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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

तंत्र और सेक्‍स—2

उसके बाद तो मैंने और मां ध्‍यान निर्वाह ने मिल कर बहुत गहरे प्रयोग किये। कितनी ही रातों हम दोनों एक दूसरे के साथ निर्वस्त्र सोये। मेरा तो ध्‍यान धीरे-धीरे गहरा और परिपक्‍व हो रहा था। पर उसे कभी-कभार सेक्‍स के तूफ़ान के कारण काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इस बात का पता मुझे काफ़ी दिनों बाद चला। क्‍योंकि स्‍त्री का सेक्‍स अंतगामी है पुरूष की तरह आप उसके तनाव को देख नहीं सकते। एक रात नाद-ब्रह्मा ध्‍यान करते एक विचित्र घटना घटी उस की साक्षी हमारी पत्‍नी मां अदवीता नियति भी थी। असल में प्रत्‍येक ध्‍यान में वह हमारे साथ होती थी। इतने दूर तक जाने के बाद मां ध्‍यान निर्वाह की हिम्‍मत बढ़ गई फिर उसने समझ और देख लिया की यहां हम ध्‍यान कर रहे। तब वह भी हिम्‍मत कर के निर्वस्त्र हो मेरे साथ ध्‍यान करने लगी। रात के समय एक तो पहले ही काला रंग और उपर से अँधेरा कर लिया जाता था। ध्‍यान के कमरे में हम केवल ध्‍यान ही करते थे वरना तो फिर बद कर दिया जाता था। तब निर्वस्त्र होने में किसी को कोई झिझक भी नहीं होती थी। फिर ध्‍यान के समय हमारी आंखे भी तो बंद रहती थी।
      एक महीन सफ़ेद चादर ओढ़ कर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर।  आमने-सामने बैठ कर हम ध्‍यान करते थे। उस रात ध्‍यान में हम इतने गहरे चले गये की। अंदर तो मुझे अपने होने का पूर्ण पता है। पर इसके साथ कुछ ऐसा भी लग रहा है। कि सामने कोई नहीं है। केवल में ही हूं। और वो पूर्णता अद्भुत थी। न वहां कोई विचार था। न मेरा शरीर मेरा था। सही मायने में मैं बहुत बड़ा अपने आप को महसूस कर रहा था। जिसका न अति था और अंत। इन दीवारों से मुक्‍ति  का वह मेरा पहला अनुभव था। न वहां शरीर की दीवारें थी। न वहां मन था। न विचार। न वहां आत्‍मा थी। एक फैलाव था और केवल मैं था। अपनी पूर्णता के साथ। बाद में जब रात के ध्‍यान के बारे में अदवीता ने बतलाया तो हमें यकीन ही नहीं हो रहा था।
      अदवीता ने बतलाया कि रात को अचानक मेरी आंखे खुली। आप दोनो मेरे सामने बैठ कर ध्यान कर रहे थे। पर मैं देख रही थी। आप दोनों की चादर के बीच में प्रकाश जल रहा है। मैंने उसे दोबारा गोर से देखा कि कहीं ये मेरा भ्रम तो नहीं है। आप दोनों मुझे साफ़ बैठे दिखाई दे रहे थे। लेकिन फिर मैंने सोचा कि ध्‍यान के बीच में मेरा इस तरह से देखना, अच्‍छा नहीं है। मेरा भी ध्‍यान खराब हो रहा है। पर मुझे कुछ अचरज था। न आप हिल रहे थे और न ध्‍यान निर्वाह। एक मूर्ति की तरह बैठे हो। फिर ये प्रकार क्‍या है कोई चीज जला रखी हो ऐसा भी दिखाई नहीं दे। उसके बाद मैंने आंखे बंद कर ली। पर मेरा ध्‍यान तो आप लोगों की और था। फिर मैंने दो मिनट बाद आंखें खोली तो क्‍या देखती हूं चारो और बहुत भंयकर अँधेरा है। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। पर अभी कुछ देर पहले तो मैंने आप दोनों को बैठे देखा है। और आप दोनों प्रकाश में नहाइये हुए थे। खेर अदवीता तो झूठ क्‍यों बोलने लगी। और हम दोनों उस प्रकाश को देख नहीं सकते थे। क्‍योंकि एक तो हमारी आंखे बंद थी। पर एक बात थी। पर वो अंतर मिलन इतना अदभुद था, अगर उस की तुलना किसी से की जाये तो वह संभोग का वह क्षण है जब हमारा वीर्या स्खलन होता तब जो आनंद क्षणिक बरसता है। या जिस में हम क्षणिक डूबते है। उस समय उस की लम्‍बाई बहुत देर तक हम लोगों पर छाई रही। शायद दो मिनट या उससे अधिक। या जो प्रकाश अदवीता ने देखा हो। वो हमारे दोनों के अतर मिलन के कारण घटा हो। हमारी स्‍त्री पुरूष की उर्जा। का एक वर्तुल बन गया हो। इसी सब के लिए तो हम पूरे जीवन भर भटकते रहते है। और बार-बार संभोग कर के भी उसे छू भर पाते है और वास नीचे लोट आते है। शायद उस जितना ध्‍यान गहरा गया वो आनंद का चरम था। वैसा अनुभव फिर बाद में कभी नहीं हुआ। हां उस के छोटे-छोटे हिस्सों में कभी नाचते हुए। कभी कोई काम करते हूं, कभी कुछ पढ़ते हुए। या कभी कुछ देखते हुए जरूर महसूस हुए पर वह क्षणिक थे। वह स्‍वाद छू भी नहीं पाता था। कि लोट जाता था। तंत्र भी विचित्र है, जो आप देखते वह सत्‍य नहीं होता। क्योंकि हम बहारी क्रिया को देखते है। और बहारी क्रिया के हम आदी होते है। जो हमें लगता है या महसूस होता है वही हमारा अनुभव है। उसी से हम तोल सकते है। शायद जितना सहज आदमी को उस रस में डुबो देता है। उसका कोई सानी नहीं है। तब पहली बार मैने खजुराहो के बन्‍ने चित्रों को गोर से देखा और समझा। उनका रहस्‍य। वो किस क्रिया में डूबे है और उनके चेहरो पर बरसता आनंद। एक समाधिस्थ व्‍यक्‍ति का दिखाई दे रहा है।
      शायद जिस हम समझते नहीं उसे हम विकसित या बरबाद ही कर देते है। तंत्र जो भगवान शिव की देन है। और जो अध्‍यात्‍मिक की इतनी उँचाई पर पहुंच कर भी खत्म हो गया। उस का कारण हमारा दकियानूसी विचार, या ना समझी है। आज भी हमारे समाज के जाने माने लोग। पुरुषोत्तम दास टंडन और महात्‍मा गांधी की चलती तो खजुराहो और कर्णांक के मंदिर मिट्टी से ढक दिये होते। पर एक बुद्ध पुरूष ने उसे जाना और रोका। श्री रविन्द्र नाथ के हस्‍तक्षेप के कारण आज वो महान धरोहर हमारे लिए खड़ी है।
      इसी तरह दो हजार साल पहले जब तंत्र अपनी उँचाई पर था। और शायद उन्‍ही दिनों ये मंदिर निर्मित हुए। एक ना समझ राज ने उसे विनिष्‍ट कर दिया। राज भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ों की हत्‍या करवा दी। आज हम उस ना समझ महान राज का नाम सम्‍मान से लेते है। क्‍योंकि उसने जो किया वह उन अनेक मूढ़ लोगों को साथ ले कर किया। जो देख रहे थे बहारी आवरण,और प्रक्रिया। कि कोई नग्‍न बैठा है......ओर हमारी समझे कितनी है। पर हमारे पास ताकत है। इसलिए हम महान है। तंत्र शारीर का सदुपयोग करता है, हम तो उसका उपयोग भी नहीं कर सकते। हम शरीर से शरीर मिलाते भी है तो एक बहाव में एक तनाव को छींक की तरह कम करने के लिए। शरीर का मिलन बहार से होता है। और हम बहार ही अटक कर रह जाते है। यहीं हमारी पीड़ा है। हम किसी औरत को कितना ही प्रेम क्‍यो न करे या कोई औरत किसी पुरूष को कितना ही समर्पण क्‍यों न करे पर हमारी एक दूरी बनी ही रहती है।
      पर उस रात एक अदभुत मिलन था। जो कभी किसी प्रेमी को ही नसीब होता होगा। जेसे लेला मजनू, हीर रांझा.....उस रात के बाद बहुत कुछ बदल गया। अचानक ध्‍यान निर्वाह का स्‍वभाव कुछ अजीब सा हो गया मैने उसका चेहरा देखा वह कुछ भय भीत सी दिखाई दी। असल में एक तरफ जो मुझे आनंद दाई लग रहा था, ठीक उसके विपरीत ध्‍यान निर्वाह को जो मिटने का अनुभव हुआ। वह एक दम मोत की तरह था। यानि न हमार मन है न हमारा शरीर है। वो मिटने की अवस्‍था। मृत्‍यु के समान महसूस होती है। पर मेरे पास कुछ अधिक गहराई थी, नाचते हुए। संन्‍यास के समय। कितनी बार मुझे लगता मैं पूरी ताकत लगा कर मिट जाऊं पर में छू-छू कर भी नहीं छू पाता था। और घंटो अवसाद के कारण। मैं रोता रहता था। जो मेरे बस के बाहर की बात थी। पर आज मुझे उस पक्षी की तरह किसी ने अपने कोमल हाथों में कर आसमान पर उड़ा दिया। पहली बार उड़न क्‍या होता है यह महसूस हुआ। पर जोड़े के ध्‍यान में साथ सदा आपके साथ रहे ये कोई जरूरी नहीं है। कब ‘’हम सफर साथ अपना छोड़ चले’’ जब वो उसे छू कर छू नहीं पता है और तड़प कर रह जाता है। पर हम किसी पर जब निर्भर हो जाते है। तो हम लाचार और असाए भी महसूस करते है। यही सब मुझे उन दिनों महसूस होता रहा। पर ये सब मेरे बास के बाहर की बात थी। मुझे उन दिनों मुगल आज़िम का वह संवाद याद आया। जब सलीम अपनी मां जोधा बाई से कहता है। कहो तो तुम्‍हारा दुध जो मेरा खून बन रंगों में बह रहा वह सब आपके कदमों में बहा दूँ। पर उससे बदले मुझसे उसका सूद वसूल न करो। मुझे अपने राज्‍य में से एक कतरा जमीन का मत दो पर अनारकली मुझे भीख में दे दो।
      मुझे लगा कि कोई काश ध्‍यान निर्वाह मुझे कुछ दिन के लिए भीख में दे दे। पर यहां तो इस से भी कुछ होने वाला नहीं था। क्‍योंकि ये शरीर की बात नहीं थी। ये तो अंदर के समर्पण की बात थी। अगर मुझे मां ध्‍यान निर्वाह शरीर भी दे देती तो भी वह मेरी जरूरत को पूरा नहीं कर सकता था। अंदर की बात थी। और वह भी दूसरे के हाथ में.....मैं आपने आप को इतना चरित्र वान समझता था। पर कहीं में अंदर से हिल रहा था। मुझे दुनियां में कुछ नहीं अच्‍छा लगा रहा था। पर में लाचार था। और गिर नहीं सकता था। और मांगने से भी मुझे वो सब नहीं मिलता। जो मुझे चाहिए था। और दूसरी और ध्‍यान निर्वाह एक दम ध्‍यान के विरोध में हो गई। उसके पति ने जब पूछा की तुम ध्‍यान करने क्‍यों नहीं जाती तो वह कहने लगी मैं नहीं करती तुम्‍हारा ध्‍यान वान। उसके पति ने सोचा इसके साथ कुछ गलत हुआ होगा। तब उसने उससे पूछा। तब कुछ हुआ ही नहीं तो वह क्‍या कहती।
      वह मेरे पास भी आया कि वह तो आपके बारे में पता नहीं क्‍या-क्‍या बातें कह रह रही है। पर मैं यकीन नहीं कर सकता की स्‍वामी जी ऐसा कर सकते है। मैंने उससे कहा की ध्‍यान निर्वाह से जो मुझे मिला है। वह कई जन्मों की तपस्‍या के बाद भी नहीं पा सकता था। मैं उसके बारे में आपको कुछ नहीं कहा सकता। हां आपको अगर मुझ पर यकीन नहीं हो तो मैं खुद आपके घर आ सकता हूं। वो चाहे जो मेरे बारे में बोले। मैं उस का उत्‍तर दूँगा। हम लोग यानि मैं और अदवीता उसके घर पहुँचे। हम चारो बैठे थे। तब उसके पति ने कहां की अब बतलाओ तुम जो मुझे कह रही थी। कि तुम्‍हारे साथ जो कुछ हुआ है। पर वह कुछ भी नहीं बोली।  मैं केवल सामने बैठा था। मैंने कहां ध्यान निर्वाह तुम मेरे लिए देवी हो। मां के दरजे से भी ऊपर हो। में जनम भर तुम्‍हारे पैरों पर मथा टेक सकूँ तब भी तुम्‍हारे ऋण से मुक्‍त नहीं हो सकता। तुम ध्‍यान को मत छोड़ो। चलो किसी के साथ मत करों। पर ये जरा सी बाधा है इसे किसी तरह तुम तोड़ दो फिर सामने खुला समुद्र है। फिर तुम्‍हें कोई नहीं रोक सकता। नदी समुद्र में गिरने से कतरा रही थी। मेरे साहस के सामने वह फिर तैयार हुई। और अब हमने समय निर्धारित कर लिया रात दस बजे। तुम आपने घर बैठ कर ध्‍यान करना और मैं अपने ध्‍यान के कमरे में। और दोनों ऐसा भाव करेंगे की हम एक दूसरे के समने है। हमनें कई बार वह प्रयोग किया। वह इतना घनीभूत अनुभूति थी। की ध्‍यान निर्वाह बार-बार बताती की स्‍वामी जी मेरे सामने आकर बैठ जाते है। मेरी पीठ पर और सर पर हाथ फेरते है। और उनकी मौजूदगी मुझे घेर लेती है। उनकी सुगंध मेरे नासापुट में समा जाती है। और मेरा तन मन उनकी छुअन को महसूस कर रहा होता है। पर शायद उनके पति देव गगन को यकीन नहीं हो रहा था। एक दिन वह मेरे पास मिलने के लिए आया हुआ था। वह यहां मेरे साथ कभी-कभी फर्श की घिसाई करवाता था। तब उसने पूछा स्‍वामी जी आप ये दूर से बैठ कर ध्‍यान करने वाली बात बताते है। तब मुझे यकीन नहीं आता। मैंने उसे कहां की ऐसा करना कल तुम मत आना। और दिन में ठीक तीन बजे में ध्‍यान करना शुरू करूंगा। और वहां जो भी हो मुझे अगले दिन आकर बतलाना।
      वह तीन बजे का इंतजार करने लगा। ठीक तीन बजे ध्‍यान निर्वाह ने आंखे बंद कर ली। तब उनके पति ने प्रयोग के लिए उनके साथ शारीरिक संबंध करने की कोशिश की जब की हमने उन से गुजारिश कर रखी थी की आप एक दूसरे से दूरी रखना पवित्रता रखना। आपस में शरीर संबंध मत बनाना। क्‍योंकि फिर हमारी उर्जा जो एक दूसरे के शरीर में बह कर घंटो कार कर रही थी वह विक्रीत हो जायेगी। अगर तुम दोनों शरीक संबंध करते हो तो तुम्‍हारे ओर उसके शरीर का शरीर का रसायन बदल जायेगा।  उसके दिन उसके पति ने उसके साथ। शारीरिक संबंध बनाया। पर वह हिली भी नहीं वह ध्‍यान के वशीभूत थी, एक मुर्दे की भाति पड़ी रही और काम क्रिया होती रही। उसके पति ने बाद में बताया। की मुझे गिलानि हो रही है। मैने एक लाश के साथ संभोग किया है। और उनकी पत्‍नी से जब पूछा गया की तुम्‍हें कैसा लग रहा था। तब उसने कहां की मुझे तो ध्‍यान में बजने वाला संगीत सुनाई दे रहा था। और में देख रही थी कोई मेरे शरीर के साथ छेड़ छाड़ कर रहा है। और मेरी दूरी लगातार बनी हुई है। और सबसे अधिक अचरज तो मुझे इस बात का हुआ की में अपने को शरीर से अलग महसूस करने के बाद भी पूर्ण महसूस कर रही हूं। जब कि जानती हूं शरीर मुझे दूर हे। मेरे हाथ-पैर मुझे से दूर है। फिर भी में आपने को पूरा का पूरा महसूस कर रही थी। अब ये बात तो मेरे और स्‍वामी ध्यान गगन के सिवाय कोई नही जानता था की में यहां बैठ कर ध्‍यान कर रहा हूं। तब अगले दिन वह आया और उसने माफ़ी मांगी। उसे पश्‍चाताप भी था। मैंने उसे समझाया की गलत तो हुआ है। पर तुम्‍हारी परीक्षा थी। तुम्हें शाक था। उसका निवारण हो गया। पर अब हम एक दूसरे के साथ गहरे नहीं जा सकते है। तुमने अनजाने में या अपने शक के कारण अवरोध खड़ा कर दिया।
       और ठीक वहीं हुआ वह परीक्षा उस बेचारी पर भारी पड़ी। परीक्षा और तरह से भी ली जा सकती थी। उसे खड़ा किया जा सकता था। किसी काम के लिए कहा जा सकता था। पर उसका पति भी लाचार था। क्‍योंकि करीब तीन-चार महीने से उन लोगों ने शारीरक संबंध नहीं बनाया था। हमारा मन किसी भी मौके को जाने देना नहीं चाहता है। इसका परिणाम बहुत उलटा हुआ। एक दिन जब दोनों पति पत्‍नी फिर हमारे घर आये। उनका पति कहने लगा कि यही ज़िद्द कर के ले आई है। मुझे स्‍वामी जी के पास जाना है। और तुम मेरे साथ चालों। उसका पति तो रात को चला गया। पर वह नहीं गई। उस दिन मैंने उसके साथ बैठ कर ध्‍यान नहीं किया। हमनें अलग-अलग बैठ कर ध्‍यान किया।  मैं समझ गया था। मैंने अपना मार्ग खूद बनाना है किसी के कंधे पर बैठ कर या उसके सहारे से नदी पर करना लगभग असम्‍भव ही है। गांव में एक कहावत है पराई छाछ पर मुछ मत कटवाँओ। लेकिन वह मेरे अचेतन में इतने गहरे उतर गई थी। उसकी उर्जा मेरे गहरे में जा कर बस गई थी। जो मेरे मन के बस के बहार की बात थी। में  कितना भी सोचता। पर सब विचार सब बातें बेकार की लगती।
      पर मैं हार मानने वाला नहीं था। और ये सब मेरे होश के कारण ही लगता था। वरना अगर कोई औरत आपके इतने गहरे चली जाये तो आप कुछ नहीं कर सकते। मैंने करीब छ: महीने तक उसकी उर्जा निकालने की जी तोड़ कोशिश की। ध्‍यान निर्वाह भी समझ गई। पर उसके जीवन में जो सुना पन आया। वह उस दिन के उनके पति के सहवास ने एक नया रूप दे दिया। औरत जब तक मां न बने तब तक वह अधूरी रहती है। खास कर समाज में। अब उसका ध्‍यान इधर से हट कर बच्‍चे की ललक में चला गया। और वह अपने पति से बार-बार कहती की घर सूना लगता है। मां भी बार-बार कहती है। अभी तक तुम्‍हारा पाँव भारी नहीं हुआ तुमने कुछ इस्‍तेमाल तो नहीं कर रखा है।
      इस तरह साल से भी ज्‍यादा समय गुजर गया। मेरा शरीर धीरे-धीरे अंदर से खोखला होता जा रहा था। उस गहराई से निकलने में मुझे बहुत जद्दोजहद करनी पड़ रही थी।  इस बीच पति पत्‍नी कई बार आये उन्‍होंने ध्‍यान भी किया। हमारे साथ पूना भी गये। वहां सब ने सन्‍यास लिया। समय चला जा रहा था। पर कारवां में मोजे दरियाँ नहीं थी। उस के बहाव में वो मधुरता वह उत्‍सव नहीं था। जो छ: महीने पहले था। रास्‍ता वो फूलों भर न होकर एक साधारण डगर बन गया था। संन्‍यास के समय भी वह उदास थी, नहीं लेना चाहती थी सन्‍यास बार-बार बहाना बना रही थी। और कह रही थी की मेरा मन लग रहा है जी चाहता है कही दूर भाग जाऊं यहां से। शायद वह संन्‍यास भी एक औपचारिकता भर रह गया। दिन गुजरते रहे। मैं अपने को भार हिन करने के प्रयास में रत था। इन्‍हीं दिनों मेरे सिने के बाल अचानक सफेद हो गये थे। उन्‍हीं दिनो न जाने क्‍या रसायन बदला मेरे सिने पर एक तरह की जूं की तरह का प्राणी पैदा हो गये। जो चमड़ी और बालों की जड़ों पर चिपटी रहती थी। मुझे अंदर से कुछ भी अच्‍छा नहीं लगता था। करने को में सब काम करता था। पर लगता था अंदर प्राण नहीं है। केवल श्‍वास चल रही है। अदवीता ने मेरा बहुत ख्‍याल रखा।  मेरी हर संभव मदद की। मेरी पीड़ा और उलझन को वह समझती थी। और शायद उसके सहयोग और विश्‍वास ने ही मुझे उभरने में मदद की। उन दिनो के बारे में बाद में मुझे बतलाया था।  कि मुझे बहुत डर लगता था आपकी वह हालत देख कर। तुम मुझे ऐसे लगते थे की मिट रहे हो। तुम्‍हारी आंखें सुनी हो गई थी। पर शायद ध्‍यान और गुरु ने मेरी मदद की।
      एक दिन शायद उनके पति का जन्‍म दिन था। मुझे और अदवीता को उन लोगों ने आपने घर बुलाया।  उस घटना के बाद हम कम ही उनके घर जाते थे। वो लोग ही महीने में एक बार या दो बार आ जाते थे। खाना खाने के बाद हम सब बैठे थे। कुछ और लोग भी आये थे। ध्यान की पूना की बातें चल रही थी। कि किस तरह हम पूना से मुम्‍बई गये। और वहां स्टीमर में बैठ कर ऐलफेंटा की गुफाओं को देखी था। पुरानी बातें हमारे भाव पर ज़मीं गर्द हट जाती है और उन्हे हम फिर जीवित कर रहे होते है। मैंने देखा जिस तरह हम पुरानी बातें को याद करते है। हमारी भाव दशा भी लगभग वहीं हो जाती है। कुछ क्षण के लिए हम वहीं पर पहुंच जाते है। उसी ज़मीं पर और उसी दिशा में वहीं पर हम जा कर खड़े हो जाते है। वैसा ही रस या दु:ख हम महसूस कर सकते है। इसी लिए बचपन की उन यादों को याद कर हम अपने बचपन में पल भर के लिए पहुंच जाते है। इसी लिए सबको पुरानी बातों में बहुत रस होता है।
      तब शायद मैने एक बार ध्‍यान निर्वाह  को कहां था। देखना इस बार चित्र लेखा हार जायेगी। उन लोगों की समझ में नहीं आया। पर मैं जानता था। हमेशा ही इतिहास में वो सब नहीं घटता, कभी- कभी उस में बदलाव भी आ जाता है। और ऐसा ही हुआ। पर इसके लिए मुझे जितनी पीड़ा और संताप से गुजरना पडा। में उसे आप को बता नहीं सकता। पर मैंने उस दिन दृढ़ संकल्प कर लिया था की अब किसी के सहारे से ध्‍यान की गंगा को पार नहीं करना ही बेहतर है। ये तंत्र की प्रकिया बहुत कम कामयाब हुई है। क्‍योंकि मार्ग बहुत लम्‍बा है। रास्‍ते में अवरोध बहुत है। और पहुंचना बहुत दूर है। आपका साथी कभी भी थक सकता है। मार्ग बदल सकता है। आपकी इतनी मेहनत। सब बेकार हो जाती है। हां एक गहराई तो मिलती है। सफ़र भी तय किया जाता है। पर ये ऐसा समझो आप जा रहे है हरियाली भरे रास्‍ते से। चारों और पक्षियों की आवाज है। कल-कल करते सीतल झरने है। फूल-फल है। हरियाली है। छांव है। और अचानक आप पहुंच जाते हो एक रेगिस्‍तान में। तब आपको उसके अनुकूल ढलने में सालों लग सकते है। शायद आप उस परिवर्तन को सह नहीं पाओ तो आप मिट भी सकते हो।
      एक श्‍याम वो अकेली आई। हमनें समझा की शायद पति पत्‍नी में कुछ अनबन हो गई होगी। रात हमनें ध्‍यान किया खाना खाया। अब हम अलग-अलग ध्‍यान करते थे। उसे बुरा भी लगता था। ध्‍यान की वो उँचाई वह जो संग बैठ कर महसूस कर पाता थी। अब उस को छू भी नहीं पाती। पर अब किया भी क्‍या जा सकता है। ध्‍यान से समर्पण है एक पवित्रता है एक पूजा है। कोई भोग नहीं। इस प्रेम की तरह जबरदस्‍ती नहीं किया जात सकता है। ये तो कभी किसी का रसायन मिल जाता है। या हो सकता किसी जन्‍म में दोनों का संग साथ हुआ हो। वरना ध्‍यान का जोड़ा मैंने पूरे जीवन में दूसरा नहीं देखा। उसके बाद जब सोने का समय हुआ तो वह कहने लगी दीदी में स्‍वामी जी के पास सो जाऊं। उस समय तक में आपने को कछुवे की तरह समेट रहा था। किसी तरह से उस उर्जा से अपने को मुक्‍त करना चाह रहा था। मैं उस सब के लिए तैयार नहीं था। पर आपके तैयार होने न होने से कुछ नहीं होता। हम अपना सारा जीवन जीते है दूसरों के लिए। अपने लिए तो हमारे पास समय ही नहीं है। जो अपने लिए जाने की कला को जान लेता है। उसे हम स्वार्थी कहते है। सही मायने में वह अपने में डूब रहा है। अपना अर्थ जानना चाहता है। वह किसी का बुरा नहीं करता। पर अपने समय की एक-एक बूँद बर्बाद नहीं करना चाहता। वह अपने तल को उपर उठाना चाहता है। आज शायद वह गाली जैसा लगता हो पर किसी जमाने मैं स्‍वार्थी को बड़े मान सम्‍मान से देखा जाता था। स्‍वार्थी-मतलबी का पर्यायवाची नहीं है। मतलबी-का शब्‍द है अँगरेजी मे सेल्‍फिस स्‍वार्थी सेल्फिस नहीं होता। वह डूब रहा है अपने में लोग कहते थे। वह जा रहा स्वयं के अर्थ की खोज में, उन्‍हें मत सताएं, उसे न रोके, उसे जाने दे, डूबने दे अपने में।
      पर आज की रात मुझे पता था मुझ पर भारी होगी। वह आई मेरे साथ सोने के लिए। पर हमारी भाव दशा हमारे अंदर ही नहीं हमारे तन हमारी गतिविधियों में भी कितना परिर्वतन कर देते है। आज उसकी छूआन में वह प्रेम नहीं था। वह कुछ देर तो लेटी रही पर ज्‍यादा सब्र नहीं कर सकी। और मुझसे कहने लगी स्‍वामी जी में आप से एक चीज मांग तो क्‍या तुम मुझे दोगे। मैंने कहां ऐसा क्‍यों सोचती हो। तुमने मुझे इतना दिया। जिस की कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता। फिर तुम्‍हारे मन में ये प्रश्न क्‍यों आया। वह कहने लगी नहीं तुम पहले वादा करो। मैं समझ गया जरूर कुछ उलझन भरा प्रश्न है। मैं उसके सर पर हाथ फेरा। और अपने ज्‍यादा नजदीक लाते हुए कहा। कल सुबह बात करेगी। किसी बात को ले कर तुम्‍हारी अन बन तो नहीं हो गई है। तब वह रोने लगी। मेरे लाख चुप कराने से  भी वह चुप नहीं हो रही थी।
      मेरे देखे आध्‍यात्‍मिक में मनुष्‍य के एक ही वासना सबसे खतरनाक है। वह होने की। जैसे-जैसे ध्‍यान गहरा होता जाता है। कहीं मिटने का भय सतानें लग जाता है। तब आदमी तो गुरु बनना चाहता है। और औरत उत्पती कर के अपने को बचाना चाहेंगी। क्‍यों स्‍त्री का स्‍वभाव नहीं है। गुरु बनने का, आज जो नारी आप गुरु देख रहे है। उनका का मन पुरूष प्रधान है। वरना आप पूर्ण महिला स्‍वभाव की स्‍त्री को नहीं पा सकोगे गुरु। उसने मेरे सीने में मुहँ छुपा कर कहा की आप मेरी बात को मना मत करना। मैने कहां नहीं, पर ये बात हम सुबह कर ले तो कैसा होगा। तब उसने कहां की रोशनी में मैं आपके सामने कह नहीं पाऊँगी। इस लिए अंधेरे को मैं चून रही हूं। आप मुझे बस एक संतान दे-दे। मैं पहले ही समझ गया था। जिस दिन उसके पति ने ध्‍यान प्रयोग के बीच संभोग किया था। ये बीज उसी समय उग गया था। खेत में खरपतवार को सींचने की जरूरत नहीं होती और न ही उगाने की वह खुद बखुद उग जाती है। असल में चाहे ये प्रयोग देखने में अपवित्र लगे पर इस में भी उतनी ही पवित्रता चाहिए। और शायद तंत्र दूसरी साधना से भी अधिक पवित्रता मांगता है। आप सोचते होगें ये प्रयोग मेंने अपनी पत्‍नी के साथ क्‍यों नहीं किया। बात आपकी सही है। पर जब हम ध्‍यान करते है। और हमारा मनस शरीर एक दूसरे में विलय होता है। तब हमारे स्थूल शरीर पर वह उर्जा इकट्ठी होती है। जो अंदर की यात्रा पर हमारा साथ देगी। अगर हम उस उर्जा का दूर उपयोग कर के शरीर के तल पर उतर जाते है तो हम उस आगे नहीं जा सकते। और यही होता है ध्‍यान करने वाले करोड़ो के साथ। हम पति पत्‍नी का शारीरक मिलन उस में बाधा डालता था। क्‍यों हम जैसे ही शरीर के पार जाना चाहते। शरीर पर भोगी हुई वासना उसमें छेद कर देती। हम वहां उर्जा इकट्ठी ही नहीं कर पाते थे। और न पवित्रता का भव उठ पाता था। और न ही सेक्‍स उठ पाता था। क्‍योंकि हमने एक दूसरे के शरीर को भोगा हुआ था।  कठिन है लेकिन कभी-कभार कोई योगी पत्‍नी के साथ भी उस दूर की यात्रा पर निकल सकता है। और एक अंजान जिसे तुम नहीं जानते जिस के साथ तुम्‍हारा शरीक संबंध नहीं है। एक निश्‍छल प्रसाद भरी अनुभूति है।  एक क्वाँरी है। और इस लिए मैंने उनके पति को कहा था कि आप दोनों शरीक संबंध थोड़े दिन मत करना। क्‍योंकि फिर गहरे तलों पर जो हमारी उर्जा काम करती है।  वह स्थूल शरीर पर ही जाकर रूक जाती है। और नहीं तो ये केवल मन का खेल बन कर रह जाता है। और ध्‍यान के नाम पर हम भी वहीं सब कर रहे होते है, शारीरिक वासना। भ्रमित बना कर भटक जाते है। और उपरी दिखाव भर करने वाली बात रह जाती।
      जब हम एक दूसरे के अति नजदीक होते तब हमारे शरीर पर जो सेक्‍स उठता है, उसे हमने रोकना नहीं है उसे उठने देना है। उस का साधन की तरह उपयोग करना है। पर आज सब खराब हुआ जा रहा था। उसकी मांग बहुत पेचीदा और भटकन भरी थी। उसने अपने चेहरे को अपने हाथों में छुपा कर एक नजाकत भरी अदा के साथ थोड़ा शरमाई। और कहने लगी......स्‍वामी जी हम आप से एक संतान चाहते है। इस बात को मैं पहले ही समझ गया था। की क्‍या मांग हो सकती है। और इससे पहले ये अनुभव मेरे जीवन में तीन बार पहले भी आ चुका था। प्रकृति का ये रहस्‍य बहुत बेबूझ है। जब आपके सामने कोई औरत एक उत्‍पती की गुहार करती है। तब आप अकेले खड़े होते हो...सारा आस्‍तित्‍व आपके सामने। और इसे ठुकराना शायद दुनियां का सबसे पेचिदा और अशोभनीय काम है। पर मैं बच सका। क्‍योंकि मैं सब नहीं चाहता था। इतनी पवित्रता और उंचाईयों पर चल कर कोई नहीं गिरना चाहेगा। पर मैं उसका दिल भी नहीं दुखाना चाहता था।
      उस संग मुझे वो मिला जिसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं पा सकता था। अनमोल थी देन उसकी। मैंने उसके सर पर हाथ फेरा। और कहां-तुम ये जो कहा रही हो। अपने होश में कहा रही है। उसने कहा हां। पर एक बात है। अगर हम ऐसा करो गी तो तुम्‍हारे पति और मेरी पत्‍नी का विश्‍वास उठ जायेगा हम से और ध्‍यान से। फिर ये बात एक पवित्र ने रह कर कुरूप हो जायेगी। और बाद में शायद तुम्‍हें जीवन भर पछताना पड़े। घुटना पड़े और तुम नफरत करों मुझसे अपने आपसे या उस संतान से। इससे पहले इस पर विचार करना जरूरी है। और तुम जानती हो ये बातें छुपती नहीं है। तुम्‍हारी मांग सही है। तो हमे मार्ग भी सही चुनना होगा। उसकी समझ में नहीं आया। मार्ग और कौन सा मार्ग हो सकता है। मैंने कहां अगर ऐसा होना ही होगा तो तुम्‍हें अपने पति को ये सब बताना होगा। और मैं अपनी पत्‍नी को ये सब बतालाऊंगा। हम दो नहीं पाँच होंगे एक तुम और तुम्हारा पति, मैं और मेरी पत्‍नी और बीच में होंगे हमारे गुरू। हम ध्‍यान के संग ये संभोग करेंगें। ये कोई भोग नहीं होगा। एक पूजा होगी। हम आने वाले के लिए आनंद का मार्ग देंगे। और कोशिश करेंगे की हम में उस समय वासना न उठे एक पवित्रता बनी रहे। एक पवित्र क्षण में आहवन करेंगे। किसी पवित्र आत्‍मा का। में कोई भी ऐसा काम नहीं सकूंगा जिस के कारण तुम्हें बाद में पछताना पड़े।
      वह थोड़ी उदास हो गई। और कहने लगी अपने पति को बाद में बतलाऊ तो कैसा रहेगा। हां दीदी (अदवीता) को हम पहले बता सकते है। मैंने कहा पर ऐसा क्‍यों। उस बेचारे को भी तो इतना हक होना चाहिए। वह तुम पर और मुझ पर कितना विश्‍वास करता है। तुम्‍हें रात भर के लिए मेरे पास भेज देता हे। उस के मन पर क्‍या गुजरेगी। क्‍यों हम थक जाते है। एक खास ऊँचाई पर पहुंच कर। क्‍यों हमारे फेफड़े फूल जाते है, हमारी साँसे....हमारे बस के बाहर हो जाती है हमारी ही पकड़। माना थकावट और भय है उँचाई पर आनंद और उन्‍माद क्‍या कम है। बस एक बार हिम्‍मत कर के पंख ही तो खोलने होते है। फिर तो बस उड़ना ही समझो......कितने साथियों को उस उँचाई से भय खाते देखा और वो लोट कर चले गये। शायद वहीं वह जगह है। जहां हमें चाहिए गुरु का भरोसा। और भरोसा आयेगा समरपर्ण से। मेरे देखे जिस के समर्पण में जरा भी खोट होगा। या अपने को अधिक चतुर समझेगा। वह इस मार्ग...की पगडंडी से डर जायेगा। पहली बार जब पक्षी दूर बैठ कर अपने बच्‍चे को बुलाता है। गीत गा कर...लुभा कर। तब उसे करना होता है अपनी मां का विश्‍वास उस का भरोसा। और कूद पड़ना होता है। उस अनंत आकाश में उसे पता नहीं है अपने पंखों का पर एक भरोसा है। और यही भरोसा ओर हिम्‍मत एक दिन रंग लाती है। और वह उड़ चलता है आसमान में । बस एक कदम की दूरी है। समर्पण और विश्‍वास में।
      और पा लिया तुमने अनंत आसमान। लेकिन अगर तुम्‍हें भरोसा नहीं है तो तुम मुड़ जाते है। आज मेरा प्‍यार और सत्‍कार उन मित्रों के साथ है। जो रूक गये है। जो उड़ सकते थे....पर उड़ना तो उन्‍हें पड़ेगा। देर कितनी भी लग जाये। पर जो उंचाईयों उन्‍होंने छुई है। वह नजारा भूल तो हम नहीं सकते। वह खिचता रहेगा। बुलाता रहेगा। लुभाता रहेगा, और अंदर एक मधुर राग गा-गा कर तुम्‍हें पुकारता ही रहेगा। जन्‍म–जन्‍म, तुम रूक नहीं सकते। मुंह फैर सकते हो पर कितनी देर के लिए.......यही प्रश्न है समय का।
मेरा प्रेम....और पूकार है उन सब मित्रों को
गुरु गा रहा है गीत,और बुला रहा है उस छौर
बस थोड़ा और एक कदम और छोड़ दो अपने को
फिर देखो उन रहस्‍यों को, अनछुए पलों को
जो कर रहे है तुम्‍हारा सदियों से इंतजार।

     ‘’उतरो कामवासना में, लेकिन ऐसी श्रद्धा से स्‍त्री का संग करो कि स्‍त्री देवी जैसी ही हो; यह कामुकता नहीं होती। और उस आदमी को जो की स्‍त्री के संग होता है, उसकी पूजा करनी होती है, उसके पाँव छूने होते है। और यदि हलकी सी भी कामवासना उठने लगती है। तो वह अयोग्‍य हो जाता है; तो वह अभी इसके लिए तैयार नहीं है।
     यह एक बड़ी तैयारी थी—कठिन परीक्षा थी जो कि कभी निर्मित की गई मनुष्‍य के लिए। कोई आकांशा नहीं कोई वासना नहीं,उसे स्‍त्री के प्रति ऐसी भाव दशा रखनी पड़ती जैसे कि वह उसकी मां हो।
(ओशो......पतंजलि: योग-सूत्र—3)

स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’