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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

संभोग से समाधि की और—20

समाधि : संभोग-उर्जा का अध्‍यात्‍मिक नियोजन—5

     यहां से मैं भारतीय विद्या भवन से बोल कर जबलपुर वापस लौटा और तीसरे दिन मुझे एक पत्र मिला कि अगर आप इस तरह की बातें कहना बंद नहीं कर देते है तो आपको गोली क्‍यों ने मार दि जाये? मैंने उत्‍तर देना चाहा था, लेकिन वह गोली मारने वाले सज्‍जन बहुत कायर मालूम पड़े। न उन्‍होंने नाम लिखा था, न पता लिखा था। शायद वे डरे होंगे कि मैं पुलिस को न दे दू्ं। लेकिन अगर वह यहां कहीं हों—अगर होंगे तो जरूर किसी झाड़ के पीछे या किसी दीवाल के पीछे छिप कर सून रहे होंगे। अगर वह यहां कहीं हों तो मैं उनको कहना चाहता हूं। कि पुलिस को देने की कोई भी जरूरत नहीं है। वह अपना नाम और पता मुझे भेज दें। ताकि में उनको उत्‍तर दें सकूँ। लेकिन अगर उनकी हिम्‍मत न हो तो मैं उत्‍तर यहीं दिये देता हूं। ताकि वह सुन ले।
      पहली तो बात यह है कि इतनी जल्‍दी गोली मारने की मत करना, क्‍योंकि गोली मारते ही जो बात मैं कह रहा हूं। वह परम सत्‍य हो जायेगी। इसका उनको पता होना चाहिए। जीसस क्राइस्‍ट को दुनिया कभी की भूल गयी होती। अगर उसको सूली न मिली होती। सूली देने वाले ने बड़ी कृपा की।
      और मैंने तो यहां तक सूना है जो इनर सर्किलस में जो जीवन की गहराईयों की खोज करते है। उनसे मुझे यह भी ज्ञात हुआ है की जीसस ने खुद अपनी सूली लगवाने की योजना और षड़यंत्र किया था। जीसस ने चाहा था कि मुझे सूली लगा दी जाये। क्‍योंकि सूली लगते ही जो जीसस ने कहा है वह करोड़ों-करोड़ों वर्ष के लिए अमर हो जायेगा। और हजारों लोगों के, लाखों लोगो के काम आ सकेगा।
      इस बात की बहुत संभावना है, क्‍योंकि जूदास। जिसने ईसा को तीस रूपये में बेचा था। वह ईसा के प्‍यारे से प्‍यारे शिष्‍यों में से एक था। और यह संभव नहीं है कि जो वर्षों से ईसा के पास रहा हो, वह सिर्फ तीस रूपये में ईसा को बेच दे। सिवाय इसके कि ईसा ने उसको कहा हो कि तू कोशिश कर, दुश्‍मन से मिल जा और किसी तरह मुझे उलझादे और सूली लगवा दे, ताकि मैं जो कह रहा हूं, वह अमृत का स्‍थान ले-ले और करोड़ों लोगों का उद्धार बन जाये।
      महावीर को अगर सूली लगी होती तो दुनिया में केवल तीस लाख जैन नहीं होते। तीस करोड़ हो सकते थे। लेकिन महावीर शांति से मर गये, सूली का उन्‍हें पता नहीं था। न किसी ने लगायी, न उन्‍होंने लगवाने की व्‍यवस्‍था ही की। आज आधी दुनियां ईसाई है। उसका इसके सिवाय कोई कारण नहीं कि ईसा अकेला सूली पर लटका हुआ है—न बुद्ध, न मुहम्‍मद, न महावीर, न कृष्‍ण, न राम। सारी दुनिया भी ईसाई हो सकती है। यह सूली पर लटकने से यह फायदा हो गया। तो मैं उनसे कहता हूं कि जल्‍दी मत करना। नहीं तो नुकसान में पड़ जाओगे।   
      दूसरी बात यह कहना चाहता हूं। कि घबराये न वे। मेरे इरादे खाट पर मरने के है भी नहीं है। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि कोई न कोई गोली मार ही दे। तो मैं खूद ही कोशिश करूंगा, जल्‍दी  उनको करने की आवश्‍यकता नहीं है। समय आने पर मैं चाहूंगा कि कोई गोली मार ही दे। जिंदगी भी काम आती है और गोली लग जाये तो मौत भी काम आती है। और जिंदगी से ज्‍यादा काम आ जाती है। जिंदगी जो नहीं दे पाती है, वह गोली लगी हुई मौत दे जाती है। अब तक हमेशा यह भूल की है दुश्‍मनों ने। नासमझी की है। सुकरात को जिन्‍होंने सूली पर लटका दिया, जिन्‍होंने जहर पिला दिया; मंसूर को जिन्‍होंने सूली पर लटका दिया। और अभी गँडासे ने गांधी को गोली मार दी है। गँडासे को पता नहीं कि गांधी के भक्‍त और गांधी के अनुयायी गांधी को इतने दूर तक स्‍मरण कराने में कभी सफल नहीं हो सकते थे। जितना अकेले गँडासे ने कर दिया है।
      और अगर गांधी ने मरते वक्‍त। जब उन्‍हें गोली लगी और हाथ जोड़कर गँडासे को नमस्‍कार किया होगा तो बड़ा अर्थपूर्ण था वह नमस्‍कार। वह अर्थपूर्ण था कि मेरा अंतिम शिष्‍य सामने आ गया। अब ये मुझे आखिर और हमेशा के लिए अमर कर दिये दे रहा है। भगवान ने आदमी भेज दिया, जिसकी जरूरत थी।
      जिंदगी का ड्रामा, वह जो जिंदगी की कहानी है, वह बहुत उलझी हुई है। वह इतनी आसान नहीं है। खाट पर मरने वाले हमेशा के लिए मर जाते है। गोली मरने वालों का मरना बहुत मुश्‍किल हो जाता है।
      सुकरात से किसी ने पूछा उसके मित्रों ने कि अब तुम्‍हें जहर दे दिया जायेगा। अब तुम मर जाओगे तो हम तुम्‍हारे गाड़ने की कैसी व्‍यवस्‍था करेंगे? जलाये, कब्र बनाये, क्‍या करें? सुकरात ने कहा पागलों तुम्‍हें नहीं पता कि तुम मुझे नहीं गाड़ सकोगे। तुम जब सब मिट जाओगे, तब भी मैं जिंदा रहूंगा। मैंने मरने की तरकीब जो चुनी है, वह हमेशा जिंदा रहने वाली है।
      तो वह मित्र अगर कहीं हों तो उनको पता होना चाहिए, जल्‍दी न करें। जल्‍दी में नुकसान हो जायेगा। उनका। मेरा कुछ होने वाला नहीं है। क्‍योंकि जिसको गोली लग सकती है वह मैं नहीं हूं। और जो गोली लगने के बाद भी पीछे बच जाता है वहीं हूं। तो वह जल्‍दी न करें। और दूसरी बात यह कि वह घबराये भी न। मैं हर तरह की कोशिश करूंगा कि खाट पर न मर सकूँ। वह मरना बड़ा गड़बड़ है। वह बेकार ही मर जाना है। वह निरर्थक मर जाना है। मर जाने की भी सार्थकता चाहिए।
      और तीसरी बात कि वह दस्‍तखत करने से न घबराये, न पता लिखने से घबराये। क्‍योंकि अगर मुझे लगे कि कोई आदमी मारने को तैयार  हो गया है तो वह जहां मुझे बूलायेगा, मैं चुपचाप बिना किसी को खबर किये, वहां आने को हमेशा तैयार हूं। ताकि उसके पीछे कोई मुसीबत न आये।
      लेकिन ये पागलपन सूझते है। इस तरह के धार्मिक.....ओर जिस बेचारे ने लिखा है , उसने यही सोच कर लिखा है कि वह धर्म की रक्षा कर रहा है। उसने यही सोचकर लिखा है कि मैं धर्म को मिटाने की कोशिश कर रहा हूं। वह धर्म की रक्षा कर रहा है। उसकी नीयत में कहीं खराबी नहीं है। उसके भाव बड़े अच्‍छे है। लेकिन बुद्धि मूढ़ता की है।
      तो हजारों साल से तथाकथित नैतिक लोगों ने जीवन के सत्‍यों को पूरा-पूरा प्रकट होने में बाधा डाली है, उसे प्रकट नहीं होने दिया गया है। नहीं प्रकट होने के कारण एक अज्ञात व्‍यापक हो गया और उसे अज्ञात—अंधेरी रात में हम टटोल रहे है। भटक रहे है, गिर रहे है। और वे मॉरल टीचर्स वे नीतिशास्‍त्र के उपदेशक,हमारे इस अंधकार के बीच में मंच बनाकर उपदेश देने का काम करते रहते है।
      यह भी सच है कि जिस दिन हम अच्‍छे लोग हो जायेंगे, जिस दिन हमारे जीवन में सत्‍य की किरण आयेगी समाधि की कोई झलक आयेगी। जिस दिन हमारा सामान्‍य जीवन  भी परमात्‍मा-जीवन में रूपांतरित होने लगेगा। उस दिन उपदेशक व्‍यर्थ हो जायेगे। उसकी कोई जरूरत नहीं रह जायेगी। उपदेशक तभी तक सार्थक है, जब तक लोग अंधेरे में भटकते है।
      गांव में चिकित्‍सक की तभी तक जरूरत है। जब तक लोग बीमार पड़ते है। जिस दिन आदमी बीमार पड़ना बंद कर देगा। उस दिन चिकित्‍सक को विदा कर देना पड़ेगा। तो हालांकि चिकित्‍सक ऊपर से बीमार का इलाज करता हुआ मालूम पड़ता है। लेकिन भी तर से उसके प्राणों को आकांक्षा यही होती है। कि लोग बीमार पड़ते रहें। यह बड़ी उलटी बात है। क्‍योंकि चिकित्‍सक जीता है लोगों के बीमार पड़ने पर। उसका प्रोफेशन बड़ा कंट्राडिक्‍री है। उसका धंधा बड़ा विरोधी है। कोशिश तो उसकी यह है कि लोग बीमार पड़त रहे। और जब मलेरिया फैलता है और फ्लू की हवाएँ आती है। तो वह भगवान को एकांत में धन्‍यवाद देता है। क्‍योंकि यह धंधे को वक्त आया सीजन है।
      मैंने सुना है, एक रात एक मधुशाला में बड़ी देर तक कुछ मित्र आकर खाना-पीना करते रहे, शराब पीते रहे। उन्‍होंने  खूब मौज की और जब वे चलने लगे आधी रात को तो शराब खाने के मालिक ने अपनी पत्‍नी को कहा कि भगवान को धन्‍यवाद बड़े लोग आये। ऐसे लोग रोज आते रहें तो कुछ ही दिनों में हम मालामाल हो जायें।
      विदा होते मेहमानों को सुनायी पड़ गया और जिसने पैसे चुकाये थे उसने कहा, दोस्‍त भगवान से प्रार्थना करो कि हमारा भी धंधा रोज चलता रहे तो हम रोज आयें।
      चलते-चलते उसे शराबघर के मालिक ने पूछा भाई तुम्‍हारा धंधा क्‍या है?
      उसने कहां, मेरा धंधा पूछते हो, मैं मरघट पर लकडियां बेचता हूं, मुद्रों के लिए। जब आदमी ज्‍यादा मरते है, तब मेरा धंधा अच्‍छा चलता है। तब हम थोड़ा खुश हो जाते है। हमारा भी धंधा अच्‍छा चलता रहे तो हम तो रोज यहां आये।
      चिकित्‍सक का धंधा है कि लोगों को ठीक करें। लेकिन फायदा, लाभ और शोषण इसमें है कि लोग बीमार पड़ते रहें। तो एक हाथ से चिकित्‍सक ठीक करता है और उसके प्राणों की प्रार्थना होती है कि मरीज जल्‍दी ठीक न हो जाये।
      इसीलिए पैसे वाले मरीज होने में बड़ी देर लगती है। गरीब मरीज जल्‍दी ठीक हो जाया है; क्‍योंकि गरीब मरीज को ज्‍यादा देर बीमार रहने से कोई फायदा नहीं है। चिकित्‍सक को कोई फायदा नहीं है। चिकित्‍सक को फायदा है अमीर मरीज है, तो अमीर मरीज लम्‍बा बीमार रहता है। सच तो यह है कि अमीर अक्‍सर ही बीमार रहते है। यह चिकित्‍सक की प्रार्थनाएं काम कर रही है। उसकी आंतरिक इच्‍छा भी उसके हाथ को रोकती है कि मरीज एकदम ठीक ही न हो जाये।
      उपदेशक की स्‍थिति भी ऐसी ही है। समाज जितना नीतिभ्रष्‍ट फैल जितना अनाचार फैले उतना ही उपदेशक का मंच ऊपर उठने लगता है। क्‍योंकि जरूरत आ जाती है, कि वह लोगों को कहं; अहिंसा का पालन करो, सत्‍य का पालन करो, ईमानदारी स्‍वीकार करो; यह व्रत पालन करो, वह व्रत पालन करो। अगर लोग व्रती हों, अगर लोग संयमी हों, अगर लोग शांत हों, ईमानदार हों तो उपदेशक मर गया। उसकी कोई जगह न रही।
      और हिंदुस्‍तान में सारी दुनिया से ज्‍यादा उपदेशक क्‍यों है? ये गांव-गांव गुरु और घर-घर स्‍वामी और संन्‍यासी क्‍यों है? यह महात्‍माओं की इतनी भीड़ और यह कतार क्‍यों है?
      यह इसलिए नहीं है कि आप बड़े धार्मिक देश में रहते है, जहां कि संत-महात्‍मा पैदा होते है। यह इसीलिए है कि आप इस समय पृथ्‍वी पर सबसे ज्‍यादा अधार्मिक और अनैतिक देश है। इसीलिए इतने उपदेशकों को पालने का ठेका और धंधा मिल गया है। हमारा तो जातीय रोग हो गया है।
      मैंने सुना हे कि अमरीका में किसी ने एक लेख लिखा हुआ था। किसी मित्र ने वह लेख मेरे पास भेज दिया। उसमें एक कमी थी, उन्‍होंने मेरी सलाह चाही। किसी ने लेख लिखा था वहां—मजाक का कोई लेख था, उसमें लिखा था कि हर आदमी और हर जाती का लक्षण शराब पिलाकर पता लगाया जा सकता है। कि बेसिक कैरेक्‍टर क्‍या है?
      उसने लिखा था कि अगर डच आदमी को शराब पिला दी जाये तो वह एकदम से खाने पर टूट पड़ता है, फिर वह किचन के बाहर ही नहीं निकलता। फिर वह एकदम खाने की मेज से उठता ही नहीं। बस शराब पी कि वह दो-दो, तीन-तीन घंटे तक खाना खाता रहता है। अगर फ्रैंच को शराब पिला दी जायें तो शराब पीने के बाद वह एकदम नाच-गाने के लिए तत्‍पर हो जाता है। और अंग्रेज को शराब पिला दि जाये तो वह एक दम चुप हो कर एक कोने में बैठ जाता है। वह वैसे ही चुप बैठा रहता है, और शराब पी ली तो उसका कैरेक्‍टर है, वह और चुप हो जाता है। ऐसे दुनिया के सारे लोगों के लक्षण थे। लेकिन भूल से यह  अज्ञान के वश भारत के बाबत कुछ भी नहीं लिखा था, तो किसी मित्र ने मुझे लेख भेजा और कहा कि आप भारत के कैरेक्‍टर की बाबत क्‍या कहते है। अगर भारतीय को शराब पिलायी जायें तो वह क्‍या करेगा।
      तो मैंने कहा कि वह तो जग जाहिर बात है। भारतीय शराब पियेगा। और तत्‍काल उपदेश देना शुरू कर देगा। यह उसका कैरेक्‍टरस्‍टिक है, वह उसका जातीय गुण है।
      यह जो—यह जो उपदेशकों का समाज और साधु, संतों और महात्‍माओं की लंबी कतार है, ये रोग के लक्षण है, ये अनीति के लक्षण है। और मजा यह है कि इनमें से कोई भी भीतर ह्रदय से कभी नहीं चाहता कि अनीति मिट जाये, रोग मिट जाये; क्‍योंकि उनके मिटने के साथ वह भी मिट जाते है,प्राणों की पुकार तो यही कहती है कि रोग बना रहे और बढ़ता रहे।
      और उस रोग को बढ़ाने के लिए जो सबसे सुगम उपाय है वह यह है, कि जीवन के संबंध में सर्वांगीण ज्ञान उत्‍पन्‍न न हो सके। और जीवन के जो सबसे ज्‍यादा गहरे केंद्र है, जिनके अज्ञान के कारण अनीति और व्‍यभिचार और भ्रष्‍टाचार फैलता है, उन केंद्रों को आदमी कभी भी न जान सकें क्‍योंकि उन केंद्रों को जान लेने के बाद मनुष्‍य के जीवन से अनीति तत्‍काल विदा हो सकती है।
      और मैं आपसे कहना चाहता हूं कि सेक्‍स मनुष्‍य की अनीति का सवार्धिक केंद्र है। मनुष्‍य के व्‍यभिचार का, मनुष्‍य की विकृति का सबसे मौलिक, सबसे आधारभूत केंद्र और इसलिए धर्मगुरू उसकी बिलकुल बात नहीं करना चाहते है।
      एक मित्र ने मुझे खबर भिजवायी है कि कोई संत-महात्‍मा सेक्‍स की बात नहीं करता। और आपने सेक्‍स की बात की तो हमारे मन में आपका आदर बहुत कम हो गया है।
      मैंने उनसे कहा,उसमें कुछ गलती नहीं हुई। पहले आदर था, उसमें गलती थी। इसमें क्‍या गलती हुई? मेरे प्रति आदर होने की जरूरत क्‍या है? मुझे आदर देने का प्रयोजन क्‍या है? मैंने कब मांगा है कि मुझे आदर दें? देते थे तो आपकी गलती थी। नहीं देते तो आपकी कृपा, मैं महात्‍मा नहीं रहा। मैंने कभी चाहा होता कि मैं महात्‍मा होऊं तो मुझे बड़ी पीड़ा होती। मैं कहता, क्षमा करना भूल से ये बातें मैंने कह दीं।
      मैं महात्‍मा था नहीं, मैं महात्‍मा हूं नहीं, मैं महात्‍मा होना चाहता नहीं।
      जहां इतनी बड़े जगत में इतने दीन-हीन लोग है, वहां एक आदमी महात्‍मा होना चाहे, उससे ज्‍यादा निम्‍न प्रवृति और स्‍वार्थ से भरा हुआ आदमी नहीं है। जहां इतने दीन-हीन आत्‍माओं का विस्‍तार है, वहां महात्‍मा होने की कल्‍पना और विचार ही पाप है।
      महान मनुष्‍यता में चाहता हूं। महान मनुष्‍य में चाहता हूं।
      महात्‍मा होने की मेरे मन में कोई और आकांक्षा नहीं है। महात्‍माओं के दिन विदा हो जाने चाहिए। महात्‍माओं की कोई जरूरत नहीं है। महान मनुष्‍य की जरूरत है। महान मनुष्‍यता की जरूरत है। ग्रेट मैन नही, ग्रेट ह्रुमिनिटी। बड़े आदमी बहुत हो चुके। उनसे क्‍या फायदा हुआ। अब बड़े आदमियों की जरूरत नहीं, बड़ी आदमियत की जरूरत है।
      तो मुझे.....मुझे अच्‍छा लगा कम से कम एक आदमी का इल्‍यूजन तो टूटा। एक आदमी तो डिसइल्‍यूजंड हुआ। एक आदमी को तो यह पता चल गया कि यह आदमी महात्‍मा नहीं है। एक आदमी का भ्रम टूट गया,यह भी बड़ी बात है। वह शायद सोचे होंगे कि इस भांति कहकर वह शायद मुझे प्रलोभन दे रहे है कि मुझे महात्‍मा और महर्षि बनाया जा सकता है। अगर मैं इस तरह की बातें न करूं।
      आज तक महार्षियों और महात्‍माओं को इसी तरह बनाया गया है। इसीलिए उन कमजोर लोगों ने इस तरह की बातें नहीं की, जिनसे महात्मा पन छिन सकता था। अपना महात्मा पन बचा रखने के लिए—उस प्रलोभन में जीवन का कितना अहित हो सकता है इसका उन्‍होंने कोई भी ख्‍याल नहीं किया।
      मुझे चिंता नहीं है, मुझे विचार भी नहीं है, मुझे ख्‍याल भी नहीं है। मुझे घबराहट ही होती है, जब कोई मुझे महात्‍मा मानना चाहेगा।
      और आज की दुनिया में महात्‍मा में महात्‍मा बन जाता और महर्षि बन जाना, इतना आसान है। जिसका कोई हिसाब नहीं। हमेशा आसान रहा है। हमेशा आसान रहेगा। वह सवाल नहीं है। सवाल यह है कि महान मनुष्‍य कैसे पैदा हो? उसके लिए हम क्‍या कर सकते है, क्‍या सोच सकते है। क्‍या खोज सकते है। और मुझे लगता है कि मैंने बुनियादी सवाल पर जो बातें आपसे कहीं है। वह आपके जीवन में एक दिशा तोड़ने में सहयोगी हो सकती है। उनसे एक मार्ग प्रकट हो सकता है। और क्रमश: आपकी वासना का रूपांतरण आत्‍मा की दिशा में हो सकता है। अभी हम वासना है, आत्‍मा नहीं। कल हम आत्‍मा भी हो सकते है। लेकिन वह होंगे कैसे? इसी वासना के सर्वांग रूपांतरण से इसी शक्‍ति को निरंतर ऊपर ले जाने से।
      जैसा मैंने कल आपको कहा, उस संबंध में भी बहुत से प्रश्‍न हे। उसके संबंध में एक बात कहूंगा।
      मैंने आपको कहा कि संभोग में समाधि की झलक का स्‍मरण रखें, रिमेम्‍बरिग रखें और उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें। उस बिंदु को जो विद्युत की तरह संभोग के बीच में चमकती है समाधि का। एक क्षण को जो चमक आती है, और विदा हो जाती है। उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें कि वह क्‍या है। उसे जानने की कोशिश करें। उसको पकड़ लें पूरी तरह से कि वह क्‍या है। और एक दफा उसे आपने पकड़ लिया तो उस पकड़ में आपको दिखायी पड़ेगा कि उस क्षण में आप शरीर नहीं रह जाते है—बॉडीलेसनेस। उस क्षण में आप शरीर नहीं है। उस क्षण में एक झलक की तरह आप कुछ और हो गये है। आप आत्‍मा हो गये है।
      और वह झलक आपको दिखायी पड़ जाये तो फिर उस झलक के लिए ध्‍यान के मार्ग से श्रम किया जा सकता है। उस झलक को फिर ध्‍यान की तरह से पकड़ा जा सकता है। और अगर वह ज्ञान हमारे जानने ओर जीवन का हिस्‍सा बन जाय तो आपके जीवन में सेक्‍स की कोई जगह नहीं रह जायेगी।

( क्रमश: अगले अंक में ..................देखें)

ओशो
संभोग से समाधि की ओर,
प्रवचन—4
गोवा लिया टैंक, बम्‍बई,
2 अक्‍टूबर—1968,