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सोमवार, 26 जनवरी 2026

21-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा


 अध्याय-21

(सदमा - उपन्यास)
 

अगले हफ्ते किसी काम के कारण वह नेहालता को ढूंढने के लिए जा नहीं सका। रोज-रोज समय गुजर रहा था, यह वह जानता था। ये सब उसके दोस्त के लिए एक-एक दिन कितना भारी होता जा रहा होगा। परंतु उसकी और से पूरी तो कोशिश कि ही जा रहा है, तब से वह मुम्बई आया है। वहां पर उसका दोस्त किस हालत में होगा इस बात का पता उसे चलता रहता था। क्योंकि वह बीच-बीच में सोनी से फोन पर बात कर सब हाल चाल पता कर लेता था। वहां से सोनी उसको सोम प्रकाश की प्रगति के विषय में बताती रहती थी। उस दिन जो उसके साथ मंदिर में घटा था उसका हालचाल भी उसने सोनी को बतलाया कि वह लड़की शायद मैंने मंदिर में देखी थी। परंतु इस विषय में पक्का तो नहीं कहां जा सकता। लेकिन मुझे लग रहा है था कि ये वहीं है। क्योंकि कोठे पर जब मैंने पहली बार उसे देखा था। तब वह और तरह का परिधान पहने हुए थी और चेहरे पर मेकअप भी अधिक था। एक खास किस्म की विकृति एक भय, एक तनाव वह अपने चेहरे पर लिए हुई थी। फिर मैंने उसे उस समय खास होश से या ध्यान से भी नहीं देखा था। अब जैसे ही में उसका पीछा करने के लिए मंदिर के बाहर आया अचानक न जाने वह कहां गायब हो गई। लाख खोजने पर भी मुझे कहीं दिखाई नहीं दी। परंतु सोनी न जाने क्यों ऐसा लगता है जब मैं उससे अपने दोस्त के बारे में बात करूंगा तो उसकी संवेदना, उसकी भावुकता उसके स्नेह को जगा सकता हूं। ये सब मैंने तेरे संग साथ के प्रेम से सीखा है। न जाने क्यों मुझे ऐसा विश्वास हो गया है। अगर तुम भी आज यहां मेरे साथ होती तो कितना अच्छा होता।

परंतु सोनी ने कहां की एक बात मैं भी आपको कहना चाह रही थी। परंतु कह नहीं पाई मुझे कुछ अजीब सा लगता है। तब पेंटल को लगा की क्या बात हो सकती है। उसके मन में जिज्ञासा उठी। और उसने पूछा बताओ न सोनी तुम क्या कहना चाह रही थी। क्या तुम मुझ से भी अपनी किसी बात का पर्दा रख सकती हो। कहने लगी सोनी पर्दा नहीं मुझे झिझक आती है। और सोनी ने कहां पता है तुम्हें, तुम पिता बनने वाले हो। पेंटल ने कहा क्या.....? अरे तुमने पहले क्यों नहीं बतलाया। सच मुझे आज बहुत खुशी हो रही है। तुमने मुझे इतनी खुशी की खबर सुनाई है की देखना एक दो दिन मैं भी तुझे यहां की एक अच्छा समाचार देने वाला हूं। चाहे मैं अपने बेटे को अपना नाम न दे सकूंगा। परंतु देखना वह हम दोनों के प्रेम का वो सुंदर फूल होगा। देखना उसमें तुम्हारे सारे गुण भरे होंगे। अगर वह लड़की होगी तो उसका नाम हम रखेंगे—‘तृप्ति’ । अगर वह लड़का हुआ तो उसका नाम ‘’प्रेम कीर्ति’’ ये बातें पेंटल एक सांस में कह गया।

फिर उसने सोनी की महीन आवाज में कहते सूना की अब मैं फोन रख रही हूं। साहब घर पर ही है। फिर एकांत में बाते करेंगे। सोनी की ये बात सून कर पेंटल को न जाने क्या हो गया। शब्द भी मन पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ते चलते है। जैसे की उन शब्दों में भाव और प्रेम समेट कर आपके ह्रदय में उडेल दिया हो। और वही दूसरा कटू शब्द आपको कितना बैचेन कर जाते है। सब कुछ मन के तल पर शब्दों की हवा बहती है। मानो उस पर भिन्न-भिन्न लहरे उत्पन्न कर रही होती है। जिसे हम चाहे तो तटस्थता से जीकर और महसूस कर सकते है। या उस में डूब कर उसके सूख-दुख को महसूस कर जी सकते है। यही सब भाव- विभाव इस समय पेंटल के साथ घट रहा था। आज दफ्तर में उसके मन ने गीत गुनगुनाते हुए कार्य किया। उसके चेहरे पर कैसी आभा फैली थी और शांति छायी हुई थी। अगर कोई देखने वाला या पारखी आंखों वाला होता तो उसे देखकर पल भर में उस भाव को पकड़ सकता था। परंतु हम कहां होश में होते है। एक गहरी नींद में, तंद्रा में ही सब कार्य कर रहे होते है। आज उसके अंग-अंग से उसके कार्य से उसके आस पास एक खुशी देखी जा सकती थी। उसकी प्रत्येक मुद्रा एक लयवदिता समेटे बहती हुई सी प्रतीत हो रही थी।

अगर हम पूर्णता से सब स्वीकार कर लेते है तो हमारे चित की अवस्था अचानक थिर व शांत हो जाती है। परंतु मनुष्य एक उत्‍ताप्‍त में मदहोशी में जीता है या तो बहुत खुश या बहुत बेहोश एक पेंडुलम की तरह से। जहां धूप होगी वहां परछाई भी होगी। प्रत्येक दृश्य या अदृश्य के दो किनारे तो होते ही है। शायद मनुष्य को जीने के लिए कुछ स्पीड ब्रेकर तो चाहिए। चाहे पल भर ही उसे उतुंग मिले परंतु वह चाहता है। इस एक खुशी से आज पेंटल का दिन कितना आनंद से ओतप्रोत हो कर कितना सुहाना गुजरा। उसे जीवन में एक नई राह दिखाई दे रही थी।

देखते ही देखते रविवार आ गया। और उस दिन उसके मन में एक उमंग थी। की आज वह लड़की उसे जरूर ही मिलेगी। एक सकारात्मक सोच लिए वह अपने गंतव्य की और चल दिया। आज समय से कुछ अधिक ही पहले ही वह केवल आज चाय पी कर ही वह निकल लिया। उसने आज नाश्ता भी नहीं किया। उसे लग रहा था वह अंदर से पूर्ण है। जब हमें कोई खुशी होती है तो आपने देखा की आप को भोजन की भी जरूरत नहीं होती। उसे अंदर से लग रहा था की आज जरूर उसका काम पूर्ण हो जायेगा। एक तो देखा हुआ रास्ता बहुत छोटा हो जाता है। वह काफी जल्दी पहुंच कर मंदिर के एक कोने में भगवान से प्रार्थना कर था कि उसके दोस्त का दूख हरो। भोले तुमने तो कितनों को तारा है। उस बेचारे का क्या कसूर है। और इस तरह से वह आँख बंद किए काफी देर तक बैठा रहा। इसे ध्यान तो नहीं कहेंगे। बस विचारों के उलझन में वह कहीं खो गया। जिससे बहार की पर्त तो उपर रह गई। जो उसके विचार थे और कुछ देर के लिए मन उसे भूल कर एक निंद्रा में चला गया। इस सन्यासियों की भाषा में योग तंद्रा कहा जाता है।

कितनी देर वह इसी अवस्था में डूबा रहा, कितना समय गुजरा उसे कुछ पता नहीं चला। अचानक उसकी आंखें तब खुली तब किसी ने मंदिर की घंटी बजाई। मंद्र प्रकाश में उसने देखा कोई महिला है। नींद की बेहोशी में उसे सब धुंधला-धुंधला सा नजारा दिखाई दे रहा था। जिसे वह समझने की कोशिश कर रहा था, की वह कहां पर है। और क्यों है? कितनी देर में ही उसकी चेतना अचेतन से चेतन के तल पर आई। तब मन उन चीजों को समझने लगा। आज वह न जाने किसी अचेतन की अवस्था में बहुत गहरे में जाकर खो गया था। उसे पता नहीं था की वह कहां गया है। परंतु फिर भी उसके शरीर में माधुर्य का रस भरा था। उसके मुख में एक मधुरता फैली थी। जब की उसने सुबह से तो कुछ खाया नहीं था। फिर ये मिठास किस वस्तु का था। उस स्वाद को वह चिंहित नहीं कर पा रहा था।

उसे लगा सच यही तो वही लड़की है। जिस का वह इंतजार कर रहा था। पूजा के बाद वह प्रसाद देने फिर उसकी और बढ़ी अभी मंदिर में कोई नहीं था। दूर जो बरगद का वृक्ष था उसपर कुछ पक्षी अपना मधुर गान गा रहे थे। सूर्य थोड़ा उपर अंबर में चढ़ आया था। जब उसने घड़ी की और देखा तो नौ बज चूके थे। उसने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए उस लड़की ने प्रसाद देने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाये तो लगा की यह तो जाना पहचाना सा चेहरा है। अरे हां उस दिन भी तो यह व्यक्ति यहीं अकेला ही बैठा था। तब उस लड़की ने पेंटल से पूछा।

नेहालता—आप उस दिन भी यहीं बैठे थे। अगर में गलत न हूं तो। क्या आप यहां पर रोज आते है।

पेंटल—हां आपने सही पहचाना। मैं ही था। परंतु उस दिन आप मंदिर से निकली और कहां गायब हो गई।

नेहालता—तब उसने कहां की आप उस स्थान को शायद नहीं जानते पीछे एक तालाब है। उसे यहां के लोग पवित्र ‘देव ताल’ के नाम से पुकारते है। वहां चारों और खुब सूरत वृक्षों की हरियाली है। पक्का घाट बना है। वहां मैं जाकर कुछ दर जल स्नान करती हूं। इसलिए आप शायद दूसरी और मुझे ढूंढते रहे होंगे। परंतु आप तो मुझे जानते नहीं, और न ही शायद मैं आपको जानती हूं। मैंने तो आज दूसरी बार आप को देखा है। फिर आप मेरा पीछा क्यों कर रहे थे?

पेंटल—जी आपने सही पहचाना।

नेहालता—आप मुझे क्यों ढूंढ रहे थे क्या आप को मुझ से कुछ कहना था क्या?

पेंटल—जी नेहालता जी ।

नेहालता—अरे कमाल है आप मेरा नाम कैसे जानते है। मैं तो आपको जानती नहीं।

पेंटल—लेकिन मैं आपको जानता हूं। आपका एक नाम ‘’रेशमी’’ भी था। लेकिन आप मुम्बई के ‘सेन्ट जेवियर्स कॉलेज’ में पढ़ती थी। अब आप को याद आया।

नेहालता—अरे ये नाम आप को कैसे पता। ये नाम तो मेरा कोई नहीं जानता। इस नाम को तो खूद मैं भी नहीं जानती न ही मुझे इस नाम का पता है। परंतु मुझे बतलाया गया था की ऊटी में मुझे सब इसी नाम से पुकारते थे। आप कहां से है। तब उसे याद आया की अरे आप तो पेंटल जी तो नहीं है। कितने बदल गये आप पाँच साल में ही। मैं तो आप को पहचान ही नहीं पाई।

पेंटल—वैसे तो मैं मुम्बई ही में एक दफ्तर में कार्य करता हूं। और यहां केवल आपसे मिलने के लिए आया हूं। अगर आप मुझे पर यकीन कर के आधा घंटा दे तो आप की बड़ी मेहरबानी होगी।

नेहालता—(नेहालता ने उसे एक बार उपर से नीचे तक पेंटल को देख) और तब कहां चलो तालाब के पास बैठ कर बाते करते है।

और दोनों उठ कर भगवान को प्रणाम कर मंदिर की सीढ़ीयां उतरने लगे। इस बीच पेंटल में नेहालता का दिया प्रसाद पहले माथे के लगाया और उसे ग्रहण किया। तालाब कोई खास दूर नहीं था। बस पीछे से एक पतली सी गली जाती थी। घने पेड़ो के झुरमुट की वजह से वह जगह अति रमणीय थी। चारों और पेड़ नीला साफ सुथरा जल का भरा तालाब। उसके बने पक्के घाट। देखने में अति प्राचीन लग रहा था।

पेंटल—ने चुप्पी तोड़ते हुए कहां की कितनी सुंदर जगह है। मैं तो यहां कई बार आया परंतु इस तालाब का तो मुझे पता ही नहीं था। आप यहां कब से आती है।

नेहालता ने कहां की अधिक दिन से नहीं परंतु कुछ महीनों से मैं आती हूं। मंदिर भी पहले मम्मी पापा के साथ आती थी। अब तो करीब छ: महीने से मुझे यहां आना बहुत ही अच्छा लग रहा है। न जाने क्या हुआ जो मेरी समझ के बाहर है। पहले जिस तरह से मेरा जीवन था वह सब मुझे बहुत ही उथला लगता है। कैसे मैं वो सब जीवन जी रही थी, मुझे अपने पर यकीन नहीं आ रहा। जी ही कहां रही थी ये देखने में जीने जैसा लगता है, परंतु जीवन हमें जी कहा रहा होते है। उसकी बागडोर कहां हमारे पास होती है। हम तो बस यहां से वहां भटकते से जीते हे। जीवन जीता तो उसे कोई उच्च आत्मा ही सकता है। हम बाकी तो लोग नाहक अपना समय खराब कर रहे है। न ही हमारी कोई मंजिल ही होती है और नहीं हमें पता होता है, उस मार्ग का जिस पर हम चल रहे है। परंतु एक हादसे के बाद मेरी याद दास्त चली गई थी। और उसके बाद जीवन में न जाने अंदर सब अपने आप बदल गया। जिसे मैं लाख समझने की या सुलझाने की कोशिश करती हूं, परंतु लगता है बीच के कुछ दृश्य गायब हे। जिन्हें में खोज नहीं पाती।

पेंटल के चेहरे पर एक शैतानी हंसी थी। जिसे नेहालता ने देख लिया और पूछा की आप इस तरह से क्यों हंस रहे है। तब पेंटल ने कहां की मैं जानता हूं आपके सारे जवाब मेरे पास है। और एक प्रकार से भगवान ने ही मुझे आपके पास भेजा है। आपका एक नाम रेशमी था। जैसे मैंने पहले कहा। आप ऊटी में कभी गई है। ये सब बात नेहालता सुन कर एक दम से चौकी और दंग रह गई। ऊटी आप ऊटी के विषय में कैसे जानते है। और वह अपनी पूजा का थाल ले कर खड़ी हो गई। तब पेंटल ने कहा की आप घबराइये नहीं मैं कोई आपका दुश्मन नहीं हूं। आपका दोस्त हूं। हम एक ही कॉलेज में पढ़े है इतना तो आप को मुझ पर विश्वास करना ही चाहिए। आप बैठ जाये। और नेहालता कुछ नहीं बोल सकी केवल अवाक सी खड़ी रह गई।

कुछ पल के लिए मानो सब ठहर गया। हवा चल तो रही थी परंतु एक गहरा मौन चारों पसर फैल गया। नेहालता अपने आप को समेट कर डरी सहमी सी बैठ गई। तब पेंटल ने उसे सारी बात बतानी शुरू की कि किस तरह तुम एक कोठे पर मिली थी। मैं और मेरा एक दोस्त सोम प्रकाश आपको तो याद नहीं होगा। तब आप वहां बहुत डरी हुई थी। आपकी बुद्धि भी बालवत थी। आप गलत हाथों में किस तरह से वहां पहुंच गई थी ये हम नहीं जानते। परंतु ये परमात्मा की ही इच्छा थी कि हम वहां गए। खास कर मेरा दोस्त वह तो पहली बार किसी ऐसे स्थान पर गया था। हो सकता ये आपके अंतस की पुकार हो। और उसने कितनी लड़कियों में से आपको चुना। जबकि आपने उस पर हमला बोल कर उसका सर तोड़ दिया था। पता नहीं ये बाते आप को याद है या नहीं और मैं आप को क्यों बतला रहा हूं। इस बीच वह पैसे दे कर आप को उस कोठे से भगा कर ऊटी लेकर चला गया था। आप उसके यहां कई महीने तक रही। शायद आप याद करें तो याद आ जाये। उसके घर में एक बूढ़ी नानी थी। एक जिसकी ठोड़ी पर एक बड़ा सा मस्सा था। नेहालता याद करने की कोशिश तो कर रही थी। परंतु उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। परंतु जब वह पेंटल का चेहरा देख रही थी। तो उसकी आंखों में एक विश्वास था। तब पेंटल ने अपने दोस्त के साथ उसकी कुछ फोटो दिखलाई। जिस देख कर वह थोड़ा घबराई। परंतु वह उसे गोर से देख रही थी।

अरे हां ये तो मैं ही हूं, परंतु ये कपड़े तो मैंने कभी पहने नहीं थी। तब पेंटल ने कहां की वहाँ तुम ऐसे ही कपड़े पहनती हो। क्योंकि उस मेरे दोस्त के पास लड़कियों के कपड़े नहीं थे। इसलिए आप उनके ही कपड़े पहनती थी। उस समय मैं तो वहाँ पर नहीं था। मैं तो तब गया जब आप वहां से आ गई थी। ये मेरा दोस्त है जो आपको उस कोठे से मुक्त करा कर अपने साथ ले कर गया था। मैं तो इतनी हिम्मत कभी नहीं दिखलाता परंतु इसने प्रकृति के साथ कुछ उंची ही छलांग लगाई। और आज आप उसे देखो तो पहचान नहीं सकती। वह एक अंधेरे गहरे गड्ढे में गिरा हुआ है। उसके आस पास क्या घट रहा है, इस विषय में वह कुछ भी नहीं जानता। मैं जब उससे मिलने ऊटी पहुंचा तो मुझे वो सब देख कर भरोसा नहीं आया। ये सब कैसे हो गया।

नेहालता ने कहा क्या हो गया उस आदमी को। तब पेंटल कुछ देर के लिए चुप हो गया। मानो किसी पेड़ को छूकर आती हवा भी कुछ देर के लिए ठहर गई हो। नेहालता के दिल की धड़कन तेज हो रही थी। वह जल्दी से सुनना चाहती थी आगे की बात को। वह जो उसके जीवन में एक खाली पन लिए थी। एक रहस्य लिये थी जो उसे समझ नहीं आ रहा था। अब कैसे उससे निकले उसे बाहर निकलने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता था। जिससे वह उस गहन रहस्य के अंदर प्रवेश कर जाये।

आज वो उसके सामने वो रहस्य आकर खड़ा हो गया था। जिसका की अचेतन काफी दिनों से इंतजार कर रहा था। चाहे इस बात का पता चेतन को हो या न हो। तब पेंटल ने एक गहरी श्वास ली और कहना शुरू किया की मैं यहां कभी नहीं आता परंतु मेरी एक मजबूरी मुझे यहां खींच कर लाई है। और सच बतला रहा हूं मुझे किसी ने भेजा भी नहीं है। सच में तो मेरा दोस्त ये जानता ही नहीं की मैं यहां आप से मिलने आया हूं। अगर वह जानना भी चाहे जिस अवस्था में वो है तो कहां जान सकेगा।

नेहा लता ने कहा की आपके दोस्त का क्या नाम है। तब पेंटल ने कहा की मुझे अपना परिचय तो अब देने की शायद आवश्यकता नहीं होगी। या होगी? परंतु मेरे दोस्त का नाम ‘सोम प्रकाश’ है। जो वहां ऊटी में आप को लेकर गया था। अब आप इस बात को एक दम से ह्रदय खोल कर सून ले इन बातों में कुछ भी बनावट या छल कपट नहीं है। इसलिए में आपके सामने सच्चे ह्रदय से अपने दोस्त की हालत आपको बतलाता हूं।

वह इस समय एक सदमे में पत्थर बन गया है। उसे अब कुछ भी पता नहीं उसकी याद दास्त एक दम से गायब हो गई है। ये मैं आप पर इल्जाम नहीं लगा रहा हूं। इसमें आपका कोई चेतन हाथ है भी नहीं आपका कोई कसूर भी नहीं है। क्योंकि आप तो इस विषय में कुछ जानती ही नहीं की पीछे क्या घटा है। और शायद यहां पर मेरे अलावा कोई दूसरा व्यक्ति इस घटना को जानता भी नहीं। इस बात की शायद आपको को कल्पना भी नहीं होगी कि मैं किस बात के लिया यहां आया हूं।

आप जब ठीक होकर रेल गाड़ी में बैठ कर आ गई। आपको याद होगा की एक पागल सा आदमी स्टेशन पर आपकी और भीड़ में से आया था। जिसे आपने खाना देने की कोशिश भी की थी। आप जरा उस घटना को याद करो। और तब नेहालता ने वो दृश्य याद किया जो धुंधला था वह अब स्पष्ट दिखाई दे रहा था। तब नेहालता ने कहा की हाँ मुझे याद है। मैं तो उसे कोई भिखारी या पागल ही समझ रही थी। कौन था वह? क्या वही था वह आपका दोस्त परंतु ऐसा कैसे हुआ। तब पेंटल ने जितना वह जानता था सब बतलाया क्योंकि पूरा तो वह भी नहीं जानता था। पूरा तो केवल सोम प्रकाश ही जानता था, की उसके उपर और अचेतन में क्या घटा है। हम तो घटना के बाद उसकी क्रिया को जानते है।

ये सब घटना सून कर नेहालता की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। की इतना सब हो गया परंतु मुझे पता भी नहीं चला। पेंटल ने कहां की अभी मैं अपने उस दोस्त के पास से तीन महीने रह कर आ रहा हूं। मुझे मुम्बई आये हुए भी करीब दो-तीन महीने हो चूक है। मेरे उपर दफ्तर के काम का बोझ था। जो वहां जा कर मैं बिना बतलाए वहां रूक गया। अब उस रूके कार्य को पूरा करना था। मैं तो यूं ही अचानक आप लोगों का हाल चाल पूछने के लिए ऊटी चला गया था। क्योंकि मैं जानता था आपको ले जाना बहुत ही जोखिम का कार्य है। अगर पुलिस को पता चल गया तो क्या होगा? क्योंकि यहां आप को पुलिस अवश्य ही ढूंढ रही होगी। फिर आप यह भी नहीं कह सकती की मैं अपनी मर्जी से गई हूं, आप तो कुछ बता ही नहीं सकती थी। आपको तो कुछ याद ही नहीं था। तो पुलिस उसे किडनैपिंग के केस में तो आराम से अंदर कर देती। यही सब देखने में गया था। की कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया है।

परंतु जब वहां पहुंचा तो दृश्य ही दूसरा था। उसकी एक टाँग में प्लास्टर लगा था। और वह अपनी सब याद दास्त को भूल गया था। उसे कुछ याद ही नहीं था। न वह बिना सहारे के चल-फिर ही सकता था और न उठ बैठ सकता था। बेचारी वह बूढ़ी नानी कैसे ये सब करती तब मैं वहां करीब तीन महीने रहा गया। मैंने नौकरी की जरा भी परवाह नहीं की। जाये तो जाये रहे तो रहे। अब उसी वैद्य जी को उसे भी दिखलाया है। जिसने आपको ठीक किया था। अब वह धीरे-धीरे बिना सहारे के चल फिर तो लेता है। लेकिन उसे मनुष्य नहीं कह सकते। वह तो मिट्टी का खिलोना बन गया है। उसकी सारी संवेदना खत्म हो गई। सच उसने जितना प्रेम आपको किया उस सब का फल है यह। चाहे उसमें आपका ठीक होना ही ले लिजिए। अब आगे अपने जीवन की आप मालिक है। मैं आप के साथ कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता। केवल एक हाथ जोड़ कर आपके पैर पकड़ कर दया याचना कर सकता हूं, कि आप मेरे दोस्त को बचा सकती है।

तब नेहालता ने कहा की हम विस्तार से बैठ कर बाद बात करेंगे आप मेरे घर वालों को ये सब नहीं बतलाना। और आप चलों अभी हमारे घर चलो आपको तो यहां से बहुत दूर जाना है। अब दोपहर भी हो गई है। और आपको आज जाना भी कहीं नहीं है। आपकी मुराद भी पूरी हो गई है। तो पार्टी तो बनती ही है। आप हमारे साथ खाना खाइये और श्याम को चाय पीने के बाद विश्राम कर के आप तब घर जाना। अब इस स्नेह निमंत्रण को पेंटल कैसे अस्वीकार कर सकता था। उसे आज बहुत खुशी थी। और सबसे अधिक खुशी थी नेहालता के व्यवहार के कारण। की वह लड़की संवेदनशील है। उसके अंदर प्रेम है। शायद वह वहां जायेगी तो जरूर उसका दोस्त ठीक हो जाये। वह सपने बुन रहा था। और दोनों खुशी-खुशी नेहालता के घर की और चल दिये। रास्ते में मंदिर पड़ा तब दोनों से झूक कर प्रणाम किया। दोनों की भाव दिशा भिन्न-भिन्न थी। बस पाँच मिनट के बाद तो नेहालता का घर आ गया।

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