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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

हठीला केकटस—कविता

कल जब मैंने पूछा
उस हठीले गर्बीले
और ज़हरीले केकटस से
तुम कैसे करते हो निर्णय
फूल और कांटों के बनाने में
कैसे कर पाता है
संतुलन तुम्‍हारा दोनों में
तब वह कुछ चौंका
फिर मेरी और देखा
शायद कुछ सोचा
और फिर यू बोला
क्‍या है भेद इसमें
जो मांग है तुम्‍हारी
बस वहीं तो इति है
और में नहीं होता कर्ता
बस देखता हूं इस सब को
मैं तो बस होता हूं मात्र
कर्ता का पता नहीं है मुझे
होने की कला जान गया हूं
क्‍या तुम नहीं जानते?
फिर तब तुम कैसे जी पाते हो?
दम नहीं घुटता होगा तुम्‍हारा
नित कर्ता बन-बन कर
क्‍यों उठाते हो तुम इतना भार
नाहक जमाने भर का
छोड़ कर देखें अपने को
उस के हाथों में आपने को
तब देखना एक दिन
तुम्‍हें आयेगा जीने का आनंद
तब बहोगे तुम धार में
कितनी सरसता-मधुरता
लिए है ये जीवन
देखो चारों और
की कर्ता कोई और है
मैं नाहक भ्रम का बोझ ढोये जा रहा था......

स्‍वामी आनंद प्रसाद ’’मनसा’’