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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

34-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-34

(सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर जाकर पहला काम यह किया की। उसने पहले बम्बई (मुम्बई) के नम्बर पर जो नेहालता के माता-पिता का वह लिख कर लाई थी। उस पर ट्रंकाल बूक कराया। शायद श्याम तक मिल जाये। परंतु उन्हें ये संदेश तो देना जरूरी था की उनकी लड़की यहां ठीक ठाक पहुंच गई है। नेहा लता ने वैसे यह भी कह दिया था की वह चिट्ठी भी लिख देगी। परंतु पत्र को पहुंचने में तो कम से कम एक हफ्ता तो लग ही जायेगा। वह अपने दिल और यहां का हाल अपने माता-पिता को जब पत्र में लिखेगी तो उसे पढ़ कर उन्हें सब हाल मालूम हो जायेगा। परंतु अब कम से कम इतना तो संदेश पहुंच जाये की नेहा लता हजारों मील यहां पर ठीक ठाक पहुंच गई है। वैसे वह चाह रही थी की अगर एक फोन वह पेंटल को भी कर दे तो अच्छा होगा। परंतु इतनी देर में पेंटल का फोन आ गया। नेहालता ने उसे उठा कर हाल चाल पूछा और बतला दिया की नेहालता यहां आराम से पहुंच गई है। आप फिक्र ने करें। मैं अभी वही से आ रहा हूं हमने साथ ही खाना खाया है। वह बहुत ही प्रेम पूर्ण लड़की है इतने लाड़ प्यार से पलने के बाद भी उस में जरा भी अहंकार नहीं है। अपने माता पिता के धन का वैभव का।

पेंटल को थोड़ी राहत हुई और सोनी को कहां की आप उनका ख्याल रखना। क्योंकि वह बहुत बड़े घर की लड़की है। शायद वहां परेशान हो जाये तो तुम अपने पास भी कभी-कभी बुला लेना। परंतु सोनी ने कहां की मुझे तो कम से कम नहीं लगता। उस का संकल्प देख कर तो मैं खूद दंग रह गई। वह तो सोम प्रकाश या नानी या मुझ से मिल कर ऐसे बातें कर रही थी की हम न जाने कब से एक दूसरे को जानते है। इस एक बात से आपको दूसरे के मन का अंदाज लग जाता है की वह कितना तरल, व कितना मिलन सार है। सच ही वह पढ़ी लिखी होने पर भी अति सरल है। शिक्षा ने उसे विक्रीत नहीं किया उसके अंदर के संस्कारों को खत्म नहीं किया। नहीं तो आज कल की ये शिक्षा आदमी में एक मैं एक अहंकार भर रही है। जिससे प्रेम की संबंधों की झील सुख जाती है। वह एक मतलबी सा जीवन केवल अपने लिये जीता है।

ये बात सून कर पेंटल को बहुत अच्छा लगा। और उसने कहां की अब मैं फोन रख रहा हूं। और तीन दिन बाद रविवार के दिन में नेहालता के घर जाकर सब हाल बतला दूंगा। तब नेहालता ने कहां की मैंने वहां पर भी ट्रंकाल बुक कर रखा है। शायद श्याम तक मेरी उन से बात हो जाये। फिर भी आप अगर वहां जाओगे तो उनके लिए और भी अच्छा होगा। वरना तो वो लोग पता नहीं क्या-क्या सोच रहे होगे। तुम तो उनके घर पहले भी जा चूके हो इसलिए बात को टलना मत उनके घर अवश्य ही चले जाना। और प्रेम प्रणाम कर के दोनों ने फोन रख दिया। ये सब बाते कर सोनी को कुछ राहत तो मिली की अगर किसी कारण उनके माता-पिता से बात नहीं हो पाई या मुझ अंजान की बातों को विश्वास नहीं हुआ तो। पेंटल तो परसों चला ही जायेगा। और वह कपड़े बदल कर अपने नौकर राम लाल को आवाज दी की मैंने ट्रंकाल बुक की है। अगर वहां से फोन आये तो मुझे कमरे से बुला लेना। उन्हें मना मत करना। क्योंकि ये फोन मैंने बम्बई की लिये बुक किया हुआ है। और दूसरा मैं अब थोड़ी थक गई हूं मैं आराम कर रही हूं। खाना में नानी के घर से अभी-अभी खा कर आई हूं। इसलिए मैं खाना नहीं खाऊंगी। तुम लोग खा लो।

और वह अपने कमरे में विश्राम के लिए चली गई। करीब छ: बजे राम लाल ने आकर उन्हें जगाया की आपका ट्रंकाल मिल गया है। वह उठी और जाकर फोन पर नेहालता के माता-पिता से बात करने लगी। उसने उन्हें तसल्ली दी की वह यहां पर ठीक ठाक से पहुंच गई है। और एक दो दिन में वह आपको चिट्ठी भी लिख देगी। मैं अभी उससे मिल कर आ रही है। आप उसकी तरफ से जरा भी फिक्र मत करना। हम सब उसके अपने ही है। ये बात सून कर मल्होत्रा जी को बहुत अच्छा लगा वरना तो दो तीन दिन से तो उनका मन ही नहीं लग रहा था।

और सोनी ने कहां की अगर समय मिला तो पेंटल जी आपके पास शायद रविवार को जरूर आयेगे। आप हम लोगों से अलग नहीं है हम एक दूसरे को नहीं जानते हुए भी एक परिवार की ही तरह से है। आपका दूख हमारा दूख है। आपकी लड़की जो कार्य कर रही है वह कोई करोड़ों में ही एक साहसी व्यक्तित्व ही कर सकता है। आप दोनों धन्य है कि आपने इतनी महान बेटी को जन्म दिया। और सोनी की आंखें भर आई। तब सोनी ने कहां की आपकी लड़की बहुत प्रेम वाली है। मैं तो एक बार में मिलने भर से उसकी हो गई। आप चिंता न करें। और जैसे ही सोम प्रकाश जरा सा ठीक होगा। आप को खबर कर दी जायेगी। आप कुछ दिन में यहां आ कर सब अपने आंखों से भी देख सकते है। सब को इस बात चीत से थोड़ी राहत की सांस ली। की बेटी ठीक ठाक पहुंच गई है। माता-पिता के लिए बच्चे कितने ही बड़े क्यों न हो जाये वह बच्चे ही रहते है। फिर नेहालता के साथ वह दुर्घटना घटने के बाद से वह बहुत ही डर गये थे। परंतु अब उनकी लड़की ठीक-ठाक से है इसलिए उन्हें थोड़ी हिम्मत है।

वरना इतनी दूर एक जवान लड़की को अंजान लोगों में जाना किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा। परंतु नैतिकता और बेटी की जिद के आगे उन दोनो की एक न चली। फिर आज सोनी का फोन आने पर उन्हें कुछ राहत मिली है। और उन्हें लगता है कि उनकी लड़की कही किन्हीं परायों के बीच नहीं है। इतना सब झेलने के बाद भी नेहालता में एक साहास था। वह बहुत हिम्मत वाली लड़की थी। ये बात तो सब जान गये थे। इस सब के रहते सब को एक उम्मीद की किरण नजर आ रही थी की एक दिन जरूर सोम प्रकाश ठीक हो जायेगा।

इधर सोनी के जाने के बाद नेहालता ने नानी से कहां की ये जो सोनी आई थी, यह कौन महिला थी। और ये आप सब को कैसे जानती है। तब नानी ने सारी बात बतलाई। की यह वक्त और हालात की मारी एक लड़की है। इसने बहुत धोखे खाये है। गरीबी के दलदल में ये फंसी जीवन संघर्ष के लिए बहुत कुछ किया परंतु समाज का प्रचलन ही ऐसा है कि अकेली महिला को कोई महत्व ही नहीं देता। तब इस ने मजबूरी में आकर अपनी उम्र से दो गणें व्यक्ति से शादी की। यहीं अपने सोम प्रकाश के स्कूल का मालिक इसका पति है। अरे आपके बम्बई से जो मित्र आये थे। न जाने इन दोनों की कैसे दोस्ती हुई उसके बाद तो ये लड़की एक दम से बदल गई। मैं तो इसे बचपन से जानती हूं। परंतु पहले तो ये बहुत समझदार थी परंतु जवान होने पर ये बहुत बदनाम थी। अपने सोम प्रकाश पर भी डोरे डालती थी। परंतु पेंटल के आने के बाद न जाने इसे क्या हुआ। ये जलती आग एक दम से बर्फ बन गई। और ह्रदय में जो तूफान था वह भी शांत हो गया। अब तो ये मां बनने वाली है।

तब नेहालता ने कहां हां नानी मुझे याद आया पेंटल इन्हीं महिला के विषय में मुझे शायद कह रहे थे कि वह आपकी मदद करेगी। नानी मनुष्य का पता नहीं चलता ये मन किस को किसी स्थान पर मोड़ दे दे। परंतु हां एक बात है सुशील और सभ्य लड़की है। और प्रेम पूर्ण भी शायद जीवन में प्रेम के आभाव में कही मनुष्य भटक जाते है। और जिताना वह भटकते है। प्रेम उनसे उतना ही दूर होता चला जाता है। शायद तब सफर में केवल मतलबी ही व्यक्ति मिलते है। और फिर शायद उसका मानवता पर से विश्वास उठ जाता है। भला हो पेंटल का जो उसके प्रेम के कारण इसका जीवन बदल गया। वैसे तो नानी पेंटल जी भी बहुत ठहरे और समझदार व्यक्ति है। देखा आपने मुझे बम्बई में उसने कितनी मेहनत कर के ढूंढ ही लिया। ये भी एक चमत्कार है। आप जानती है। भूसे के ढेर से जैसे कोई सूई को ढूंढ ले इस तरह का शहर है बम्बई। वह आदमी को खोने की जरूरत ही नहीं है। वहां पर आदमी हमेशा खोया ही रहता है। और मजेदार हम एक ही कॉलेज में पढ़े हुए है मैं और पेंटल जी। वह मेरे से दो कक्षा आगे था। परंतु उस समय भी वह बहुत ही समझदार था।

तब नानी ने कहां की मुझे तो तुम्हारी बात ही सून का डर लगता ह। मैं तो इतनी भीड़ देख कर घबरा जाऊंगी। नानी ने फिर नेहालता को कहां की अब तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि ये तुम्हारे परिवार को फोन पर सब बात बतला देगी। और फिर बाकी की बाते पत्र में लिख कर भेज सकती हो। एक दो दिन या इस बार की दवाई लेने के बाद तुम आराम से यहां का सब हाल अपने माता पिता को बतला देना। ताकि वह घबराये नहीं। दोनों को सोनी के आने से और नेहालता के घर पर संदेश भेज देने से बहुत अच्छा महसूस हो रहा था।

उधर जब नानी, नेहालता बात कर रही थी तो सोम प्रकाश उनको इस तरह से बातें करते हुए देख कर। कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। तब नानी ने उसका चेहरा देखा तो उसे लगा की सोम प्रकाश कुछ जानना या कहना चाह रहा है। तब उसने एक बार नेहालता की और देखा और कहा की सोमू तुझे पता है कौन आई थी। तब सोम प्रकाश ने गर्दन हिलाकर हां भरी। और धीर से कहां की नानी ये क्यों यहां आई थी। मुझे इससे डर लगता है। आप मेरे साथ ही रहना न जाने कैसे-कैसे लोग आज कल आ रहे है मैं तो उन्हें जानता ही नहीं। तब नेहा लता ने कहा की सोमू तुम मुझे नहीं पहचानते। मैं तुम्हारी रेशमी हूं। तब रेशमी शब्द से उनके चेहरे के भाव बदले। और उसने एक बार फिर गोर से नेहा लता को देखा। और नानी की और इस मुद्रा में देखा की क्या नानी ये रेशमी है।

तब नानी ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहां की अब तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। हमारी रेशमी हमारे साथ आ गई है। तुम बार-बार उसे याद कर रहे थ। तब सोम प्रकाश ने एक बार बड़े गौर से नेहालता को देखा। और कहां की नहीं नानी ये तो हमारी रेशमी नहीं है। इन से तो मुझे डर लग रहा है। आप झूठ बोल रही हो बहका रही हो। मैं अपनी रेशमी को कभी नहीं भूल सकता। वह जब मेरे सामने आयेगी तो देखना मुझे आते ही कहेगी। सोमू तुम ऐसे क्यों हो। जोर से फिर ताली बजा कर मेरे साथ खेलेगी। दौड़ लगायेगी। और हम ....परंतु नानी वो तो ठीक है परंतु हमारा हरिप्रसाद कहां है। वह भी क्या रेशमी के साथ ही चला गया। शायद वह भी उसे साथ लेकर चली गई। सामने बैठे हरि प्रसाद की और इशारा कर नानी ने कहां की देख ये तो है तुम्हारा हरिप्रसाद।

सोम प्रकाश ने अचरज से एक बार उसे फिर गोर से देख और कहा की वो हमारा हरिप्रसाद तो बहुत छोटा था ये तो बहुत बड़ा है। ये हमारा हरिप्रसाद नहीं हो सकता। अब इस बात का दोनों के पास कोई जवाब नहीं था। तब नेहा लता ने खड़े होकर सोम प्रकाश का हाथ अपने हाथ में लिया और उसके सामने बैठ गई। और उसने आंखें बंद कर ली। उसकी आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे थे। तब सोम प्रकाश ने कहां की तुम रोती क्यों हो तुम्हें क्या हो गया है। और अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए नेहालता ने कहां की सोमू तुम घबराना मत। देखना एक दिन तुम्हारी रेशमी तुम्हारे सामने होगी। और फिर हम सब के जीवन में फिर से बहार एक खुशी का बसंत आ जायेगे। सोम प्रकाश ने गोर से नेहालता को देखा और वह उसे देखता ही रहा। इतनी देर में हरि प्रसाद भी खड़ा होकर उन दोनों के बीच में आ गया। और अपने दोनों पैर सोम प्रकाश के पैरों में पैर रख कर कुछ कहने लगा। सोम प्रकाश की आंखों को सूँघने लगा। हरि प्रसाद ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह बार-बार सोम प्रकाश की आंखों को सूंध रहा था। न जाने क्यों पशु सुंध कर अपने को परितृप्त महसूस करने लगते है। और उसने हरि प्रसाद का हाथ चाट लिया। इससे हरि प्रसाद के मन में एक तरह की तरंग उठी। कि ये दृश्य तो उसने पहले भी देखा है। और वह निरीह उदास हरि प्रसाद उदास वहीं आपने मालिक के चरणों में बैठ गया। अचानक वहां का वातावरण एक दम से भारी हो गया। चारों और एक गहरी खामोशी फैल गई। मानो सभी शब्द गगन में विलीन हो गया।

जैसे की शब्द ही वातावरण में हमारे को चलायमान रखे हुए है। तब अगर शब्द नहीं होते है, तो मन भी पल भर के लिए ठहर जाता है। आप अचानक कभी-कभी किसी ऐसे स्थान में या वातावरण में प्रवेश कर जाते हो। जहां शब्द नहीं है, न ही विचार है और न ही भाव है। तब आप एक दुविधा में प्रवेश कर जाते है। उस समय मन तो अति बैचेनी महसूस करेगा। परंतु अंतस तुम्हारा उससे परितोष एक तृप्ति को अपने कंठ पर महसूस करेगा। जैसे की जन्मो इस प्यार को जलती जेष्ठ की धरा को अषाढ़ की चार बूंद आन गिरी। देखने में तो आप उस समय अधिक प्यास को उष्मा को महसूस करोगे परंतु अंतस में कही एक तृप्त का सोपान भी आपका नजर आयेगा। 

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