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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

भगवान बुद्ध और ज्‍योतिषी— ( कथा यात्रा )

एक गर्म दोपहरी थी। भगवान बुद्ध नदी किनारे चले जा रहे थे।  नंगे पाव होने के कारण ठंडी बालु रेत का सहारा ले पैरों को ठंडा कर लेते थे। आस पास कहीं कोई वृक्ष नहीं था। नदी का पाट गर्मी के सुकड़ कर सर्प की तरह आड़ा तिरछा और संकरा भी हो गया।  चारों और बालु का विस्‍तार फैला हुआ था। सुर्य शिखर पर था। रेत गर्मी के कारण तप रही थी। भगवान पैरो की जलन को कम करने के लिए गीली रेत पर चल कर पैरो को ठंडा कर रहे थे। जिसके कारण उनके पद चाप नदी के गिले बालु पर चित्र वत छपे अति सुंदर लग रहे है। दुर तक कोई बड़ा पेड़ न होने के कारण, पास ही एक कैंदु की झाड़ी की छांव को देख कर पल भर विश्राम करने के लिए रूप गये। कैंदु की छांव इतनी सधन थी कि कोई-कोई धूप का चितका छन कर ही आपा रहा था।
      संयोगवश काशी से ज्योतिष पढ़ कर एक महा पंडित अपने घर आ रहा था। उसने ज्योतिष और अंक गणित के रहस्‍यों को जाने के लिए बारह साल लगाये थे। कीमती से कीमती ग्रंथ उस के पास था। उसके गुरु ने उसे महाविद्यालय उपाधि दे कर विदा किया था। गर्मी के कारण वह बैल गाड़ी से उतर कर पानी पीने नदी के किनारे आया। बालु पर जो भगवान के पद चाप छपे थे उन्‍हें देख कर उसे यकीन ही नहीं आया। वह इतना हैरान और परेशान हुआ की भाग कर बैल गाड़ी के गया और एक ग्रंथ निकाल कर लाया। और उन चिन्‍हों को उनके साथ मिलान करने लगा। वह सोचने लगा तो फिर जो मैंने बारह वर्ष तक सिखा है वह बेकार है। इस भर दोपहरी में ये पद चिन्‍ह इस निर्जन जंगल में । ये कैसे हो सकता है। वह उन पद चिन्‍हों का पीछा करता हुआ चला। दस र्फलांग चलने पर ही उसने एक आदमी को एक झाड़ के नीचे विश्राम करते हुए देखा।
वह उस और चल दिया। भगवान पैर पर पैर रख कर आराम कर रहे थे। पास बैठ कर ज्योतिषी ने उन चिन्‍हों का मिलान किया। पहले तो अपने को भाग्‍य शाली समझा की जो लाखों सालों में करोड़ों आदमियों में भी दुर्लभ चिन्‍ह है उन्‍हे देखने को मिले। पर ये खुशी पल भर में ही गायब हो गई।
      क्‍योंकि चरण चिन्‍ह पर जो रेखाएं थी, वे उस शास्‍त्रों के अनुसार चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए। वैसी रेखाएं केवल उस के ही पैर में हो सकती है। जो सारे जगत को, छहों महाद्वीपों का एकमात्र सम्राट हो, जो पूरी पृथ्‍वी का मालिक हो। लेकिन जिस व्‍यक्‍ति को सामने लेटा हुआ देख रहा था। वह तो एक भिखारी था। उसके कपड़े फटे हुए नंगे पैर। जो धूप में चलने के लहू लूहान हो गये थे। एक दीद दरिद्र नदी के किनारे सोता हुआ भिखारी। पर उसके चेहरे पर तेज था। एक आभा थी, एक गौरव गरिमा थी। एक प्रसाद था एक शांति थी, जो उसे भी घेर रही थी। वह अपना सर पकड़ कर बैठ गया। अब उसके चलने कि हिम्‍मत जवाब दे चुकी थी। अब या ता जो सालों जाना है वो बेकार, या इस बात का और क्‍या रहस्‍य हो सकता है। इस बात को जाने के लिए वह भगवान के सौकर उठने का इंतजार करने लगा। मन में लगातार विचार चल रहे थे कि ऐसा कैसे हो सकता जिस मनुष्‍य के पैरों में पद्म हो और वो भिखारी, देख रहा है अपने सामने भिक्षा पात्र, जीर्ण-शीर्ण वस्‍त्र, न पास कोई रक्षक, न मंत्रि गण, न रथ, अकेला, वह भी इस निर्जन जंगल में। बारह वर्ष जो कड़ी मेहनत कर  शिक्षा अर्जित की है वह किस काम, की उस ज्योतिषी को और भी अधिक मुश्‍किल में डाल दिया। एक-एक पल उसके लिए भारी हो रहा था। कि कब ये मनुष्‍य आंखे खोले और उसके मन में उठ रहे तूफान का निर्वाण करे।
      अचानक भगवान ने आंखे खोली सामने एक ज्‍योतिषी को बैठे देख, और मुस्‍कुराये। उनकी हंसी मैं भी एक सौंदर्य था। एक तृप्‍ति थी, एक प्रसाद था। ज्‍योतिषी ने दोनों हाथ जोड़ कर निवेदन किया, महाराज आप मेरी शंका का निवारण कीजिए। मेरे भीतर एक अराजकता पैदा हो गई है। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है। मैं बनारस से ज्‍योतिष की शिक्षा ग्रहण करके लोट रहा हूं। आपके पैरों में जो पद्म है। वह अति दुर्लभ है, हजारों साल में कभी किसी भाग्य शाली को देखने को  मिलता है। पर हमारी ज्‍योतिष कहती है कि उस व्‍यक्‍ति को चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए, परन्‍तु आप.....। और ज्‍योतिषी कहते-कहते चुप हो गया। लेकिन आपकी आंखे, आपका संग, एक सुगंध से लवलीन है, इतनी जीवित आंखे मैने आज तक नहीं देखी। आप केवल भिक्षु ही नहीं उस सब के भी पास कुछ और को पा चुके हो। पर शंका अपनी जगह वहीं के वही है। आपको चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए। मैं बहुत मुश्‍किल में हूं कृपा मेरी मुश्‍किल को सुलझाओं।
      भगवान बुद्ध हंसे और उन्‍होंने कहा, जब तक में बंधा था, इस प्रकृति की पकड़ में, तब तक आपका ये ज्‍योतिष काम करता था। अब मैं सब बंधनों से, मुक्‍त हो गया हूं, न तो प्रकृति मेरा उपयोग कर सकती है, यहां तक जन्‍म-मृत्यु भी अब उस के बस के बहार हो गया है। आप उस पाश में बंधे है। आप चाह कर अपनी इच्‍छा से कहीं जनम नहीं ले सकते। प्रकृति जहां धक्‍के मारेगी वहीं जाना हो। और मुक्ति का क्‍या अर्थ की घर बार छोड़ दिया, जंगलों में भाग गये। ये तो उपरी थोड़ा आडम्बर है। हाँ साधना में सह योग दे सकता है। पर ये पूर्ण मुक्‍ति नहीं है। अब मैं मुक्‍त हूं, आपका ज्योतिष मुझ पर काम नहीं कर सकता। जो सोए है, उनके सबंध में ये ठीक है। जो बंधे है बंधन में उनके लिए ठीक है। पर जो मुक्‍त हो गये, वहां ये नकारा हो जाता है। वहां ये कुछ काम नहीं कर सकता।
      ज्‍योतिषी की कुछ समझ में नहीं आया। मुक्‍त बंधन तो ठीक है, पर मैं ये पूछना चाहता हूं की आप मनुष्य तो है। आपका शरीर है, मन है, फिर ये सब आप पर काम क्‍यों नहीं करता। क्‍या आपको भूख नहीं लगती। क्‍या पृथ्‍वी का गुरुत्वाकर्षण आपको खिचता नहीं। क्‍या आपको सर्दी नहीं लगती। क्‍या आपके मन, दया का, वेदना का भाव मिट गया। आप चलते है, सोते है।.....
      बोघिक तोर से भरे मन को समझना अति कठिन है।
      वो सब तो होता है।
      तो फिर क्‍या आप मनुष्‍य न होकर कोई देवता है।
      बुद्ध ने कहां,नहीं।
      तो किन्‍नर है।
      बुद्ध ने कहा नहीं।
      तो क्‍या आप यक्ष है।
      यूं ज्‍योतिषी पूछता चला गया। और भगवान बुद्ध उत्‍तर देते चले गये। तब उसने कहा तो आप खुद ही बताये की आप कोन है।
      भगवान बुद्ध ने कहां, मैं तुम्‍हें कहा चुका हूं मैं केवल एक जागा हुआ आदमी हूं। अब सोया हुआ नहीं हूं, इस अवस्‍था को ही हमने मुक्‍ति कहा है, मोक्ष कहा है। परम स्वतंत्रता कहा है। कैवल्‍य कहा है, समाधि कहां है।
      पर पता नहीं बेचारे ज्‍योतिषी को कुछ समझ आया या नहीं, वह केवल उठा और भारी कदमों से अपनी बेल गाड़ी की तरफ चला गया। रत पर उसके पैरों के कदम भी बनते चले गये। सुर्य भी अपनी तपीस को समेट कर घर जाने की तैयारी कर रहा था। नदी पर और बालु पर पड़ रही उसकी किरण स्‍वर्णिम होने का भ्रम दे रही थी। दुर पक्षियों का झुंड संध्‍या से पहले अपने शरीर को उष्मा देने के लिए उड़ारी भर रहा था। पेड़ पौधे भी दिन भर की तपीस के बाद अब चेन की सांस ले सोन की तैयारी कर रहे थे। जैसे भगवान पुरी प्रकृति भगवान के उत्‍तर से प्रश्न थी। की एक तो मुक्‍त हुआ। कल हमारी भी बारी है। पर ज्‍योतिष हताश और मायूस चला जा रहा था। भगवान बस बैठे देखते रहे उसे जाते हुए और फिर कमंडल उठा कर आगे बढ़ गये।

स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’
धम्‍म पद से