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बुधवार, 10 जुलाई 2024

03-एक थी काल रात--(कविता ) मनसा-मोहनी दसघरा

 एक थी काल रात-कविता 


एक थी काली रात,

एक दिन वो आकर कहने लगी मुझसे।

कभी तो बुझा दो अपना दीपक,

मैं थक गई हुँ,

बहार खड़ी इंतजार करते हुए सालो से।

मैंने पूछा उससे कुछ फुसला कर,

क्‍यो करती हो यहाँ पर खड़ी होकर मेरा इंतजार?

जाओ वहां हजारों घरों पे तैरा राज चलता है।

कितने गुनाह होते तैरी काली-छाया में,

कितनी असमतो को तुम छीन लेती हो।

पल भर में,

वो शरमा कर यूं कहने लगी।

क्‍या करूँ अब मैं वहां जाकर,

वहां पर मेरे होने ने होने का कहाँ अब भेद रहा।

शुक्रवार, 19 जून 2020

01-वृक्ष और पत्थर –(कविता) (मनसा दसघरा)


वृक्ष और पत्थर –(कविता) (मनसा दसघरा)

एक वृक्ष ने जब पुछा 
अपने संग साथी पत्थर से
तुम किस तरह के वृक्ष हो,
न तुम में पत्ते आते है
न ही खिलते है 
तुम पर कोई पुष्प।
एक पीड़ा में करहा उठा उसका ह्रदय 
और ली एक गहरी उषास
शायद यहीं अपने होने की
पीड़ा उसे देगी एक दिन
उत्ंग उठने का साहस
और बन कर कोई हिमालय 
खड़ा हो उठेगा
तब वह समेट लेगा अपनी ही
गोद में हजारों वृक्षों को।
छू लेगा अंबर की नीलिमा को
परंतु चरण टिके रहेगे उसके
धरा के आगोश में ही।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

02--सांसों का एतबार (कविता)-मनसा-मोहनी दसघरा

सांसों का एतबार --(मेरी कविता)

कितनी सपनों को था देखा हमने,
  कितने तारे थे मेरे दामन में।।
    कितनी रुसवाईयां सही थी हमने,
      कितने बादों पर एतबार किया था।
        सांसों के कुछ हारों को गुथा हमने।
          रातों के तारों के छुपने से पहले,
            कितने आंसुओं की पिरोती थी माला!
              कितनी सिसकियाँ दबी घुटी सी,
             सिसक-सिसक कर कुछ कहना चाहा,
           सपनों को पलकों के जाने से पहले।
         कितनी सीने में दबी थी आहें।
      कोई तो जाकर उनसे कह दो।