हम दीप जलाए बैठे थे, इक आस लगाए
बैठे थे।
हम दिल के टूटे तारों से, कोई
गीत बनाए बैठे थे।
इक आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।
जो महक उठी थी प्राणों में, वो
खो हुई एहसास सी थी।
वो दूर भले ही रहती थी, पर रहते
दिल के पास ही थी।
जो आकर नहीं जाती है कभी, अनबूझी
सी प्यास सी थी।
वो आकर भी कभी आ न सके, हम आस लगाए बैठे थे.....
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