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बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—28)

मैंने भी प्रेम किया—
    अचानक एक दिन घर में गहमागहमी शुरू हो गई। मैं बहुत समझने की कोशिश कर रहा था परंतु मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भैया-दीदी की स्‍कूल की छुटियां थी। दिसम्बर माह था। दिन की घूप बहुत अच्‍छी लगती थी। और रात को कड़ाके की ठंड शरीर की हड्डियों को भी सिहरा देती थी। और इन दिनों एक बात और थी मैं रोज ही पापा जी के साथ जंगल में सुबह -सुबह जाता था। पापा जी शहर कर के आते और में उस धूल भरे रस्‍ते पर बहुत ताकत के साथ दौड़ लगाता। मुझे अपने पूरे जोर से दौड़ने में बहुत मजा आता था। रात का अँधेरा होता था। आस पास कोई नहीं होता था। दूर रह-रह कर कभी-कभार गीदड़ों की हाऊ....हाऊ की पूकार सुनाई देती थी। आज कर जंगल में कुत्‍ते रहते थे उन में से दो कुतियाँ जो जंगल में रहती थी उन्‍होंने बहुत प्‍यारे-प्‍यारे बच्‍चे दे रखे थे। मैं और सब करता था परंतु बच्‍चे मुझे बहुत अच्‍छे लगते थे।

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—27)

ध्‍यान और पागलपन

पिरामिड के बनने का काम चलता रहा। पिछले दिनों जैसे ही ध्‍यान का कमरा टूटा था और जो लोग ध्‍यान करने के लिए आना बंद हो गये थे। इन कुछ ही महीनों के इंतजार के बाद उन की तादाद बढ़ गई थी। पिरामिड बन तो गया था परंतु अभी उस के अंदर पलास्टर नहीं हुआ था। लेकिन लोगों को कहां सब्र था। वह तो मौके की तलाश में ही थे। कि जैसे ही ध्‍यान का मौका मिले और वो आये। क्‍योंकि पापा जी ने ध्‍यान का समय ऐसा र्निधारित कर रखा था जो उन्‍हें सुविधा जनक हो। जैसे दिन के 10 बजे दूकान बंद कर के आते थे और 11 बजे ध्‍यान शुरू हो जाता था। ध्‍यान के बाद भी पापा जी को बहुत काम होता था। वरूण भैया को स्‍कूल से लेकर आते थे। हिमांशु भैया के स्‍कूल की बस आती थी। और दीदी तो बड़ी हो गई थी वह तो खूद स्‍कूल चली जाती थी और आ भी जाती थी।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

जिम जोंस का स्‍वर्ग रथ—सामूहिक बेहोशी

स्‍वर्ग रथ की प्रतीक्षा में—
       सत्‍तर के दशक में अमरीका में एक करिश्‍माई नेता जिम जोंस का प्रभाव बढ़ने लगा। उसके वक्‍तव्‍य बड़े सम्‍मोहक होते और उसके अनुयाई अंधों की तरह उसका अनुसरण करते। जिम जोंस ने कार्ल मार्क्‍स, विंस्‍टन चर्चिल, और एडोल्फ हिटलर जैसे लोगों को गहन अध्‍ययन किया था। उसके जीवन पर किए गए अध्‍ययनों के अनुसार वह बचपन से मृत्‍यु की घटना से बड़ा प्रभावित था। अक्‍सर छोटे-छोटे मृत जानवरों को लाकर उनका अंतिम संस्‍कार किया करता था। वह अपनेआप को महात्‍मा गांधी, कार्ल मार्कस, जीसस और बुद्ध का अवतार भी कहता था।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—26)

प्‍यार और  दुलार   
    पिरामिड ऊपर और ऊपर उठता चला जा रहा था। इतना ऊपर की मैं उसे देख भी नहीं सकता था। उपर सर करने से मुझे चक्‍कर आते थे और वह असमान के उस कोने का छूता सा प्रतीत होता था। जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था चारों और से पतला होता जा रहा था। अंदर से खड़े होकर देखने पर तो और भी अधिक भय लगता था। क्‍योंकि बीच में चारों और से खाली होने के कारण चारों और की दीवारे ऐसे लग रही थी जैसे अभी अंदर गिर जायेगी। काम अंदर से ही हो रहा था। इस लिए पेड़ अंदर से ही बांधी गई थी। अंदर से चढ़ने के लिए जो पेड़ बंधी हुई थी, अब भी मैं मोका देख कर चढ़ जाता था। वह गिरने वाली बात तो न जाने में कब का भूल गया था। हमारे शरीर में कोई भय या सोच विचार इतनी देर तक थिर नहीं रह सकती। कोई पीड़ा या दुख हमारा पीछा मनुष्य की तरह नहीं करता जन्‍म-जन्‍म तक।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

पा लूं गा विस्‍तार आप सा...आशिष (कविता)

नभ तुन तो देखा होगा, अनन्‍त सृष्‍टियों  का संध हार।
है धीर-दृष्‍टा तुझे कभी तो आता होगा इस  पर प्‍यार।

कैसे तू इतना अडिग खड़ा है,
थिरता का मंदिर सा बनकर।
मेरे दीपक की क्षणिक ज्‍योति,
क्‍यों कंप जाती है नित रह-रह कर।।

जंगल का फूल—कविता

जंगल में एक फूल खीला जब,
मैने पूछा चुपके से।
क्‍यों यहां खिला और के लिए?
किस उसने हंसकर कुछ यूं देखा
फिर हौट हीले और बात झरी
खिलनें में ही पूर्णता है,
      न जग के लिए।
      न रब के लिए।।
स्‍वामी आनंद प्रसाद ’’मनसा’’

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—25)

(मेरा दुस्साहस और पापा का साहस)

    घर जाते-जाते दिन निकल आया था। चारों और चहल पहल थी। परंतु मेरी और किसी का ध्‍यान नहीं गया। बस एक आधा गली के कुत्‍ते ने देख और स्‍वभाव अनुसार मुझे भौंका। लेकिन ये केवल उनके संदेश मात्र ही माना जायेगा। कि हम सतर्क है अपने इलाके में। हमारी नजरों से कोई बच कर नहीं जा सकता। बस वह बैठे-बैठे ही भोंकते रह, परंतु वह भी आगे आने कि हिम्‍मत नही कर सके। मैं घर जाने  का एक ही रास्‍ता जानता था। पीछे की तरफ से जहां से अक्‍सर में भागने  के लिए तो उपयोग करता था। परंतु  छत से घर जाने  के लिए वापसी में बहुत कठिन होता था। क्‍योंकि उपर से तो 8-10 फीट भी कूद कर आ सकता था परंतु वापस तो इतना कूद कर चढ़ नहीं सकता था। अपने साथ मामी का मकान था। मैं वहीं पर अक्‍सर पहूंच जाता था। वहीं अपनी हीरों कुत्‍ते वाली कथाएं। परंतु आज ऐसा कुछ नहीं कर सका। केवल छत पर खड़ा हो कर रोता रहा। कि मुझे कोई उतरा लो। मामी हमारे घर पर गई और मम्‍मी जी को बुला कर कहने लगी तोहरा पौनी आया है। गली में आज भी भीड़ लग गई थी। परंतु मेरे उपर से न कूदने के कारण लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लगता है हीरों कुत्‍ता अब बूढ़ा हो गया है।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—24)

(मां की मृत्‍यु ओर वो अनमोल क्षण)
    ये कैसी अनहोनी घटना थी। जो मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ मेरी घायल मां जो मृत्‍यु सैय्या पर पड़ी थी। शायद वह मुझे जीवित देख कर अति प्रसन्‍न थी। और मैं एक तरफ तो उदास था। और एक तरफ मां से मिलने का आनंद भी मुझे महसूस हो रहा था। अब समझ में नहीं आ रहा था किसे पहले मनाऊं। इस जंगल में भी मेरी मां मुझसे हृष्ट पुष्ट थी। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। और उसके घावों को चाटनें लगा। जिन से बहकर खून जम कर सूख गया था। जख्‍म बहुत गहरे थे। गर्दन-सर और पीठ पर बुरी तरह से फाड़ रखा था वैसे तो पूरा का पूरा शरीर ही घायल कर रखा था। इन घावों को देख कर मुझे लगा उसके उपर कम से कम दस जानवरों ने एक साथ हमला किया होगा। मेरे इस तरह पास होने से और चाटनें से उसे कितना सुकून मिला ये उसकी आंखों की तृप्ति बता रही थी। वह आंखें बद कर गहरी श्‍वास ले रही थी। मानों मेरे प्रेम और छूआन को आत्‍म सात कर जाना चाहती हो।