मां
(एक जीवन
यात्रा)
अध्याय-01
मां का घर का नाम तो वैसे कृष्णा प्यारी था। परंतु देहाती भाषा में उसे सब किशनो प्यारी ही कहते थे। वैसे मां ने अपने हाथ पर जो नाम गुदवा रखा था, उस में भी लिखा था ‘किशनो प्यारी’। उनके उस नाम लिखे हाथ को मैं बार-बार बचपन से ही देखता आया था। परंतु देखो वक्त ने समय पा कर उसे भी धीरे-धीरे चमड़ी के साथ-साथ उसके आकार-प्रकार को भी धुंधला कर दिया था। और मां के अंत समय में तो जब उनके पूरे हाथ पर झुर्रियां पड़ गयी थी तब तो उस नाम को चिन्हित भी करना अति कठिन था। एक तो हाथ पर पड़ी उम्र की झुर्रियां, जिससे चमड़ी आलू की तरह मुरझा गई थी। उस पर सिमटती उड़ती उस शाही का रंग। जो अब उनके हाथ पर खोजना भी अति कठिन हो रहा था। फिर भी मैं उसे बार-बार जब उस नाम को देखने की जिद करता तो मां कहती तू तो पागल है। अब इसे कहां पढ़ा जा सकता है। मैं उस नाम में गुदे उन शब्दों को जोड़ने की हमेशा भरसक कोशिश करता ही रहता था।
