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रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-039)

अश्रद्धा नहीं, आत्‍मश्रद्धा—प्रवचन—39


सूत्र:


अससद्धो अकतज्‍जू च संधिच्‍देदो च यो नरी।
हतावकसो वंतासो स वे उत्‍तम पोरिसो ।।88।।

गामे वे यदि वारज्‍जे निन्‍ने वा यदि वा थले।
वत्‍थरहंतो विहरंति तं भूमि रामणेय्यकं ।।89।।

रमणीयानि अरज्‍जानि यत्‍थ न रमते जनो।
वीतरागा रमिस्‍संति न ते कामगवेसिनो।।90।।




म्‍मपद के एक अत्यंत अनूठे सूत्र में आज प्रवेश होता है। सूत्र इतना अनूठा है कि बुद्ध के अतिरिक्त वैसा वक्तव्य कभी किसी दूसरे व्यक्ति ने न दिया है, न देगा।
बुद्ध की सारी विशिष्टता इस सूत्र में समाहित है—उनकी क्रांति, उनके देखने का अनूठा ढंग, उनकी बिलकुल नई पहुंच।

बुद्ध के पूर्व, बुद्ध के बाद भी, सभी ने श्रद्धा के गीत गाए हैं। ये सूत्र श्रद्धा के विरोध में हैं। कठिनाई भी होगी थोड़ी समझने में, लेकिन अगर समझ पाए तो श्रद्धा का सार समझ में आ जाएगा। ये सूत्र श्रद्धा के विरोध में हैं, क्योंकि श्रद्धा के नाम पर बहुत कुछ चलता है, जो श्रद्धा नहीं है। ये सूत्र श्रद्धा के विरोध में हैं, क्योंकि बुद्ध श्रद्धा के बड़े गहरे पक्ष में हैं। उन्हें बड़ी चोट लगी होगी; श्रद्धा के नाम से चलता हुआ जो देखा होगा, उन्हें बड़ी पीड़ा हुई होगी।
वे श्रद्धा के विरोध में बोले। लेकिन जो भी समझेंगे, वै' पाएंगे कि यह विरोध इसीलिए है कि श्रद्धा के वे बड़े हिमायती और पक्षपाती हैं। इसलिए जरा नाजुक है।
अक्सर ऐसा होता है कि धर्म के विरोध में वही लोग बोलते हैं, जो धर्म के बड़े गहरे पक्षपाती होते हैं; और देखते हैं कि मंदिर—मस्जिद का धर्म मुर्दा है; और देखते हैं कि पंडित—पुरोहित का धर्म झूठा है। जब धर्म के नाम से चलते इतने झूठ देखते हैं, झूठ की प्रतिमाओं की इतनी पूजा देखते हैं, तो उनके भीतर आग जल जाती है; तो वे धर्म के विरोध में बोलते हैं। लेकिन अगर तुमने उनके शब्द ही समझे और उनकी आत्मा न समझ पाए तो चूक गए।
अक्सर ऐसा होगा, अक्सर ऐसा हुआ है कि परम धार्मिक व्यक्ति, तुम जिसे धर्म कहते हो, उसके पक्ष में हो ही नहीं सकता। तुम जिसे धर्म कहते हो, वह धर्म ही नहीं है।
तो बुद्ध जब श्रद्धा के विपरीत में बोलें तो समझना कि तुम जिसे श्रद्धा कहते हो, उसके विपरीत बोल रहे हैं। और बुद्ध जिसे श्रद्धा कहते हैं, वह तो तुम्हें अश्रद्धा जैसी मालूम पडेगी। क्योंकि तुमने जिसे श्रद्धा समझा है, वह अश्रद्धा है। तुमने जिसे सीधा समझा है, वह उलटा है। इसलिए बुद्ध जब सीधी बात कहेंगे, तब तुम्हें उलटी मालूम पड़ेगी।
इसलिए बुद्ध के इन वचनों को अपने विचारों की भीड़ से दूर रखकर समझने की कोशिश करना। इन्हीं वचनों के कारण पूरा भारत बुद्ध से वंचित हुआ है। बुद्ध भारत में जन्मे और भारत के न रह गए। ऐसा अनूठा अवसर इस देश ने गंवाया है कि उसे भर पाने का कोई उपाय नहीं है। सारे एशिया पर बुद्ध का सूरज उगा, सिर्फ भारत में, जहां वे पैदा हुए थे, वहां अस्त हो गया।
भारत क्यों वंचित हुआ बुद्ध को समझने से? भारत के पास बड़ी बंधी हुई धारणाएं हैं धर्म की, श्रद्धा की। बुद्ध ने सब धारणाएं छिन्न—भिन्न कर दीं। काश, हम उन्हें समझ लेते तो भारत की यह लंबी रात कभी की टूट गई होती!
अभी भी नहीं टूटी है, अभी भी बुद्ध घर वापस नहीं लौट पाते हैं। अभी भी भारत के द्वार—दरवाजे बंद हैं। बुद्ध शब्द ही घबड़ाता है, भयभीत करता है। दो हजार साल, ढाई हजार साल भारत के पंडितों ने बुद्ध के खंडन में लगाए। जैसे बुद्ध ही अधर्म के प्रतीक हो गए। इससे बड़ा कभी कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ। इससे ऊंची भगवत्ता की उड़ान किसी और ने नहीं ली। अगर किसी को भगवान कहें तो वह यही व्यक्ति है। और किसी ने अगर धर्म की गहनतम अनुभूतियों को पाया तो वह यही व्यक्ति है।
फिर भी क्या हुआ कि भारत जैसा देश न समझ पाया? भारत, जो अपने को धार्मिक कहता है; भारत, जिसकी बड़ी पुरातन परंपरा है! बेबीलोन था कभी, खो गया; मिश्र था कभी, खो गया : यूनान था कभी, खो गया; सभ्यताएं आयीं और गयीं, भारत बना रहा है। हजारों सभ्यताएं बनीं और मिटी, धूल होकर खो गयीं; भारत का भवन खड़ा रहा है; बड़ा प्राचीन है।
फिर भी इतना प्राचीन देश बुद्ध को न समझ पाया? ऐसा मन में सवाल उठता है। लेकिन सच यह है कि इस प्राचीनता के कारण ही न समझ पाया। बुद्ध इतने नवीन हैं, इतने नित—नूतन हैं कि बुद्ध को समझने के लिए नई आंख चाहिए, जवान आंख; कुंआरा मन चाहिए।
भारत के पास बड़ा खंडहर जैसा मन है; इसमें इतनी धूल जम चुकी है कि जब भी कोई नई सूरज की किरण आती है तो सूरज की किरण भी धूल—धवांस में दब जाती है। जब भी कोई नया फूल खिलता है, खंडहर इतना पुराना है कि कोई भी ईंट गिरकर फूल को दबा देती है और मार डालती है। यहां फूल खिलना ही कठिन हो गया है। घास—पात ही खिलता है, झाड़—झंखाड़ ही उगते हैं, गुलाब और कमल खो गए हैं; जूही और बेलों की जगह नहीं रही है।
इसलिए बहुत समझकर सुनना।
'जो श्रद्धा से रहित है, जो अकृत को जानने वाला है, जो संधि को छेदन करने वाला है, जो हतावकाश है और जिसने तृष्णा को वमन कर दिया है, वही उत्तम पुरुष है। '
'जो श्रद्धा से रहित है। '
श्रद्धा का शास्त्र हम समझें। श्रद्धा का शास्त्र जैसा तुम जानते हो, जैसा तुम मानते हो, पहले उसे समझें। उसे समझे बिना यह सूत्र न समझा जा सकेगा।
श्रद्धा का अर्थ है : तुम्हें अपने पर श्रद्धा नहीं तो तुम किसी और का सहारा खोजते हो; तुम्हें अपने पर भरोसा नहीं तो तुम किसी और का भरोसा खोजते हो। थोड़ा सोचो लेकिन, जिसे अपने पर श्रद्धा नहीं है, उसे किसी और पर श्रद्धा हो कैसे सकेगी? जिसे अपने पर श्रद्धा नहीं है, उसे अपनी श्रद्धा पर भी कैसे श्रद्धा हो सकेगी? जिसे अपने पर भरोसा नहीं है, उसे अपने भरोसे पर कैसे भरोसा आएगा? धोखा होगा।
दूसरे के भरोसे में तुम केवल आत्म—अश्रद्धा को छिपा लोगे। दूसरे के पीछे चलकर तुम चलने की जो कठिनाई थी, उससे बच जाओगे। दूसरे का अनुकरण करके वह जो खोज की चुनौती थी, उसे चूक जाओगे।
अभियान है जोखिम से भरा; तुम जोखिम नहीं उठाना चाहते। तुम भोजन भी पचा—पचाया चाहते हो। कोई चबा दे, कोई तुम्हारे मुंह में चबाया उगल दे, ताकि तुम्हें मुंह भी न चलाना पड़े।
जूठा भोजन करने से तुम्हें मितली आएगी, लेकिन जूठी श्रद्धा से तुम्हें मितली नहीं आती? कोई दूसरा दे देता है और तुम मान लेते हो? इससे सिर्फ एक ही बात पता चलती है कि मानने का तुम्हारे मन में कोई मूल्य ही नहीं। तुम दूसरे के उतारे कपड़े पहनने को राजी नहीं होते, क्योंकि कपड़ों का तुम्हारे मन में कोई मूल्य है; लेकिन उन दूसरों के उतारे शास्त्र पहनने को राजी हो जाते हो। इससे एक ही बात पता चलती है कि तुम्हारे मन में कोई मूल्य ही नहीं है। तुम इस बात को इतना व्यर्थ समझते हो कि अपना हुआ कि पराया, हुआ कि न हुआ, सब बराबर है।
सत्य की गरिमा तुम्हारे मन में नहीं है; अन्यथा तुम उधार कैसे स्वीकार करते? सत्य और उधार! सत्य और किसी और का!
एक पंडित एक चमार की दुकान पर जूते सुधरवाने गया था। जूते की हालत बड़ी बुरी थी। तो उस चमार ने कहा, दो—चार दिन लगेंगे। पंडित ने कहा, यह तो बड़ा मुश्किल होगा। दो—चार दिन मुझे बिना जूते के चलना पड़ेगा। जल्दी नहीं हो सकती? दो—चार घंटे में नहीं हो सकता? तो उस चमार ने कहा, ऐसा करो, यह एक जोड़ी सुधरी पड़ी है; यह तुम दो—चार दिन पहन लो। फिर तुम्हारी ठीक हो जाए, ले जाना; यह वापस कर जाना। पंडित ने वह जोड़ी देखी, वह किसी और की जोड़ी थी, जो उसने सुधारकर रखी थी। उसने कहा, सोच—समझकर बात कर, मैं और किसी दूसरे के जूते उधार पहनूंगा? किसी के पहने हुए जूते? तूने मुझे समझा क्या है? वह चमार हंसने लगा; उसने कहा कि मैंने तो सोचा, आप पंडित हैं; इतने उधार जूते पहने हुए हैं, एक और हो जाएगा तो क्या हर्ज है?
जिसने आत्मा तक के वस्त्र उधार ले लिए, वह पैरों में जूते डालने में दूसरों के परेशान हो रहा है! लेकिन पैरों का हमारे मन में मूल्य है, आत्मा का कोई मूल्य नहीं है।
बुद्ध कहते हैं, 'जो श्रद्धा से रहित है। '
तुम किसे श्रद्धा कहते हो? तुम किसे विश्वास कहते हो? तुम अकेले घबडाए हुए हो, तुम अकेले कंप रहे हो, तुम किसी का सहारा पकड़ लेते हो। लेकिन कौन कब किसका सहारा हुआ है? इस संसार में स्वयं ही खोजना पड़ता है।
वस्तुत: सत्य से भी ज्यादा मूल्यवान खोज है। जो खोजता है ठीक से, जिसकी खोज सम्यक है, उसको सत्य तो मिल ही जाता है; वह तो परिणाम है।
लेकिन तुम खोज से बचना चाहते हो। तुम्हारी हालत उस छोटे बच्चे जैसी है, जो गणित करता है और किताब उलटकर पीछे लिखे उत्तर देख लेता है—इसको तुम श्रद्धा कहते हों—विधि नहीं करना चाहता, उधार उत्तर ले लेता है। लेकिन उधार उत्तर आ जाने से भी गणित हल नहीं होता। विधि तो जाननी ही पड़ेगी; यह उधार उत्तर व्यर्थ है। क्योंकि गणित का उपयोग यही था कि जब जीवन में प्रश्न तुम्हारे सामने खड़े हों तो तुम्हारे हाथ में विधि हो, ताकि तुम उत्तर खोज सको। अब यह उत्तर तुमने मुफ्त पा लिया। विधि से तुम चूक गए। गणित का अर्थ ही न रहा।
अब जीवन में जब भी कोई सवाल उठेगा—और जीवन में कोई किताब थोड़े ही है, जिसको उलटकर तुम पीछे लिखे उत्तर देख लोगे। स्कूल की किताबों में पीछे उत्तर लिखे होते हैं, जिंदगी की किताब में तो कहीं पीछे कोई उत्तर नहीं। उत्तर खोजने होते हैं; यहां उत्तर निर्मित करने होते हैं, अपने खून से सींचने होते हैं। यहां प्राणों को चुकाते हो तो उत्तर मिलते है।
एक बार अगर श्रद्धा की झूठ तुम्हें पकड़ गई, तुमने कहा, हम क्या करेंगे जानकर? बुद्ध पुरुषों ने जान लिया, कृष्ण और क्राइस्ट ने जान लिया, हम तो सिर्फ मान लेते हैं।
तुम्हारी श्रद्धा जानना नहीं है, मानना है। और सत्य माना नहीं जा सकता, केवल जाना ही जा सकता है। सत्य इतना सस्ता नहीं कि तुम माग लो और मिल जाए।
खोजना पड़ेगा। दुर्गम पथ है, लंबी यात्रा है, निश्चित कुछ भी नहीं है। मिलेगा भी, यह भी कोई आश्वासन नहीं दे सकता। ज्यादा से ज्यादा कोई इतना ही कह सकता है कि मैं भी चला, मैं भी भटका, पहुंच गया; आशा करता हूं तुम भी चलोगे, भटकोगे, गिरोगे, उठोगे, पहुंच जाओगे। आशा हो सकती है, आश्वासन नहीं हो सकता। आशीर्वाद कोई दे सकता है, आश्वासन कोई भी नहीं दे सकता। शुभकामना कोई कर सकता है कि प्रभु करे, तुम पहुंच जाओ; लेकिन पहुंचने के लिए कोई गारंटी नहीं दे सकता।
सत्य कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। और सत्य का कोई नियत घर नहीं है। जहां मैंने उसे पाया, वहां तुम उसे न पाओगे। क्योंकि तुम-तुम हो, मैं-मैं हूं। तुम्हारी राह थोड़ी अलग होगी, तुम कहीं और से चलोगे, क्योंकि तुम कहीं और खड़े हो। मैं जहा से चला था वहा से मैं चला था; तुम वहा से कभी भी न चलोगे। तुम्हारा चलना तो वहीं से शुरू होगा, जहा तुम खड़े हो; जहां तुमने अपने को पाया है। तुम्हारी राह मेरी राह कैसे होगी? मेरी राह तुम्हारी राह कैसे होगी?
ही, तुम मुझसे कुछ सीख सकते हो; मानने से कुछ सार न होगा। तुम मेरे अनुभवों से कुछ सार ले सकते हो, जो तुम्हें राह में चलने में सहयोगी हो जाएगा, लेकिन राह नहीं ले सकते।
इसलिए बुद्ध ने कहा है, बुद्ध पुरुष केवल इशारा करते हैं। उनकी अंगुलियों को पकड़कर, मानकर बैठ मत जाना। उनके इशारे मंजिल नहीं हैं; चलना तुम्हें होगा, यात्रा तुम्हें करनी होगी, भटकना तुम्हें होगा।
सत्य को पाने में, सत्य के मार्ग पर मिली हुई कठिनाइयां अनिवार्य हिस्सा हैं। क्योंकि सत्य कोई वस्तु थोड़े ही है, जो बाहर रखी है; उसकी खोज में ही तुम्हारे भीतर जो निर्मित होता है, वही सत्य है। उसकी खोज में, सतत चेष्टा में, बार—बार भटककर फिर—फिर तुम लौट आते हो, फिर—फिर खोजते हो, गिरते हो, उठते हो, हजार बार हाथ से सूत्र छूट जाता है, फिर तलाशते हो।
इस सारी खोज में तुम्हारे भीतर कोई संगठित होने लगता है प्राण। इस सारी खोज में तुम्हारे भीतर टूटे हुए, बिखरे हुए खंड करीब आने लगते हैं। एक रासायनिक प्रक्रिया घटती है, एक कीमिया से तुम गुजर जाते हो। तुम बिखरे टुकड़े नहीं रह जाते, तुम संगठित हो जाते हो। तुम्हारे भीतर आत्मा का जन्म होता है। वही आत्मा सत्य है।  ' सत्य की खोज में ही सत्य निर्मित होता है। सत्य की खोज सत्य के जन्म की प्रक्रिया है।
सत्य कहीं तैयार होता तो हम दूसरों से उधार ले लेते, रास्ते बना लेते, नक्शे तैयार हो जाते, दिशा—सूचक निशान लगा देते, मील के पत्थर गाड़ देते, सब चीजें सरल हो जातीं। भीड़ चुपचाप चली जाती। कुछ खोजना न पड़ता।
लेकिन सत्य बाहर नहीं है। खोजते हो तुम, तुम्हारे भीतर निर्मित होता है। जैसे गर्भ में बच्चा निर्मित होता है, ऐसे तुम्हारे भीतर सत्य का जन्म होता है। प्रसव की पीड़ा से गुजरना ही होगा। गर्भ को, गर्भ के बोझ को ढोना ही होगा।
तो जब बुद्ध कहते हैं, जो श्रद्धा से रहित है, तो वे यह कह रहे हैं : जो मान्यताओं से मुक्त है, जिसने विश्वास नहीं किया, जो खोजने को तत्पर है, जो खोजेगा तो ही मानेगा, जो खोज के पहले नहीं मानेगा।
इसका क्या अर्थ हुआ? क्या इसका यह अर्थ हुआ कि जो अश्रद्धा से भरा है? नहीं, फिर तुम चूक जाओगे। वही भूल भारत के पंडितों ने की; उन्होंने समझा, बुद्ध अश्रद्धा सिखाते हैं। बुद्ध केवल इतना कह रहे थे कि श्रद्धा छोड़ो। बुद्ध अश्रद्धा पकड़ने को नहीं कह रहे थे; क्योंकि फिर अश्रद्धा ही श्रद्धा हो जाती है। तुम जिसे पकड़ लेते हो, वही श्रद्धा हो जाती है। नास्तिक की भी श्रद्धा होती है। आस्तिक उसको अश्रद्धा कहता है, नास्तिक के लिए तो वह श्रद्धा ही होती है।
किसी कम्मुनिस्ट से पूछो! उसके लिए तो कार्ल मार्क्स की कैपिटल वैसे ही है, जैसे हिंदुओं के लिए वेद है, मुसलमानों के लिए कुरान है। और हिंदुओं का वेद तो हजारों साल की चोटें खा—खाकर थोड़ा नब भी गया है, विनम्र भी हो गया है; कैपिटल अभी बड़ा नया वेद है, अभी बड़ी अकड़ से भरा है, अभी समय की चोटें बहुत नहीं खाई हैं, अभी सौ साल ही हुए हैं उस किताब को लिखे हुए।
तो जैसे बच्चे में अकड़ होती है, सीमाओं का बोध नहीं होता, सब कुछ को पा लेने का खयाल होता है, कुछ भी असंभव नहीं है ऐसी धारणा होती है—ऐसी ही अवस्था है। न तो हिंदू वेद को पढ़ते हैं, न कम्युनिस्ट कैपिटल को पढ़ते हैं। मुझे अब तक कोई कम्युनिस्ट नहीं मिला, जिसने पूरी कैपिटल पढ़ी हो; न कोई हिंदू मिला है, जिसने पूरा वेद पढ़ा हो।
पढ़ने की जरूरत ही क्या है? मानना जब हो तो पढ़ने की जरूरत क्या है? मान लिया, बात खतम हो गई। असल में मान लेने के पीछे यही तो छिपा है कि पढ़ने की भी झंझट कौन करे? खोजने की भी झंझट कौन करे? ठीक है, ठीक ही होगा; झंझट मिटी।
नास्तिक की भी श्रद्धा होती है; वह कहता है, ईश्वर नहीं है। यह उसकी श्रद्धा है। आस्तिक इसे अश्रद्धा कहता है, क्योंकि आस्तिक की श्रद्धा है कि ईश्वर है। अगर तुम नास्तिक से पूछो तो वह कहेगा कि आस्तिक जिसको श्रद्धा कहता है, वह अश्रद्धा है। वह नास्तिक के ईश्वर में अश्रद्धा है। नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है, यही उसका ईश्वर है।
कभी तुमने गौर किया, नास्तिक भी मरने—मारने पर उतारू हो जाता है। यह बड़े मजे की बात है। ईश्वर है ही नहीं; तो अगर कोई आस्तिक ईश्वर के लिए मरने—मारने को उतारू होता हो तो समझ में आता है कि चलो, कम से कम इसका ईश्वर है तो! नास्तिक भी मरने—मारने को उतारू हो जाता है—उसके लिए, जो है ही नहीं; विवाद करता है, जीवन गवाता है। आस्तिकों से भी ज्यादा नास्तिक विवाद में समय गंवाते हैं।
कोई पूछे कि जो है ही नहीं, उसके लिए तुम परेशान क्यों हुए जा रहे हो?
नहीं, जो नहीं है, इतने पर ही बात पूरी नहीं हो जाती; इसे सिद्ध करना पड़ेगा। इसके लिए प्रमाण जुटाने पड़ेंगे कि नहीं है। और जो कहते हैं कि है, उनको गलत सिद्ध करना पड़ेगा, क्योंकि यह श्रद्धा का मामला है। अगर दूसरा कहे चला जाए कि है, तो हमारी श्रद्धा को डगमगाहट पैदा होती है, संदेह पैदा होता है कि कहीं हो ही न! इसलिए सारा इंतजाम करना पड़ता है नास्तिक को भी, कि नहीं है। उसको नहीं के मंदिर बनाने पड़ते हैं। उसे इनकार के शास्त्र निर्मित करने पड़ते हैं।
बुद्ध अश्रद्धा नहीं सिखा रहे हैं, बुद्ध कह रहे हैं, श्रद्धा न हो। बुद्ध यह कह रहे हैं कि तुम्हारा चित्त मान्यता से घिरा न हो—न इस तरफ, न उस तरफ। जब जाना ही नहीं है तो हम निर्णय कैसे करें? पता नहीं, है; पता नहीं, न हो। हमें पता नहीं है। तो हम अपने इस अज्ञान को किसी ज्ञान से न ढांके।
आस्तिक का भी दावा वही है, जो नास्तिक का है। आस्तिक कहता है, ईश्वर
है, यह हमें पता है। नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है, यह हमें पता है; मगर दोनों को पता है।
बुद्ध कहते हैं, सच में तुम्हें पता है? थोड़ा सोचो, थोड़ा मनन करो, तुम्हें पता है? तो पैर के नीचे से जमीन खिसकती मालूम होगी।
पता तो नहीं है; सुन रखा है, कहा है किसी ने, सुना है किसी से, समझ लिया है, मान भी लिया है। माना क्यों है?
बुद्ध कहते हैं, तुम्हारी सारी श्रद्धा के पीछे भय है। तुम्हारी श्रद्धा भय का ही विस्तार है।
बिना ईश्वर को माने बड़ी कठिनाई है। हजार उलझनें खड़ी हो जाती हैं, जो हल नहीं होतीं। फिर किसने संसार बनाया? फिर किसने यह सब सृष्टि रची? प्रश्न ही प्रश्नों की कतारे खड़ी हो जाती हैं, उत्तर नहीं मिलते। और बिना उत्तर के बेचैनी होने लगती है। ऐसा भी नहीं है कि श्रद्धा से उत्तर मिल जाते हैं, लेकिन उत्तर का आभास मिल जाता है। उतने से ही आदमी राहत मान लेता है। न सही सत्य, सत्य का आभास ही सही। थोड़ा भरोसा आ जाता है, थोड़ी सांत्वना हो जाती है।
नास्तिक की भी तकलीफ यही है। उसकी तकलीफ यही है कि ईश्वर को मानने से हजार प्रश्न खड़े होते हैं।
दुनिया में दो तरह के लोग मैंने देखे। एक हैं, जिनको ईश्वर न हो तो प्रश्न खड़े होते हैं; और एक हैं कि जिनको ईश्वर हो तो प्रश्न खड़े होते हैं; मगर दोनों की तकलीफ यह है कि ईश्वर के होने, न होने से उन्हें प्रश्न खड़े होते हैं।
और कोई न कोई उत्तर चाहिए। बिना उत्तर के सिर्फ प्रश्न में जीना बड़ा कष्ट है, बड़ा दूभर है। सिर्फ प्रश्न में जीना, समस्या में घिरे सब तरफ से, हाथ में कुछ भी सूत्र नहीं, बड़ी हिम्मत की बात है। सिर्फ दुस्साहसी प्रश्नों के साथ जी सकते हैं। और इसलिए सिर्फ दुस्साहसी ही सौभाग्यशाली हैं; कभी उनको उत्तर मिलते हैं। अगर तुमने उत्तर मिलने के पहले उत्तर मान लिए तो उत्तरों के आने की राह रोक दी, अवरोध खड़े कर दिए।
इसलिए बुद्ध कहते हैं, 'जो श्रद्धा से रहित है। '
श्रद्धा से रहित का अर्थ है : प्रश्नों को तो जानता है, उत्तरों को कैसे मान ले?
सभी उत्तर एक जैसे हैं। कोई कहता है, ईश्वर है; कोई कहता है, ईश्वर नहीं है; मैं कैसे मान लूं? तो मैं चुपचाप बिना माने खड़ा रहता हूं। मैं कोई चुनाव नहीं करता, मैं कोई निर्णय नहीं लेता। मैं कहता हूं  खोजूंगा। जब तक मैं न खोज लूंगा, तब तक मैं कैसे कहूं कौन तुममें ठीक है। हो सकता है, दोनों गलत हों। हो सकता है, दोनों ठीक हों। हो सकता है, कोई एक ठीक हो, कोई दूसरा गलत हो। सभी कुछ संभव है।
खोजी कहता है : स्यात् ऐसा हो, स्यात् वैसा हो; मुझे अभी पता नहीं, इसलिए मैं किस पक्षपात में खड़ा हो जाऊं? खोजी न हिंदू बनता है, न मुसलमान, न ईसाई, न जैन, न बौद्ध। खोजी कहता है, मैं सिर्फ खोजी हूं; खोज की क्या जात! खोज की कोई जात संभव नहीं है। खोज का क्या वर्ण! खोज का क्या नाम, क्या विशेषण! खोज का कौन सा मंदिर है? कौन सी मस्जिद अपनी है? खोज के लिए सारा संसार खुला है। खोजना है; जिस दिन खोज लेंगे उस दिन घोषणा करेंगे। उसके पहले घोषणा न करेंगे।
खोजी के लिए धैर्य चाहिए, श्रद्धा नहीं।
खोजी के लिए अभय चाहिए, भय नहीं।
खोजी के लिए दुस्साहस चाहिए और एक गहन आत्मनिष्ठा चाहिए कि खोजूंगा, शायद मिल जाए। अपने पर भरोसा चाहिए।
तो जब बुद्ध कहते हैं, जो श्रद्धा से रहित है, वे यह कह रहे हैं कि वही श्रद्धा से रहित हो सकता है, जिसे स्वयं के होने में श्रद्धा है।
श्रद्धा तुम दूसरे पर करो तो यह आत्म—अविश्वास है, श्रद्धा तुम अपने पर करो तो भीतर के दीए के जलने की संभावना है।
अब तुम फिर से सोचो, बुद्ध का क्या मतलब है! बुद्ध तुम्हें वस्तुत: श्रद्धा से भरना चाहते हैं, इसलिए सारी झूठी श्रद्धा को खींच लेना चाहते हैं। वास्तविक श्रद्धा तो खोज की श्रद्धा है—अन्वेषण की, आविष्कार की; पक्षपात की नहीं, धारणाओं की नहीं, विचारों की नहीं, अधैर्य की नहीं। अनंत धैर्य चाहिए।
और बुद्ध के वचन का यह भी अर्थ है कि जिसने अपने पर श्रद्धा की, वह अगर किसी पर कभी श्रद्धा करेगा तो उसका कोई मूल्य है।
मेरे पास लोग आते हैं; एक मित्र आए, उन्होंने कहा कि मेरे किए तो कुछ नहीं होता, मैं सभी आप पर छोड़ता हूं।
मैंने कहा, तुम छोड़ पाओगे? तुम्हारे किए कुछ भी नहीं होता, छोड़ पाओगे? यह तुमसे हो सकेगा? वे थोड़े चौंके, थोड़े परेशान हुए। मैंने कहा कि तुमसे जब कुछ भी नहीं होता तुम्हारे किए, तो तुम इतना बड़ा काम करने चले आए? तुम थोड़ा सोचो; छोटे—मोटे काम तुम से नहीं हुए, यह तो आखिरी काम है—सब छोड़ देना। तुम मुझ पर छोड़ रहे हो, तुम्हें अपने पर भरोसा है?
उन्होंने कहा, नहीं है, इसलिए तो आपके पास आया हूं।
तुम्हें अपने पर भरोसा नहीं है, तुम्हें मुझ पर भरोसा कैसे होगा? क्योंकि तुम्हीं तो मुझे खोजकर आओगे। तुम अपनी ही आंखों से तो खोजोगे। तुम्हें अपनी आंख पर भरोसा नहीं है। तुम्हारी आंख ने तुम्हें बहुत बार धोखे दिए हैं, तुम्हारी आंख इस बार भी धोखा दे रही हो तो क्या करोगे? तो भीतर शक तो बना ही रहेगा।
तुम्हारी सभी श्रद्धाओं के भीतर संदेह छिपा है। तुम लाख उपाय करो, ढांको, सजाओ; तुम्हारी श्रद्धा संदेह की सजावट है, श्रृंगार है।
मैंने उनसे कहा, तुम कुछ दिन सोचकर आओ। बहुत गौर से समझना, क्योंकि जब तुम कुछ भी करने में समर्थ नहीं, तो यह तो आखिरी करना है। यह तो केवल वही समर्थ हो पाता है, जो बहुत कुछ करने में समर्थ हुआ है। जिसे भरोसा आ गया है कि मैं कुछ कर सकता हूं वही यह कर पाता है। समर्पण संकल्प की आखिरी ऊंचाई है। सिर्फ संकल्पवान ही समर्थ है समर्पण करने में।
और फिर तुम कहते हो कि मुझे तो अपने पर बिलकुल भरोसा नहीं। तो मैं तो सदा नंबर दो ही रहूंगा न! नंबर एक तो तुम्हीं रहोगे। तुम्हारे द्वारा ही तुम मुझे देखोगे। मैं तो दोयम ही रहूंगा, प्रथम तो नहीं हो सकता, प्रथम तो तुम्हीं रहोगे। यह तुमने ही मुझे खोजा, यह तुम्हीं मेरे पास आए, यह तुमने ही निर्णय लिया कि सब छोड़ दें। यह तुम्हारा ही निर्णय है, इस पर तुम्हें भरोसा है ' अगर इस पर तुम्हें भरोसा है तो आत्मश्रद्धा होनी ही चाहिए भीतर। अगर इस पर तुम्हें भरोसा नहीं है तो तुम मुझ पर कैसे श्रद्धा कर सकोगे?
बुद्ध ने कहा है, जो श्रद्धा से रहित है, इसका अर्थ है. जो पर—श्रद्धा से रहित है, आत्मश्रद्धा से जो भरा है।
और ऐसा व्यक्ति अगर कभी श्रद्धा करेगा, उसकी श्रद्धा का कोई मूल्य है, अर्थ है, उसकी श्रद्धा में कोई बल है।
तुम अगर आत्मश्रद्धा से हीन हो, फिर तुम किसी पर श्रद्धा कर लेते हो, तुम्हारी श्रद्धा मूलत: ही कमजोर है; उसमें जड़ें ही नहीं हैं, कागजी है। इन कागज की नावों से कोई यात्रा होने वाली नहीं। डूबोगे, बुरी तरह डूबोगे। और मजा यह रहेगा कि तुम समझोगे कि दूसरे ने डुबाया।
मैंने उन सज्जन से यही कहा कि तुम केवल इतनी कोशिश कर रहे हो कि अब तुम जिम्मा अपने ऊपर न रखकर मेरे ऊपर डालना चाहते हो। तुम तो डूबोगे, अब तुमने एक तरकीब निकाली कि इस आदमी के कंधों पर रख दो जिम्मा—कि सब तुम पर छोड़ा, अब अगर डूबे तो याद रखना, तुम्हीं जिम्मेवार हो। तुम डूब ही रहे हो, नाव डूबी—डूबी हो रही है, सब तरफ से पानी भरा जा रहा है, घबड़ाहट में तुम श्रद्धा कर रहे हो। साबित नाव लेकर आओ।
वे कहने लगे, नाव साबित होती तो आता ही क्यों?
तब उलझन है। साबित नाव हो तो आने में कुछ अर्थ है, टूटी—फूटी नाव हो तो आने में कुछ अर्थ नहीं है।
इसलिए बुद्ध ने पहली बात कही, 'जो श्रद्धा से रहित है। '
यह श्रद्धा का बड़ा अनूठा सूत्र है। जो पर—श्रद्धा से मुक्त है, वही धीरे—धीरे आत्मश्रद्धा खोजेगा। अगर तुमने पर—श्रद्धा को ही अपना आसरा बना लिया तो तुम धीरे—धीरे भूल ही जाओगे कि आत्मश्रद्धा की जरूरत है; यह तो परिपूरक हो जाएगा। यह तो ऐसा हुआ, जैसे झूठा सिक्का हाथ में आ गया और तुमने असली समझकर मुट्ठी बंद रखी।
यह भरोसा काम में आने वाला नहीं है। यह भरोसा तो महंगा पड़ा जा रहा है। यह तो न हो तो अच्छा। डगमगाकर चलना, अपने ही पैर से चलना। ज्यादा देर डगमगाकर चलोगे न; गिरोगे, फिर उठोगे, धीरे—धीरे डगमगाहट कम होने लगेगी। धीरे—धीरे घिर होने की कला सीखने लगोगे। अगर तुमने अपने पैरों से नजर ही हटा ली और दूसरों के पैरों पर नजर रख ली तो दूसरे के पैर कितने ही थिर होकर चल रहे हों, वे तुम्हारे पैर नहीं हैं। और जो तुम्हारे पैर नहीं हैं, वे मंजिल तक न ले जाएंगे; अपने ही पैर ले जाते हैं।
हां, दूसरे से इशारे सीखे जा सकते हैं। बुद्ध पुरुषों से सीखो, लेकिन बुद्ध पुरुषों के कंधों पर बोझ मत बन जाओ। तुम जिसे श्रद्धा कहते हो, तुम समझते हो, तुम बड़ी कृपा कर रहे हो। तुम सिर्फ दायित्व फेंक रहे हो। तुम कह रहे हो, लो सम्हालो! अब अगर कुछ हुआ तो जिम्मेवारी तुम्हारी! अगर ठीक हुआ तो तुम्हारा अहंकार भरेगा कि देखो, हमने ठीक आदमी में श्रद्धा की। हमने श्रद्धा की ठीक आदमी में। और अगर डूबे, तो तुम कहोगे, इस आदमी ने डुबाया। इस आदमी ने धोखा दिया। ऐसे अहंकार खेल खेलता है।
इसलिए बुद्ध ने इसके लिए कोई जगह न छोड़ी। उन्होंने कहा, मेरे पास आओ तो आत्मश्रद्धा से भरकर आना; लड़खड़ाते पैर लेकर मेरे पास मत आना। क्योंकि लंबी यात्रा है, ऐसा न हो कहीं कि तुम मुझे अपनी बैसाखी समझो। मैं किसी की बैसाखी नहीं हूं। हा, मेरे चलने को देखो, मेरे चलने की कला को समझो; कैसे पैर बिना डगमगाए पड़ते हैं, यह देखो; और समझो और कला सीखो। लेकिन पैर अपने ही; यात्रा उन्हीं से होनी है—अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद ही बनना होगा। रोशनी जलाने की कला किसी से भी सीख लो, लेकिन रोशनी तो अपनी ही जलानी होगी।
आसरा मत ऊपर का देख
सहारा मत नीचे का मांग
यही क्या कम तुझको वरदान
कि तेरे अंतस्तल में रहा
राग से बांधे चल आकाश
राग से बांधे चल पाताल
धंसा चल अंधकार को भेद
राग से साधे अपनी चाल
भीतर है तुम्हारा संगीत। न तो आकाश का सहारा मांगो, न तो ऊपर का, न नीचे का। सहारा ही मत मांगो। सहारा मांगना अपमानजनक है। सहारे की बात ही तुम्हारे डुबाने का कारण बनी है। बहुत सहारे मांगे, कहां पहुंचे?
धंसा चल अंधकार को भेद 
राग से साधे अपनी चाल
भीतर के संगीत को पकड़ने की जरूरत है। जो तुम्हें चाहिए, तुम्हें मिला हुआ है; जरा पहचान बनानी है। जो चाहिए, हो सकता है अस्तव्यस्त हो; थोड़ी व्यवस्था जमानी है। जो चाहिए, हो सकता है अराजक हो और तुम्हारी समझ में ही न आता हो कि यहां क्या करें. थोड़ी समझ वहीं बढ़ानी है।
वीणा तुम्हारे भीतर है; तार अलग पड़े होंगे, वीणा अलग पड़ी होगी, खंड—खंड में होगी; खंडों को जोड़ना है। यह भी हो सकता है—बहुत बार ऐसा मैं देखता हूं? बहुत लोगों के भीतर—वीणा खंड—खंड में भी नहीं है, वीणा बिलकुल तैयार है, उनकी अंगुलियों की प्रतीक्षा कर रही है, लेकिन उनकी अंगुलियां बाहर खोज रही हैं, बाहर टटोल रही हैं। और जितना जीवन में अंधकार बढ़ता जाता है, जितना जीवन में व्यर्थ का शोरगुल बढ़ता जाता है, उतनी बेचैनी से वे बाहर दौड़कर खोज में लग जाते हैं कि कहीं कोई संगीत, कहीं कोई सुराग, कहीं कुछ मिल जाए सहारा। और भीतर वीणा सड़ रही है तुम्हारी अंगुलियों की प्रतीक्षा में'
बुद्ध ने बड़ी अनुकंपा की कि तुम्हारे हाथ तुम्हारी तरफ मोड़ दिए। बुद्ध ने कहा, ले जाओ भीतर हाथ अपने, मुझे मत टटोलो। मेरी वीणा मैंने भीतर पाई है, तुम भी अपनी वीणा इसी तरह अपने भीतर पाओगे। इतना इशारा मुझसे समझो। तुम मेरे संगीत को बजता देखते हो? यह गुनगुनाहट तुम्हें सुनाई पड़ती है, जो मेरे भीतर हो रही है ' यह मैंने अपने भीतर की वीणा पर अंगुलियों को चलाकर पाई है। तुम भी ऐसा ही करो।
बुद्ध पुरुषों के पीछे मत चलो। बुद्ध पुरुषों ने जो किया है, वह तुम भी करो। अब यह बड़े मजे की बात है। अगर ठीक से समझो तो यही बुद्ध पुरुषों के पीछे चलना है। उनके पीछे न चलना, अपने भीतर जाना—यही बुद्ध पुरुषों के पीछे चलना है, क्योंकि ऐसे ही वे अपने भीतर गए। अगर तुम बुद्ध पुरुषों के पीछे चल पड़े—बुद्ध पुरुष किसी के पीछे नहीं चले—भूल हो गई।
बुद्ध ने किसी वेद पर श्रद्धा न रखी, किसी उपनिषद पर आसरा न रखा। बुद्ध ने अपना उपनिषद भीतर खोजा। अब अगर तुम बुद्ध के वचनों पर श्रद्धा रखकर बैठ जाते हो, धम्मपद तुम्हारा वेद हो जाए—बहुतों का हो गया है—तो उलटी हो गई बात। बोधिधर्म जब चीन पहुंचा तो चीन के सम्राट बू ने कहा कि मैंने बड़े शास्त्र छपवाकर बांटे हैं। उसने कहा, होली लगवा दो। सब शास्त्रों को होली में डाल दो। बोधिधर्म का एक बड़ा प्रसिद्ध चित्र है, जिसमें वह धम्मपद को फाड़कर आग में डाल रहा है। और बोधिधर्म से ज्यादा बुद्ध के निकट कौन? उतने करीब से कभी किसी ने बुद्ध को नहीं अनुगमन किया। और बुद्ध के वचनों को आग में डाल रहा है! क्योंकि बुद्ध ने ही सारे शास्त्रों को आग में डाल दिया था।
अब यह उलटी बात लगती है, लेकिन जरा भी उलटी नहीं है। तुम कहोगे, यह
बोधिधर्म तो दुश्मन मालूम पड़ता है बुद्ध का। तो तुम चूक गए; तो तुम धर्म की पहेली को समझने से चूक गए। यह बोधिधर्म ही उनका अनुयायी है; यही उनको समझा, इसी ने पहचाना है। जब यह आग में डालता होगा धम्मपद को, तब बुद्ध ऊपर से फूल बरसाते होंगे।
मैं भी धम्मपद को आग में ही डाल रहा हूं—जरा और ढंग से; आग जरा सूक्ष्म है। क्योंकि बोधिधर्म ने जिस आग में डाला है, उसमें से तो बचाया जा सकता है। पानी छिड़क दो, आग बुझ जाएगी। जली—बुझी किताब लेकर भाग खड़े हो जाओ, उसी की पूजा चलती रहेगी। मैं कुछ और भी सूक्ष्म आग में डाल रहा हूं जिसमें से धम्मपद धम्मपद होकर निकल ही न सकेगा। और तुम उसे बचा भी न सकोगे। क्योंकि तुम समझोगे कि व्याख्या हो रही है, मैं जला रहा हूं।
शास्त्र को जलाने की यही तरकीब मैंने सोची। आग में तो जलाए गए, लेकिन जले नहीं; लोगों ने बचा लिए। पूरे न बचे, अधूरे बचा लिए। जो अधूरे जल गए थे आग में, उनको प्रक्षिप्त करके जोड़ दिया, और भी उपद्रव हो गया।
कुछ ऐसी आग से गुजारना है कि शास्त्र जल भी जाए, तुम बचा भी न पाओ। और जो भी शास्त्र में बचाने योग्य था, वह बच भी जाए—वह सदा बच जाता है, कोई आग उसे जला नहीं सकती।
धम्मपद आग में जलाया जा सकता है, धर्म तो नहीं जलाया जा सकता। धम्मपद जलाया जा सकता है, धर्म को कैसे जलाओगे? जो नहीं जलता, वही धर्म है। जो सब जलने के पार बच जाता है, वही धर्म है।
इसलिए जो शास्त्रों को बचाने में लगा है, उसे धर्म का पता ही नहीं है। जो बचाना पड़ता है, जिसे बचाना पड़ता है, वह तो धर्म है ही नहीं।
'जो श्रद्धा से रहित है। '
बुद्ध ने किसी मंदिर, किसी शिवालय में सिर न झुकाया, इसलिए नहीं कि सिर झुकाने की तैयारी न थी; ये मंदिर, ये शिवालय सिर झुकाने के योग्य ही न थे। और यहौ जो लोग सिर झुका रहे थे पंक्तिबद्ध, वे जरा भी सिर न झुका रहे थे, वे सिर्फ एक झूठा खेल कर रहे थे, एक अभिनय चल रहा था। झुकते थे और जरा भी नहीं झुकते थे।
दैरो—हरम में सर झुके, सर के लिए यह नंग है
झुकता है अपना सर जहा, वह दरो—आस्तां है और
इन पंक्तियों को जिसने भी लिखा होगा, बुद्ध की धारणा को समझकर ही लिखा होगा। बुद्ध ने कहा है कि मंदिर और मस्जिद में सिर झुके, यह अपमान है तुम्हारे भीतर के परमात्मा का। तुम चैतन्य को मिट्टी—पत्थर के सामने झुका रहे हो? तुम सम्राट को अपने ही बनाए खिलौनों के सामने झुका रहे हो?
बुद्ध ने कहा था, मेरी मूर्तियां मत बनाना, क्योंकि तुम बनाओगे तो तुम झुकने भी लगोगे। तुम झुकोगे तो भूल होगी, क्योंकि तुम्हारे भीतर असली मंदिर है, असली परमात्मा है, असली प्रतिमा है।
दैरो—हरम में सर झुके, सर के लिए यह नंग है
यह अपमान है, तुम्हारी गरिमा के योग्य नहीं।
झुकता है अपना सर जहां, वह दरो—आस्तां है और
वह दरवाजा और है, जहा सर झुकना चाहिए। वह दरवाजा तुम्हारे ही भीतर है, वह गुरुद्वारा तुम्हारे ही भीतर है, जहा सर झुकना चाहिए। और जहा झुकना गरिमापूर्ण है।
बुद्ध ने श्रद्धा ही सिखाई, लेकिन सम्यक श्रद्धा सिखाई। और सम्यक श्रद्धा का अनिवार्य हिस्सा है कि सारी अंधश्रद्धा चली जाए, पर—श्रद्धा चली जाए।
आत्मवान बनो! अपने तो बनो! कम से कम अपने तो बनो, फिर तुम किसी और के भी बन सकते हो। जो अपने ही नहीं हैं, वे दूसरों के बनने निकल पड़ते हैं। पहले कदम से ही राह भटक जाती है।
'जो श्रद्धा से रहित है, जो अकृत को जानने वाला है'
बड़ी बहुमूल्य सूक्ति है, 'जो अकृत को जानने वाला है।
अकृत बुद्ध कहते हैं निर्वाण को जो किया न जा सके, जो होता हो।
इस जगत में सब चीजें की जा सकती हैं, सिर्फ एक परमात्मा नहीं किया जा सकता। वह तुम्हारे करने के बाहर है; वह तुम्हारा कृत्य नहीं है, अकृत है, उसे तुम कर न सकोगे। इस जगत में सब किया जा सकता है, समाधि नहीं की जा सकती। इस जगत में सब किया जा सकता है और करने से सब पाया जा सकता है, निर्वाण नहीं पाया जा सकता।
बुद्ध ने निर्वाण तब पाया, जब वे कुछ भी न कर रहे थे। जिन्होंने भी पाया, तभी पाया, जब वे कुछ भी न कर रहे थे।
इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम आलसी होकर बैठ जाना; क्योंकि तुम्हारी व्याख्याएं बड़ी मजेदार हैं। तुम अपनी तरकीब निकाल लेते हो। सुनते ही तुम्हारे मन में यही खयाल उठता है कि बस, फिर तो ठीक, फिर तो हम कुछ कर ही नहीं रहे!
तो फिर तुम सोचने लगते हो कि फिर मैं तुम्हें क्यों इतने उपद्रवों में, ध्यान में और इस—उस में उलझाता हूं? जब कुछ न करने से मिलता है तो तुम पहले ही भले—चंगे थे, कुछ भी नहीं कर रहे थे, अब तुम्हें और मैंने उलझा दिया—ध्यान करो, प्रार्थना करो।
बुद्ध को न करने से मिला, लेकिन न—करने की दशा बहुत करने से आती है, जब तुम कर—करके थक जाते हो, तब आती है। जब कर—करके ऐसी घड़ी आ जाती है कि करना तुमसे गिर जाता है, तुम सम्हाल नहीं पाते उसे, तब आती है।
कृत्य की आखिरी ऊंचाई पर अकृत की शुरुआत होती है।
जब तक तुम्हें लगता है, तुम कुछ कर सकते हो, तब तक अकृत शुरू नहीं होता। कर ही डालो, जो तुम कर सकते हो, तभी तुम उस जगह आओगे, उस परिधि पर, जहां तुम्हें दिखाई पड़ेगा, अरे! अब आगे मुझसे कुछ भी नहीं हो सकता।
इस भेद. को समझना। एक आदमी तो कह सकता है, मुझसे कुछ भी नहीं होता, सिर्फ आत्म—अश्रद्धा के कारण। और एक आदमी कह सकता है, अब मुझसे कुछ भी नहीं होता, क्योंकि वह उस पड़ाव पर आ गया है, जिसके आगे अकृत शुरू होता है। आलस्य से नहीं मिलता निर्वाण, अकृत से मिलता है।
अकृत का अर्थ है : कृत के बाद, कृत के पार। आलस्य का अर्थ है कृत के पहले; और अकृत का अर्थ है कृत के बाद।
कर चुके सब। करने की आखिरी चरम अवस्था आ गई। ध्यान किया, योग किया, जप किया, तप किया, सब किया। उससे बहुत कुछ मिलता है, सिर्फ निर्वाण नहीं मिलता। शांति मिलेगी, आनंद मिलेगा, बड़े सुख की तरंगें फैल जाएंगी, बड़े गहन संगीत बजेंगे, नाच आ जाएगा जिंदगी में, उत्सव होगा, अंधेरी रात कट जाएगी, सुबह होगी—बहुत कुछ मिलेगा, निर्वाण नहीं मिलेगा।
निर्वाण का क्या अर्थ है फिर? निर्वाण का अर्थ ही होता है : जहा तुम मिट जाओ। सुख मिलेगा, तुम रहोगे। शांति मिलेगी, तुम रहोगे। उत्सव होगा, तुम रहोगे। अभी थोड़ी सी कमी बाकी है—तुम हो। उतना ही काटा अभी गड़ा है। वह कांटा भी जब निकल जाता है, तो निर्वाण।
निर्वाण का अर्थ है—जब तुम बुझ जाते हो। निर्वाण शब्द का अर्थ है, बुझ जाना जब तुम बिलकुल नहीं बचते; तुम्हारा न होना हो जाता है।
समझो, कृत से तो तुम बढ़ोगे—मैं हूं और मजबूत होता जाऊंगा। धन कमाओगे तो मैं हूं योग करोगे तो मैं हूं र क्योंकि मैं योगी हूं इतना योग किया; तप करोगे तो मैं हूं यह मैं तो बड़ा होता जाएगा। कृत से तो मैं बड़ा होगा। कृत से तुम आत्मवान बनोगे।
अब तुम्हें बुद्ध की भाषा समझनी बहुत सरल हो सकती है, अगर मेरी बात तुम्हारे खयाल में आ जाए। कृत से तुम आत्मवान बनोगे—मैं हूं। और एक ऐसी घड़ी आएगी, जहा तुम पाओगे, जो किया जा सकता था, किया जा चुका; लेकिन अभी कुछ और एक कदम बाकी है, जो किया नहीं जा सकता। तुम तड़फोगे, भागोगे, दौड़ोगे, लेकिन वह कदम किया नहीं जा सकता। तुम विक्षिप्त होने लगोगे। तुमने कभी सपने में ऐसा देखा? जागना चाहते हो, जाग नहीं सकते। हाथ हिलाना चाहते हो, हिला नहीं सकते। आंख खोलना चाहते हो, खोल नहीं सकते। कितने घबड़ा नहीं जाते हो! कितने बेचैन नहीं हो जाते हो! आंख भी खुल जाती है तो छाती धड़कती रहती है, पसीना माथे पर बहता रहता है। दुखस्वप्‍न देखा, तुम कहते हो। 
तुम कल्पना करो थोड़ी इस दुखस्वप्न से। जिन्होंने योग की पराकाष्ठा साधी, उनके जीवन में एक ऐसी घड़ी जागते—जागते आती है—यह तो तुम्हारे सोते में घटता है कभी, उनके जागते में घटता है—एक ऐसी घड़ी आती है, कि बस एक कदम और, परमात्मा वह रहा! और वह कदम नहीं उठता। हाथ हिलाना चाहते हैं, हाथ नहीं हिलता। छलांग लगाना चाहते हैं, छलांग नहीं लगती। सास लेना चाहते हैं, सांस नहीं ले सकते। और जागते में, परिपूर्ण जागरूकता में, बड़े होश में यह घटता है।
झेन फकीर कहते हैं—निर्वाण के लिए उनका शब्द है—द लास्ट नाइटमेयर; आखिरी दुखस्वप्न। जागते—जागते! तड़फते हो, चीखते—चिल्लाते हो, कोई सहारा नहीं, सब शून्य में खो जाता है—और बस एक कदम! मंजिल के सामने खड़े हो, द्वार खुला है, एक कदम और सब हल हो जाए; मगर यह नहीं उठता, नहीं उठता, नहीं उठता—अकृत आ गया, निर्वाण आ गया।
क्या करते हो—जब दुखस्वप्‍न में ऐसा होता है कि तुम जाग नहीं पाते, आंख खोलना चाहते हो, आंख नहीं खुलती; हाथ हिलाना चाहते हो, हाथ नहीं हिलता—क्या करते हो? कुछ भी नहीं करते। थोड़ी देर तड़फकर शांत रह जाते हो। जैसे ही शांत होते हो, आंख भी खुल  जाती है, हाथ भी चल जाता है।
बस, ऐसी ही घड़ी अंतिम पराकाष्ठा पर घटती है। पहले बड़ी चेष्टा चलती है, बड़ी चेष्टा चलती है, फिर थककर आदमी गिर जाता है। अपने किए होता ही नहीं तो करोगे भी क्या? अपना किया पूरा का पूरा टूट जाता है, गिर जाता है। और जैसे ही तुम गिरते हो, तुम अचानक पाते हो, मंजिल पर आ गए। जो करने से नहीं हुआ, वह न करने से होता है।
भक्त इसको प्रसाद कहते हैं, क्योंकि उनके पास परमात्मा है, उनके पास परमात्मा की धारणा है। वे इसको प्रसाद कहते हैं। वे कहते हैं, अपने किए नहीं होता, वह देता है। बुद्ध इसको प्रसाद नहीं कह सकते, उनके पास भक्त की भाषा नहीं है। वे कहते हैं : अकृत।
अब तुम समझ लेना, यह सिर्फ भाषा का भेद है। बुद्ध कहते हैं, अकृत; क्योंकि परमात्मा तो है नहीं, जो दे दे। तुम कर नहीं सकते, कोई देने वाला है नहीं, अब होता जरूर है; तब एक ही उपाय रहा कि बिना किए होता है, अपने आप होता है।
भक्त के पास भाषा है। भाषा द्वंद्व चाहती है, द्वैत चाहती है। भक्त के पास द्वैत है—मैं और भगवान। उसको सुविधा है। वह कहता है, मेरे किए नहीं होता, कोई हर्जा नहीं है, तू दे-दे; तेरे देने से हो जाता है।
बुद्ध अद्वैत की भाषा बोलना चाहते हैं, इसलिए अकृत शब्द का उपयोग किया है। अकृत का अर्थ है : मेरे किए होता नहीं, देने वाला कोई है नहीं; किसी से मांगूं ऐसा कोई है नहीं; किसी को पुकारूं, ऐसा कोई है नहीं—सूना, विराट, शून्य आकाश है—तो चीखता हूं चिल्लाता हूं दौड़ता हूं भागता हूं, सब करता हूं। करते—करते, करते—करते एक चरम अवस्था आ जाती है, जिसके पार करने का उपाय नहीं रह जाता, गिर जाता हूं। उसी गिरने में निर्वाण घटता है।
इसलिए बुद्ध ने निर्वाण को अनात्मा कहा। करने तक आत्मा, अत्ता, फिर जब करना ही गिर गया, उसी के साथ मैं भी गिर गया—अनत्ता।
बुद्ध के इस अनत्ता शब्द को समझने में बड़ी कठिनाई हुई। क्योंकि लोगों ने कहा, यह तो हद हो गई, ईश्वर भी नहीं और आत्मा भी नहीं? तो फिर अब नास्तिकता में और क्या कमी रही? यह तो परम नास्तिकता हो गई।
जैनों को तो हिंदुओं ने बरदाश्त भी कर लिया। कम से कम परमात्मा को नहीं मानते, चलो कोई हर्जा नहीं, आत्मा को तो मानते हैं। पचास प्रतिशत आस्तिक हैं, चला लो। तो जैन चल गए—बहुत ज्यादा नहीं चले, लेकिन हिंदुओं ने बरदाश्त किया; फेंकने योग्य न मालूम पड़े—कि चलो एक कोने में बने रहेंगे।
लेकिन बुद्ध को तो बरदाश्त करना ही असंभव हो गया। क्योंकि इसने तो सारी बात ही छोड़ दी; सौ प्रतिशत नास्तिक मालूम हुआ। पहले परमात्मा छीन लिया और आखिरी में अकृत कहकर आत्मा भी छीन ली फिर अनत्ता बची, निर्वाण हुआ—जैसे दीया बुझ गया। यह आदमी तो महा नास्तिक है। इसलिए हिंदू बौद्धों से इतने नाराज रहे; क्षमा नहीं कर पाए बुद्ध को।
अंबेडकर ने इसका ही बदला लिया। जब हिंदुओं से उसका विरोध बढ़ता गया, बढ़ता गया, तो एक ही उपाय बचा। पहले वह सोचता था कि ईसाई हो जाए, मगर ईसाइयों से हिंदुओं का कोई खास विरोध नहीं है। यह कोई बात जंची नहीं उसे। कई बार सोचा, मुसलमान हो जाए, यह बात भी जंची नहीं, क्योंकि मुसलमानों से झगड़ा—झांसा हो, विरोध कुछ खास नहीं है। अंततः उसने तय किया कि बौद्ध होना चाहिए, क्योंकि इससे कभी हिंदुओं का कोई मेल का सवाल ही नहीं उठता। इससे बड़ा कोई विरोध ही नहीं हो सकता। सिर्फ बदला लेने के लिए अंबेडकर बौद्ध हुआ और हरिजनों के एक समूह को बौद्ध कर लिया।
यह राजनीति थी। बुद्ध धर्म लौटा भी तो न लौटने जैसा लौटा; गलत आदमी के हाथों लौटा। वैसे ही बुद्ध धर्म को भारी नुकसान हुआ; और अंबेडकर उसे वापस लाया तो और नुकसान हो गया। अब उसके लौटने के सब द्वार ही बंद हो गए। लेकिन बुद्ध ने बड़ी परम सत्य की बात कही है। क्योंकि जब अकृत हो जाएगा तो मैं कैसे बचेगा? मैं तो कृत का जोड़ है। जो—जो हमने किया है, उसका ही जोड़ मैं है। तुमसे कोई पूछे, तुम कौन हो? तो तुम कहते हो, मैं इंजीनियर हूं डाक्टर हूं चित्रकार हूं कवि हूं। इसका मतलब, तुम यह—यह करते रहे हो। अगर तुमसे कोई कहे कि तुम यह करने की बात छोड़ो, तुम सीधा बता दो कि तुम कौन हो? क्या तुमने किया, यह हम पूछ ही नहीं रहे। तुम कविता करते हो? हमें कुछ मतलब नहीं, कविता करो कि न करो। डाक्टरी करते हो? कोई मतलब नहीं हमें। तुम तो सीधा बता दो कि तुम कौन हो?
तो वह आदमी भी थोड़ा चकित होगा। वह कहेगा, फिर तो बताने का कोई उपाय न रहा। क्योंकि मैं कृत्य का जोड़ है। कोई कहता है, मैं चोर हूं? यह भी कृत्य का जोड़ है। कोई कहता है, मैं साधु हूं यह भी कृत्य का जोड़ है। वह कहता है, इतने उपवास किए, त्याग किए, साधु हूं।
बुद्ध कहते हैं, जहां तक मैं है वहां तक संसार है, जहां अनत्ता का प्रारंभ होता है, अकृत का, और मैं नहीं, वहीं निर्वाण है।
'जो श्रद्धा से रहित है, जो अकृत को जानने वाला है, जो संधि को छेदन करने वाला है।'
बहुत बार तुमसे मैंने कहा है संध्या के लिए; संधि बुद्ध उसे कहते हैं। दो विचारों के बीच, दो होने के बीच न—होने की संधि। दो अहंकारों के बीच खाली जगह, संधि।
'जो संधि को छेदन करने वाला है, जो हतावकाश है।
जिसको अब संसार में आने की कोई जरूरत नहीं रह गई। जो अब वापस नहीं लौटेगा। लौटने का कोई कारण नहीं रहा। जिसने संधि पा ली, द्वार पा लिया। जिसने अकृत को जान लिया, जो मिट ही गया, उसे वापस कैसे लाओगे? जब तक हो, तब तक वापस आना है। जब तक मैं है, तब तक पुनर्जन्म है।
बुद्ध ने कहा है, जब तक तुम हो, तब तक बंधन है, क्योंकि तुम ही बंधन हो। औरों ने कहा है कि बंधन संसार है; संसार छोड़ो, संन्यास स्वीकार करो। औरों ने कहा है, वासना बंधन है, वासना छोड़ो, निर्वासना हो जाओ। औरों ने कहा है, संसार के विपरीत मोक्ष है। बुद्ध ने कहा, संसार के विपरीत मोक्ष नहीं है, मैं के विपरीत मोक्ष है। और बुद्ध ने बड़ी गहरी बात कही कि मैं ही संसार है। मैं को छोड़ो; बाकी कुछ छोड़े काम न चलेगा। धन छोड़ोगे, त्याग पकड़ लोगे। संसार छोड़ोगे, मोक्ष पकड़ लोगे, क्योंकि तुम्हारे मैं की पकड़ मौजूद है, वह कुछ भी पकड़ लेगी। मैं को छोड़ो, पकड़ को तोड़ो।
मैं की मुक्ति नहीं है मोक्ष, मैं से मुक्ति मोक्ष है।
'और जिसने तृष्णा को वमन कर दिया है, वही उत्तम पुरुष है। '
स्वर्ग तो कुछ भी नहीं है
छोड़कर  छाया जगत की
स्वर्ग—सपने देखती दुनिया
सदा सोती रही है
मोक्ष तुम्हारा स्वप्न नहीं है। तुम लाख चेष्टा करके भी मोक्ष की कोई धारणा नहीं बना सकते। मोक्ष तुम्हारी कोई कामना नहीं है। तुम लाख विचार करके भी मोक्ष को समझ नहीं सकते। मोक्ष तुम्हारा कोई लोभ का विस्तार नहीं है।
इसलिए बुद्ध स्वर्ग और नर्क की बात नहीं करते, सिर्फ निर्वाण की बात करते हैं। उन्होंने मोक्ष के लिए भी नया शब्द उपयोग किया है निर्वाण। मोक्ष शब्द का भी उपयोग नहीं किया, क्योंकि मोक्ष से ऐसा लगता है कि तुम तो बचोगे मुक्त हो जाओगे। मोक्ष शब्द में उन्हें खतरा दिखाई पड़ा।
जैसे एक आदमी जेलखाने में बंद है, फिर मुक्त हो गया तो जेलखाने से बाहर हो गया। आदमी तो रहेगा! वही का वही रहेगा, जो जेलखाने के भीतर था। लेकिन बुद्ध कहते हैं कि जेलखाने से तुम बाहर हुए कि तुम न हुए; तुम बचोगे ही नहीं। तुम्हारा होना ही जेलखाना है। यह जेलखाना कुछ ऐसा नहीं है कि तुमसे बाहर है और तुम इसके बाहर हो सकते हो; यह जेलखाना कुछ ऐसा है कि तुम जहां रहोगे, वहीं रहेगा। यह तुम्हारे चारों तरफ चिपटा है, यह तुम्हारे होने का ढंग है।
इसलिए बुद्ध को एक नया शब्द खोजना पड़ा—निर्वाण। निर्वाण का अर्थ है : संसार तुम हो; और जहां तुम नहीं हो, वहीं मोक्ष है।
सबके हृदय में शल है
सबके पगों में धूल है
रुकना यहां पर भूल है
पथ पर कहीं विश्राम के लिए
सोना यहां अच्छा नहीं
संसार है, संसार है
सभी दुख से भरे हैं। दुख से भरे होने के कारण स्वभावत: सुख की आकांक्षा पैदा होती है। सभी नर्क में जी रहे हैं। नर्क में जीने के कारण स्वभावत: स्वर्ग की कल्पना पैदा होती है। स्वर्ग की कल्पना तुम्हारे नर्क का ही विस्तार है। सुख की कल्पना तुम्हारे दुख का ही फैलाव है। दोनों से मुका होना होगा; नहीं तो नींद जारी रहती है। जिसे तुम सुख कहते हो, वह ज्यादा से ज्यादा विश्राम है।
सोना यहां अच्छा नहीं
संसार है, संसार है
जिसे तुम सुख कहते हो, वह नींद है। जिसे तुम दुख कहते हो, वह जैसे किसी ने नींद उचटा दी। अच्छा नहीं लगता नींद का उचट जाना; तुम फिर सो जाना चाहते हो। दुख जगाता है, सुख सुलाता है।
इसलिए जिन्होंने जीवन के सत्यों की गहरी खोज की है, वे कहते हैं, दुख सौभाग्य है, सुख दुर्भाग्य है। क्योंकि अगर तुम दुख के जागने में जाग जाओ तो तुम सत्य की खोज की यात्रा पर निकल जाते हो। लेकिन अगर तुम फिर सुख खोजने लगो, तो ऐसा ही समझो कि किसी ने जगा दिया, कुछ शोरगुल हो गया, बाजार की आवाज आ गई, सड़क से कोई कार निकल गई, नींद टूट गई, तुमने फिर करवट ले ली, फिर कंबल के भीतर छिपकर फिर तुम सो गए; फिर तुमने सुख में अपने को डुबा लिया।
सुख एक तरह का विस्मरण है, एक तरह की निद्रा है। दुख इस निद्रा में पड़ी हुई खलल। सब ठीक चल रहा था, दुकान अच्छी चल रही थी, दीवाली की दशा थी, अचानक दिवाला आ गया—बस, खलल पड़ गई। स्वास्थ्य ठीक चल रहा था, सब मजे से जा रहा था, अचानक बीमारी आ गई—खलल पड़ गई। सब ठीक चलता था, जैसा चलना चाहिए चलता था, पत्नी मर गई, पति मर गया—खलल आ गई। इस खलल का जो ठीक से उपयोग कर ले, दुख का जो ठीक से उपयोग कर ले तो दुख ही तप हो जाता है।
दुख के दो आयाम हैं या तो तुम दुख के कारण फिर सोने की कोशिश करने लगते हो—और भी जोर से—शामक दवाएं खोज लेते हो, फिर से नींद में डूबने की चेष्टा करते हो; यह साधारण आदमी की चेष्टा है।
एक दूसरा आयाम भी है कि तुम दुख के जागरण को सौभाग्य मानते हो कि चलो, जगे तो! अब सोएंगे नहीं, अब जागते ही रहेंगे अब इस जागने का उपयोग कर लेंगे। जो दुख में जागने का उपयोग कर लेता है, उसका दुख तप हो जाता है। दुख के दो आयाम हैं : सुख और तप, सोना और जागना, विस्मृति और स्मृति; होश और बेहोशी। दुख का कैसा तुम उपयोग करते हो, इस पर तुम्हारे सारे जीवन का रूपांतरण निर्भर है।
वही उत्तम पुरुष है, जिसने दुख से जागने का काम ले लिया। वही उत्तम पुरुष है, जिसने जाग—जागकर, सारा श्रम किया जागने का और ऐसी घड़ी छू ली, जहां अकृत का प्रवेश हो जाता है।
'गांव हो या वन, नीची भूमि हो या ऊंची, जहां कहीं अर्हत विहार करते हैं, वही भूमि रमणीय है। '
फूलों में सौंदर्य नहीं है; सूर्योदय में, सूर्यास्त में सौंदर्य नहीं है; सौंदर्य देखने वाले की आंख में है।
तुमने भी इसे देखा होगा। कभी तुम खुश होते हो, प्रसन्न होते हो, गुनगुनाते होते हो, तब फूल ज्यादा सुंदर मालूम पड़ते हैं। कभी तुम उदास होते हो, पीड़ित, परेशान होते हो, फूल बड़े कुम्हलाए, जरा—जीर्ण मालूम पड़ते हैं। कभी तुम प्रफुल्लित होते हो, चांद नाचता मालूम पड़ता है बदलियों में; और कभी तुम खिन्न मन होते हो, हताश मन होते हो, चांद भी ढला—ढला, उदास—उदास, थका—थका, घसिटता—घसिटता मालूम होता है। तुम्हारी दृष्टि में सब कुछ है।
उसकी तो तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि जब कोई अर्हत पुरुष….
अर्हत बुद्ध का शब्द है। अर्हत का अर्थ होता है कि जिसने अपने सारे शत्रुओं से विजय पा ली। अरि यानी शत्रु, हत यानी हरा दिया, जिसने सारे शत्रु हरा दिए, जो विजयी हुआ। जिसको जैनों ने जिन कहा है, उसको बुद्ध ने अर्हत कहा है। जिन जो जीत गया।
'गांव हो या वन, नीची भूमि हो या ऊंची, जहां कहीं अर्हत विहार करते हैं, वही भूमि रमणीय है।
अर्हत का होना रमणीय है। अर्हत के होने में सौंदर्य है। अर्हत के होने में अपूर्व मंगलदायी उत्सव है। जहा अर्हत चलता है, वहीं उसका उत्सव फैल जाता है।
तुम अर्हत को मरुस्थल में नहीं बिठा सकते, उसके मरुस्थल में भी फूल उग आते हैं। तुम अर्हत को अकेला नहीं कर सकते, उसके अकेले में परम नाद का आविर्भाव हो जाता है। तुम अर्हत को मार नहीं सकते उसकी मृत्यु में भी निर्वाण ही फलित होता है।
'गांव हो या वन, नीची भूमि हो या ऊंची, जहां कहीं अर्हत विहार करते हैं, वही भूमि रमणीय है। '
चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए सो ही शहनशाह
कबीर ने कहा है।
चाह गई, चिंता मिटी
चिंता चाह की छाया है।
…….मनवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए सो ही शहनशाह
वे सम्राट हैं; वे चक्रवर्ती सम्राट हैं।
बुद्ध पैदा हुए, ज्योतिषियों ने कहा, या तो यह लड़का सम्राट होगा चक्रवर्ती, या अर्हत तत्व को उपलब्ध बुद्ध पुरुष होगा। पिता बहुत चिंतित हुए। लेकिन आठ ज्योतिषी उन्होंने बुलाए थे सारे साम्राज्य से, सबसे बड़े ज्योतिषी बुलाए थे, उनमें एक कोदन्ना नाम का युवक ज्योतिषी भी था। सात ने तो यह विकल्प दिया कि या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाएगा, संन्यासी होगा, परम संन्यासी होगा; लेकिन कोदन्ना ने कहा कि यह चक्रवर्ती सम्राट ही होगा।
पिता बहुत प्रसन्न हुए; उन्होंने कोदन्ना को भेंटों से भर दिया। लेकिन कोदन्ना ने कहा, ठहरो, शायद तुम समझे नहीं। यह बुद्ध पुरुष होगा, यही मेरा मतलब है। क्योंकि सिर्फ बुद्ध पुरुष ही चक्रवर्ती सम्राट होते हैं, और तो कोई नहीं। इसमें विकल्प है ही नहीं।
तब तो पिता बड़े दुखी हुए। क्योंकि यह कोदन्ना सबसे महत्वपूर्ण ज्योतिषी था; युवा था, लेकिन इसकी आंख बड़ी पैनी थी। और सच में ही इसकी आंख पैनी रही होगी। क्या गजब की बात उसने कही, कि होगा तो यह बुद्ध पुरुष ही, यही मेरा मतलब है, तुम समझे नहीं। झोली मेरी भरने के पहले थोड़ा ठहरो। इन्होंने तो विकल्प भी दिया है, मैं तुम्हें विकल्प भी नहीं देता; यह होगा तो बुद्ध पुरुष ही। लेकिन वही एकमात्र ढंग है चक्रवर्ती होने का, और तो कोई ढंग ही नहीं।
चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए सो ही शहनशाह
स्वामी राम अपने को बादशाह कहते थे था उनके पास कुछ भी नहीं। जब वे अमरीका गए और वहां भी उन्होंने अपनी यह बात जारी रखी, तो यहां भारत में तो चलती है, वहां लोगों को बड़ी हैरानी हुई—बादशाह! अमरीकी प्रेसीडेंट भी उनसे मिलने आया था। तो उसने भी कहा कि जरा और तो सब ठीक है, आपके पास कुछ दिखाई नहीं पड़ता, आप बादशाह कैसे? उन्होंने कहा, इसीलिए! इसीलिए कि मेरे पास कुछ भी नहीं है।
चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए सो ही शहनशाह
मैं सम्राट हूं क्योंकि मेरे पास कुछ भी नहीं। जिनके पास कुछ है, उनके पास सीमा है, उनके साम्राज्य की परिधि है। जिनके पास कुछ भी नहीं है, उनके पास शून्य का साम्राज्य है, असीम साम्राज्य है, वे चक्रवर्ती हैं।
'गांव हो या वन, नीची भूमि हो या ऊंची, जहां कहीं अर्हत विहार करते हैं, वही भूमि रमणीय है।
'ऐसे रमणीय वन हैं, जहां सामान्यजन नहीं रमते। वीतराग पुरुष ही वहा रमते हैं, जिन्हें काम— भोगों की तलाश नहीं रहती।
पर्त दर पर्त सौंदर्य छाया है चारों तरफ। तुम जो देखते हो, वह तुम्हारी सीमा की खबर है; उससे अस्तित्व का कुछ संबंध नहीं। तुम्हें जो दिखाई पड़ता है, वह तुम्हारी दृष्टि की खबर है। यहां पर्त दर पर्त, फूल के भीतर फूल, किरणों के भीतर किरणें छिपी हैं। यहां रूप के भीतर रूप, और रूपों के अंतत: अरूप छिपा है। यहां सौंदर्य ही सौंदर्य की वर्षा हो रही है। अगर तुम वंचित रह जाते हो तो कहीं भूल तुम्हारी है। यहां बूंद के पीछे बूंद, और सारी बूंदों की पंक्तियों के, अनंत पंक्तियों के पीछे सागर छिपा है। कितना तुम पाते हो, यह तुम पर निर्भर है—कि कितना तुम पी सकते हो! तुम्हारा पात्र कितना है! मेघ तो बरसते हैं, असीम को बरसा जाते हैं, तुम्हारे पात्र में लेकिन उतना ही पड़ता है, जितना तुम्हारा पात्र सम्हाल पाता है।
जिसे तुमने पत्थर—कंकड़ों का जगत समझा है, वहीं परमात्मा भी छिपा है। और जहां—जहां तुम्हें सीमा दिखाई पड़ती है, वहीं असीम का नर्तन चल रहा है। जहां तुम्हें स्वर सुनाई पड़ते हैं, वहीं उस शून्य का नाद भी गज रहा है।
तुम जैसे—जैसे सूक्ष्म होने लगोगे, वैसे ही सूक्ष्मतर सौंदर्य की पर्तें उघड़ने लगती हैं। तुम जितने स्थूल होते चले जाते हो, उतना ही जीवन कुरूप होता चला जाता है।  'रमणीय ऐसे वन हैं, जहां सामान्यजन नहीं रमते। '
रम ही नहीं सकते। वे वहां से गुजर भी जाते हैं तो भी उन्हें दिखाई नहीं पड़ता। कभी—कभी वे वहां पहुंच भी जाते हैं तो भी उन्हें पता नहीं चलता कि कहां पहुंच गए! बुद्ध पुरुषों के पास पहुंचकर भी कुछ लोग खाली हाथ ही लौट जाते हैं।
इस संसार में बहुत कुछ घट रहा है। तुम ऐसा मत मानकर बैठ जाना कि जो तुमने जाना है, बस इति आ गई।
इति तो आती ही नहीं। शास्त्रों की इति आती है। जीवन के शास्त्र की कोई इति नहीं। न कोई आदि है, न कोई अंत है, सदा मध्य है यहां।
और जितना खोजोगे, उतना पाते चले जाओगे। सीमा कभी आती ही नहीं। खोजते—खोजते खोजने वाला ही मिट जाता है। सौंदर्य इतना घना होने लगता है कि तुम बचते ही नहीं। भरते— भरते पात्र पिघल जाता है, भरते— भरते पात्र मिट जाता है, लेकिन भरना नहीं मिटता।
कोहसारों का यह गाता हुआ शाबाद सकूत
यह हवाओं में लरजता हुआ रंगीन खुमार
यह सनोवर के दरख्तों की बुलंदी का वकार
बज रहा है मेरे महबूब मेरे दिल का तार
कोहसारों का यह गाता हुआ शाबाद सकूत
पहाड़ों के सौंदर्य की गीत गाती शांति!
यह हवाओं में लरजता हुआ रंगीन खुमार
हवाओं में कंपती, डोलती खुमारी! मस्ती!
यह सनोवर के दरख्तों की बुलंदी का वकार
ये ऊंचाइयां सनोवर के दरख्तों की, ये आकाश को छूने की आकांक्षा ए!
बज रहा है मेरे महबूब मेरे दिल का तार
जैसे—जैसे तुम्हें पहाड़ों का संगीत सुनाई पड़ता है, वृक्षों की अभीप्सा का अनुभव होता है, जैसे—जैसे तुम्हें हवाओं में डोलती मस्ती का थोड़ा सा स्वाद आता है, वैसे—वैसे तुम्हारे भीतर उस प्यारे का तार भी बजने लगता है। उस इकतारे पर किसी की अंगुलियां पड़ने लगती हैं।
इसकी शुरुआत तो है, इसका अंत कोई भी नहीं।
'रमणीय हैं ऐसे वन, जहा सामान्यजन नहीं रमते। '
नहीं कि सामान्यजनों को वहां पहुंचना असंभव है; वे पहुंचकर भी नहीं पहुंच सकते, उनकी आंख ही चूक जाती है। उनके पास देखने का ढंग नहीं, सलीका नहीं। उनके पास देखने की शैली नहीं, उनके पास ध्यान नहीं।
सौंदर्य को जानना हो तो ध्यान चाहिए।
सत्य को जानना हो तो ध्यान चाहिए।
शिवत्व को जानना हो तो ध्यान चाहिए। 
ध्यान के बिना कुछ भी उपलब्ध नहीं है। ध्यान यानी पात्रता, ध्यान यानी अपने भीतर अवकाश, जगह।
'वीतराग पुरुष ही वहां रमते हैं।
क्यों? वीतराग पुरुष क्यों?
'जिन्हें काम—भोगों की तलाश नहीं।
क्योंकि जब तक तुम्हारे मन में काम— भोग की तलाश है, तब तक तुम्हें स्थूल का दर्शन होगा।
ऐसा समझो कि एक लकड़हारा जाता है जंगल में, सनोवर के आकाश को छूते वृक्ष, उसे केवल लकड़ियां दिखाई पड़ती हैं, जिनका ईंधन बनाया जा सकता है। या एक मूर्तिकार जाता है, उसे उस वृक्ष में मूर्तियां छिपी हुई दिखाई पड़ती हैं, जिनको उघाड़ा जा सकता है। या एक चित्रकार जाता है, या एक कवि जाता है, तो अलग—अलग अनुभव होते हैं—वृक्ष वही है।
और जब कोई अर्हत पहुंच जाता है उस वृक्ष के नीचे, तो जो उसे दिखाई पड़ता है, सिर्फ उसे ही दिखाई पड़ सकता है। यह मैं बिलकुल शब्दशः—यह कोई प्रतीक का उपयोग नहीं कर रहा हूं—शब्दश: ऐसा सच है। जो तुम्हें दिखाई पड़ता है, वह तुम्हारी देखने की सीमा की खबर है। जो अर्हत पुरुषों को दिखाई पड़ता है, उसकी कोई सीमा नहीं। उन्हें एक छोटा सा गुलाब का फूल भी परमात्मा का पर्याप्त प्रमाण हो जाता है। तुम्हारी दृष्टि पर.।
एक सुंदर स्त्री तुम्हें दिखाई पड़ती है, सुंदर पुरुष दिखाई पड़ता है, तत्‍क्षण वासना जगती है। एक अर्हत पुरुष को भी सुंदर स्त्री दिखाई पड़े तो वासना नहीं जगती, प्रार्थना जगती है। एक धन्यवाद का भाव आता है, एक अनुग्रह का भाव आता है। अगर अर्हत पुरुष भक्त हो तो परमात्मा को धन्यवाद देता है कि तूने सौंदर्य बनाया। अगर अर्हत पुरुष भक्त न हो तो धन्यवाद देता नहीं, कोई प्रार्थना नहीं उठती, कोई शब्द नहीं बनते, लेकिन एक अहोभाव, एक धन्यता का भाव—धन्यवाद नहीं, क्योंकि धन्यवाद देने को कोई भी नहीं है—लेकिन एक धन्यता का भाव कि धन्य हूं अहोभागी हूं। होना ही इतना बड़ा अहोभाग है, और चारों तरफ सौंदर्य से भरे होना, चारों तरफ सौंदर्य से घिरे होना!
तुम पर निर्भर करता है। तुम कहां हो, यह तुम्हारा चुनाव है। तुम जहा हो, वहीं सब कुछ बदल सकता है, सिर्फ तुम्हारा चुनाव बदले।
'ऐसे रमणीय वन हैं, जहां सामान्यजन नहीं रमते; वीतराग पुरुष ही वहां रमते हैं।
      लेकिन उस रमणीयता को खोज तुम तभी पाओगे, जब मन से वासना गिर जाए। क्योंकि वासना तो बड़ी स्थूल है; वह तो बडी ओछी बात पर उलझी रहती है; उसकी नजर ही ओछी रहती है; उस नजर से वह पार जा ही नहीं सकती।
      अगर वासना से भरकर तुमने किसी की देह को देखा तो चमड़ी का ऊपर का आकार ही तुम्हारी पकड़ में आएगा। अगर तुमने निर्वासना से भरकर किसी को देखा तो हड्डी—मांस—मज्जा के भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, उसकी तुम्हें झलक मिलेगी।
      अब तुम थोड़ा सोचो, अगर तुम्हारा मन निर्वासना से भर जाए तो चारों तरफ कितने चिराग, कितने चिन्मय दीप, चारों तरफ कितनी मशालें जल रही हैं चैतन्य की! दीवाली प्रतिक्षण हो रही है। उत्सव चल ही रहा है। यह महोत्सव कभी समाप्त नहीं होता। क्षणभर को विराम नहीं पड़ता।
एक फूल झरता है तो हजार खिल जाते हैं।
एक द्वार बंद होता है तो हजार खुल जाते हैं।
यह महोत्सव चलता ही चला जाता है। अर्हत पुरुष इस महोत्सव में जीता है। निश्चित ही ऐसे रमणीय वन हैं, जहां सामान्यजन नहीं रमते, केवल वीतराग पुरुष ही रमते हैं।



आज इतना ही।