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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—35

जनसंख्‍या विस्‍फोट
    
प्रश्‍नकर्ता: भगवान श्री, परिवार नियोजन के बारे में अनेक लोग प्रश्‍न करते है कि परिवार द्वारा अपने बच्‍चों की संख्‍या कम करना धर्म के खिलाफ है। क्‍योंकि उनका कहना है कि बच्‍चे तो ईश्‍वर की देन है, और खिलाने वाला परमात्‍मा है। हम कौन है? हम तो सिर्फ जरिया है, इंस्टूरूमेंट है। हम तो सिर्फ बीच में इंस्‍टुमेंट है, जिसके ज़रिये ईश्‍वर खिलाता है। देने वाला वह, करने वाला वह, फिर हम क्‍यों रोक डालें? अगर हमको ईश्‍वर ने दस बच्‍चे दिये तो दसों को खिलाने का प्रबंध भी तो वहीं करेगा। इस संबंध में आपका क्‍या विचार है?    

     भगवान श्री: सबसे पहले तो धर्म क्‍या है इस संबंध में थोड़ा सी बात समझ लेनी चाहिए।
      धर्म है मनुष्‍य को अधिकतम आनंद, मंगल और सुख देने की कला।
      मनुष्‍य कैसे अधिकतम रूप में मंगल और सुख को उपलब्‍ध हो, इसका विज्ञान ही धर्म है।
      तो, धर्म ऐसी किसी बात की सलाह नहीं दे सकता, जिससे मनुष्‍य के जीवन में सुख की कमी हो। परमात्‍मा भी वह नहीं चाह सकता, जिससे कि मनुष्‍य का दुःख बढ़े, परमात्‍मा भी चाहेगा कि मनुष्‍य का आनंद बढ़े। लेकिन परमात्‍मा मनुष्‍य को परतंत्र भी नहीं करता क्‍यों? क्‍योंकि परतंत्रता भी दुःख है। इसलिए परमात्‍मा ने मनुष्‍य को पूरी तरह स्‍वतंत्र छोड़ा है। और स्‍वतंत्रता में अनिवार्य रूप से यह भी सम्‍मिलित है कि मनुष्‍य चाहे तो अपने लिए दुःख निर्माण कर ले, तो परमात्‍मा रोकेगा नहीं।
      हम अपना दुःख भी बना सकते है, और सुख भी। हम आनंदमय हो सकते है और परेशान भी। यह सारी स्‍वतंत्रता मनुष्‍य को है। इसलिए यदि हम दुःखी होते है, तो परमात्‍मा जिम्‍मेदार नहीं है। उस दुःख के कारण हमें खोजने पड़ेंगे और बदलने पड़ेंगे।
      मनुष्‍य ने दुःख के कारण बदलने में बहुत विकास किया है। एक बड़ा दुःख था जगत में कि मृत्‍यु की दर बहुत ज्‍यादा थी। दस बच्‍चे पैदा होते थे तो नौ बच्‍चे मर जाते थे। खुद का मरना भी शायद दुखद न होगा। जितना दस बच्‍चो का पैदा होना और नौ कर मर जाना। तो मां बाप बच्‍चों के जन्‍म की करीब-करीब खुशी ही नहीं मना पाते,मरने का दुःख मनाते ही जिंदगी बीत जाती थी।
      तो मनुष्‍य ने निरंतर खोज की और अब यह हालत आ गई है कि दस बच्‍चों में से नौ बच सकते है। और कल दस बच्‍चे भी बचाये जा सकते है। दस बच्‍चे में से नौ बच्‍चे मरते थे तो एक आदमी को अगर तीन बच्‍चे बचाना हो तो कम से कम औसतन तीस बच्‍चे पैदा करने होते थे। तब तीस बच्‍चे पैदा होते तो तीन बच्‍चे बचते थे।
      अब मनुष्‍य ने खोज कर ली है नियमों की और वह इस जगह पहुंच गया है कि दस बच्‍चों में से नौ बच्‍चे जिन्‍दा रहेंगे; दस भी जिंदा रह सकते है। लेकिन, आदत उसकी पुरानी पड़ी हुई है—तीस बच्‍चे पैदा करने की।
      आज परिवार नियोजन जो कह रहा है ‘’दो या तीन बच्‍चे बस’’ यह कोई नई बात नहीं है। इतने बच्‍चे तब भी थे। इससे ज्‍यादा तो कभी होते ही नहीं थे। औसत तो यहीं था, तीन बच्‍चों का। और 27 बच्‍चे मर जाते थे। फिर 27 बच्‍चों के मर जाने से तीन का सुख भी समाप्‍त हो जाता था। तो हमने व्‍यवस्‍था कर ली कि हमने मृत्‍यु दर को कम कर लिया। वह भी हमने परमात्‍मा के नियमों को खोज कर किया। वे नियम भी कोई आदमी के बनाये नियम नहीं है। अगर बच्‍चे मर जाते थे तो वे भी हमारे नियम की नासमझी के कारण मरते थे। हमने नियम खोज लिया है। बच्‍चे ज्‍यादा बचा लेते है। बच्‍चे जब हम ज्‍यादा बचा लेते है तो सवाल खड़ा हुआ कि इतने बच्‍चों के लिए इस पृथ्‍वी पर सुख की व्‍यवस्‍था हम कर पायेंगे? इतने बच्‍चों के लिए सुख की व्‍यवस्‍था इस पृथ्‍वी पर नहीं की जा सकती।
      बुद्ध के समय में हिंदुस्‍तान की आबादी दो करोड़ थी। आज हिंदुस्‍तान की आबादी 50 करोड़ के ऊपर है। जहां दो करोड़ खुशहाल हो सकते थे वहां, 50 करोड़ लोग कीड़े मकोड़ों की तरह मरने लगेंगे। और परेशान होने लगेंगे। क्‍योंकि जमीन नहीं बढ़ती। जमीन के उत्‍पादन की क्षमता नहीं बढ़ती। आज पृथ्‍वी पर साढ़े तीन खरब लोग है, यह संख्‍या इतनी ज्‍यादा है कि पृथ्‍वी संपन्‍न नहीं हो सकती। इतनी संख्‍या के होते हुए भी हमने मृत्‍यु दर रो ली है। उस वक्‍त हमने न कहां की भगवान चाहता है कि दस बच्‍चे पैदा हो और नौ मर जाये। अगर हम उस वक्‍त कहते तो भी ठीक था। उस वक्‍त हम राज़ी हो गये। लेकिन अब हम कहते है कि हम बच्‍चे पैदा करेंगे, क्‍योंकि भगवान दस बच्‍चे देता है। यह तर्क बेईमान तर्क है। इसका भगवान से धर्म से कोई संबंध नहीं है। जब हम दस बच्‍चे पैदा कर के नौ मारते थे। तब भी हमें यहीं कहना चाहिए था। हम न बचायेंगे। हम दवा न करेंगे। हम इलाज न करेंगे। हम चिकित्‍सा की व्‍यवस्‍था न करेंगे।
      चिकित्‍सा की व्‍यवस्‍था इलाज,दवाएं सबकी खोज हमने की, जो कि बिलकुल उचित ही है और इसको निश्‍चित ही भगवान आशीर्वाद देगा। क्‍योंकि भगवान बीमारी का आशीर्वाद देता हो, और इतने बच्‍चे पैदा हों और उनमें अधिकतम मर जायें। इसके लिए उसका आशीर्वाद हो, ऐसी बात जो लोग कहते है, वे धार्मिक नहीं हो सकते। वे तो भगवान को भी क्रूर,हत्‍यारा और बुरा सिद्ध कर देते है।
      अगर बच्‍चे मरते थे तो हमारी नासमझी थी। अब हमने समझ बढ़ा ली, अब बच्‍चे बचेंगे। अब हमें दूसरी समझ बढ़ानी पड़ेगी कि कितने बच्‍चे पैदा करें। मृत्‍यु दर जब हमने कम कर ली तो हमें जन्‍म दर भी कर करनी पड़ेगी, अन्‍यथा नौ बच्‍चों के मरने से जितना दुःख होता था, दस बच्‍चों के बचने से उससे कई गुणा ज्‍यादा दुख जमीन पर पैदा हो जायेगा।
      आदमी स्‍वतंत्र है अपने दुःख और सुख के लिए।  
      वह आदमी की बुद्धिमत्ता पर निर्भर है कि वह कितना सुख अर्जित करे या कितना दुःख अर्जित करे।
      तो अब जरूरी हो गया है कि हम कम बच्‍चे पैदा करे। ताकि अनुपात वही रहे जो की पृथ्‍वी संभाल सकती है।
      और बड़े मजे की बात है कि हम भगवान का नाम लेते है तो यह भूल जाते है कि अगर भगवान बच्‍चे पैदा कर रहा है तो बच्‍चों को रोकने की जो कल्‍पना, जो ख्‍याल पैदा हो रहा है, वह कौन पैदा कर रहा है। अगर डाक्‍टर के भीतर से भगवान बच्‍चे को बचा रहा है तो डाक्‍टर के भीतर से उन बच्‍चों को आने से रोक भी रहा है। जो की पृथ्‍वी को कष्‍ट में दुख में डाल देंगे।
      अगर सभी कुछ भगवान का है तो यह परिवार नियोजन का ख्‍याल भी भगवान का ही है।
      और मनुष्‍य की यह आकांशा कह हम अधिकतम सुखी हों, यह भी इच्‍छा भगवान की ही है।
      अधिकतम सुख चाहिए तो परिवार का नियमन चाहिए।
      परिवार नियोजन का और कोई अर्थ नहीं है—इसका अर्थ इतना ही है कि पृथ्‍वी कितने लोगों को सुख दे सकती है। भोजन दे सकती है। उससे ज्‍यादा लोगों को पृथ्‍वी पर खड़े करना, अपने हाथ से पृथ्‍वी को नरक बनाना है।
      पृथ्‍वी स्‍वर्ग बन सकती है, नरक बन सकती है—और यह आदमी के हाथ में है।
      जब तक आदमी ना समझ था तो प्रकृति की अंधी शक्‍तियां काम करती थी। बच्‍चे कितने ही पैदा कर लो, मर जाते थे। बीमारी आती थी, महामारी आती थी। प्‍लेग आता था, मलेरिया आता था, और बच्‍चे विदा हो जाते थे। युद्ध होता। आकाल पड़ता भूकम्‍प होते और बच्‍चे विदा हो जाते थे।
      मनुष्‍य ने प्रकृति की ये सारी विध्‍वंसक शक्‍तियां पर बहुत दूर तक कब्‍जा पा लिया है। प्‍लेग नहीं होगा, महामारी नहीं होगी, मलेरिया नहीं होगा, माता नहीं होगी, आकाल नहीं होगा, और बच्‍चे मरने नहीं देंगे। पिछला अकाल जो बिहार में पडा उसमें अनुमान था कि कोई दो करोड़ लोगों की मृत्‍यु हो जायेगी;लेकिन मरे केवल 40 आदमी। तो आकार भी जिन लोगों को मार सकता था उनको भी हमने सब भांति बचा लिया।
      तो हमने प्रकृति की विध्‍वंसक शक्‍ति पर तो रोक लगा दि और उसकी सृजनात्‍मक शक्ति पर अगर हम उसी अनुपात में रोक न लगाये तो हम प्रकृति का संतुलन नष्‍ट करने वाले सिद्ध होंगे।
      परमात्‍मा के खिलाफ कोई काम हो सकता है तो यह है प्रकृति का संतुलन नष्‍ट हो जाये। तो, जो लोग आज संख्‍या बढ़ा रहे है, जमीन की क्षमता से ज्‍यादा वे लोग परमात्‍मा के खिलाफ काम कर रहे है। क्‍योंकि परमात्‍मा का संतुलन बिगड़ने दे रहे है।    
      प्रकृति का संतुलन बचेगा,अगर प्रकृति की सृजनात्मक शक्‍तियों पर भी उसी अनुपात में रोक लगा दें, जिस अनुपात में विध्‍वंसक शक्‍तियों पर रोक लगा दी है। तो अनुपात वही होगा। और यह सुखद है बजाय इसके कि बच्‍चे पैदा हो और मरे बीमारी में, आकाल में, भूकम्प में, युद्ध में, इससे ज्‍यादा उचित है कि वे पैदा ही न हो। क्‍योंकि पैदा होने के बाद मरना, मारना मरने देना अत्‍यन्‍त दुखद है। न पैदा कना कतई दुखद नहीं है।
      इसलिए मैं यह कतई नहीं मानता हूं कि परिवार नियोजन कोई परमात्‍मा के खिलाफ बात है।
      बल्‍कि मैं तो मानता हूं कि इस वक्‍त जिनके भीतर से परमात्‍मा थोड़ी बहुत आवाज दे रहा है, वे यह कहेंगे कि परिवार नियोजन परमात्‍मा का काम है।
      निश्‍चित ही परमात्‍मा का काम हर युग में बदल जाता है। क्‍योंकि कल जो परमात्‍मा का काम था, जरूरी नहीं कि वह आज भी वहीं हो। युग बदलता है परिस्‍थिति बदल जाती है। तो काम भी बदल जाता है।
      अब सारी परिस्‍थितियां बदल गई है। और आदमी के हाथ में इतनी शक्‍तिआं गयी है कि वह पृथ्‍वी को अत्‍यंत आनंदपूर्ण बना सकता है।
      सिर्फ एक चीज की रूकावट हो गयी है कि संख्‍या अत्‍यधिक हो गयी है। तो पृथ्‍वी नष्‍ट हो जायेगी। और बहुत से प्राणी भी अपनी बहुत संख्‍या करके मर चुके है, आज उनका अवशेष भी नहीं मिलता। मनुष्‍य भी मर सकता है।
      इस समय वहीं मनुष्‍य धार्मिक है, जो मनुष्‍य की संख्‍या कम करने में सहयोगी हो रहा है।
      इस समय परमात्‍मा की दिशा में और मनुष्‍य की सेवा की दिशा में इससे बड़ा कोई कदम नहीं हो सकता है। इसलिए धार्मिक चित तो यही कहेगा। कि परिवार नियोजन हो।
      हां, यह हो सकता है। हम इसे बेईमान लोग है कि जो हमें करना होता है, उसके लिए हम भगवान का सहारा खोज लेते है। और जो हमें नहीं करना होता, उसके लिए हम भगवान के सहारे की बात नहीं करते। जब हमें बीमारी होती है तब हम अस्‍पताल जाते है; तब हम यह नहीं कहते की बीमारी भगवान ने भेजी है। कैंसर टी.बी भगवान ने भेजे है। तब हम डाक्‍टर को खोजते है। और जब डाक्‍टर हमें खोजता हुआ आता है और कहता है इतने बच्‍चे नहीं, तब हम कहते है कि ये तो भगवान के भेजे हुए है।
      तो, हमें इन दो में से कुछ एक तय करना होगा कि बीमारी भी भगवान की भेजी हुई है—मलेरिया भी, प्‍लेग भी, आकाल भी, तब हमें इनमें मरने के लिए तैयार होना चाहिए। और अगर हम कहते है कि भगवान के भेजे हुए नहीं है। हम इनसे लड़ेंगे तो फिर हमें निर्णय लेना होगा कि फिर बच्‍चे भी जो हम कहते है भगवान के भेजे है, उन पर हमें नियंत्रण करना जरूरी है।
      मुझे एक घटना याद है।    
      इथोपिया में बड़ी संख्‍या में बच्‍चे मर जाते है। तो इथोपिया के सम्राट ने एक अमेरिकन डॉक्टरों के मिशन को बुलाया और जांच पड़ताल करवाई कि क्‍या कारण है। तो पता चला कि इथोपिया में जो पानी पीने की व्‍यवस्‍था है, वह गंदी है। और पानी जो है, वे रोगाणुओं से भरा है। और लोग सड़क के किनारे के गंदे डबरों का ही पानी पीते रहते है। उसी में सब मल मूत्र भी बहता रहता है। और लोग उसी का पानी पीते है। वहीं उनकी बीमारियों और मृत्‍यु का बड़ा कारण है। साल भर मेहनत के बाद उनके मिशन ने रिपोट दी और सम्राट को कहा कि पानी पीने की यह व्‍यवस्‍था बंद करवाईये, सड़क के किनारे के गड्ढों का पानी बंद करवाईये और पानी की कोई नयी वैज्ञानिक व्‍यवस्‍था करवाईये।
            तो इथोपिया के सम्राट ने कहा कि मैंने समझ ली आपकी बातें और कारण भी समझ लिया; लेकिन मैं ये नहीं करूंगा। क्‍योंकि आज अगर हम यह इंतजाम कर लें, आदमियों को बीमारी से बचाने का, तो फिर कल इन्‍हीं लोगों को समझाना मुश्‍किल होगा कि परिवार नियोजन करो। इथोपिया के सम्राट ने कहा यह दोहरा झंझट हम न लेंगे। पहले हम इनको यह समझायें कि तुम गंदा पानी मत पीओ। इसमे झंझट झगड़ा होगा। बामुश्‍किल बहुत खर्च करके हम इनको राजी कर पायेंगे। तब जनसंख्‍या बढ़ेगी। तब हम इन्‍हें समझायें गे दुबारा कि तुम बच्‍चे कम पैदा करो। तब उसने कहा, इससे यह जो हो रहा है, वहीं ठीक हो रहा है।
      मैं भी समझता हूं कि यदि भगवान पर छोड़ना है तो फिर इथोपिया का सम्राट ठीक कहता है। तो फिर हमें भी इसी के लिए राज़ी होना चाहिए। अस्‍पताल बंद, लोग गंदा पानी पिये, बीमारी में रहें—फिर हम सब भगवान पर छोड़ दे—जितने जियें। इतना जरूर कहे देता हूं कि भगवान के हाथ में छोड़कर इतने आदमी दुनिया में कभी न बचे थे। जितने आदमी ने अपने हाथ में लेकर बचाये। इतने आदमी भगवान के हाथ में बचते।
      इसलिए जब हमने विध्‍वंस की शक्‍तियों पर रोक लगा दी तो हमें सृजन की शक्‍तियों पर भी रोक लगाने की तैयारी दिखानी चाहिए। और इस तैयारी में परमात्‍मा का कोई विरोध नहीं हो रहा है। और न इसमें कोई धर्म का विरोध हो रहा है। क्‍योंकि धर्म है ही इसी लिए कि मनुष्‍य अधिकतम सुखी कैसे हो इसका इंतजाम इसकी व्‍यवस्‍था करनी है।

 ओशो
संभोग से समाधि की और
प्रवचन—9