एक थी काल रात-कविता
एक थी काली रात,
एक दिन वो आकर कहने लगी मुझसे।
कभी तो बुझा दो अपना दीपक,
मैं थक गई हुँ,
बहार खड़ी इंतजार करते हुए सालो से।
मैंने पूछा उससे कुछ फुसला कर,
क्यो करती हो यहाँ पर खड़ी होकर मेरा इंतजार?
जाओ वहां हजारों घरों पे तैरा राज चलता है।
कितने गुनाह होते तैरी काली-छाया में,
कितनी असमतो को तुम छीन लेती हो।
पल भर में,
वो शरमा कर यूं कहने लगी।
क्या करूँ अब मैं वहां जाकर,
वहां पर मेरे होने ने होने का कहाँ अब भेद रहा।


