने कॉलेज का हीरो होता था। परंतु मैं मन ही मन उसका सम्मान करती थी। चलों
अब घर की और चलती हूं। और उसने अपना उठा हुआ हाथ नीचे किया जब की पेंटल तो कितनी
ही देर का आंखों से ओझल हो गया था। उसने आस पास देखा की कोई उसकी इस हरकत को देख
तो नहीं रहा है। और वह मन-ही-मन मुसकुराई की मैं भी पागल जैसी होती जा रही हूं। घर
आकर वह सोचती रही की आगे क्या किया जा सकता है। क्या इस विषय पर माता पिता से बात
की जा सकती है या नहीं। उसे लगा की वह कोई गलत काम तो करने नहीं जा रही। फिर उसे
डरने की क्या जरूरत है। वह अपने माता पिता को साफ कह सकती है कि वह वहां जा रही
है। जहां से वह ठीक होकर आई थी। उस आदमी से मिलने जा रही है की कितने दिनों तक वह
उसकी तन मन धन से सेवा करता रहा।
उसने उसे देखा तो
नहीं था परंतु वह उन दृश्यों को महसूस कर सकती है। समझ सकती है, की
वह मानो वह तो बल वत हो गई थी, परंतु वह तो जवान था दूसरा
मेरा शरीर तो जवान था। केवल मन ही तो बाल वत हो गया था। फिर भी उसने उस सब का
फायदा नहीं उठाया। उसने उसे एक दोस्त की दोस्ती, एक पिता का
स्नेह, एक प्रेमी का प्रेम, एक मातृत्व
की छाया वो सब दिया जो एक मजबूर एक असहाय को चाहिए। कुछ तो विशेषता गुण गौरव थे,
उस व्यक्ति में। वह उसकी उस धुंधली सी परछाई को याद करने की कोशिश
कर रही थी। जो उसने उस दिन रेल गाड़ी में बैठे हुए उसने देखी थी। फिर वह इस तरह की
हरकत क्यों कर रहा था, जैसे कि वह पागल था। उसके पूरे शरीर
और कपड़ों में कीचड़ लगा था। देखने में वह पढ़ा लिख सुंदर और जवान था। वह उसे कहां
से ले कर गया एक कोठे से, वहां मैं कैसे पहुंच गई। ये सब
बाते वह किसी से कर भी नहीं सकती थी। शायद किसी के पास इस का उत्तर ही नहीं था। इस
घटना का रहस्य शायद मेरे माता पिता या पुलिस कोई भी नहीं जानते। इस प्रश्न का
उत्तर तो वह भी नहीं जानता होगा जो मुझे ले कर गया था।
जीवन भी कितना कठोर
है एक मोड़ आप को कहा से कहां ले जा सकता है। उसे ये सब सोच कर डर लग रहा था, कि
वह उसे कैसे लेकर गया होगा कोठे से। उसमें कितना साहास और संकल्प है। वह मुझे
जानता ही कितना था। फिर भी उसमें एक मनुष्यता है, दया है,
सांत्वना है, प्रेम है। उस आदमी के साथ अगर
कुछ गलत हुआ है। तो अब उसके बारे में उसे जब से पता चला है उसे एक गिलानी हो रही
थी। की क्या ये सब मेरे कारण से हुआ होगा। परंतु वह तो नहीं जानती। फिर भी अकारण
में या कारण है तो वही। जिस तरह से उसकी और मेरी विदाई हुई है, क्या इस तरह से होनी चाहिए थी। माना मुझे वो सब याद नहीं था की मैं उसके
साथ रही हूं परंतु उसे तो याद था। या मेरे माता पिता या पुलिस सब को याद था। एक
धन्यवाद का भाव तो बनता था। कम से कम ये तो उसका हक था। परंतु जल्दी बाजी में या
किसी और कारण से ये सब घटा वह घटना नहीं चाहिए था।
उसने कम से कम मेरी
छ: माह या साल भर से भी अधिक समय तक देख भाल की। एक दोस्त की तरह, एक
आया की तरह, एक पिता की तरह से छत्र छाया दी, एक परिवार की सदस्य रही मैं वहां पर। और उसकी आंखों में पानी भर आया।
भगवान भला करें उस पेंटल का जो वो इतना साहास कर मुझे बताने आया अगर वह नहीं
बतलाता तो क्या मैं तब इस पाप से बच जाती। ये केवल एक मन का भ्रम है। अपने को
भुलाने के लिए। नहीं तो क्या मेरे माता-पिता नहीं जानते थे। की ये सब जो मेरे साथ
घटा और बाद में मैं जो ठीक हुई इसमें उस महान आत्मा का हाथ था। एक मन कर रहा था
उसके चरणों में जाकर लेट जाऊं। और अपने अपराध की माफी मांग लूं। वह देव है,
देव पुरूष है, इंसान की देह में आज कल के इस
मतलबी युग में ऐसा इंसान केवल किताबों में ही संकलित हो कर रह गया है। यह सब
सोचते-सोचते वह सो जाती है। तब उसे एक स्वप्न आता है की कोई स्वेत धवल कपड़ों में
किसी पहाड़ी तलहटी पर कोई देव दूत दूर खड़ा है। उसकी धवल स्वेत बाल और दाढ़ी
कितने सुंदर लग रहे है। वह दौड़ कर उसके पास जाना चाहती है। परंतु वो देखने में
इतना पास होता है वह दौड़ते-दौड़ते थक रही है परंतु उसकी दूरी कम नहीं हो रही।
उसकी श्वास तेज हो रही है उसके शरीर से पसीना बह रहा है। धीरे-धीरे उसे प्यास लग
रही है। उसका गला सूख रहा है परंतु इस डर से की वह अगर इतनी देर इस नदी से पानी
पायेगी तो वह देव दूत उसकी नजरों से ओझल हो जायेगा फिर वह उसे कैसे ढूंढ सकी है।
वह नहीं रुकती पूरी
ताकत से वह दौड़ती है परंतु अचानक उसे ठोकर लगती है और वह गिर जाती है। उसके पैरों
और हाथों से खून रिसना शुरू हो जाता है। वह उठना चाहती है परंतु अब उसमें इतनी
शक्ति नहीं होती की वह खड़ी हो जाये वह आखिरी कोशिश करती है और वह देव दूत अचानक उसकी
नजरों से ओझल हो जाता है और वह बैचेन हो उठती है। वह तड़प उठती है। की अब क्या
होगा इस भंयकर जंगल में वह किसी को जानती तक नहीं और एक आस उसके सामने खड़ी थी। वह
भी न जाने अचानक कहां पर गायब हो गई है। तभी उसकी आंखें खुलती है वह देख रह है कि
उसका पूरा बदन पसीने से तर बतर हुआ है। वह बहुत डरी सहमी है। कितनी देर में तो उसे
यह अहसास होता है कि वह ये सब स्वप्न में देख रही है। परंतु वह इस बात को किसी से
कह नहीं सकती की उसने ऐसा स्वप्न देखा। तब वह अंदर से डर गई की क्या वह पुरूष उसे
नहीं मिल पायेगी। भगवान इतना मुझे पाप में मत डालना।
नेहालता ये सोच रही
है कि क्या कारण है की जब से वह ऊटी से ठीक होकर आई है तो उसकी सोच उसकी रुची सब
बदल रही है। क्या ये बदलाव मेरी समझ का है या अचेतन में उस व्यक्ति के प्रेम का
उसके संग का प्रभाव था। और वह यह सोचकर अति उत्साहित थी की हो न हो ये सब उसकी संग
सोहबत का ही प्रभाव है। उसके प्रेम ने मेरे ह्रदय जो बीज बाया था वह अब अंकुरित हो
रहा है। इस का कारण अकारण वह सोच नहीं पा रही थी। तब वह सोच रही थी की एक बार जब
वह स्कूल के समय में पढ रही थी तो एक कहानी आती है। ‘’जो भी होता है वह सही
है’’.... ‘’इट इज आल फॉर दी बेस्ट’’ .... और वह उसे एक कहानी मान कर जीवन में पीछे
छोड़ दिया था। परंतु अब वह उस कहानी को याद करती है।
एक राजा होता है।
उसका एक खास मंत्री था जो हर अच्छे बुरे में उसकी राय लेता था। एक बार उसकी एक
उँगली फल काटते हुए चाकू से कट जाती है और उससे खून बहने लगा है। तब उसने सब
दरबारियों से पूछा की मैंने ऐसा क्या पाप किया कि मेरी उँगली कट गई मुझे याद नहीं
आ रहा । परंतु उसके दोस्त मंत्री ने कहां की हो सकता है आपने पाप न किया हो परंतु
ये आपके भले के लिए ही कटी हो। इस बात को सुनकर राज को बहुत क्रोध आया की ये आपका
तकिया कलाम हो गया है। सब भले के लिए होता है। लो तेरे भले के लिए अब तुझे एक माह
के लिए जेल में डाल देता हूं। और बेचारा मंत्री बिना किसी अपराध के सनकी राजा की
सोच के कारण जेल में डाल दिया गया। ये सब दरबारी देखते तो रहे, परंतु
उस सनकी राजा के बीच में बोले कौन।
समय गुजरा परंतु
राजा की उँगली का घाव गहरा था। सो कुछ ही दिन में भूल गया और शिकार खेलने के लिए
निकल पड़ा मंत्री लोगों ने मना किया की आप कहां शिकार कर पायेंगे। आपकी उँगली में
तो इतना गहरा जख्म है। परंतु राजा तो राजा होता है वह अगर किसी की सूने तो कैसा
राजा हुआ वह। जंगल में शिकार खेलते हुए वह पीछे रह गया और रास्ता भी भटक गया। अब
उसे समझ नहीं आ रहा था की कैसे मार्ग खोजे। कुछ दूरी पर उसने एक ठंडे पानी की झील
को देखा और वह रूक गया,
नीचे उतर कर पानी पीने लगा। घोड़े को उसने उपर चट्टान पर ही बाँध
आया था। वह जब पानी पी रहा था तो इतनी देर में एक शेर उसके सामने आ गया। शेर को
इतने पास देख कर वह डर गया क्योंकि उसके पास तो हथियार भी नहीं थे, वह तो घोड़े के पास ही छोड़ आया था। तब डर के मारे बेहोश हो गया की अब
बचने की कोई उम्मीद नहीं है। परंतु कुछ देर बाद शोर-शराब सून का जब उसकी आंखें
खुली तो वह अपने को जीवित देख कर अचरज से भर गया। उसके साथी मंत्री उसे आवाज दे
रहे थे। क्योंकि राजा का घोड़ा उपर चट्टान पर बंधा हुआ था। तब जरूर राजा भी यही
कहीं आस पास ही होगा।
वह उठ कर उपर गया
और उसने सारी बात अपने मंत्रियों को जब बतलाई की ऐसा-ऐसा उसके साथ घटा है। तब एक
मंत्र ने कहा की आपका दोस्त मंत्री ठीक कह रहा था। अगर आज आपकी उँगली न कटी होती
तो शेर आपको जरूर मार देता। आपके अंग भंग की वजह से जो दवा की दुर्गंध उसे आई
इसलिए शायद उसने आपको छोड़ दिया। तब राजा अपने किए पर पछताने लगा और जब घर आया तो
उसने हुक्म दिया की उस मंत्री को जेल से निकाल कर मेरे दरबार में हाजिर करो। तब
राजा ने अपने दोस्त से पूछा की ये बात साबित हो गई की मेरी उँगली का कटना मेरी
भलाई के लिए ही था। परंतु तुम्हारा जेल में जाना क्या भलाई हो सकता है। तब मंत्री
ने हंसते हुए कहां की आप की तो उँगली कटी थी। इसलिए शेर ने छोड़ दिया परंतु मैं
क्या करता। मेरी मृत्यु तो निश्चित थी। यदि आप मुझे यहां जेल में डाल कर नहीं
जाते। और राजा ने अपने दोस्त की बुद्धिमानी से खुश हो कर उसे जेल से मुक्त कर दिया
और उसे धन-धान्य से भी मालामाल किया।
अब नेहालता इस
कहानी को अपने जीवन पर घटी घटना से तोल कर देख रही थी। क्या मेरी कार का दुर्घटना
के पीछे भी कुछ भलाई छिपी हुई हो सकती है। शायद ये सब बात सही भी हो सकती है, परंतु
दोनों के बीच में समय की दूरी होती है इसलिए वह सब समय स्थान पर नहीं घटता उसमें
कुछ गेप कुछ दूरी बनी रहता है। इसलिए हम नहीं देख या उन्हें जोड़ नहीं पाते है।
क्या आज दूरी के कारण मैं इस विषय पर सोच सकती हूं। की अगर में वहां नहीं जाती तो
वह आदमी मेरी जीवन मैं कैसे आता मेरा बीमार होना फिर अस्पताल से मेरा किडनैपिंग या
अपहरण होकर कोठे पर जाना कितना विरोधा भास लगता है। जब सब को एक तारतम्यता में
देखते है तो कही समस्वरता नहीं दिखाई देती। परंतु अंदर से नेहालता इस बात को
स्वीकार कर चूकी थी। मेरी दुर्घटना भी जीवन को एक अभिन्न मोड़ था जो जितना अधिक
खतरनाक होगा उसके बाद अति सुंदर सुबह होनी चाहिए। रात जितनी ही संगीन होगी—सुबह
उतनी ही रंगीन होगा। और ये सब सोच-सोच कर नेहालता खुश हो रही थी।

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