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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-05

नए मठ के लिए सदगुरु कौन?-(प्रवचन-पांचवां) 

मनुष्य होने की कला--(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)
कथा:
ह्याकूजो ने अपने सभी भिक्षुओं, को एक साध बुलाया वह उनमें
से एक को नए मठ के संचालन के लिए भेजना चाहता था जमीन पर
पानी से भरा एक जग रखते हुए उसने कहा- '' बिना इसका नाम
प्रयोग किए हुए कौन बता सकता है कि यह क्या है?''
प्रधान भिक्षु ने कहा- जिसे उस पद करे प्राप्त करने की आशा थी।
उसने कहा- '' कोई भी इसे लकड़ी कर खड़ा के तो नहीं कह सकता।''
दूसरे भिक्षु ने कहा- '' यह कोई तालाब नहीं है? क्योंकि इसे कहीं
भी ले जाया सकता है। ''
भोजन बनाने वाला भिक्षु जो पास ही खड़ा था, आगे बड़ा, उसने
जग को एक ठोकर मारी और चला गया।
ह्याकूजो मुस्कुराया और उसने कहा, '' भोजन बनाने वाला भिक्षु
ही नए मत का सदगुरु होगा।

वास्तविक को विचार-प्रक्रिया द्वारा नहीं जाना जा सकता। बल्कि उसे तो कृत्य द्वारा जाना जा सकता है। सोच-विचार ठीक स्वप्न जैसी एक घटना है। जिस क्षण तुम कोई कृत्य करते हो, तुम वास्तविकता का एक भाग बन जाते हो। वास्तविकता एक सक्रिय कृत्य है। सोच-विचार बस उसका एक खण्ड है। जब तुम कोई काम करते हो तो तुम समग्र होते हो। कोई भी कृत्य हो, तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसमें संलग्न होता है। सोच-विचार मन के एक भाग में चलता रहता है, तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसमें व्यस्त नहीं होता, तुम्हारे बिना भी सोच-विचार एक स्वचालित प्रक्रिया की तरह निरंतर जारी रह सकता है।
इसे बहुत गहराई से समझना है। यह उन लोगों के लिए आधारभूत चीजों में से एक है जो और किसी चीज की खोज में न होकर सत्य खोज रहे हैं। धर्म और दर्शन शास्त्र इस अर्थ में स्पष्ट रूप से अलग है। धर्म है कृत्य और दर्शनशास्त्र है विचार-प्रक्रिया। इस कहानी में बहुत से फंसाव और उलझनें हैं। सद्‌गुरु अपने एक शिष्य भिक्षु को नए मठ का प्रधान बनाना चाहता था, जो शीघ्र प्रारंभ होने जा रहा था। वहां किसे भेजा जाए? वहां कैसे व्यक्ति को पथप्रदर्शक बनाकर भेजना चाहिए। क्या ऐसा व्यक्ति जो तत्वज्ञानी और कुशाग्र बुद्धि का हो, क्या ऐसा व्यक्ति जो तर्कों द्वारा अच्छा प्रवचन
दे सके, क्या ऐसा व्यक्ति जो शास्त्रों का जानकार हो, ज्ञानी हो अथवा एक ऐसा व्यक्ति जो सरल स्वाभाविक रूप से सभी काम करता हो? वह भले ही अधिक न जानें वह भले ही बहुत अधिक बौद्धिक क्षमता का न हो और बहुत साधारण ही हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति समग्रता से काम करने वाला पूर्ण होगा।
मठ के प्रधान शिष्य ने सोचना और स्वप्न देखना शुरू कर दिया कि उसे ही इस पद के लिए चुना जाना है। मन हमेशा महत्वाकांक्षी होता है। उसके लिए यह जरूरी था कि वह योजनाएं बनाएं कि उसे किस तरह का व्यवहार करना चाहिए और ऐसा क्या कुछ करना चाहिए जिससे उसे ही नए मठ का प्र धान चुना जाए। वह निश्चित रूप से कई रातें जागता रहा होगा और उसका मन चारों ओर अवश्य ही भटकता रहा होगा। अहंकार ही योजना बनाता है और तुम जो भी योजना बनाओगे तुम वास्तविकता या सत्य से चूक जाओगे क्योंकि स्वाभाविक होकर ही तुम वास्तविकता का आमना-
सामना कर सकते हो। यदि तुम पहले ही से उसके बारे में सोच-विचार करते हुए तैयार रहोगे तो उससे चूक जाआगे। पहले से तैयार व्यक्ति चूकेगा ही यही विरोधाभास है। वह व्यक्ति जो पहले से तैयार नहीं है जिसने किसी भी चीज के लिए कोई भी -योजना नहीं बनाई है वह ही स्वाभाविक रूप से कार्य करता हुआ वास्तविकता या सत्य के हृदय तक पहुंच जाता है।
प्रधान शिष्य के मन में बहुत से सिद्धांतों और विकल्पों का आना जरूरी था। जब सदगुरु चुनाव करने जा रहा है तो वह किसी तरह की परीक्षा भी लेगा।
उसने अवश्य ही कई शास्त्रों और ग्रंथों को भी पढ़ा होगा क्योंकि पुराने दिनों में भी सद्‌गुरु शिष्यों का चुनाव कर उन्हें नए मठों मैं भेजा करते थे। वह चुनाव किस तरह किया करते थे? किस तरह की परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती थी? वे कैसे सफल होते
पुराने दिनों की वहां बहुत-सी कहानियां थीं। अन्य परीक्षाओं में मूलभूत परीक्षा लगभग हमेशा ही झेन सद्‌गुरु किसी वस्तु को सामने रखकर बिना भाषण का प्रयोग किए शिष्यों को उसे अभिव्यक्त करने को कहते थे। वे कहते-इस चीज के बारे में बिना इसके नाम का प्रयोग किए हुए कुछ कहो, क्योंकि किसी भी वस्तु का नाम वस्तु नहीं है। यह कुर्सी यहां है और मैं इस पर बैठा हुआ हूं। एक झेन सदगुरु कह सकता है इस कुर्सी के बारे में कुछ कहो लेकिन इसके नाम का बिना प्रयोग किए हुए क्योंकि कुर्सी शब्द कुर्सी नहीं है इसलिए भाषा का प्रयोग मत करो मौखिक अभिव्यक्ति का
सहारा मत लो, लेकिन बताओ, वह है क्या?
मन उलझन का अनुभव करता है क्योंकि मन केवल भाषा के सिवाय और कुछ नहीं जानता। यदि भाषा पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो मन रुक जाता है। सिवाय शब्दों की भीड़ के और मन है क्या? उसमें शब्द है, नाम है भाषा है और एक सद्‌गुरु कहता है-'' भाषा और नाम का प्रयोग मत करो। '' वह कह रहा है-मन का प्रयोग मत करो और कुछ ऐसा करो जिससे कुर्सी का बोध हो जाए।
'परमात्मा ' शब्द परमात्मा नहीं है, मनुष्य मनुष्य नहीं है। गुलाब शब्द, गुलाब का फूल नहीं है। जब वह भाषा का जन्म भी नहीं हुआ था, वृक्ष तब भी थे-वे भाषा पर आश्रित नहीं थे। उसका तब भी अस्तित्व था।
प्रधान शिष्य ने बार-बार चिंतन पर चिंतन किया होगा। जब अवश्य ही उसने पहले ही से कुछ विकल्प चुना होगा। वह मृत था और ठीक उसी क्षण वह असफल हो गया।
अपने अंदर यदि यह तय कर लो कि तुम क्या करने जा रहे हो, फिर तुम जो भी करोगे वह तय किए हुए निर्णय से ही होगा और तुम वास्तविकता से चूक जाओगे क्योंकि वास्तविकता तो सदा प्रवाहित गतिशीलता है। कोई नहीं जानता कि वह कहा जा रही है और कोई नहीं जानता कि क्या घटने जा रहा है। कोई भी उसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता, पहले से उसके बारे में कुछ भी कहना असंभव है।
एक झेन कहानी कही जाती है : दो झेन मठ अगल-बगल स्थित थे। दोनों मठों के सदगुरु के पास दो छोटे लड़के थे, जो दौड़ते हुए संदेशा ले जाने और लाने के साथ-साथ बाजार का भी काम करते थे। दोनों लड़के अपने- अपने सद्‌गुरुद्वारा बताया सामान कभी सब्जी और कभी कुछ और चीजें लाने बाजार जाया करते थे। ये दोनों मठ परस्पर विरोधी विचारधाराओं पर आधारित थे, लेकिन बच्चे तो बच्चे ही थे, वे कभी- कभी मठ के उपदेश और सिद्धांत भूलकर जब रास्ते में मिल -जाते थे तो एक दूसरे से बातें करते हुए उसका आनंद लेते थे।
वास्तव में बात करने की मनाही थी और उन लड़कों को भी आपस में बात नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि दूसरा मठ, उनके मठ का विरोधी था, शत्रु था।
एक दिन वह लड़का जो पहले मठ का था, सद्‌गुरु के पास आकर-’‘ मैं तो बहुत उलइन में पड़ गया हूं। जब मैं बाजार जा रहा था तो मैंने दूसरे मठ के लड़के को देखकर उससे पूछा, तुम कहां जा रहे हो? तो उसने उत्तर दिया, जहां मुझे बहती हुई हवा ले जाए। मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आया कि मैं क्या कहू उसने तो मेरे लिए एक -उलझन खड़ी कर दी। ‘‘
सद्‌गुरु ने कहा-’‘ यह बात ठीक नहीं है। हमारे मठ का कोई भी कभी दूसरे मठ से हारा नहीं है। भले ही वह एक नौकर ही क्यों न हो। तुम्हें उस लड़के को ठीक उत्तर देना जरूरी है। कल उससे फिर पूछना, तुम कहां -जा रहे हो? वह कहेगा, जिधर मुझे बहती हुई हवा ले जाए। तब तुम उससे कहना, यदि हवा ही न चल रही तो तब...?
वह लड़का सारी रात ठीक से सो न सका। वह यही कल्पना करने की कोशिश करता रहा कि अगले दिन क्या कैसे होगा। वह कई बार पूर्व अभ्यास करता रहा-वह उससे पूछेगा, फिर वह लड़का क्या कहेगा और वह उसका कैसे उत्तर देगा।
अगले दिन वह सड़क पर खड़ा होकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा। जब बगल में बने मठ का लड़का सामने आया तो उसने पूछा-’‘ तुम कहां जा रहे हो? ‘‘
लड़के ने उत्तर दिया-’‘ मेरे पैर मुझे जहां भी ले जाएं। ‘‘
इसलिए उसकी फिर कुछ समझ में न आया कि क्या किया जाए? उत्तर तो पूर्व निश्चित था, पर वास्तविकता के बारे में कोई भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। वह उदास होकर मठ में लौटा और उसने सद्‌गुरु से कहा-’‘ वह लड़का विश्वास करने योग्य नहीं है। उसने उत्तर बदल दिया और मेरी समझ में आया ही नहीं कि अब मैं क्या करूं? ‘‘
सद्‌गुरु ने कहा-’‘ अगले दिन जब वह जवाब दे, ' मेरे पैर जहां मुझे ले जाएं? '
तो तुम उससे कहना, यदि तुम्हारे दोनों पैर कट जाएं और यदि तुम अपंग हो जाओ, तब...?
उस रात भी वह सो न सका। वह सुबह जल्द ही सड़क पर आकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा। जब वह लड़का आया तो उसने पूछा-’‘ तुम कहां जा रहे हो? ‘‘लड़के ने उत्तर दिया-’‘ बाजार से सब्जी लेने जा रहा हूं। ‘‘
वह फिर व्याकुल-परेशान वापस आया और उसने सद्‌गुरु से कहा-’‘ इस लड़के को समझना तो असंभव है? वह रोज बदलता रहता है। ‘‘
यह जीवन भी उस लड़के जैसा है। यह निरंतर बदलता रहता है। वास्तविकता कोई पूर्व निर्धारित जड़ घटना नहीं है।
तुम्हें स्वेच्छा से उसके लिए स्वयं ही उपस्थित रहना होगा, केवल तभी उत्तर असली होगा। यदि तुम्हारा उत्तर पहले से तैयार किया हुआ है तो तुम पहले ही से मृत हो और तुम पहले ही उससे चूक गए। कल तो आएगा, लेकिन तुम वहां न होगे? तुम तो बीते कल के साथ जमे बैठे हो, जो गुजरा अतीत है।
वे सभी मन जो इसी तरह बहुत अधिक शब्दों के बोझ से दबे बैठे हैं। उनके उत्तर अतीत में ही तैयार हो चुके हैं। किसी पंडित या किसी विद्वान से जाकर पूछो, परमात्मा क्या है?
और तुम्हारे पूछने से पहले ही वह उत्तर देना शुरू कर देगा। उसने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है क्योंकि तुम्हारे प्रश्न करने से पहले ही उस व्यक्ति के पास उत्तर था। वह उत्तर मुर्दा है, वह पहले ही से वहां है, उसे बस स्मृति से लाया गया है, वह स्वत: स्कूर्त उत्तर नहीं है।
एक तथाकथित ज्ञानी और प्रज्ञावान व्यक्ति में यही अंतर है। जानकारी रखने वाले ज्ञानी के पास पहले से तैयार उत्तर है तुमने पूछा, और उत्तर वहां पहले ही से तैयार है। तुम अप्रासंगिक हो, तुम्हारा प्रश्न असम्बद्ध है। उत्तर का अस्तित्व, प्रश्न करने से पूर्व ही है, तुम्हारा प्रश्न केवल स्मृति रूपी बंदूक के घोड़े को दबाना भर है, लेकिन यदि तुम किसी प्रज्ञावान व्यक्ति के पास जाओ, उसके पास तुम्हारे लिए कोई उत्तर हैं ही नहीं, उसके पास पहले तुम्हारा प्रश्न उसके अंदर जाएगा, तब वह प्रश्न उसके पूरे अस्तित्व में प्रतिध्वनित होगा। उसकी स्मृति से न आकर वह उत्तर उसके अस्तित्व से आता है। उस उत्तर के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। तुम अगले दिन जाकर उससे वही प्रश्न पूछो तो उत्तर ठीक वैसा ही नहीं होगा।
एक बार ऐसा हुआ कि एक व्यक्ति ने बुद्ध को जांचना चाहा। वह उसके पास प्रत्येक वर्ष जाकर वही प्रश्न पूछता था क्योंकि वह सोचता था कि यदि वे वास्तव में जानते हैं तो उनका उत्तर हमेशा ज्यों-का-त्यों एक ही होना चाहिए। क्योंकि तुम दूसरा उत्तर कैसे बदल सकते हो? यदि मैं आकर पूछता हूं क्या वहां परमात्मा है? यदि वे जानते हैं तो वे कहेंगे--हां या कहेंगे-नहीं और अगले साल आकर मैं फिर से वही प्रश्न पूछूंगा।
इसलिए कई वर्षों तक वह व्यक्ति आता रहा और उसकी उलझन निरंतर बढ़ती ही गई। कभी बुद्ध कहते, हां, और कभी बुद्ध कहते, न कभी-कभी वे मौन ही बने रहते और कभी-कभी वे मुस्कराकर रह जाते और किसी बात का कोई उत्तर देते ही नहीं।
उस व्यक्ति ने परेशान होकर उनसे कहा, ‘‘ आखिर यह सब है क्या? यदि आप जानते हैं तब आपको निश्चित होना चाहिए और आपका उत्तर तैयार होना चाहिए लेकिन आपका उत्तर निरंतर बदलता रहता है। एक बार आपने कहा, '' हां, फिर आपने कहा, न। क्या आप मुझे भूल गए कि मैंने यही प्रश्न पहले भी पूछा था? फिर एक बार आप मौन ही बने रहे और अब आप मुस्करा रहे हैं। यही कारण है कि मैं एक साल के लम्बे अंतराल के बाद आता हूं। केवल यही देखने कि आप जानते हैं या नहीं?
‘‘ बुद्ध ने कहा, ‘‘जब तुम पहली बार आए थे और पूछा था, ‘‘क्या परमात्मा है? ‘‘मैंने उसका उत्तर दिया था। लेकिन यह उत्तर तुम्हारे प्रश्न का न होकर तुम्हारे लिए था। अब तुम बदल गए हो, अब वही उत्तर नहीं दिया जा सकता और न केवल तुम बदल गए हो, मैं भी बदल गए हूं। तब से गंगा काफी बह चुकी है और वही उत्तर नहीं दिया जा सकता। मैं कोई शास्त्र नहीं हूं कि तुमने उसे खोला और वह उत्तर पा लिया, जो उसमें पहले ही से लिखा हुआ है।
एक बुद्ध एक बहती हुई नदी की भांति है। वह निरंतर प्रवाहित हो रही है। सुबह वह सबसे पृथक होती है-सूर्य के उदित होते ही जैसे नदी में चारों ओर स्वर्णिम आलोक प्रवाहित हो उठता है, दोपहर और शाम नदी कुछ अलग होती है। जब रात आती है और उसके जल में जब सितारे प्रतिबिंबित होने लगते हैं, वह कुछ और हो जाती है। गर्मियों में वह सिकुड़ जाती है, वर्षा में वह उफन उठती है और उसमें बाढ़ आ जाती है। नदी कोई तस्वीर नहीं है, वह एक जीवन्त ऊर्जा है।
एक तस्वीर या चित्र वही का वही बना रहता है। चाहे बाहर वर्षा हो रही हो या झुलसती हुई गर्मी की दोपहर हो। वर्षा ऋतु में चित्रित तस्वीर में बाढ़ नहीं आएगी। वह मृत है, अन्यथा हर क्षण वहां परिवर्तन हो रहा है। केवल एक ही चीज स्थायी है और वह है-परिवर्तन। केवल एक ही चीज वहां निरंतर है और वह है-क्रांति। सिवाय क्रांति के प्रत्येक वस्तु अस्थायी है। वह होती है... और वह निरंतर होती ही रहती है। इस मठ के प्रधान शिष्य ने पहले ही से सब कुछ तय कर रखा था, निष्कर्ष पहले
ही वहां था, वह केवल सदुगुरु के पूछने की प्रतीक्षा कर रहा था। तब सद्‌गुरु ने पानी से भरा एक बर्तन उन सभी के सामने रखते हुए कहा-’‘ इसके बारे में कुछ कहो, लेकिन बिना इसके नाम का प्रयोग किए हुए। कुछ भी कहो, लेकिन मन का प्रयोग मत करो। कोई भी चीज कहो, लेकिन भाषा का प्रयोग मत करो। ‘‘
यह पूरी चीज ही असंगत दिखाई देती है। जब तुम कहते हो- ' कुछ कहो, लेकिन भाषा का प्रयोग मत करो। ‘‘
तुम एक असंभव स्थिति निर्मित कर रहे हो। बिना भाषा का प्रयोग किए हुए किसी चीज के बारे में कुछ कैसे कहा जा सकता है? यदि तुम एक साधारण पानी से भरे हुए बर्तन के बारे में बिना भाषा का प्रयोग किए हुए कुछ नहीं कह सकते तो फिर परमात्मा के बार में जिसमें पूरा अस्तित्व ही समाहित है, कुछ भी कह सकने में कैसे समर्थ हो सकते हो यदि तुम बिना भाषा का प्रयोग किए हुए इस पानी से भरे जग की ओर भी संकेतों से कुछ अभिव्यक्त नहीं कर सकते, फिर तुम उस विराट जग अर्थात ब्रह्माण्ड, परमात्मा या सत्य की ओर इंगित करने में कैसे समर्थ हो सकोगे? यदि तुम
इसे संकेत से अभिव्यक्त नहीं कर सकते तो फिर तुम कैसे मठ के प्रधान बन सकोगे? लोग तुम्हारे पास आएंगे, शब्दों को जानने के लिए नहीं, वास्तविकता और सत्य को जानने के लिए लोग तुम्हारे पास आएंगे, तत्वज्ञान में प्रशिक्षित होने के लिए नहीं, क्योंकि वह शिक्षण तो विश्वविद्यालयों के द्वारा दिया जा सकता है.. .वहां लाखों ऐसे विश्वविद्यालय हैं जो शब्दों की शिक्षा देते हैं।
इसलिए फिर एक मठ है किसके लिए? एक मठ होता है-शब्द सिखाने के लिए न होकर सत्य सिखाने के लिए दर्शनशास्त्र न सिखाकर धर्म की शिक्षा के लिए वह सिद्धांत और व्याख्याएं न सिखाकर शिक्षा देते हैं पूरे अस्तित्व का।
इसलिए यदि तुम एक मामूली बर्तन के बारे में कुछ नहीं कह सकते, फिर तुम क्या करोगे, जब तुमसे कोई पूछेगा-परमात्मा क्या है? फिर तुम क्या करोगे जब तुमसे कोई पूछता है-’‘ मैं कौन हूं? ‘‘
मठ के प्रधान शिष्य ने उत्तर दिया-’‘ जब कभी मन का आमना-सामना ऐसी ही किसी स्थिति से होता है तो केवल एक ही रास्ता. है कि उसकी नकारात्मक व्याख्या करो। यदि कोई 'पूछता है, परमात्मा के बारे में कुछ कहो, बिना उसका नाम लिए हुए तो तुम क्या करोगे तुम केवल नकारात्मक रूप से कह सकते हो-परमात्मा यह संसार नहीं है। परमात्मा पदार्थ नहीं है। ‘‘
जरा भाषा कोषों में झांकी, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में देखो-वे कैसे चीजों को परिभाषित कर रहे हैं? तुम आश्चर्य में पड़ जाओगे यदि तुम उसके पन्ने पलटकर देखो, जहां मन को परिभाषित किया गया है। तुम पाओगे वहां परिभाषा दी गई है, मन वह है जौ पदार्थ नहीं होता। तब तुम पन्ने पलटकर पदार्थ की परिभाषा देखो, जहां तुम -यह लिखा देखोगे-पदार्थ है वह जो मन नहीं है। यह किस तरह की परिभाषा है? जब तुम मन के बारे में पूछते हो, वे कहते हैं-’‘ जो पदार्थ नहीं है और जब तुम पदार्थ के बारे पूछते हो, वे कहते हैं-जो मन नहीं है। कुछ भी परिभाषित नहीं किया जा सकता, यह पूरा एक दुष्चक्र है। यदि मैं ' ' के बारे पूछूं तो तुम कहते हो ' ' नहीं और यदि मैं ' ' के बारे में पूछूं तो तुम कहते हो, ' जो अ नहीं। ' तुम एक चीज की परिभाषा दूसरे अपरिभाषित से करते हो। किसी भी चीज की परिभाषा दूसरे अपरिभाषित के कैसे की जा सकती है? यह एक चालबाजी है। विश्व में भाषा कोष सबसे अधिक फरेबी चीज है, वे कुछ भी नहीं कहते, लेकिन वे बहुत कुछ कहते दिखाई देते हैं। प्रत्येक चीज की परिभाषा दी गई है और प्रत्येक चीज अपरिभाषित है और किसी चीज की व्याख्या की ही नहीं जा सकती।
इसलिए प्रधान शिष्य ने नकारात्मक रूप से व्याख्या की, लेकिन उसने की। जब मन ने बाजी हारते हुए देखी तो वह और करता क्या, उसने नकारात्मक रूप से कहना शुरू कर दिया। भले ही नास्तिकता ठीक एक पलायन हो, फिर भी परमात्मा वहां है, लेकिन उसकी व्याख्या कैसे की जाए जब मन अपनी हार देखता है तो सबसे आसान है। यह कहते हुए कि परमात्मा कहीं है ही नहीं, पलायन कर जाना। सारी समस्या ही समाप्त हो जाती है।
किसी अन्य ने उत्तर दिया, ‘‘ यह कोई तालाब नहीं है, क्योंकि उसे हाथ में उठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। ‘‘ लेकिन पानी से भरे हुए बर्तन की तुम सिर्फ यह कहते हुए कि वह एक तालाब नहीं है, कैसे उसे परिभाषित कर सकते हो? तब फिर तालाब क्या है? बिना उसका नाम लिए हुए कुछ कहो उसके बारे में।
तभी मठ का भोजन बनाने वाला भिक्षु रसोइया आया, जिसे निश्चित ही इन पंडितों से कहीं अधिक सच्चा मनुष्य होना चाहिए। एक रसोइया, जिसकी कभी भी शास्त्रों में कोई दिलचस्पी रही ही नहीं, एक रसोइया, जो वास्तविकता और यथार्थ का सामना करते हुए कार्य करता रहा, उसने पानी से भरे जग के बारे में बिना किसी सोच- विचार के उसे देखा, वहां रुका और बर्तन को ठोकर मारते हुए चला गया।
उसने क्या कहा? उसने कोई चीज अधिक वास्तविक रूप से अभिव्यक्त कर दी। ठोकर मारना, सोच-विचार न होकर एक कृत्य है, क्रिया है। उसने पानी के बर्तन को ठोकर मारते हुए जैसे सद्‌गुरु से कहा, ‘‘ यह सब व्यर्थ की बातें हें। ‘‘ सारी बात ही असंगत है। आप हम लोगों से किसी चीज के बारे में बिना शब्दों के अभिव्यक्ति करने को कह रहे हैं। बिना शब्दों के कुछ भी अभिव्यक्त किया ही नहीं जा सकता।
उसने जो जरूरी बात थी, उसे पकड़ लिया। बिना शब्दों के कुछ भी किया जा सकता है, लेकिन कुछ भी कहा नहीं जा सकता। इसलिए उसने कुछ किया। उसने पानी भरे बर्तन को ठोकर मार दी।
सद्‌गुरु ने कहा, ‘‘ यह रसोइया ही चुन लिया गया है। यही जाएगा नए मठ में और वहां का सद्‌गुरु होगा। यही जानता है कि बिना मन कैसे क्या किया जाए यही जानता है कि बिना मन का प्रयोग किए क्या उत्तर दिया जाए। इसने ठीक ही कहा कि यह समस्या ही असंगत है। ‘‘
एक बात का स्मरण रहे, यदि समस्या ही असंगत या मूर्खतापूर्ण है तो तुम विचारशील होकर उसका उत्तर दे ही नहीं सकते। यदि तुम ऐसा प्रयास करोगे तो तुम मूर्खता करोगे-उसे तुम्हारी छूता प्रकट होगी। यदि समस्या ही बेवकूफी- भरी असंगत है तो उसका विचारशील उत्तर हो ही नहीं सकता। यदि तुम सोच-विचारकर उत्तर देने और उसे सिद्ध करने का प्रयास करोगे तो तुम मूर्ख हो। उस प्रधान शिष्य और उस दूसरे विद्वान शिष्य को मूर्ख होना चाहिए। जिसने नकार में व्याख्या की और कहा, ‘‘ यह एक तालाब नहीं है...। ‘‘ पंडित मूर्ख होते ही हैं, अन्यथा वे पोथियों में नहीं उलझते। वे शब्दों और शास्त्रों में अपना जीवन व्यर्थ बरबाद कर रहे हैं। कोई भी अपना जीवन शब्दों में उलझाकर बरबाद नहीं कर सकता, यदि वह पूरी तरह मूर्ख नहीं है।
वह रसोइया कहीं अधिक प्रज्ञावान है जिसने ठोकर मार दी। वह न केवल पानी-भरे बर्तन को ठोकर मारता है। वह पूरी समस्या को ही ठोकर मार देता है और वह उसे अनुभव करता है-’‘ वह असंगत है। ‘‘
जरा कल्पना करें कि वह रसोइया भिक्षु अपने समग्र अस्तित्व के साथ, जिसमें समग्रता से वह स्वयं, उसका शरीर, मन और आत्मा भी शामिल है, उस बर्तन को ठोकर मार देता है। वह ठोकर जीवन्त है। उसका ठोकर मारना सहज स्वाभाविक कृत्य है। उसने ऐसा पहले से तय नहीं किया था, वह यह भी नहीं जानता कि वहां कुछ होने जा रहा है।
उसने यह भी नहीं सोचा था कि उसे कोई उत्तर देना है। वह तो बस उसे देख रहा था, जो वहां सब कुछ चल रहा था। अचानक ही वह ठोकर घटित हुई। जब वह रसोइया भिक्षु ठोकर मार रहा होगा, सद्‌गुरुने उसके पूरे अस्तित्व से निकले उस कृत्य को जरूर देखा होगा जिसमें मन नहीं था और थी बस एक शून्यता। उसी शून्यता और अमन से उस कृत्य का जन्म हुआ था-।
जब अभिनेता के द्वारा कोई कृत्य होता तो वह मुर्दा होता है, जब कोई कृत्य अहंकार से जन्मता है तो पूर्व चिंतन-मनन होता है। जब कोई कार्य बिना अहंकार के, बिना मन के और बिना तुम्हारी वहां उपस्थिति के, तुम्हारी शून्यता से बुलबुले की भांति उठता है, वही कृत्य अज्ञात परमात्मा से आता है और वह समग्र होता है।
वह ठोकर रसोइए भिक्षु ने नहीं मारी, वह तो जैसे पूरे अस्तित्व की ठोकर थी। उसने सारी विद्वता को ठोकर मारी, उसने जैसे सभी शास्त्रों को ठोकर मारी, उसने जैसे सारी बुद्धिमत्ता और उससे उत्पन्न दुष्चक्र को ठुकरा दिया और वह वहां से तुरंत चला गया। यदि वह यह देखने के लिए रुककर प्रतीक्षा करता कि अब सद्‌गुरु क्या कहते हैं तो वह चूक गया होता, क्योंकि तब उसका अर्थ था कि कृत्य का परिणाम या निष्कर्ष देखने के लिए उसका मन वहां मौजूद है।
मन हमेशा फल या परिणाम चाहता है। वह इसी में उत्सुक होता है कि क्या होने जा रहा है? यदि मैं इस काम को करता हूं तब उसका क्या परिणाम होगा? यदि वहां कारण है तो उसका प्रभाव क्या होगा? मन हमेशा फल की फिक्र करता है। वह फल सोचकर ही काम करता है।
यह रसोइया भिक्षु वहां से तुरंत चला गया। वहां क्या होने जा रहा है, उसने उसकी प्रतीक्षा ही नहीं की। उसने यह सोचा भी नहीं कि उसका चुनाव होने जा रहा है। एक बर्तन को ठोकर मारकर तुम यह कैसे सोच सकते हो कि तुम एक मठ के सद्‌गुरु के रूप में चुने जाओगे। नहीं, उसने कभी इस बाबत कोई फिक्र की ही नहीं। यह वही है जिसकी बाबत गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-’‘ कर्म करो पर फलाकांक्षा मत करो। ठोकर मारो और चले जाओ। ‘‘
अर्जुन परिणाम के बारे में सोचे चला जा रहा है। वह कहता है-’‘ यदि मैं लड़ता हूं यदि मैं युद्ध में जूझता हूं तो होगा क्या? उसका परिणाम क्या होगा? वह परिणाम अच्छा होगा या बुरा? क्या मैं कुछ प्राप्त करूंगा या बहुत कुछ खो दूंगा? इतने अधिक लोगों की हत्या करने के प्रयास का आखिर क्या औचित्य है? ‘‘
और कृष्ण कहते हैं-’‘ फल या परिणाम की फिक्र ही मत करो। परिणाम मेरे ऊपर छोड़ो तुम तो बस कर्म करो। ‘‘
लेकिन मन उसे कर नहीं सकता। कुछ करने से पहले मन परिणाम के बारे में पूछता है। वह कर्म करता है, फल के ही कारण। यदि कुछ फल मिलेगा, केवल तभी...।
लोग मेरे पास आते हैं और पूछते हैं-यदि हम ध्यान करते हैं तो क्या होगा? उसका पाल क्या मिलेगा?
स्मरण रहे, ध्यान परिणाम प्रेरित नहीं हो सकता। तुम बस ध्यान करते हो, यही सब कुछ है। हर चीज घटती है, लेकिन यह फल नहीं है। यदि तुम कुछ पाने की आकांक्षा कर रहे हो तो कुछ भी नहीं होगा। ध्यान करना ही व्यर्थ होगा। जब तुम परिणाम खोज रहे हो तो वह मन है और जब तुम परिणाम नहीं खोज रहे तो वह ध्यान है। बर्तन को ठोकर मारो और आगे बढ़ जाओ। ध्यान करो और आगे चल पड़ो, परिणाम की बाबत पूछो ही मत। यह मत कहो- आखिर घटेगा क्या? क्योंकि यदि तुम उसके बारे में सोच रहे हो कि क्या घटेगा तो तुम ध्यान नहीं कर सकते। मन परिणाम के बारे में सोचे चला जाता है, वह यहां और अभी हो ही नहीं सकता। वह हमेशा भविष्य में होता है। तुम ध्यान कर रहे हो और तुम सोच रहे हो, आखिर इसका परिणाम कब मिलने जा रहा है? अभी तक कुछ हुआ क्यों नहीं...? यदि तुम प्रेम कर रहे हो और सोचे चले जाओ, कब मिलेगी प्रसन्नता? कब आएगा आनंद? वह अभी तक आ क्यों नहीं रहा? तो क्या यह प्रेम है?
जब तुम परिणाम के बारे में पूरी तरह भूl ही जाते हो, जब वहां मन में परिणाम के लिए जरा-सी भी हलचल नहीं होती, जब वहां भविष्य के लिए एक भी विचार तरंग नहीं उठती। जब तुम यहीं और अभी एक शांत सरोवर बन जाते हो, तो हर चीज स्वत: घटती है। ध्यान में कारण और परिणाम दो नहीं होते, कारण ही परिणाम होता है। कृत्य और परिणाम दो नहीं है, कर्म ही फल है। वे विभाजित नहीं है। ध्यान में बीज और वृक्ष दो नहीं है। बीज ही वृक्ष है।
लेकिन मन के लिए हर चीज विभाजित है: बीज और वृक्ष दो हैं, कर्म और फल दो हैं। फल या परिणाम हमेशा भविष्य में है और कर्म या कृत्य यहीं है। तुम भविष्य के कारण कर्म करते हो। मन हमेशा भविष्य के लिए वर्तमान का बलिदान कर देता है, और भविष्य का कोई अस्तित्व नहीं। वहां कोई भविष्य होता ही नहीं, वहां हमेशा वर्तमान होता है। अभी तो शाश्वत है और तुम इस अभी को, किसी ऐसी चीज के लिए जो कहीं भी है नहीं और न हो सकती है, व्यर्थ बलिदान कर रहे हो।
ध्यान में पूरी प्रक्रिया उल्टी है। वर्तमान के लिए भविष्य का बलिदान कर दिया जाता है। जो है, उसके लिए उसको बलिदान कर दिया जाता है, जो है ही नहीं। वहां कोई परिणाम की बाबत पूछो ही मत।
यही था उसका सौंदर्य। रसोइया भिक्षु सिर्फ यह कहता हुआ चला गया, यह पूरी चीज असंगत और मूर्खता पूर्ण है। आपका प्रश्न और इन लोगों का उत्तर। यह पूरा खेल ही निरर्थक है। मेरा यहां होना ही व्यर्थ है। वह अवश्य ही रसोई में जाकर अपना काम करने लगा होगा। एक ध्यानी मन इसी तरह से काम करेगा और सद्‌गुरु ने कहा-’‘ मैं उसी व्यक्ति को चुनता हूं वही जाएगा नए मठ में और वही वहां का प्रधान है। वह ही जानता है, कैसे समग्र हुआ जाए वही जानता है कैसे स्वाभाविक रूप से बिना किसी लक्ष्य के कैसे कार्य किया जाए और वही जानता है कि बिना मन के कैसे कार्य किया
जाए। ‘‘
ऐसा ही व्यक्ति दूसरों का ध्यान में नेतृत्व कर सकता है। यही व्यक्ति पथ प्रदर्शक बन सकता है। इसी व्यक्ति ने सब कुछ पा लिया है और अब वहां उसके पाने के लिए कुछ है ही नहीं।
यह कहानी बहुत दुर्लभ, हृदय वेधी और बहुत सुंदर है, लेकिन तुम इसकी गहराई में तभी उतर सकते हो, जब तुम भी उस रसोइए भिक्षु की भांति कार्य करना शुरू कर देते हो, लेकिन वहां गड्डे में गिरने की भी संभावना है और तुम पहले ही सोच-विचार में पड़ सकते हो। यदि मैं तुम्हारे सामने पानी भरा बर्तन रख दूं तो तुम उसे ठोकर भी मार दो, फिर भी तुम चूक जाओगे क्योंकि तुम इसका उत्तर पहले से जानते हो। तुम सोचोगे, ठीक है, अब यह अवसर मेरे सामने है। बर्तन को ठोकर मारो और आगे बढ़ जाओ। उससे कुछ होने का नहीं। तुम धोखा नहीं दे सकते, क्योंकि जब वहां मन होता
है, तो तुम्हारा पूरा अस्तित्व कुछ भिन्न कम्पनें उत्पन्न करता है। तुम एक सद्‌गुरु को धोखा नहीं दे -सकते।
स्मरण रहे, यह घटना कई बार दोहराई जा चुकी है। झेन सद्‌गुरु वास्तव में अनूठे हैं। वे एक ही समस्या बार-बार दोहराए चले जाते हैं और जिन लोगों ने भी शास्त्र पड़े हैं, वे पुराने तरीके से ही व्यवहार करते हैं। वे सोचते हैं, यह रहा उत्तर! बर्तन को ठोकर मारो और आगे बढ़ जाओ और बन जाओ मठ के प्रधान।
लेकिन तुम एक झेन सद्‌गुरु को धोखा नहीं दे सकते, क्योंकि उसका संबंध. उससे नहीं है, जो कुछ तुम कर रहे हो, उसका संबंध तुमसे है कि उस कृत्य के क्षण में तुम क्या हो? यह बिल्कुल ही एक अलग चीज है। तुममें एक सुवास होती है, एक अलग तरह की सुवास, जब तुम्हारा कृत्य शुन्यता से जन्मता है और जब मैं एक भिन्न सुवास की बात कहता हूं तो मेरा अर्थ शाब्दिक ही है। मैं किसी अलंकार का प्रयोग नहीं कर रहा हूं। जब तुम्हारी शून्यता से किसी कृत्य का जन्म होता है। तो तुम्हारे चारों ओर पत्ते पर पड़ी ओस जैसी एक ताजगी और नवीनता होती है, जैसे अचानक बीच दोपहर में सुबह हो गई हो। तुम्हारे चारों ओर ताजगी की तरंगें जो स्पर्श करती हैं.. .एक
जीवन जो इतना तीव्र होता है, जो चारों ओर से तुम पर जैसे चोट करता है-तुम्हारी आंखों पर, तुम्हारे पूरे अस्तित्व पर, तुम जिस तरह बैठते हो, तुम जिस तरह से खड़े होते हो और जिस तरह से तुम बर्तन को ठोकर मारते हो। जरा ख्याल करें, यदि तुम बर्तन को ठोकर मारते हो तो वहां अहंकार होगा,, अंहाकर ही बर्तन को ठोकर मार रहा है और तुम आक्रामक होगे, लेकिन जब उस रसोइए भिक्षु ने बर्तन को ठोकर मारी तो वह आक्रामक नहीं था। वह बस एक तथ्यात्मक वक्तव्य था, वहां कोई हिंसा न थी।
मैंने एक गरीब भिखारी के बारे में सुना है और मैं गरीब भिखारी इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वहां अमीर भिखारी भी होते हैं-जिसने भिक्षा में भोजन मांगा। उस घर की गृहिणी ने उस पर दया प्रदर्शित करते हुए कहा-मैं तुम्हें भोजन दूंगी और यदि तुम कुछ काम भी करना चाहते हो तो कुछ लकड़ियां फाड़ दो। तुम उसे कर भी सकते हो और उसके लिए मैं तुम्हें अलग से धन दूंगी।
इसलिए उस व्यक्ति ने परिश्रम करते हुए लकड़ियां चीरी और शाम को जब वह चलने को हुआ तो उस गृहिणी ने कहा-’‘ तुम्हारे चोगे में छेद है। मुझे दो, मैं मिनटों में उसकी मरम्मत कर दूंगी। ‘‘
उस व्यक्ति ने कहा-’‘ जी नहीं, इस लबादे में छेद होने के कारण ही सारा अंतर उत्पन्न होता है और जब यह मरम्मतशुदा चोगा होगा तो वह कुछ अलग होगा। जब तुम्हारे पास मरम्मत किया हुआ लबाद है तो यह सोची-विचारी गरीबी है और जब उसमें छेद है, तो वे ठीक अभी अथवा किसी दुर्घटनावश हुए लगते हैं। लेकिन जब आप इन छेदों को भर देंगी तो यह लबादा पुराना बन जाएगा। यह किसी दुर्घटनावश ठीक अभी क्षतिग्रस्त होता न लगकर ऐसा लगा जैसे काफी पहले यह फटा था और छेद भरकर उसकी मरम्मत कर दी गई हो। यह एक सुविचारित गरीबी बन जाती है। मेरी गरीबी को स्वाभाविक गरीबी ही रहने दीजिए। ‘‘
लेकिन तुम्हारा पूरा मन थिकड़ी लगा मरम्मत किया हुआ है और यह सुविचारित गरीबी ओढ़े हुए है। तुम्हारे पास हर प्रश्न के उत्तर हैं लेकिन प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुआ एक भी उत्तर नहीं है। तुमने पहले ही से तय कर लिया है कि तुम्हें क्या करना है और इस निर्णय के कारण ही तुमने स्वयं अपने आपका ही कल्ल कर दिया है, स्वयं अपने को मार लिया है, यह आत्मघाती है।
मन एक आत्महत्या है।
स्वयं प्रवर्तित या स्वेच्छा से काम करने की शुरुआत करो। शुरू में यह कठिन लगेगा, तुम्हें असुविधा होगी। सुविचारित उत्तर के साथ कम असुविधा होगी, क्योंकि तुम अधिक निश्चित रहोगे। हम क्यों स्वाभाविक और स्वयं प्रवर्तित नहीं है। इसका कारण है भय। वहां भय यह है कि उत्तर गलत भी हो सकता है, इसलिए अच्छा यही है कि पहले ही से तय कर लिया जाए। तब तुम निश्चित होते हो, लेकिन यह निश्चित होना, मृत्यु से संबंधित है। स्मरण रहे, जीवन सदा अनिश्चित है। प्रत्येक मृत चीज ही निश्चित होती है। जीवन सदा अविश्वसनीय है। प्रत्येक मृत वस्तु ठोस और स्थिर होती है, उसकी प्रकृति नहीं बदली जा सकती। प्रत्येक जीवन्त वस्तु गतिशील है, परिवर्तित हो रही है, वह तरल द्रव जैसी है, उसमें लचीलापन और प्रवाह है। वह किसी भी दिशा में गतिशील हो सकती है। तुम जितने अधिक निश्चित होते हो, तुम उतने ही अधिक जीवन से चूकते जाते हो। जो जानते हैं, वे जीवन को परमात्मा समझते हैं। यदि तुम जीवन से चूकते हो तो परमात्मा से ही चूक जाते हो।
कृत्य को स्वत: स्कूर्त होने दो। यदि शुरू में असुविधा हो तो उसे होने दो। उसे छिपाओ मत और न उसका दमन करो और नकली मत बनो। बच्चे जैसे बनो। लेकिन बचकानापन न हो। यदि बच्चे जैसे निर्दोष और स्वाभाविक हो गए तो तुम संत बन जाओगे और यदि तुममें बचकानापन है तो तुम एक महान विद्वान या पंडित बन सकते हो।
एक दिन एक व्यक्ति जब अपने घर लौटा तो उसने देखा कि उसके बच्चे, पड़ोसियों
के बच्चों के साथ सीढ़ियों पर बैठे हैं, इसलिए उसने पूछा-’‘ तुम लोग क्या कर रहे हो यहां? ‘‘
उन लोगों ने उत्तर दिया-’‘ हम लोग चर्च-चर्च का खेल-खेल रहे थे। ‘‘
वह उलझन में पड़ गया, क्योंकि वे लोग तो बस बैठे थे और कुछ भी नहीं कर रहे थे। उसने पूछा-’‘ किस तरह के चर्च का खेल? ‘‘
उन लोगों ने उत्तर दिया-’‘ हम लोगों ने गीत गाए उपदेश दिए और प्रार्थना की। जब हर चीज पूरी हो गई, अब हम लोग सीढ़ियों पर बैठे धूम्रपान कर रहे हैं। ‘‘ तुम नकल उतार सकते हो-जानकारी. बढ़ा लेना नकल उतारने जैसा ही है। एक बुद्ध जो कुछ कहता है, वह उसकी प्रज्ञा से आता है, जानकारी से नहीं, स्मृति से नहीं, वह आता है उसके अनुभव से। तुम नकल कर सकते हो। तुम चर्च-चर्च का खेल-खेल सकते हो तुम उसे रटकर मन में सुरक्षित रख दोहरा सकते हो। यह बचकानापन है। बच्चे जैसे बनो, बचकाने नहीं। बच्चे जैसे होना स्वयं प्रवर्तित है। एक बच्चा ताजा
और नित नूतन होता है, उसके पास उत्तर नहीं होते, कोई इकट्ठा किया हुआ अनुभव नहीं होता। वास्तव में उसकी कोई स्मृति नहीं होती, वह सिर्फ करता है। जो भी कृत्य होता है वह उसके अस्तित्व के द्वारा आता है। वह कामना प्रेरित नहीं होता। वह परिणाम और भविष्य के बारे में सोचता नहीं, वह निर्दोष होता है।
यह भोजन बनाने वाला भिक्षु वास्तव में निर्दोष था। निर्दोष और सहज होना ध्यान है। अपने कृत्यों में ध्यानपूर्ण होना शुरू करो। छोटी-छोटी चीजों से ही शुरुआत करो। जब भोजन कर रहे हो, स्वाभाविक बनो। जब बातचीत कर रहे हो, वह स्वयं प्रवर्तित हो, जब चल रहे हो तो वह स्वत: स्कूर्त हो। जीवन को प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अवसर दो, सोचा--समझा उत्तर मत दो। यदि कोई भी कुछ भी कहे, बस निरीक्षण करते रहो। तुम किसी चीज को, जैसा कि हमेशा से आदतन करते रहे हो, क्या सिर्फ दोहरा रहे हो अथवा हर स्थिति में तुम्हारा उत्तर क्या सहज प्रतिक्रिया है? क्या हमेशा
की तरह मन पुरानी आदत को दोहरा रहा है अथवा क्या वह उत्तर तुम्हारी स्मृति से आ रहा है या सीधे तुमसे?
यही कारण है कि तुम लोगों को इतना अधिक बोर करते हो। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को बोर कर रहा है क्योंकि प्रत्येक चीज मृत है, उधार ली हुई और बासी है, जिसमें मृत्यु की बदबू आ रही है, उसमें ताजगी नहीं है। बच्चों को खेलते हुए देखो और तुम उनमें एक ताजगी पाओगे। एक क्षण के लिए तुम यह भी भूल सकते हो कि तुम बूढ़े हो गए हो।
पक्षियों के गीत सुनो, वृक्षों और फूलों को जरा नजर भर देखो और एक क्षण के लिए तुम अपने को भूल जाओगे, क्योंकि वहां मन नहीं है। फूल सहज रूप से खिल रहे हैं जैसे भोजन बनाने वाले भिक्षु ने ठोकर मारी थी, वैसे ही वे भी प्रभावित कर रहे हैं। पक्षी गीत गा रहे हैं, वे एक सुखद अनुभूति करा रहे हैं। जीवन स्वयं अपने आप में एक तरंग और उमंग है, लेकिन वहां कोई सिद्धांत नहीं है।
प्रारंभ में यह असुविधाजनक होगा, लेकिन धैर्य रखो, उस परेशानी से होकर गुजरो। शीघ्र ही तुम्हें ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का अनुभव होगा। यह खतरनाक है। इसी कारण लोग इससे बचते हैं स्वयं प्रवर्तित और स्वाभाविक बनना खतरनाक है। क्योंकि जब क्रोध आता है तो बस आता है। मन कहता है, जरा सोचो। क्रोध मत करो। यह महंगा पड़ेगा इसलिए तुम हमेशा सोचते हो और अपना क्रोध जो तुमसे कमजोर हो, उन पर निकाल देते हो, लेकिन उन पर नहीं जो तुमसे अधिक शक्तिशाली हैं। किसी से प्रेम हो सकता है लेकिन प्रेम करने की अनुमति नहीं है। तुम केवल अपनी पत्नी के
प्रति ही प्रेम भरा व्यवहार कर सकते हो।
जीवन यह नहीं जानता कि कौन तुम्हारी पत्नी है और कौन नहीं है? जीवन पूरी तरह अनैतिक है। वह नैतिकता जानता ही नहीं। तुम किसी और की पत्नी के प्रेम में भी पड सकते हो., क्योंकि जीवन कोई रिश्ते-नाते या किसी निश्चित संस्था को नहीं जानता। सभी संस्थाएं मनुष्य निर्मित हैं और यही खतरा है। इसलिए उसकी ओर इतनी प्रेमपूर्ण दृष्टि से मत देखो। यह अनैतिक है। यह है तुम्हारी पत्नी, इसलिए उसकी ओर प्रेम से देखते हुए मुस्कराओ। भले ही तुम प्रेम महसूस करो या नहीं, यह जरूरी नहीं है। यह तो तुम्हारा कर्तव्य है। इसी तरह से हमने प्रत्येक को मार दिया है। प्रत्येक व्यक्ति यहां किसी न किसी संस्था में रहता है और यह जीवन नहीं है।
इन खतरों -के कारण मन पहले ही से सोच लेता है कि क्या कहना है। जब तुम वापस घर लौटते हो तो तुम सोच रहे होते हो कि पत्नी क्या कहेगी और तुम कैसे उसका उत्तर दोगे? पत्नी तुम्हारी प्रतीक्षा करती हुई भली- भांति जानती. है कि तुम जो कुछ भी कहोगे वह गलत है। उसने पहले भी तुम्हारे बहाने सुने है और तुम फिर वही पुराने बहाने बनाओगे तुम्हारे देर से आने -का कारण...।
मैंने सुना है, एक दिन एक व्यक्ति ने दोपहर बाद अपनी पत्नी. से फोन पर कहा- ‘‘मेरा एक मित्र आया है और आज -रात मैं उसे अपने साथ रात्रिभोज पर घर ला रहा हूं'
पत्नी चीखती हुई बोली-’‘ तुम परले सिरे के बेवकूफ हो, तुम अच्छी तरह से जानते हो कि रसोइया नौकरी छोड्‌कर चला गया है, बेबी अपने दांत किटकिटा रही है और मुझे तीन दिनों से बुखार आ रहा है। ‘‘
उस व्यक्ति ने बहुत शांत स्वर में कहा-’‘ मैं सब कुछ अच्छी तरह से जानता हूं। यही, कारण है कि मैं उसे घर लाना चाहता हूं क्योंकि वह बेवकूफ शादी करने की बाबत सोच रहा है। ‘‘
पूरा जीवन रीति-रिवाज और संस्कारों के दायरे में बंधकर एक पागल खाना बनकर रह गया है जिसमें कर्तव्यों को निभाना-- भर होता है, यहां प्रेम नहीं है।
तुम्हें किससे कैसा व्यवहार करना है, यह सभी पूर्व निश्चित है। स्वयं प्रवर्तित नहीं है एक ढांचा है जिसका तुम्हें अनुसरण करना है जीवन ऊर्जा के अतिरेक से बहते प्रवाह को रोकना है। यही वजह है कि मन हर चीज पहले से सोचकर तैयार रखता है क्योंकि खतरा सामने होता है।
मैं उसी व्यक्ति को संन्यासी कहता हूं जो इन संस्कारों और नियम-कानूनों को तोड़कर स्वाभाविक जीवन जीता है। संन्यासी बनकर जीना सबसे अधिक संभव साहसिक कदम है। संन्यासी बनकर जीने का अर्थ है- अमन में रहना और जिस क्षण तुम बिना मन के रहते हो, तुम बिना समाज के रहते हो। मन ने ही समाज निर्मित किया है और समाज ने निर्मित किया है मन, यह दोनों एक दूसरे के आश्रित हैं। संन्यासी बनने का अर्थ है-वह सभी कुछ छोड़ देना जो नकली है। सँसार नहीं छोड़ना है, छोड़ना है वह सब कुछ जो नकली है, छोड़ना है वह सब कुछ, जो अप्रामाणिक है, छोड़ना है सभी उत्तरों को जो किसी प्रभाव में दिए जाते हैं, बिना परिणाम की चिंता किए सहज
स्वाभाविक होकर जो स्वत: प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और सचबन कर जीता है। कठिन है... क्योंकि चेहरे पर मुखौटे लगाए हुए तुम जो खेल खेलते हुए नकली जीवन जी रहे हो, उसमें तुमने काफी पूंजी लगा रखी है। संन्यास में दीक्षित होने का अर्थ है- अब तुम प्रामाणिक बनने का प्रयास करोगे, चाहे जो कुछ भी परिणाम हो, तुम उसे स्वीकार करोगे और तुम वर्तमान में जीओगे। तुम वर्तमान के लिए भविष्य को बलिदान कर दोगे और भविष्य के लिए कभी वर्तमान को कुर्बान नहीं करोगे। यह क्षण
भी तुम्हारे अस्तित्व की समग्रता का क्षण बन जाएगा और तुम कभी भी पहले से ही सोचा कोई कृत्य न करोगे।
यही है वह जिसे मैं संन्यास कहता हूं। बर्तन को ठोकर मारो और आगे बढ़ जाओ, परिणाम की प्रतीक्षा मत करो। परिणाम अपनी चिंता स्वयं करेंगे, वे तुम्हारा अनुसरण करेंगे।
यह कहानी यह नहीं कहती है, लेकिन मैं इस बात को जानता हूं कि सद्‌गुरु उस भोजन बनाने वाले भिक्षु के पीछे जरूर भागा होगा और उसने कहा होगा, ‘‘ रुको! तुम्हें चुन लिया गया है। तुम्हीं नए मठ जाओगे और लोगों के जीवन में ध्यान का पथ प्रशस्त करोगे। ‘‘
क्या कुछ और भी...!
००
प्रश्न: करे ओशो? प्रत्येक दिन जब मैं यहां बैठता, अपने मन
में बिना किसी प्रश्न के बैठने का प्रयास करता हूं और जो कुछ मैं सुन
रह? है उस क्षण के साथ में ठहरा रहता है उस पर कुछ कहता नहीं
और न कुछ कहने या पूछने का मन-ही- मन अभ्यास करता हूं। तब
आप कहते है- कोई चीज और..? और यह ऐसा है जैसे कोई
सुरक्षात्मक कवच मुझे रोक लेत हो ओर मैं आपके निकट नहीं पहुंच
पाता। मैं स्वयं से ही बातें करता रहता हूं और मन हमेशा जैसे सभी
चीजों से मुझे सुरक्षित बना देता है।

ऐसा ही होता है क्योंकि हम हमेशा डरते रहते हैं कि कहीं कोई चीज गलत न हो जाए लेकिन मेरे सामने डरने की कोई बात नहीं, कुछ भी गलत होने नहीं जा रहा। यदि सहज स्वाभाविक रूप से कुछ गलत हो भी रहा है, तब वह ठीक ही हो रहा है। मन भय के कारण उसे नियंत्रित करना चाहता है। तुम कोई बात पूछो और दूसरे लोग कहीं हंसना शुरू न कर दें और सोचें कि तुम बेवकूफ हो इसलिए कुछ ऐसा पूछा जाए जिससे उस पर कोई हंस न सके। प्रत्येक यही सोचे कि तुमने एक अर्थपूर्ण गंभीर प्रश्न पूछा है। यही कारण है कि मन डरा हुआ है और भय तुम्हें रोक लेता है।
मेरे निकट भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं। तुम व्यर्थ की बातें भी पूछ सकते हो, तुम बेवकूफी- भरे प्रश्न भी पूछ सकते हो, क्योंकि मेरे लिए मन ही बेवकूफियों से भरा हुआ है। वह इसके सिवाय और कुछ पूछ ही नहीं सकता इसलिए कोई समस्या ही नहीं वहां। तुम तभी प्रकट हो सकते हो जब कोई चीज गंभीर हो... क्योंकि मन कोई ऐसी चीज पूंछ ही नहीं सकता, जो बेवकूफी से भरी न हो। सभी प्रश्न मूढ़तापूर्ण हैं। पूरा मन ही गिरा देना है, केवल तभी तुम बेवकूफ न बन सकोगे।
लेकिन भय है,….यही कारण है कि प्रकट होने से पूर्व हम अभ्यास करते हैं। अहंकार कुछ महत्वपूर्ण होने का अनुभव करना चाहता है। मेरे निकट भयभीत होने की कोई जरूरत ही नहीं। मैं तुमसे कोई बुद्धिमत्तापूर्ण बात पूछने के लिए नहीं कह रहा हूं। बुद्धिमत्तापूर्ण कोई बात पूछी ही नहीं जा सकती। किसी ने कभी बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न पूछा ही नहीं। यह असंभव है, क्योंकि जब तुम प्रज्ञापूर्ण बन जाते हो तो प्रश्न ही गिर जाते हैं। जब तुम्हें अक्ल आती है तो कोई प्रश्न रहता ही नहीं।
तुम कुछ-न-कुछ पूछकर बुद्धिमान बनने की नकल कर सकते हो, लेकिन उससे कोई सहायता मिलेगी नहीं। इसलिए जो लोग प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं, वे यह न समझें कि वे बुद्धिमान हैं और प्रश्न पूछने वाला यह तीर्थ बेवकूफ है।
वह केवल तुम्हारा ही प्रतिनिधि है इसलिए वह यह अनुभव करने के लिए बाध्य है कि वह तुम लोगों से अधिक बेवकूफ है, क्योंकि वह तुम सभी लोगों की बेवकूफियों को इकट्ठा कर उन सभी का एक साथ प्रतिनिधित्व कर रहा है.. इसलिए वह भयभीत होगा ही यह स्वाभाविक है, लेकिन धीरे- धीरे यह नियंत्रण गिराते जाओ, क्योंकि जब तुम मन के नियंत्रण से मुक्त हो जाते हो, तुम मेरे लिए सहज स्वाभाविक बन जाते हो और तुम्हें इसकी एक झलक मिलेगी। सरल स्वाभाविक बनते ही तुम्हें
उसकी पहली झलक मिलेगी और तब तुम जीवन में स्वाभाविक बनने का साहस जुटा सकते हो। यदि तुम मेरे निकट रहते हुए स्वाभाविक नहीं बन सकते हो तो फिर कहीं भी तुम्हारा सहज स्वाभाविक बनना कैसे संभव हो सकेगा?
यदि तुम दूसरे तथाकथित सद्‌गुरुओं के पास जाओ तो वे भय उत्पन्न करते हैं। तुम उनके सामने हंस नहीं सकते, वे उसे गलत समझेंगे। तुम्हें उनके सामने बहुत उदास और गंभीर चेहरे के साथ उपस्थित होना होगा। जरा गिरजाघरों और मस्जिदों में इन तथाकथित सद्‌गुरुओं के लंबे लटके गंभीर चेहरों को देखो.. .ईसाई कहते हैं, जीसस कभी हंसे ही नहीं क्योंकि उनके देखे जीसस कैसे हंस सकते हैं? यदि वे हंसते हैं तो वे साधारण और अधार्मिक बन जाते हैं।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि ऐसी गंभीरता एक कवच है जो उन सभी से तुम्हारी रक्षा करती है जिनसे तुम्हारी व्यर्थता प्रकट होती है। उसे बाहर आने की अनुमति दो। उसे बलपूर्वक अपने अंदर रोके मत रहो। किसी भी तरह से उसका दमन मत करो। मेरे निकट स्वाभाविक बनकर रहो और इस स्वाभाविक बने रहने में तुम वह सीखोगे, जो किसी और तरह से तुम सीख नहीं सकते। बस मेरे निकट स्वाभाविक बनकर रहते हुए ही तुम मन को विसर्जित कर दोगे और ध्यानपूर्ण हो जाओगे।
मैं इस कारण तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर नहीं देता क्योंकि तुम्हारे प्रश्नों से कोई लेना-देना है-यह बात ही असंगत है। मैं किसी भी तरह से तुम्हारे प्रश्नों का समाधान नहीं कर रहा हूं। उनका समाधान हो ही नहीं सकता। तब मैं आखिर क्या कर रहा हूं? मैं बस यहां तुम्हारे साथ हूं। मेरा उत्तर देना तो ठीक एक बहाना है, तुम्हारा प्रश्न भी मेरे निकट बने रहने का ठीक एक बहाना है, बस जिससे तुम मेरे और निकट आओ। लेकिन हम मौन में क्यों नहीं बैठ सकते? हम बैठ सकते हैं-मैं बैठ सकता हूं लेकिन यह तुम्हारे लिए कठिन होगा। हम लोग मौन बैठ सकते हैं। न मैं कुछ बात करूं और न तुम कुछ पूछो, लेकिन तुम अपने अंदर बातें किए ही जाओगे, वहां चटर-पटर होती ही रहेगी। भयानक कोलाहल हो रहा होगा वहां, सामान्य से कहीं अधिक क्योंकि जब तुम मन से कहते हो, खामोश बैठ जाओ। मन विद्रोह करता है। तब अधिक शब्द उत्पन्न होते हैं, अधिक प्रश्न उठते हैं, आत्म प्रलाप चलने लगता है और तुम्हें पागल बना देता है। तुम मौन बैठ ही नहीं सकते, इसलिए मैं तुमसे कुछ पूछने को कहता हूं और इसी वजह से मैं उत्तर देता हूं।
यदि मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूं तो तुम्हारा मन तो इस बीच बात न करेगा। मेरी बातचीत मेरे लिए हानिप्रद नहीं, लेकिन तुम्हारी बातचीत तुम्हें नष्ट करती है। यदि मैं बातचीत करता हूं तो तुम उसमें डूब जाते हो, तुम्हें मौन की भी कुछ झलकें मिल सकती हैं। यह जीवन कितना विरोधाभासी है, जब मैं बातचीत कर रहा हूं। तुम्हें मौन की कुछ झलकें मिलेंगी, क्योंकि तुम उसमें व्यस्त होकर उलझकर इतना खो जाते हो, तुम्हारा मन सुनते हुए तनाव से भरकर इतना सजग हो जाता है कि तुम किसी बात से चूक न जाओ। इसी सजगता में तुम मौन हो जाते हो, तुम्हारी अंदर की बातचीत रुक जाती हो। तुम्हारे अंदर मौन का जो अंतराल उत्पन्न हो जाता है, वही मेरा उत्तर है। असली चीज मेरे उत्तर नहीं हैं, इसीलिए मेरे उत्तर निरंतर बदलते रहते हैं। लोग सोचते हैं कि मैं अनिश्चित, अनियमित हूं। मैं कुछ भी कहे जाता हूं- आज कुछ कहता हूं तो कल कुछ और उनमें कोई संगति नहीं होती। मेरा संबंध किसी निश्चितता से है ही नहीं। मेरा उत्तर देना तो गिटार पर संगीत की कोई धुन सुनाने जैसा है। तुम नियमितता की बात पूछना ही मत। यह तो ऐसा है जैसे बार-बार एक ही धुन सुने जाओ। संगीतकार तो बुने बदलता रहता है। यदि तुम मेरे संगीत में पूरी तरह डूब गए तो तुम मौन के कुछ अंतराल पाओगे। उन्हीं अंतरालों में तुम पहली बार सजग बनकर
जान सकोगे  तुम कौन हो? यही सजगता धीरे - धीरे एक केंद्र पर एकीकृत चेतना बन जाएगी।
इसलिए यह फिक्र मत करो कि तुम क्या पूछ रहे हो। तुम जो कुछ भी पूछते हो-वही ठीक है। पर पूछते हुए मन में पूर्व अभ्यास मत करो, उसे अधिक सहज स्वाभाविक होने दो। यह तुम्हारे लिए कठिन होगा क्योंकि स्वाभाविकता और सहजता कठिन है।
मैंने एक उपदेशक के बारे में सुना है। वह गिरजाघर के उपदेश मंच पर पहली बार जा रहा था, इसलिए उसे क्या कहना है, उसका उसने पूरी रात अभ्यास किया। उसने जीसस के जीवन के बारे में एक सुंदर प्रसंग चुना क्योंकि वह अवसर उसके जीवन का निर्णायक मोड़ था। या तो वह सफल होता है अथवा असफल, और पहली सफलता या पहली असफलता कहीं अधिक अर्थपूर्ण होती है। इसलिए पूरी रात वह यह कल्पना करता हुआ कि वह श्रोताओं के सम्मुख उपदेश दे रहा है, बोलने का निरंतर पूर्व अभ्यास करता रहा। सुबह होने पर वह इतना अधिक थक चुका था और वास्तव में उसकी आंखों में नींद भरी हुई थी कि वह जब उपदेश मंच पर खड़ा हुआ तो उसका मन कोरा हो गया। वह लगभग सब कुछ भूल गया। उसने बाइबिल का एक सुंदर उदाहरण चुना था-’‘ सावधान हो जाओ। मैं आ रहा हूं। ‘‘ इसलिए उसने कहा, ‘‘ सावधान हो जाउंगे, मैं आ रहा हूं। ‘‘ और उसका मस्तिष्क कोरा हो गया था। इसके बाद के शब्द वह भूल गया, इसलिए उसने सोचा-यदि मैं इसी वाक्य को दोहराऊं तो शायद प्रवाह आ जाए।
वह फिर आगे की ओर झुका और कहा, ‘‘ सावधान हो जाओ मैं आ रहा हूं। ‘‘ लेकिन कुछ भी नहीं आया। अपने को अविचलित होने का दिखावा करते हुए वह और अधिक आगे की ओर झुका, जैसे कि ऐसा वह किसी संयोगवश नहीं कर रहा था और फिर उसने कहा, ‘‘ सावधान हो जाओ, में आ रहा हूं। ‘‘
भारी दबाव के कारण वह उपदेश मंच के नीचे बैठी एक बूढ़ी महिला की गोद में जा गिरा। उसे बहुत शर्मिंगीं हुई और उसने उसकी महिला से कहा-’‘ मुझे अफसोस है, लेकिन जो हुआ मेरा कभी यह मतलब नहीं था। ‘‘
उस स्त्री ने कहा-’‘ कुछ भी कहने की जरूरत नहीं, मुझे सावधान होना ही चाहिए था। आपने तो तीन बार कहा था-’‘ सावधान हो जाओ, मैं आ रहा हूं। इसमें आपकी कोई भी गलती नहीं। ‘‘
पूर्व अभ्यास या रिहर्सल करने की कोई जरूरत नहीं। पहले से सोच-विचार करने की कोई जरूरत नहीं। चीजों को स्वयं घटने दो, लेकिन यही वह रास्ता है जिससे चीजें संसार में स्वयं आती हैं। सभी प्रश्न मृत हैं और उसके उत्तर भी मृत हैं। प्रश्न भी सोच-विचारकर पूछे जाते हैं और उत्तर भी सोच-विचार कर दिए जाते हैं। दोनों ही मृत हैं और जो मुर्दा चीजें मिलती हैं तो उनमें कोई चमक या रोशनी नहीं होती। मैं जानता हूं कि यह तुम्हारे लिए कठिन है, लेकिन कोशिश करो। धीरे-. धीरे ऐसा घटेगा और उसे घटना ही चाहिए। एक बार जब ऐसा घटता है तो तुम मन की कारा से मुक्त
हो जाओगे। तब तुम भारहीन बन जाओगे, तब मुक्ताकाश में उड़ने के लिए तुम्हारे पास पख।
तीर्थ! क्या कोई चीज और?

००
प्रश्न : प्यारे ओशो? मेरा मूड मन पहले से ही विरोधाभास में ही
उलझा हुआ है और मैं अपने को आपकी कल की और आज की,
अभी की वार्ता के बीच उलझा पाता हूं 'आज के प्रवचन में आपने नई
स्थितियों में स्वाभाविकता से स्वस्कृर्त उत्तर आने की बात कही? जिसमें
ताजगी दिखाई दे। कल जोशू के बारे में आपने जो बोधकथा कही
थी, उसका संदेश था कि सभी स्थितियां और सभी मनुष्य एक जैसे
होते हैं इसलिए जोशू ने तीन व्यक्तियों को चाय पीने के लिए आमंत्रित
किया। मेरे-लिए यही विरोधाभास एक पहेली जैसा है।




कल कभी का बीत चुका। जोशू को मरे हुए एक लंबा अर्सा हो गया। केवल आज है यहां और यह भी बीता जा रहा है। सिर्फ यही क्षण है।
मन चीजों को देखता है और उनमें विरोधाभास पाता है क्योंकि मन अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचता है। केवल है वर्तमान ही। मन इसलिए विरोधाभास देखता है क्योंकि मन हमेशा भूत से वर्तमान की ओर क्षति करता है और तब भविष्य की ओर।
अपनी मां के गर्भ में कभी तुम एक छोटे-से कोष थे। इतने सूक्ष्म कि तुम्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता था। अब तुम पूरी तरह भिन्न हो और युवा हो। देर सवेर तुम बूढे और अपंग भी होंगे। अभी तुम जीवित हो, लेकिन एक दिन आएगा जब तुम मरोगे भी।
मन इन सभी चीजों के बारे में एकसाथ सोचता है और एक बच्चा तथा एक बूढ़ा उसके लिए विरोधाभासी बन जाते हैं। एक बच्चा बूढ़ा कैसे हो सकता है और एक युवा, आ तब जीवन और मृत्यु विरोधाभासी बन जाते हैं, क्योंकि मन के लिए जीवन और मृत्यु दोनों ही विचार है। अस्तित्व के लिए जब वहां जन्म है, तब मृत्यु नहीं है जब वहां मृत्यु है, तब वहां जीवन नहीं है। अस्तित्व के लिए कुछ भी विरोधाभासी नहीं है, लेकिन मन अतीत, वर्तमान और भविष्य की ओर देख सकता है और ये तीनों विरोधाभासी हैं
कल तुमने मुझे सुना वह बात खत्म हो गई। अब वहां बीता कल है ही नहीं, लेकिन, मन उसे ढोए जा रहा है-यदि तुमने कल वास्तव में मुझे सुना था। तुम उसे साथ लेकर नहीं चलोगे यदि तुम उसे साथ लिए हो तो आज तुम मुझे कैसे सुन सकते हो? कल का धुआं एक व्यवधान बन जाएगा, वहां उसकी धूल उड़ रही होगी और तुम केवल उस कल के द्वारा ही मुझे सुनोगे और तुम चूक जाओगे।
बीते कल को गिरा देना चाहिए जिससे तुम अभी और यहीं हो सको। वहां कोई विरोधाभास नहीं है। यदि तुम बीते हुए कल और आज की तुलना करो, विरोधाभास आता है। कल और आज दोनों साथ-साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते, वे केवल स्मृति में ही साथ-साथ रह सकते हैं। अस्तित्व में कोई विरोधाभास है ही नहीं, विरोधाभास केवल मन में है।
बीते कल के बारे में क्या सोचते हो? यदि तुम उसके बारे में सोच रहे हो तो तुम यहां कैसे हो सकते हो? यह कठिन हो जाएगा और इस पूरी मूढ़ता की ओर देखो, तुम बीते कल के कारण ही मुझे आज सुनने में समर्थ न हो सकोगे। क्या तुमने मुझे कल सुना था क्योंकि वहां कल के पीछे भी कई कल हुए हैं। क्या तुम आने वाले कल में भी मुझे सुनने में समर्थ हो सकोगे-क्योंकि यह आज, कल बन जाएगा। सभी बीते कलों की फिल्म होगी वहां और उस फिल्म के द्वारा, वर्तमान में गहरे प्रविष्ट होना कठिन होगा।
इसलिए वह सब कुछ जो मैं कह सकता हूं वह अभी और यही रहना है। जोश तो मर चुका है। जो व्यक्ति यहां तुमसे बात कर रहा है, कल उसके लिए है ही नहीं, वह मर चुका। वहां नियमितता या अनियमितता का कोई प्रश्न ही नहीं। कल मैं यहां नहीं हूंगा, तुम भी नहीं होंगे। कल तो पूरी तरह से नया और ताजा होगा। केवल जब ये दो नवीनताएं मिलती हैं तो वहां जैसे बिजली चमक जाती है, वे प्रकाश किरणें नृत्य करती हैं और वह नृत्य ही हमेशा नियमित होता है।
ढोया हुआ अतीत ही समस्याएं उत्पन्न करता है। वह समस्या यह नहीं है कि कल मैंने क्या कहा था अथवा मैं आज क्या कह रहा हूं। वह समस्या है कि तुम बीते कलों का बोझ ढो रहे हो और तुम आज से चूक जाते हो। जो कुछ भी तुम सोचते हो, तुमने वह सुना है, मैंने ऐसा कहा भी नहीं। तुमने उसे कुछ-का-कुछ और सुन लिया होगा क्योंकि बहुत से बीते कलों के द्वारा जो कुछ मैं कह रहा हूं तुम उसकी व्याख्या करोगे। तुम उसमें वह अर्थ सोच लोगे जो वहां उसके है ही नहीं, तुम उन बातों से चूक जाओगे, जो वहां कही जा रही हैं और वह कोई चीज तुम्हारी अपनी बन जाएगी। तब
तुम बहुत से विरोधाभास को उत्पन्न करोगे और तब मन भ्रमित होकर उलझन में पड़ जाएगा। उन्हें गिराते जाओ।
मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं न मैं कोई व्यवस्थापक हूं। मैं पूरी तरह अराजकतावादी हूं। उतना ही नियंत्रण विहीन जितना कि जीवन स्वयं है। मैं किन्हीं भी व्यवस्थाओं में विश्वास नहीं रखता। यदि तुम हीगल या कांट के पास जाओ और कहो कि इस चीज में यह विरोधाभास है, वे तुरंत कहेंगे-हरगिज नहीं और वे तुरंत दिखा भी देंगे कि उसमें कुछ भी विरोधाभास नहीं है। यदि तुम यह सिद्ध कर सकते हो कि उसमें विरोधाभास है तो वे उसके एक खण्ड को अलग हटा देंगे जिससे व्यवस्था नियमित हो जाए। एक जुआरी दूसरे जुआरी से कह रहा था-’‘ मैं तुम्हें उस व्यक्ति के बारे में जरूर बताना चाहता हूं जिससे मैं कल मिला था। वह एक अद्‌भुत व्यक्ति है। एक महान गणितज्ञ और एक अर्थशास्त्री उसने एक नई विधि खोजी है जिसके द्वारा एक परिवार बिना धन के जीवित रह सकता है। ‘‘
दूसरे जुआरी में दिलचस्पी पैदा हुई और वह तुरंत उस विधि को जानने के लिए उत्सुक हो उठा। उसने पूछा-’‘ क्या वह विधि काम करती है? ‘‘
पहले मित्र ने उत्तर दिया-’‘ वह विधि है बहुत आश्चर्यजनक लेकिन कमी केवल यही है कि वह काम नहीं करती। सिर्फ एक ही कमी है उसमें, अन्यथा उसकी विधि कमाल की है। ‘‘
सभीव्यवस्थाएं अद्‌भुत हैं। हीगल, कांट, मार्क्स और सभी की व्यवस्थाएं अद्‌भुत हैं। उनमें केवल एक ही कमी है कि वे मुर्दा हैं, मृत हैं।
मेरे पास कोई व्यवस्था नहीं है। एक व्यवस्था केवल मृत हो सकती है, वह जीवन्त नहीं हो सकती। मैं व्यवस्था विरोधी एक अराजक प्रवाह हूं मैं एक व्यक्ति भी नहीं हूं केवल एक प्रगति हूं। मैं नहीं जानता कि मैंने कल क्या कहा था और जिस व्यक्ति ने कहा था, वह अब यहां उत्तर देने को नहीं है, वह तो चला गया। मैं यहां हूं और मैं केवल इसी क्षण के लिए उत्तरदायी हूं। इसलिए कल का इंतजार मत करो क्योंकि मैं कल यहां नहीं रहूंगा।
और कौन बताने जा रहा है नियमितता और कौन खोजने जा रहा है वह रेशा, जिसमें विरोधाभास न हो। वहां ऐसा कोई भी नहीं है। मैं तुम्हें वैसा ही बनाना चाहता
केवल यही क्षण अस्तित्व में है, पूरी तरह से नियमित या पक्का क्योंकि इससे किसी की कोई तुलना नहीं। वहां न कोई अतीत है और न कोई मनुष्य, केवल यही क्षण है। तुम इसकी तुलना कर कैसे सकते हो? यदि तुम इस क्षण को जीयो तो एकनियमितता आएगी जो कोई व्यवस्था न होगी, जो जीवन्त होगी, जो अपने आप में एक ऊर्जा होगी। वह तुम्हारे ही अस्तित्व की एक आंतरिक नियमितता होगी, मन की नहीं।
मेरी दिलचस्पी तुम्हारे अस्तित्व, तुम्हारे होने में है, तुम्हारे मन में नहीं इसलिए मेरे उत्तरों को बहुत गंभीरता से मत लो, वे तो ठीक खेल की तरह हैं, शब्दों से खेलों। उनका मजा लो और उन्हें भूल जाओ। मेरा आनंद लो, लेकिन मुझे व्यवस्थित बनाने की कोशिश मत करो। तुम्हारा पूरा प्रयास ही व्यर्थ होगा और इस प्रयास में जो कुछ 'भी सुंदर है, तुम उससे चूक जाओगे। तुम बहुत कुछ उससे भी चूक जाओगे जो तुम्हारे अंतर की गहराई में रक परमानंद बन सकता है।
मेरी ओर देखो और जो कुछ मैं कहता हूं उसकी फिक्र मत करो। मेरे साथ बने रहो, सिद्धांतों और शब्दों की चिंता मत करो। मेरे साथ कृत्य में उतर जाओ-यह सुनना भी एक मानसिक प्रयास न होकर एक कृत्य बन जाना चाहिए। मुझे सुनो, लेकिन इस बारे में सोचने का प्रयास मत करो। मैं तुम्हें समझाने की कोशिश नहीं कर रहा हूं मैं तुम्हें कोई विश्वास देने का प्रयास नहीं कर रहा हूं मैं कोई पंथ या धर्म पैदा करने कोशिश नहीं कर रहा हूं और न मेरा अर्थ किसी सिद्धांत से है। जब मैं तुमसे कुछ कह रहा हूं मैं वहां हूं बात करना या कहना तो एक बहाना है। में आज किसी एक
विचारधारा का प्रयोग कर सकता हूं और कल दूसरी विचारधारा का, यदि तुम मेरी विचारधारा की ओर देखोगे तो कहोगे, में अनियमितता हूं। कल मेरे वह विचार थे और आज यह।
मैं कहता हूं-’‘ बस मेरी ओर देखो, शब्द तो बस वस्त्र पहनने जैसे हैं। मैं नियमित हूं। मुझसे कोई विरोधाभास नहीं। मेरा अस्तित्व नियमित है। वह अन्यथा कुछ हो भी नहीं सकता, तुम्हारा अस्तित्व विरोधाभासी हो कैसे सकता है? अस्तित्व मैं अंतराल नहीं होते, वह अखण्ड है, लेकिन मन सोचना और तुलना करना शुरू कर देता है और समस्याएं तभी उत्पन्न होती है। ‘‘
एक बार ऐसा हुआ कि एक झेन सद्‌गुरु के पास एक शिष्य आया और उसने पूछा-’‘ कुछ लोग इतने बुद्धिमान और कुछ लोग इतने अधिक मूर्ख क्यों हैं? कुछ लोग इतने अधिक सुंदर और कुछ लोग इतने अधिक कुरूप क्यों हैं? यह अनियमितता क्यों है? यदि हर जगह परमात्मा ही है और यदि वह सृष्टिकर्ता है, तब उसने एक को कुरूप और दूसरे को सुंदर क्यों बनाया? ‘‘
और उसने कहा-’‘ मुझे कृपया कर्मों के बारे में मत बताएं। मैंने वे सभी व्यर्थ के उत्तर सुन लिए कि पुराने जन्मों के कर्मों के कारण ही एक व्यक्ति सुंदर है और दूसरा कुरूप। मेरा पिछले जन्मों से कोई मतलब नहीं। एकदम प्रारंभ में जब कोई बीता कल ही न था, यह अन्तर कैसे आया? तब क्यों एक को सुंदर और दूसरों को कुरूप बनाया गया? यदि प्रत्येक को समान बनाया गया, सभी को बराबर बनाया गया? और यदि प्रत्येक को सामान बनाया गया, सभी को बराबर की सुंदरता और बुद्धिमत्ता दी गई तो फिर वे अलग तरह के कृत्य कैसे कर सकते हैं? कैसे उनके कार्य भिन्न हो सकते हें?’‘
सदगुरु ने कहा-’‘ प्रतीक्षा करो, यह इतना गुप्त रहस्य है कि इसे मैं तुम्हें तब बताऊंगा, जब यहां से सभी लोग चले जाएंगे। ‘‘
वहां बहुत से व्यक्ति बैठे थे इसलिए वह बैठ गया, उत्सुकता से भरा हुआ, लेकिन लोग जाते रहे और आते रहे और वहां बताने का कोई अवसर था ही नहीं। शाम होने पर जब सभी लोग चले गए, तब उस व्यक्ति ने पूछा, ‘‘ अब...। ?? '
सद्‌गुरु ने कहा-’‘ मेरे साथ बाहर आओ। चंद्रमा उदित हो रहा था और सद्‌गुरु उसे बगीचे में ले गया और उसने कहा, ‘‘ वह पेड़ देख रहे हो, वह छोटा है और यहां जो वह वृक्ष है वह बहुत लंबा है। मैं इन वृक्षों के साथ वर्षों से रहा हूं लेकिन उन्होंने कभी यह प्रश्न उठाया ही नहीं -कि यह वृक्ष छोटा क्यों है और वह लंबा क्यों है? जब वहां मुझ में मन था, तब मैं भी इन वृक्षों के नीचे बैठा हुआ कई बार यही पूछा करता था कि यह पेड़ छोटा क्यों है और वह पेड़ लंबा क्यों है? जब मेरा मन गिर गया तो प्रश्न भी गिर गया। अब मैं जानता हूं कि यह वृक्ष छोटा है और वह वृक्ष बड़ा और लंबा।
इसमें समस्या क्या है? इसलिए उन्हें देखो। वहां कोई समस्या है हीं नहीं। ‘‘
मन ही तुलना करता है। तुम कैसे तुलना कर सकते हो जब मन होगा ही नहीं? तब तुम कैसे कह सकते हो कि यह वृक्ष छोटा है और वह बड़ा मन गिर जाता है- तो तुलना करना भी गिर जीती है और जब वहां कोई तुलना नहीं होती तो अस्तित्व के सौंदर्य का विस्फोट होता है। वह .ज्वालामुखी का विस्फोट बन जाता है, तब तुम देखते हो कि छोटा ही बड़ा है और जो बड़ा है वह छोटा भी है, तब सारे विरोधाभास मिट जाते हैं और आंतरिक नियमितता दिखाई देती है।
मन को विसर्जित कर दो और मुझे सुनो। तब तुम पूछोगे नहीं-कल क्यों था और आज क्यों है? तब न कोई कल होगा और न आज, तब मैं यहां हूं और तुम भी यहीं हो और इस यहां-वहां का ही मिलन हो रहा है और यह अभी और यहीं, जब मन वहां नहीं होता, एक सहभागिता या अंतर्मिलन बन जाता है।
मेरी दिलचस्पी तुम्हें कोई चीज सम्प्रेषित करने की नहीं है। मेरी दिलचस्पी एक दूसरे में घुल जाने या अंतर्मिलन में है। सम्प्रेषण का अर्थ है कि मेरा मन तुम्हारे मन से बातचीत कर रहा है और अंतर्मिलन का अर्थ है-मैं एक मन नहीं हूं और तुम भी एक मन नहीं हो-बस तुम्हारा हृदय मेरे हृदय से मिल रहा है, दोनों एक दूसरे को महसूस कर रहे हैं और वहां शब्द नहीं है।
यहीं है वह कहानी, इस बर्तन के बारे में, बिना किसी शब्द का प्रयोग करते हुए कुछ कहो। भोजन बनाने वाले भिक्षु ने ठोकर मारी और चला गया। जो कुछ भी मैं कह रहा हूं उसे ठोकर मार कर अपने अंदर चले जाओ।

आज बस इतना ही...।


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