ऐ चट्टान तेरा ये एकांकी पन
कितना निष्ठुर ओर शुष्क है।
कैसा बेजान निर्जीव सा दिखता है
परंतु तुझमें भी जीवन लहर है
तुझ में भी स्पन्दन बहता है
फैली है जीवेष्णा भी तुझमें
पूर्णता को अपने में समेटे
तेरा विकास काल अजय है
कैसी तेरी थिरता, और धीरता,
कैसा शांत अविचल, स्थिर, निष्कंप
साधु वाद लिए हुए
अडिग खड़ी सुहासती-दमकती है
तेरी आभा पूर्ण सी।
फिर देखो उस पुष्प को,
जो नाचता है इतराता है
खिंचता है अपनी और सबको
किसी अपूर्व गंध और है रंग से लवरेज
कैसी मदहोशी भरी होती है
सारे वातावरण अपने आस-पास
वो पुष्प का इठलाना,
उसका वो नयनों को भाना
और ह्रदय को छू जाना
किसी अनजान अनजाने को भी
देता है कैसी तृप्ति
फिर देख है हमने उस खग को,
जो उड़ जाता नभ की उतुंग उंचाई तक
उसका कलोल गान,
भिन्नता में मधुरता को समेटे
उसकी चपलता, चुहल-चंचलता
मदमस्त मदिरालय गान
झूमा जाता है इस धरा को।
पौर-पौर उसकी उड़न से
हे देव,
ये तेरा अनेक-में एक रूप
भिन्नता में अभिन्नता
निराकार में साकार का
कैसा भेद है.....
समेटे आपने में एक अज्ञता।
क्या हम इस जान सकेंगे....
या केवल भेद ही करते रहेंगे।।
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(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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