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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(साधन-शिविर)-प्रवचन-07

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 रात्री  
 
(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-सातवां-(सत्य का संगीत)

एक मित्र ने पूछा है कि मैं शास्त्रों को जला डालने के लिए कहता हूं। और मेरी बातों से कहीं थोड़े कम समझ लोग भ्रांत होकर भटक न जाएं?

लोग भटकेंगे या नहीं, लेकिन जिन्होंने प्रश्न पूछा है, वे मेरी बात सुनकर जरूर भटक गए हैं। मैंने कब कहा कि शास्त्रों को जला डालें। मैंने सिर्फ अपनी किताबों को--अगर वे किसी दिन शास्त्र बन जाएं तो जला डालने को कहा है। मेरी किताबें हैं, उनको जला डालने के लिए मैं कह सकता हूं। लेकिन दूसरों की किताबें जला डालने को मैं क्यों कहूंगा।
और फिर मैंने कहा शास्त्रों को जला डालें--किताबों को जलाने के लिए मैंने कभी कहा नहीं है। अगर इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती है तो फिर मैं और जो कह रहा हूं, वह क्या समझ में आता होगा?

मनुष्य के जीवन में शास्त्र न रह जाएं--जरूर मैं चाहता हूं। क्योंकि किसी भी किताब को शास्त्र कहना, मनुष्य के सत्य की खोज को चोट पहुंचाना है, बाधा पहुंचानी है। लेकिन हम शायद सुनते नहीं, या सुनते हैं तो पूर्वाग्रह से भरे हुए सुनते हैं। पहले से ही हमारा मन तैयार होता है। सुनते समय भी हम अपने मन में कुछ हिसाब-किताब लगाते रहते हैं कि मैं क्या कह रहा हूं और क्या नहीं कह रहा हूं। शायद इसीलिए कठिनाई होती है समझने में, अन्यथा बातें बहुत सीधी और साफ हैं।
सुनने के लिए मन साफ हो तो बातें बहुत सीधी और साफ हैं। और मन उलझा हुआ हो तो फिर चीजों के अर्थ, शब्दों के अर्थ बड़े विकृत रूप ले लेते हैं। और ऐसे ही मन को लेकर आप शास्त्रों को भी पढ़ते होंगे। उन में से भी जो अर्थ आप निकाल लेते होंगे, वह अर्थ भी इतना ही विकृत होता होगा।
शब्दों को समझने के लिए, विचारों को समझने के लिए एक बड़ा शांत, मौन, सुनने वाला मन चाहिए। वह हमारे पास नहीं है। हम पहले से ही बहुत भरे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आप मुझे सुन रहे हैं--जरूरी नहीं है आप मुझे सुन रहे हों। आप अपने को ही अपने भीतर सुन रहे होंगे। मेरी बातें भी सुनाई पड़ती हैं बीच-बीच में, फिर आप अपनी बातें सुनने लगते हैं; फिर मेरी बातें सुनाई पड़ती हैं, और इस सबमें इतना घोल-मेल, इतना कनफ्यूजन पैदा हो जाता है कि जो आप मुझसे पूछते हैं, अच्छा होता कि अपने से ही पूछ लेते।
क्योंकि अक्सर जो बातें मैंने नहीं कहीं, उन्हीं के बाबत प्रश्न पूछ लिए जाते हैं। या जो मैंने समझाया, उसके ही बाबत फिर किसी दूसरी शकल में प्रश्न मौजूद हो जाते हैं। सिर्फ आप चुप बैठे हैं और मैं बोल रहा हूं, इसलिए आप सुन रहे हैं, इस भ्रांति में मत पड़ जाना।
कार्ल गुस्ताव जुंग के पागलखाने में दो प्रोफेसर भर्ती हुए थे। ऐसे प्रोफेसरों की टेंडेंसी, वृत्ति पागल हो जाने की स्वाभाविक है। उन दोनों का जुंग अध्ययन करता था। खिड़की से छिपकर एक दिन सुन रहा था उन दोनों की बातें--बहुत हैरान हो गया। वे दोनों बिलकुल ही असंगत बातें कर रहे थे। दोनों की बातों में कोई भी संबंध न था। एक आकाश की बातें कर रहा था, दूसरा पाताल की। उन दोनों में कोई नाता नहीं था, उनमें कोई जोड़ नहीं था। उनमें कोई संगति नहीं थी।
लेकिन एक और भी अजीब बात थी। यह तो स्वाभाविक था, दो पागल आदमी बातें करें--तो उनकी बातों में संगति, तालमेल नहीं हो सकता। लेकिन इससे भी आश्चर्य की बात थी कि जब एक बोलता था तो दूसरा चुप रहता था। जब दूसरा बोलना बंद करता था तब पहला बोलना शुरू करता था। लेकिन दोनों की बातों में कोई संबंध नहीं था।
जुंग भीतर गया और उसने उनसे पूछा कि मित्रों, मैं बहुत हैरानी में हूं। जब एक बोलता है तो दूसरा चुप रहता है। क्यों? तो दोनों हंसे। उन्होंने कहा कि हम कन्वर्सेशन का नियम जानते हैं, बातचीत का नियम हमें पता है।
लेकिन उसने पूछा कि इतना जब तुम्हें पता है--बातचीत का नियम, तो मैं यह भी देख रहा हूं कि जब एक बोलना बंद करता है, तो जहां से बात छूटती है, दूसरा न मालूम कहां से शुरू करता है। उससे छूटी गई बात का कोई संबंध नहीं होता। वे दोनों पागल हंसने लगे और उन्होंने कहा, क्या तुमने कभी भी कोई ऐसी बातचीत सुनी है, जिसमें संबंध होता हो?
जो लोग थोड़े ज्यादा सोफिस्टीकेटेड हैं, थोड़े से ज्यादा धोखा देने में कुशल हैं, वे इस तरह बातचीत शुरू करते हैं कि मालूम पड़ता है कि दोनों में संबंध है। लेकिन संबंध कोई भी नहीं होता है। क्योंकि जब एक बोलता है, तब दूसरा अपने भीतर बोले चला जाता है, बोले चला जाता है। जब पहला बंद होता है, दूसरा शुरू करता है तो वह वहां से शुरू नहीं करता, जहां से दूसरे ने बंद किया। वह वहां से शुरू करता है, जहां उसके भीतर सिलसिला था। और तब सारी चीजें न मालूम क्या अर्थ ले लेती हैं।
मुझे आप सुन रहे हैं--तो ऐसा प्रश्न उठना बहुत कठिन है।

और उन्हीं मित्र ने पूछा है, कि आपकी बहुत सी बातें अनेक शास्त्रों से मिलती-जुलती मालूम पड़ती हैं।

न आप मुझे समझ रहे हैं, न शास्त्रों को समझ रहे हैं। मेल-जोल भी बिठालने की कोशिश कर रहे हैं--कि किससे मिलती है बात, किससे नहीं। यह कंपेरिजन, यह तुलना करने की जरूरत क्या है? मैं सीधा आपसे बातें कर रहा हूं। इसमें बीच में और किसी को मिलाने-जुलाने के लिए लाने की आवश्यकता क्या है? और अगर आप लाएंगे तो क्या आप मुझे समझ सकेंगे? आपका चित्त अगर इस तुलना में पड़ जाएगा तो समझना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
सीधी सी बात मैं कह रहा हूं, उसे सीधे समझने की कोशिश करें। बीच में और बहुत शास्त्रों को, गुरुओं को, शास्ताओं को लाने का क्या प्रयोजन है? अगर सीधे आप समझने की कोशिश करेंगे तो बड़ी आसानी हो जाती है। और तुलना करके समझने की कोशिश करेंगे तो बहुत कठिन हो जाता है। क्योंकि शब्दों की ही तो तुलना करेंगे। और शब्दों की तुलना से इतनी भ्रांतियां पैदा हुई हैं, जिनका कोई हिसाब नहीं है। क्योंकि पहले तो जो मैं कहना चाहता हूं, वही शब्द में आधा मर जाता है। फिर आप जो समझना चाहते हैं, अगर तैयार हैं किसी शास्त्र के माध्यम से समझने को तो जो आधा बचता है, उसकी हत्या आप कर देते हैं। फिर शब्द बिलकुल थोथा, चली हुई कारतूस की तरह आपके पास पहुंचता है, जिसमें कोई प्राण नहीं रह जाते। समझने की कोशिश सीधी होनी चाहिए।
आप एक गुलाब के फूल को देखते हैं तो आप जमाने भर के गुलाब के फूलों से तुलना करते हैं! तब उसको देखेंगे या कि सीधा देखेंगे? और क्या एक गुलाब के फूल की तुलना, किसी भी दूसरे गुलाब के फूल से की जा सकती है? कोई जरूरत भी नहीं है, संभावना भी नहीं है। हर गुलाब का फूल अपनी तरह का फूल है। अनूठा है, अद्वितीय है, बेजोड़ है। छोटा सही, बड़ा सही, कैसा भी सही--वह अपने तरह का है। उसे आप दूसरे गुलाब के फूल से कैसे तौलिएगा? और तौलने में एक बात तय है, इस गुलाब के फूल को देखने से आप वंचित रह जाएंगे।
आज रात आकाश में तारे निकले हुए हैं। इनको तौलिए पिछली रात के तारों से? और इसमें आप भूल जाइए, भटक जाइए और फिर इस रात के तारे आपको दिखाई नहीं पड़ेंगे। रोज चांद निकलता है, रोज सूरज निकलता है। हम रोज तौलते हैं हर चीज को!
एक मित्र आए। उन्होंने कहा कि यहां के वृक्ष तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन एक और हिल स्टेशन है, वहां के और भी अच्छे हैं। मैंने उनसे कहा, इन वृक्षों को देखिए। ये जो आनंद दे सकते हों, उसे पाइए। ये जो संदेश दे सकते हों, उसे सुनिए। लेकिन और किसी पहाड़ी के वृक्षों को बीच में लाने का प्रयोजन क्या है? और मैंने उनसे कहा, आप जब उस पहाड़ी पर जाओगे, तब किन्हीं और पहाड़ियों के वृक्षों को बीच में ले आओगे। ऐसे आप कभी भी सत्यों को सीधा नहीं देख सकेंगे।
तुलना करने वाला मन कभी भी सीधा देखने में समर्थ नहीं रह जाता। और जो भी चीज देखनी हो, सीधी देखनी चाहिए। बीच में किसी को लेने की और लाने की आवश्यकता नहीं है। आंखों पर जब किसी और चीज का पर्दा पड़ जाता है तो फिर हम देखते नहीं, हम सिर्फ तुलना करते रह जाते हैं। और देखने से जो उपलब्ध हो सकता था, उससे व्यर्थ ही वंचित हो जाते हैं।
तो मैं निवेदन करूंगा तुलना क्यों करें। किसी दिन जब सत्य का अनुभव होगा, जीवन की प्रतीति होगी तो जरूर आपको पता चल जाएगा कि हजारों-हजारों लोगों को वह प्रतीति हुई है। और हजारों लोगों ने उस प्रतीति को शब्द देने के प्रयास किए हैं। हजारों किताबों में वे शब्द लिखे हुए हैं। लेकिन जब आपको प्रतीति होगी, तभी उन शब्दों का अर्थ भी आपके सामने प्रगट होगा और खुलेगा, उस प्रतीति के पहले उन शब्दों को आप पकड़ लेंगे तो न तो अर्थ खुलेगा, न रहस्य खुलेगा उनका, बल्कि उन शब्दों के पकड़ लेने के कारण, जो अनुभव आपको हो सकता था--सीधा, इमीजिएट, प्रत्यक्ष, वह भी आपको नहीं हो सकेगा।
शब्दों का एक रोग है हमारे मन को। हम उन्हें पकड़कर इकट्ठा कर लेते हैं। जैसे हम धन इकट्ठा करते हैं, ऐसे ही हम शब्द इकट्ठे कर लेते हैं। और जितने ज्यादा शब्द हमारे मन पर इकट्ठे हो जाते हैं, उतना चीजों को सीधा देखना कठिन हो जाता है।
एक फकीर था नसरुद्दीन। एक घर में नौकरी करता था। उस घर के मालिक ने दूसरे दिन ही उसे कहा कि तुम बहुत अजीब आदमी हो। तीन अंडे खरीदकर लाने थे, तुम तीन बार बाजार गए। तीन अंडे एक ही बार में लाए जा सकते हैं। तीन बार जाने की कोई जरूरत नहीं है।
बात बिलकुल सीधी और साफ थी कि तीन अंडे खरीदने हों...तो वह एक अंडा खरीदकर लाया, उसको रखकर फिर गया, फिर दूसरा खरीदकर लाया, फिर तीसरा खरीदकर लाया। तो उसके मालिक ने कहा, ऐसे काम नहीं चलेगा। तीन बार जाने की जरूरत न थी। एक बार जाना काफी था। उस नौकर ने कहा, आप निश्चिंत रहें, मैंने आपका शब्द समझ लिया, आगे ऐसा ही होगा।
आठ दिन बाद उसका मालिक बीमार पड़ा। उसने कहा, जाओ, वैद्य को बुला लाओ। वह वैद्य को भी बुला लिया और आठ-दस आदमियों को और बुला लाया। उसके मालिक ने कहा, वैद्य तो ठीक है, लेकिन ये आठ-दस आदमी कैसे? उसने कहा, मैंने सोचा कि वैद्य को ले चलूंगा, हाथ देखकर कहेगा, फलानी दवा खरीदकर लाओ--मैं ड्रगिस्ट को भी ले आया, एक केमिस्ट को भी लिवा लाया, दवा बेचने वाले को भी ले आया। फिर मैंने सोचा दवा ने काम किया या न किया, आप बचे या न बचे, तो एक कब्र खोदने वाले को भी लिवा लाया हूं। और आपने ही तो कहा था कि तीन अंडे तीन बार खरीदने जाने की कोई जरूरत नहीं है?
शब्द को पकड़ लिया। और फिर शब्द से ऐसा अर्थ भी निकल सकता है, कौन सी कठिनाई है?
मैंने कहा, मेरी किताबों को आग लगा देना, अगर शास्त्र बन जाएं। फौरन आप समझ गए कि मैंने कहा, जाओ शास्त्रों में आग लगा दो। तीन अंडे इकट्ठे ही खरीद लाए आप। थोड़ी भी तो समझ, थोड़ी भी तो सहानुभूति, थोड़ी भी तो सिम्पैथेटिक अंडरस्टेंडिंग होनी चाहिए--क्या मैं कह रहा हूं। शब्दों के शरीर को पकड़ लेंगे या थोड़ा उनकी आत्मा में भी झांकने की कोशिश करेंगे। तो अगर आत्मा में झांकने की कोशिश करेंगे तो ऐसा नहीं दिखाई पड़ेगा कि मैं शास्त्रों का विरोधी हूं। शायद मुझसे ज्यादा मित्र उनका कोई भी नहीं है। दुश्मन तो वे ही हैं जो उनको पकड़कर बैठ गए हैं। उनके कारण ही शास्त्रों के भी प्राण निकल गए हैं और पकड़ने वालों के भी प्राण निकल गए हैं। आप शास्त्रों से मुक्त हो जाएं तो एक दूसरी घटना भी घटेगी, शास्त्र आपसे मुक्त हो जाएंगे। एक म्युचुअल इंप्रिजनमेंट चल रहा है। हम शास्त्रों को पकड़े हुए हैं, शास्त्र हमको पकड़े हुए हैं। न शास्त्र इधर हिल-डुल सकते हैं, न हम। और फिर ऐसा जोर से पकड़ लिया है शब्दों को कि उनकी जान निकाल दी है, उनकी गर्दन कस ली है बिलकुल, इसलिए सुन नहीं पाते हैं। क्योंकि शब्दों पर ऐसा आग्रह, ऐसा दुराग्रह पकड़ा हुआ है। देख नहीं पाते हैं शब्दों के पीछे।
शब्द इशारे हैं। अगर मैं चांद को अंगुली बताऊं और कहूं यह चांद है, आप मेरी अंगुली पकड़ लें कि कहां है, आपने अंगुली बताई थी, अंगुली में चांद कहां है? मैं भी मुश्किल में पड़ जाऊंगा और आप भी। मैं कहूंगा, क्षमा करें, कृपा करें मेरी अंगुली छोड़ें। अंगुली से चांद दिखाया था, अंगुली चांद नहीं थी। कभी भूलकर नहीं कहा था कि अंगुली चांद है। कहा था कि इधर चांद है--आपको अंगुली दिखाई पड़ी। चांद तक तो आंख उठाने की कोशिश न की, अंगुली पकड़ ली।
अब ऐसे ही हम सब अंगुलियां पकड़े हुए हैं--शास्त्रों की भी, शास्ताओं की भी। और कोई भी कुछ कह रहा है तो हम उसकी अंगुली जल्दी पकड़ने को तैयार हैं। लेकिन चांद की तरफ देखने की...और चांद की तरफ तभी देख सकेंगे, जब अंगुली को बिलकुल छोड़ दें और भूल जाएं। अंगुली पर आंख न रह जाए तो चांद दिखाई पड़ सकता है।
तो मैं जो शब्दों का उपयोग कर रहा हूं, बड़ी मजबूरी में, बड़ी हेल्पलेसनेस में--बड़ी असहाय अवस्था है शब्दों का उपयोग करने में। क्योंकि जो मैं कहना चाहता हूं, वह शब्दों के बाहर है, और शब्दों में उसे कहना है। कहने का और कोई उपाय नहीं है। तो अगर शब्द पकड़ लेंगे तो एक मजाक हो जाएगी और कुछ भी नहीं होगा। तो शब्द में जो इशारा, जो संकेत है; शब्द के पीछे छिपी हुई जो--जो आकांक्षा है, शब्द के पीछे छिपी जो आत्मा है, उस पर...।
एक सितार रखी हो और कोई समझ ले कि तार और यह सितार का सारा ढांचा और यंत्र, यही संगीत है...तो भूल में पड़ जाएगा। न तो सितार का ढांचा संगीत है, न सितार के तार संगीत हैं। ढांचा और तार तो केवल एक इशारा बन जाते हैं, किसी और चीज को जन्मने के लिए। संगीत कुछ और ही है। लेकिन अगर कोई सितार को ढोता फिरे दिन-रात कि मैं संगीत का बड़ा प्रेमी हूं तो वह गलती में हो गया। उसने शरीर को पकड़ लिया संगीत के, आत्मा पर उसका खयाल न गया।
ऐसे ही हम शब्दों को पकड़ लेते हैं। शब्दों के यांत्रिक रूप में, शब्दों के उपकरण में जिस तरफ इशारा था--जिस संगीत की तरफ, जिस सत्य की तरफ, उस पर हमारा खयाल ही नहीं जाता। और फिर इन शब्दों की ही व्याख्या में हम लग जाते हैं। शब्दों की व्याख्या करने वाले मन को ही मैं शास्त्रीय मन कहता हूं। वह चाहे गीता के शब्दों की व्याख्या करता हो या मेरे शब्दों की। यही शास्त्रीय बुद्धि है...यह शब्दों को पकड़ लेने वाली, शब्दों पर जीने वाली, शब्दों पर सोचने वाली। इस तरह का मनुष्य कभी सत्य के निकट नहीं पहुंच पाता। क्योंकि शब्दों से सत्य का क्या लेना-देना है? सत्य की तरफ तो...शब्द इतनी ही अगर खबर दे सकें कि शब्दों को छोड़ देना है तो बात पूरी हो जाती है।
मैं जिन शब्दों का उपयोग कर रहा हूं, बहुत खुश नहीं हूं। आज तक कोई भी बहुत खुश नहीं रहा है शब्दों का उपयोग करके। लेकिन करे क्या?

एक मित्र ने पूछा है, जो सत्य को जान लेते हैं, वे फिर बोलते ही नहीं और आप तो बोलते हैं?

बड़ी मजेदार बात पूछी है। तब तो उनेक हिसाब से ही...और ये वही मित्र हैं, जिनने पहले प्रश्न पूछे हैं शास्त्रों के पक्ष में। तो ये शास्त्र किसने बोले होंगे? सत्य को जानने वाले बोलते नहीं हैं तो ये बुद्ध, महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट जो बोलते हैं, ये तो सत्य को जानने वाले रहे नहीं? फिर सत्य को न बोलने वाले का पता कैसे लगा आपको और कहां से, क्योंकि वह कभी बोला नहीं? उसका पता आपको लग सकता नहीं। कैसे खबर मिली आपको? क्या किसी आदमी को गूंगा देखकर आप समझ लेंगे कि यह सत्य को उपलब्ध हो गया है? या किसी आदमी को चुपचाप बैठे देखकर समझ लेंगे कि यह सत्य को उपलब्ध हो गया है?
तब तो बड़ी आसान बात है। गूंगा होना भी कठिन नहीं, गूंगेपन को साधना भी कठिन नहीं। और दोत्तीन वर्ष चुप रह जाएं तो फिर बोल भी नहीं सकते, चाहें तो भी। क्योंकि दोत्तीन वर्ष में बोलने का यंत्र फिर खराब हो जाता है। तब तो बड़ी आसान बात है। मामला सिर्फ बोलने के यंत्र को खराब करने का है। तो फिर सत्य को उपलब्ध आप हो जाएंगे। इतना आसान नहीं था।
लेकिन हां, प्रश्न पूछने वाले मित्र जैसे सोचने वाले बहुत लोग हुए हैं। कई लोग सोचते हैं: आंख बंद कर लो, आंख फोड़ लो तो सत्य को उपलब्ध हो जाओगे! कोई सोचता है, मुंह बंद कर लो, वाणी बंद कर लो तो सत्य को उपलब्ध हो जाओगे! कोई सोचता है, कान बंद कर लो! जो और भी बहुत अग्रणी विचारक हैं, वे सोचते हैं, आत्मघात ही कर लो तो सत्य को उपलब्ध हो जाओगे! क्योंकि तब सभी इंद्रियां बंद हो जाएंगी। बोलना तो एक ही इंद्रिय है। आत्मघात करने से सभी इंद्रियां बंद हो जाती हैं। सो जल समाधि लेने वाले और मिट्टी में समाधि लेने वाले और मरने वालों का लंबा सिलसिला है! आत्महत्या करने वालों का! वे भी सत्य को उपलब्ध हो जाते हैं?
बहुत अजीब बात है। सत्य को उपलब्ध होने से बोलने, न-बोलने का कोई भी संबंध नहीं है। सत्य को उपलब्ध हुए लोग नहीं बोले या बोले, इससे भी कोई संबंध नहीं है। एक बात तय है कि जिन्होंने भी सत्य को जाना, उन्हें बोलने में बड़ी कठिनाई हो गई। लेकिन उनकी दया और करुणा का यह कारण रहा होगा कि जिसे नहीं बोला जा सकता, उसे भी उनने बोलने की कोशिश की है, चेष्टा की है। जो नहीं कहा जा सकता, उस तरफ भी इशारे किए हैं। जिस तरफ आंखें नहीं उठाई जा सकतीं, उस सूरज की तरफ भी खबर की है। उनकी पीड़ा को हम नहीं समझ सकते। वे कितनी पीड़ा से गुजरते होंगे, यह कहना कठिन है। क्योंकि उनके सामने सबसे बड़ा पैराडाक्स, सबसे बड़ी विरोधाभासी चीज खड़ी हो जाती है। कुछ उन्होंने जाना है, और वह जाना हुआ लुट जाना चाहता है, बंट जाना चाहता है। लेकिन बांटने का कोई साधन हाथ में नहीं है। उसे कैसे बांटे, उसे कैसे लुटा दें?
बहुत अधूरे उपकरण हैं शब्दों के, भाषा के, उनका ही उपयोग करना पड़ता है। उनका उपयोग किया गया है। जो सत्य को जानता है, वह बोलता नहीं, फिजूल की बात है। लेकिन जो सत्य को जानता है, वह जानता है यह भी कि जो मैंने जाना है, वह बोला नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी बोलने का हजारों वर्ष से उपक्रम चलता है। कोई करुणा है सत्य के जानने के साथ ही--कोई प्रेम है, जो बंट जाना चाहता है। कोई चीज भीतर जन्मती है, वह बिखर जाना चाहती है, फैल जाना चाहती है। जैसे फूल खिलता है तो उसकी सुगंध हवाओं में लुट जाना चाहती है। दीया जलता है तो उसकी किरणें अंधेरे में दूर की यात्रा पर निकल जाती हैं। जब किसी प्राण में सत्य का दीया जलता है या सत्य का फूल खिलता है, तब सत्य की किरणें और सत्य की सुगंध भी अनेक-अनेक रूपों में बिखर जाना चाहती है, फैल जाना चाहती है।
जिस जीवन में भी सत्य आया हो, वह हजार-हजार रूपों में प्रगट होना चाहता है। शब्द भी, चित्र भी, रंग भी, काव्य भी न मालूम किन-किन रूपों में वह प्रगट होना चाहता है, बंट जाना चाहता है। जब भी आनंद उपलब्ध होता है तो वह बंटना चाहता है।
दुख और आनंद में यही फर्क है। दुख उपलब्ध होता है तो सिकुड़ता है, आदमी बंद होता है अपने में, क्लोज होता है। जब आप दुखी होते हैं तो आप द्वार बंद करके एक कोने में बैठ जाना चाहते हैं। नहीं चाहते कोई आए, कोई बोले, कोई मिले। दुख सिकोड़ता है। जब बहुत दुखी होते हैं तो नशा पीकर बंद हो जाना चाहते हैं--कि किसी का मुझे पता ही न रहे कि कोई है। और भी ज्यादा दुखी होते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं, क्योंकि मर जाने से फिर किसी से कोई संबंध नहीं रह जाएगा।
लेकिन जब आनंद उपलब्ध होता है, तब किसी आदमी को बंद कमरे में बैठे देखा है? जब आनंद उपलब्ध होता है तो वह खोजने निकलता है--किसको दे दूं। कोई मिल जाए, जिससे मैं शेयर कर लूं, जिसको भागीदार बना लूं। जो लोग जंगल भी भाग गए थे, अगर उनको वहां आनंद मिल गया तो भागकर वापस बस्ती में आ गए।
महावीर जंगल में थे, बुद्ध जंगल में थे। फिर लौटकर बस्ती में कैसे आ गए, कौन खींच लाया? आप? मैं? हम तो पहले भी बस्ती में रहते थे। वे बस्ती से भाग गए थे। लौट कैसे आए? कौन ले आया? भीतर एक आनंद का जब जन्म हुआ तो वह आनंद मांगने लगा--शेयर करो, बांटो। किसको बांटें? भागे बस्ती की तरफ, जहां लोग थे। वहां जाकर उनको कह देना होगा, वे किरणें उन तक पहुंचा देनी होंगी।
बुद्ध जिस दिन मरे, सुबह ही हजारों भिक्षु इकट्ठे हो गए। उन्हें प्रेम करने वाले हजारों लोग। बुद्ध ने उनसे कहा कि आज अंतिम क्षण है मेरे जीवन का। अब मैं तुमसे विदा लेता हूं। और इसके पहले कि मैं विदा लूं और विलीन हो जाऊं अनंत में, कुछ तुम्हें पूछना हो, पूछ लो।
वे सारे भिक्षु, वे सारे उन्हें प्रेम करने वाले लोग, उनकी आंखें आंसुओं से भरी हैं। उन्हें कोई प्रश्न नहीं सूझता। वे कहते हैं बहुत आपने दिया, बहुत आपने बांटा। कुछ अब हमें और नहीं पूछना, सब आपने बताया है। तीन बार बुद्ध पूछते हैं। फिर जब कोई कुछ नहीं पूछता तो वे उठकर पास में वृक्ष के पीछे चले जाते हैं। ताकि वहां वे शांति से ध्यान में डूबते चले जाएं और ध्यान की अंतिम गहराई में विलीन हो जाएं। वे वहां पीछे चले जाते हैं।
जिस गांव के किनारे यह घटना घटती है, उस गांव में सुभद्र नाम का एक व्यक्ति था। बुद्ध उस गांव से तीन बार निकले थे। लेकिन सुभद्र अपनी दुकान में व्यस्त था। उसने सोचा अगली बार आएंगे तब मिल लूंगा, तब दर्शन कर लूंगा, तब सुन लूंगा उनकी बातें।
अभी उसे पता चला कि अब अगली बार बुद्ध नहीं आएंगे उस गांव से, अब अंतिम दिन है उनका। वह दुकान बंद करके भागा। इधर वह आया तो उसने पूछा, कहां हैं? मुझे कुछ पूछना है। तो भिक्षुओं ने कहा, चुप। वे हमसे विदा भी ले चुके। और उन्होंने पूछा भी था, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था। अब देर हो गई, अब बहुत देर हो गई। जब वे तीन बार तेरे गांव में आए थे, तब तू कहां था?
उसने कहा, मैं तो वहां था लेकिन सोचा कि फिर कभी अगली बार। अगर कुआं घर पर आ जाए तो आप भी सोचेंगे अगले दिन प्यास लगेगी, तब देखेंगे। पर उसने कहा कि अब तो दुबारा वे नहीं आ सकेंगे। क्या नहीं हो सकता ऐसा कुछ कि मैं उनसे पूछ लूं? दो शब्द मुझे जानने हैं, सुनने हैं। लेकिन भिक्षुओं ने कहा कि नहीं, अब यह नहीं हो सकता।
लेकिन बुद्ध को यह भनक कान में पड़ गई। वे वृक्ष के पीछे से उठकर आगे आ गए। और उन्होंने कहा, सुभद्र, जो भी पूछना हो तो पूछ ले। क्योंकि मेरे नाम पर यह कलंक न रह जाए कि मैं जीवित था, और कोई प्यासा आया था और प्यासा वापस लौट गया।
इस आदमी को सत्य उपलब्ध नहीं हुआ होगा निश्चित ही, क्योंकि नहीं तो यह आदमी मरते वक्त भी बोलने की इतनी उत्सुकता दिखाता? गलती में रहे हम अब तक कि सोचते थे कि इस आदमी को सत्य उपलब्ध हो गया?
लेकिन सत्य तो उपलब्ध होता है। हजारों लोगों को हुआ है, होगा। वे अपनी-अपनी सामर्थ्य से चेष्टा करते हैं उसे बांट देने की। लेकिन जब हम उनके शब्दों को पकड़कर सोच लेते हैं कि सत्य मिल गया, तो भूल हो जाती है। यही शास्त्र पकड़ने की भूल है। बुद्ध के वचन को हम पकड़ लें, क्योंकि बुद्ध को सत्य मिला था--तो उनके वचनों को हम पकड़ लें, पूजा करें उन वचनों की, उन वचनों पर टीका-टिप्पणी करें, उन वचनों को कंठस्थ करें, उन वचनों को दोहराते रहें, जीवन इसमें व्यतीत कर दें--तो भूल हो जाती है। तो फिर हम इन्हीं शब्दों में अटके रह जाते हैं। तो फिर हम यहीं उलझकर रह जाते हैं।
एक आदमी के जीवन में प्रेम उपलब्ध हुआ हो। वह प्रेम के कुछ गीत गाए और हम उन गीतों को याद कर लें, पकड़ लें, कंठस्थ कर लें और सोचें कि हम भी प्रेम को उपलब्ध हो गए हैं--तो क्या यह ठीक होगा? क्या प्रेम के गीत याद कर लेने से कोई प्रेम को उपलब्ध होता है? तो क्या सत्य के शब्द, सत्य की अभिव्यक्तियां--इनको पकड़ लेने से कोई सत्य को उपलब्ध हो जाएगा? न तो प्रेम के गीत याद कर लेने से कोई प्रेम को पाता है। और न सत्य के गीत याद कर लेने से कोई सत्य को पाता है।
लेकिन जिसके जीवन में प्रेम आया था, हो सकता है गीतों में प्रेम बहा हो। उसने अपनी तरफ से गीतों में प्रेम का दान किया हो। उसने जो जाना था, उसने जो जीया था, वह बहा हो उससे। उससे जरूर बहा था। लेकिन आप अगर उसको ही पकड़कर ठहर जाते हैं तो आपको वह नहीं मिलने को है।
ये जो दो भेद हैं, ये अगर हमारे खयाल में न रहें तो कठिनाई पैदा हो जाती है। आपको भी वह उपलब्ध हो सकता है, जो किन्हीं के शब्दों से प्रगट हुआ है। लेकिन वह उपलब्ध होगा निःशब्द में जाने से, शून्य में जाने से, निर्विचार में जाने से, ध्यान में जाने से। क्योंकि जिनको भी वह कभी उपलब्ध हुआ है ध्यान में, निर्विचार में, शून्य में ही उपलब्ध हुआ है।
किसी ने भी कहा है कभी आज तक कि मुझे शास्त्र से सत्य उपलब्ध हुआ है? किसी ने कहा है यह आज तक कि मुझे शास्त्र से सत्य उपलब्ध हुआ है?
किसी ने भी नहीं। कहेगा भी कोई कैसे। शास्त्र से शब्द मिल सकते हैं, सत्य नहीं। सत्य पाने की तीव्र आकांक्षा हो तो इतनी तैयारी जरूरी है।
एक और मित्र ने पूछा है, उनके प्रश्न की चर्चा करके फिर हम ध्यान के लिए, रात्रि के ध्यान के लिए बैठेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैं जप में, राम-नाम में, इन सबमें विश्वास नहीं करता हूं? क्या इनका कोई मूल्य और फायदा नहीं है?
एक और ने पूछा है, क्या एकाग्रता और ध्यान एक ही चीजें नहीं हैं?

थोड़ा इन पर चर्चा कर लें, उससे ध्यान को भी समझने में सुविधा होगी। फिर हम ध्यान के लिए बैठेंगे।
पहली बात, ध्यान और एकाग्रता एक ही बात नहीं है। दोनों बड़ी भिन्न बातें हैं। एकाग्रता, आत्म-सम्मोहन की विधि है, सेल्फ-हिप्नोसिस की, आटो-हिप्नोसिस की--खुद को मूर्च्छित कर लेने का उपाय है। एकाग्रता, कांसनट्रेशन, खुद को मूर्च्छित कर लेने की विधि है।
ध्यान आत्म-ज्ञान की विधि है।
ध्यान है आत्म-ज्ञान की विधि, और एकाग्रता है आत्म-मूर्च्छा की।
एकाग्रता है--स्वयं को भूल जाने की विधि, ध्यान है--स्वयं को जान लेने की।
एकाग्रता है--फारगेटफुलनेस, विस्मरण, ध्यान है--रिमेंबरिंग, स्मृति।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
हजारों वर्षों से यह भ्रम है कि एकाग्रता ही ध्यान है। और यह भ्रांति इतनी महंगी पड़ी है जितनी महंगी कोई भ्रांति नहीं पड़ी है। एकाग्रता का अर्थ है: चित्त को किसी एक चीज पर रोकना, ठहराना।
दीए की ज्योति पर ठहरा लें, राम के नाम पर ठहरा लें किसी प्रतिमा पर ठहरा लें; किसी सिंबल पर ठहरा लें, किसी एक चीज पर, एक विचार पर, एक धारणा पर--चित्त को सब भांति रोक लेने का प्रयास है।
चित्त को जब इस भांति रोक लेने की तीव्र चेष्टा की जाती है, तो क्या होता है? चित्त को जब बहुत जोर से कांसनट्रेट करने की, एकाग्र करने का श्रम किया जाता है, तो क्या होता है?
होता है यह कि जब तीव्रता से चित्त को एक जगह जबर्दस्ती हम रोकने की कोशिश करते हैं, चित्त वहां से भागने की कोशिश करता है। चित्त का स्वभाव गति है, डायनामिक है। माइंड जो है, चित्त जो है, वह डायनामिक है, गत्यात्मक है--जाना चाहता है, गति करना चाहता है, ठहरना नहीं चाहता।
समझ लें, गंगा को हमें ठहराना हो। गंगा को ठहराना हो तो क्या करना पड़े? गंगा जीवंत धारा है--बही जा रही है पहाड़ों से समुद्र की तरफ। चित्त भी बहा जा रहा है। चित्त की धारा, नदी भी, सरिता भी बही जा रही है अनंत की तरफ। हम उसे रोक लेना चाहते हैं, ठहरा लेना चाहते हैं। तो एक ही रास्ता है। वह रास्ता यह है कि गंगा का पानी जमकर बर्फ हो जाए तो गंगा ठहर जाएगी वहीं के वहीं, जहां है। तो वह जो डायनामिक गंगा है, वह डार्मेट हो जाए; वह जो चलती गंगा है, वह ठहर जाए, बर्फ हो जाए, तो जहां के तहां ठहरी रह जाएगी।
साइबेरिया में या ठंडे स्थानों में नदियां जम जाती हैं। जम जाए गंगा तो ठहर सकती है, नहीं तो नहीं ठहर सकती। चित्त की धारा भी जम जाए, बर्फ बन जाए तो ठहर सकती है, नहीं तो नहीं ठहर सकती।
जगत में चित्त प्रवाहमान है, बहा जाता है। तो चित्त का बर्फ हो जाना, कांसनट्रेशन--हो सकता है। और चित्त बर्फ कब होता है, ठहरता कब है? जब नींद में चला जाता है। जब मूर्च्छा में चला जाता है, तब ठहर जाता है। फिर उसमें कोई गति नहीं होती। एक बेहोश आदमी के चित्त में कोई गति नहीं होती।
तो अगर बहुत तीव्र हम कोशिश करें चित्त को ठहराने की, ठहराने की, ठहराने की, पहले चित्त उपाय करेगा भागने का, भागने का। फिर हम नहीं मानें, नहीं मानें, प्रयास जारी रखें तो, तो एक रास्ता रह जाएगा चित्त के सामने कि वह सो जाए। सोते से ठहर जाए, मूर्च्छा आ जाए; हिप्नोसिस, नींद आ जाए, सम्मोहित हो जाए--तो ठहर जाएगा। निश्चित ही इस ठहरने में फिर दुख का कोई पता नहीं चलेगा। क्योंकि जब चित्त मूर्च्छित है तो पता किसको चले।
अब तो हिप्नोसिस के द्वारा, सम्मोहन के द्वारा आपरेशन भी होते हैं--आपको ज्ञात होगा। अब तो यूरोप और अमरीका के बड़े-बड़े अस्पतालों में एक हिप्नोटिस्ट एक सम्मोहक भी रखते हैं। और बड़े सफल हुए प्रयोग। एक आदमी को बेहोश कर देते हैं, कांसनटे्रशन के द्वारा, एकाग्रता के द्वारा। उस आदमी को कहते हैं अपनी आंख को इस प्रकाश पर लगाओ। वह एक पांच मिनट तक आंख को प्रकाश पर देखता रहता है। फिर सारा चित्त उसका धीरे-धीरे-धीरे जमता जाता है और मूर्च्छित हो जाता है। जब वह मूर्च्छित हो जाता है तो उसे कह देते हैं मूर्च्छित होती अवस्था में, कि अब तुम आधा घंटे के लिए मूर्च्छित हो गए। आधा घंटे तक उसका चित्त फ्रोजन, जमा हुआ रह जाएगा। अब उसका पैर काट डालो, उसे पता नहीं चलेगा। उसका आपरेशन कर दो, उसे पता नहीं चलेगा।
तो अनस्थीसिया के, बेहोश करनी वाली दवाओं का उपयोग अब वैज्ञानिक कहते हैं, बहुत जरूरी नहीं है। जैसे-जैसे हिप्नोटिज्म की हमारी सामर्थ्य, समझ बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे आदमी को बेहोश केवल एकाग्रता के द्वारा किया जा सकता है। फिर आपरेशन करना बहुत आसान है, क्योंकि वह आदमी मूर्च्छित है, उसे पता नहीं कि क्या हो रहा है--हाथ-पैर काटा जा रहा है या क्या किया जा रहा है।
यह जो स्थिति है, यह आनंद की स्थिति नहीं है। यह आत्म-विस्मरण की स्थिति है। इसको ही कोई आनंद समझ लेगा तो भूल में पड़ जाता है।
इसी भांति नाम-जप का भी परिणाम होता है। एकाग्रता का जो परिणाम है, वही नाम-जप का भी परिणाम है। एक ही शब्द को बार-बार दोहराने, बार-बार दोहराने से चित्त में ऊब पैदा होती है, बोरडम पैदा होती है। और ऊब की वजह से नींद पैदा होती है।
तो चाहे एकाग्रता से नींद ले आएं और चाहे ऊब से। अगर आप यहां ऊब जाएं मेरी बातों से तो आप पाएंगे, आपको नींद आनी शुरू हो गई। बोरडम नींद ले आती है। इसलिए मंदिरों में लोग अक्सर सोए हुए नजर आते हैं। धर्म-सभाओं में लोग सोए हुए मिलेंगे। क्योंकि वही बातें, वही राम की कथा, बहुत बार सुनी जा चुकी है। उससे ऊब पैदा होती है। ऊब पैदा होने से नींद आ जाती है। तो राम, राम, राम, राम, राम, राम कोई जपता रहे तो ऊब पैदा होगी।
एक घटना मैंने सुनी है।
एक आदमी पर अदालत में मुकदमा चला। उसने एक स्त्री के सिर पर चोट कर दी थी और अकारण। एक बस में वह बैठा हुआ था, एक डबल-डेकर बस में, दो मंजिली बस में बैठा हुआ था, नीचे की मंजिल में और उसके पड़ोस में एक औरत बैठी हुई थी। अचानक उसने उस औरत के सिर पर हमला कर दिया। वह औरत बेहोश हो गई। वह औरत अपरिचित थी।
उस पर मुकदमा चला। वह पकड़ा लिया गया। और मजिस्ट्रेट ने उससे पूछा कि तुमने इस स्त्री पर क्यों हमला किया? न तुम्हारा कोई परिचय है, न कोई पहचान। तुम पागल तो नहीं हो? उसने कहा, पागल तो मैं नहीं हूं। लेकिन उस क्षण पागल हो गया था। मजिस्ट्रेट ने पूछा क्या घटना घटी, जिससे तुम हमला करने को तैयार हुए? तो उसने कहा घटना ऐसी घटी है।
मैं बस में आकर बैठा। मेरे पीछे ही यह औरत भी आकर बैठी। इसके हाथ में एक बैग था। इसने बैग को खोला। उसके भीतर से पर्स निकाली। फिर बैग को बंद किया, फिर पर्स को खोला, फिर पर्स में से रुपए निकाले। फिर पर्स बंद की। कंडक्टर आ रहा था। लेकिन कंडक्टर दूसरे ग्राहक के पास चला गया। इसने फिर अपनी पर्स खोली, रुपया अंदर रखा, पर्स बंद की; बैग खोला, बैग में पर्स रखी, बैग बंद किया। कंडक्टर फिर इधर आ रहा था। इसने फिर बैग खोला, पर्स बाहर निकाली, बैग बंद किया; पर्स खोली, रुपया बाहर निकाला, पर्स बंद की। फिर कंडक्टर दूसरी तरफ चला गया। इसने फिर पर्स खोली।
मजिस्ट्रेट बोला, स्टाप। यू विल ड्राइव मी क्रेजी, तुम मुझे पागल कर दोगे। चुप हो।
उस आदमी ने कहा, सर, दिस इज वाट, दैट हैपंड विथ मी। यही तो मेरे साथ हुआ कि मैं एकदम पागल हो गया।
कोई चीज रिपीट, रिपीट, रिपीट, रिपीट; दोहरे, दोहरे दोहरे, तो दिमाग ऊब जाए, घबड़ा जाए। उस घबड़ाहट में रास्ता एक ही रह जाए कि सो जाओ।
छोटे बच्चे को सुला देते हैं। कहते हैं, मुन्ना राजा सो जा, मुन्ना राजा सो जा, मुन्ना राजा सो जा। थोड़ी देर में मुन्ना राजा ऊब जाता है और सो जाता है। मां समझती है हमारे संगीत का फल है। मुन्ना राजा केवल बोरडम की वजह से सो गए। और मुन्ना राजा के बाप भी सो सकते हैं, अगर यही तरकीब उपयोग में लाई जाए।
जब भी चित्त ऊबेगा, जब भी चित्त परेशान हो जाएगा, एक शब्द की पुनरुक्ति से तो सिवाय सोने के कोई उपाय नहीं रह जाता है। बहुत पहले लोगों ने यह तरकीब खोज ली थी। एक शब्द को पकड़ लो, दोहराए चले जाओ--ओम, ओम, ओम दोहराए चले जाओ। राम, राम, राम--कोई भी शब्द। अल्लाह, अल्लाह सभी शब्द समान हैं। कोई भी शब्द दोहराए चले जाओ। दोहराते जाओ, दोहराते जाओ, खुद का मन बेचैन हो जाएगा, ऊब जाएगा, घबड़ा जाएगा। घबड़ाहट में एक ही रास्ता रह जाएगा कि सो जाओ तो छुटकारा हो जाए इस परेशानी से। इस रिपिटीशन से मुक्ति का एक ही रास्ता है।
कोई दूसरा कर रहा हो तो आप भागकर चले जाएं। कहीं खुद ही कर रहे हैं, तो भागेंगे कहां?
अगर दूसरा राम-राम जप रहा हो तो हम अपने कान बंद कर लें। दूसरा राम-राम जप रहा हो, हम अपना रेडियो खोल लें। दूसरा राम-राम जपता हो, हम वह जगह छोड़ दें। लेकिन जब हम खुद ही जप रहे हों, तो हमारा मन क्या करे? कहां जाए? उसके पास एक ही रास्ता है, वह नींद में चला जाए। यह नींद में चले जाना बचाव का उपाय है और कुछ भी नहीं। मन को परेशान करेंगे, मन बचना चाहेगा। आत्मरक्षा में मन सो जाएगा। यह सेल्फ डिफेंस है और कुछ नहीं। आप टार्चर कर रहे हैं, आप परेशान कर रहे हैं, तो आत्मरक्षा में मन एक ही रास्ता देखता है कि सो जाना उचित है। और मन सो जाता है।
इस सोने में एक तरह का सुख मिलता है। और वह सुख यही है कि हमें दुखों का कोई पता नहीं चलता। जब हम बाहर आते हैं तो इतनी देर के लिए जो नींद पैदा हो गई--जो अपने हाथ से पैदा की गई नींद थी, उस नींद के बाद थोड़ी सी राहत मिलती है। थोड़ा हल्का, अच्छा लगता है। और वह हल्का लगने की वजह से फिर हम सोचते हैं दुबारा जाएं, तिबारा जाएं। फिर यह एक माइंड की हेबिट, एक आदत बन जाती है। फिर रोज-रोज मन मांग करता है--जैसे मांग सिगरेट की करता है, चाय की करता है, वैसे ही वह कहता है अब राम-राम जपो। क्योंकि उससे थोड़ी सी राहत मिलती है। और जिस दिन राम-राम नहीं जपते, उस दिन ऐसा लगता है कि जैसे कोई काम छूट गया, जैसे सिगरेट नहीं पी। आज तो लगता है कुछ खाली जगह रह गई। ऐसा उससे भी लगता है। ये दोनों एक सी आदतें हैं। इनमें कोई भी फर्क नहीं है।
न तो जप, न एकाग्रता--ये मनुष्य को आत्मज्ञान में नहीं ले जाते हैं। आत्मज्ञान में तो ले जाता है ध्यान।
और ध्यान का अर्थ है--परिपूर्ण चैतन्य, जागरूकता, कांशसनेस। बेहोशी नहीं, नींद नहीं--होश। जितना ज्यादा मेरे भीतर जागरूक होता जाए चैतन्य, जितना अलर्ट, जितना अवेअर, जितना बोधपूर्ण--उतना मेरे भीतर क्या है, उसकी जानने की दिशा, जानने की सामर्थ्य, जानने की पात्रता मुझे उपलब्ध होती चली जाती है।
इतना जाग जाना है भीतर--कि भीतर एक कोना भी न रह जाए अनजाना, अपरिचित। भीतर एक अंधेरे का कण भी न रह जाए, इतना जाग जाना है कि सब हो जाए आलोकित, सब भीतर प्रकाश से भर जाए, होश से भर जाए। एक-एक कोना मेरे चित्त का मुझसे परिचित हो जाए। जिस दिन टोटल माइंड, जिस दिन पूरा चित्त जान लिया जाता है--सिर्फ कांशस माइंड नहीं, टोटल, सिर्फ चेतन मन नहीं, अचेतन भी। वह जो छिपा है अनकांशस, वह भी। जिस दिन पूरा मन...पूरा मन जिस दिन जान लिया जाता है, उस दिन जीवन के सारे रहस्यों के द्वार खुल जाते हैं। पूरे मन के प्रति जाग जाना है। और जान लिया जाना पूरे मन का, ध्यान है।
तो ध्यान तो सोने की तरकीब नहीं है, जागने की तरकीब है। और एकाग्रता, और नाम-जप इत्यादि सोने की तरकीबें हैं, जागने की नहीं। इसलिए जिन कौमों ने इस तरह की सोने की विधियों का उपयोग किया, उनके पूरे प्राण धीरे-धीरे सुस्त होकर सो गए। उनके जीवन में जागरण की प्रफुल्लता, जागरण की ऊर्जा और शक्ति दिखाई पड़नी बंद हो गई। वे सो गए। उनके जीवन में क्रांति और परिवर्तन विलीन हो गया। क्योंकि क्रांति और परिवर्तन होता है उसके जीवन में, जो जागा हुआ है। जो सोया हुआ है, वह क्या क्रांति और परिवर्तन करेगा। जो आदमी सोया हुआ है, उसके घर में आग लग जाए तो भी वह उठकर नहीं आएगा। जो आदमी जागा हुआ है, घर में आग लगे तो उसको बदलने की कोशिश करेगा।
आदमी के घर में कितनी आग लगी हुई है, इसका कुछ पता है? आदमी निरंतर आपके भीतर जी रहा है, इसका कुछ पता है? आदमी के जीवन में कितनी दीनता, कितनी दरिद्रता, कितना दुख है, इसका कुछ पता है? लेकिन हम सो रहे हैं--तो पता कैसे हो?
अगर आदमी जागा हुआ होता तो दुनिया बिलकुल दूसरी हो जाती। इस दुनिया में युद्धों के होने की जरूरत न रह जाती। इस दुनिया में रोज हत्याएं और कत्ल होने की जरूरत न रह जाती। इस दुनिया में आदमी इतना दुखी न होता कि शराब पीए, नशा करे, अपने को भूले। आदमी इतना दीन-हीन, इतना दरिद्र, इतना पीड़ित न होता। यह दुनिया बिलकुल दूसरी दुनिया हो सकती थी। लेकिन यह दूसरी दुनिया नहीं हो पाई, क्योंकि हमने अब तक सब भांति सोने की तरकीबें खोजी हैं, जागने की नहीं।
धर्म का कोई संबंध सोने से और निद्रा से नहीं है। धर्म का संबंध है जागरण से। और जागरण का धर्म जिस दिन दुनिया के कोने-कोने, आदमी-आदमी के मन तक पहुंच सकेगा, उस दिन हम मनुष्य के बदलने की कीमिया उपलब्ध कर लेंगे। एक अदभुत रूप से मनुष्य के जीवन को नया किया जा सकता है।
तो जागरण है ध्यान।

आज इतना ही।  
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक २०-१०-६७, रात्रि