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रविवार, 24 अप्रैल 2011

पीपल तू अब नहीं बचेगा? --( कविता)


देखना पीपल अब तू नहीं बचेगा?
सुकोमल सा था तब किया तूने,
तपती दुपहरी का किस साहस से सामना,
रिम-झिम बरसतें सावन में
गर्दन तक डूब कर भी तू नहीं डरा।
जिस दिन वो दीवार बन रही थी,
नहीं घुटा तेरा दम उस पर भी
डरा-सहमा तुम जरूर था
पर साहस तेरा काम हुआ
और ठिठुरती ठिठुरन में भी
तुम कांपा सुकड़ पर नहीं मिटा
कितने पैरो ने तुझे रौंदा,
जानवरों ने तुझे नोचा
बच्‍चों ने तुझे तोड़ा-मरोड़ा
तू नहीं मरा, सहा सब तुम
और फिर खड़ा हो गया तू
अंनत पथ की यात्रा पर
पर देखना अब तू नहीं बच सकेगा।
क्‍यों?
क्‍योंकि तुझे आज मरना होगा
अपने ही भगतों के हाथों
वह पूजा के नाम पर जला देंगे
दबा देंगे, और खत्‍म कर देंगे तुझे जड़ मूल से।
अपनी पूजा, आस्‍था थोप देंगे तुझ पर
और बना देंगे तुझे देवता
आज उस देवत्‍व का देना हो कर्ज
जो तुझे गीता में भगवान कृष्‍ण ने तुझे दिया
घोट देंगे दम तेरा-छिन लेंगे स्वतंत्रता तेरी।
हर लेंगे तेरी आजादी-उन्माद को
केवल झूठे पाप-पूण्‍य के नाम से
बलि चढ़ जायेगी तेरी
और तू कुछ नहीं कर सकेगा
क्‍योंकि वो तेरे आपने भक्‍त है?
देखना तू अब नहीं बचेगा
क्‍योंकि अब तू पूजा जाने लगा है?

--स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’