(सदमा - उपन्यास)
आज का दिन सब के लिए बहुत भारी गुजरा था। अचानक वो मोड़ आपके जीवन में आ जाये जिसके बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते है। तब मनुष्य मन क्या प्रकिृया करेगा। यहीं थी वह मन की प्रतिक्रिया जो श्रीमति मल्होत्रा जी की थी। वह अचानक अपना आपा खो बैठी। झल्ला गई, क्रोध करने लगी, उछलने लगी, तांडव शुरू हो गया। वह व्यक्ति उस बात को स्वीकार न करने के लिये, उस बात को न मानने के लिए भरसक प्रयत्न करेगा। वहीं कल नेहालता ओर श्रीमति मल्होत्रा जी के बीच हुआ था। जिसे पेंटल आराम से बैठ कर देख रहे थे। वैसे भी उस का इस सब बीच में बोलने का न ही कोई औचित्य था और न ही अधिकार।
होटल जाते-जाते तक श्रीमति मल्होत्रा जी का गुस्सा कम ही नहीं एक दम से उतर गया था। उसे अपने बोले शब्दों पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था। परंतु बेटी ने जो किया वह बहुत सौम्य था। उस का अपना जीवन है, फिर भी उसने मां को कोई अनुचित शब्द नहीं बोले। वह अपनी मां के स्वभाव को जानती थी। की वह जबान की कड़वी है, परंतु दिल से एक दम मुलायम। ये बात मल्होत्रा जी भी जानते थे, इसलिए वह चिंगारी को बूझने का इंतजार कर रहे थे। अगर वह बेटी का साथ देंगे तो उसकी पत्नी फिर क्रोधित हो जायेगी। सो जब वह होटल पहुंचे तो सब अपने-अपने कमरे में चले गए किसी ने किसी से कोई बात नहीं की। पेंटल जी अपने कमरे में एक दम से मौन मुद्रा में चले गए एक चिंगारी को लिए हुए, जिसके नीचे एक तूफान भभक रहा है।








