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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

संभोग से समाधि की और-16

समाधि : अहं-शून्‍यता समय शून्‍यता का अनुभव—4

      और अब तो हम उस जगह पहुंच गये है कि शायद और पतन  की गुंजाइश नहीं है। करीब-करीब सारी दुनिया एक मेड हाऊस एक पागलखाना हो गयी है।
      अमरीका के मनोवैज्ञानिकों ने हिसाब लगया है न्‍यूयार्क जैसे नगर में केवल 18 प्रतिशत लोग मानसिक रूप से स्‍वस्‍थ कहे जा सकते है। 18 प्रतिशत, 18 प्रतिशत लोग मानसिक रूप से स्‍वास्‍थ है। तो 82 प्रतिशत लोग करीब-करीब विक्षिप्‍त होने की हालत में है।
      आप कभी अपने संबंध में कोने में बैठकर विचार करना, तो आपको पता चलेगा कि पागलपन कितना है भीतर। किसी तरह दबाये है पागलपन को, किसी तरह संभलकर चले जा रहे है। वह बात दूसरी है। जरा सा कोई धक्‍का दे-दे और कोई भी आदमी पागल हो सकता है।
      यह संभावना है कि सौ वर्ष के भीतर सारी मनुष्‍यता एक पागलखाना बन जाये। सारे लोग करीब-करीब पागल हो जाये। फिर हमें एक फायदा होगा कि पागलों के इलाज की कोई जरूरत नहीं रहेगी। एक फायदा ओर होगा कि पागलों के चिकित्‍सक नहीं होंगे। एक फायदा होगा कि कोई अनुभव नहीं करेगा कि कोई पागल है। क्‍योंकि पागल का पहला लक्षण यह है कि वह कभी नहीं मानता कि मैं पागल हूं। इतना ही फायदा होगा।
      लेकिन यह रूग्णता बढ़ती चली जाती है। यह रोग, यह अस्वस्थता, यह मानसिक चिंता और मानसिक अंधकार बढ़ता चला जाता है। क्‍या मैं आपसे कहूं कि सेक्‍स को स्‍प्रीच्‍युअलाइज किये बिना, संभोग को आध्‍यात्‍मिक बनाये बिना कोई नयी मनुष्‍यता पैदा नहीं हो सकती है?
      इन तीन दिनों में थोड़ी सी बातें आपसे कहीं। निश्‍चित ही एक नये मनुष्‍य को जन्‍म देना है। मनुष्‍य के प्राण आतुर है उंचाईयों को छूने के लिए, आकाश में उठ जाने के लिए, चाँद तारों जैसे रोशन होने के लिए, फूलों जैसे खिल जाने के लिए, नृत्‍य के लिए, संगीत के लिए, आदमी की आत्‍मा रोती है। और प्‍यासी है। और आदमी कोल्‍हू के बैल की तरह चक्‍कर में घूमता है और उसी में समाप्‍त हो जाता है। चक्‍कर के बहार नहीं उठ पाता है। क्‍या कारण है?
      कारण एक ही है, मनुष्‍य के जन्‍म की प्रक्रिया बेहूदी है, एब्‍सर्ड है। मनुष्‍य के पैदा होने की विधि पागलपन से भरी हुई है। मनुष्‍य के संभोग को हम द्वार नहीं बना सके समाधि का इसीलिए। मनुष्‍य का संभोग समाधि का द्वार बन सकता है।
      इन तीन दिनों में इसी छोटे से मंत्र पर मैने सारी बातें कहीं और अंत में एक बात दोहरा दूँ और आज की चर्चा में पूरी करूं।
      मैं यह कह देना चाहता हूं, कि जीवन के सत्‍यों से आंखें चुराने वाले लोग मनुष्‍य के शत्रु है। जो आपसे कहें कि संभोग और सेक्‍स की बात का विचार भी नहीं करना चाहिए। वह आदमी मनुष्‍य का दुश्‍मन हे, क्‍योंकि ऐसे ही दुश्‍मनों ने हमें सोचने नहीं दिया। अन्‍यथा यह कैसे संभव था कि हम आज तक वैज्ञानिक दृष्‍टि ने खोज लेते और जीवन को नया करने का प्रयोग न खोज लेत।
      जो आपसे कहे कि सेक्‍स का धर्म से कोई संबंध नहीं है। वह आदमी सौ प्रतिशत गलत है। क्‍योंकि सेक्‍स की ऊर्जा ही परिवर्तित और रूपांतरित होकर धर्म के जगत में प्रवेश पाती है। वीर्य की शक्ति ही उर्ध्‍वस्‍वी होकर मनुष्‍य को उन लोको में ले जाती है, जिनका हमें कोई पता नहीं है। जहां कोई मृत्‍यु नहीं है, जहां कोई दुःख नहीं जहां आनंद के अतिरिक्‍त और कोई अस्‍तित्‍व नहीं है।
      उस सत चित आनंद में ले जाने वाली शक्‍ति और ऊर्जा किसके पास है और कहां है?
      हम उसे व्‍यय कर रहे है। हम उन पात्रों की तरह है, जिनमें छेद है, जिन्‍हें हम कुओं में डालते हैं खींचने के लिए। ऊपर तक पात्र तो आ जाता है, शेर गुल भी बीच में बहुत होता है और पानी गिरता है और लगता है कि पानी आता होगा। लेकिन पानी सब बीच में गिर जाता है। खाली पात्र हाथ में वापस आ जाता है।
      हम उन नाव की तरह है, जिनके छेद है। हम नावों को खेते है—सिर्फ डूबने के लिए; नावें किसी किनारे पर नहीं पहुंच पाती है। सिर्फ मंझधार में डूबा देती है। और नष्‍ट हो जाती है।
      और ये सारे छिद्र मनुष्‍य की सेक्‍स ऊर्जा के गलत मार्गों से प्रवाहित और बह जाने के कारण है। और उन गलत मार्गों पर बहाने वाले लोग वह नहीं है, जिन्‍होंने नंगी तस्‍वीरें लटकायी है; वे नहीं है जिन्‍होंने नंगे उपन्‍यास लिखे है; वह नहीं है, जो नंगी फिल्में बना रहे है।
      मनुष्‍य की ऊर्जा को विकृत करनेवाले वे लोग हैं, जिन्‍होंने मनुष्‍य को सेक्‍स के सत्‍य से परिचित होने में बाधा दी है। और उन्‍हीं लोगों के कारण ये नंगी तस्‍वीरें बिक रही है। नंगी फिल्‍में बिक रही है। लोग नए क्‍लबों को ईजाद कर रहे है। और गंदगी के नये-नये और बेहूदगी के नये-नये रास्‍ते निकाल रहे है।    
      किनके कारण? ये उनके कारण जिनको हम साधु और संन्‍यासी कहते है। उन्‍होंने इनके बाजार का रास्‍ता तैयार किया है। अगर गौर से हम देखें तो वे इनके विज्ञापनदाता है, वे इनके एजेन्‍ट है।
      एक छोटी सी कहानी, मैं अपनी बात पूरी कर दूँगा।
      एक पुरोहित जा रहा था। अपने चर्च की तरफ। दूर था गांव, भागा हुआ चला जा रहा था। तभी उसे पास की खाई में जंगल में एक आदमी पडा हुआ दिखायी पडा घावों से भरा हुआ। खून बह रहा था। छुरी उसकी छाती में चुभी है।
      पुरोहित को ख्‍याल आया कि चलू में इसे उठा लूं, लेकिन उसने देखा कि चर्च पहुंचने में देर हो जायेगी। और वहां उसे व्‍याख्‍यान देना है। और लोगों को समझाना है। आज वह प्रेम के संबंध में ही समझाने जाता है। आज उसके विषय चुना था, ‘’लव इज़ गॉड’’ क्राइस्ट के वचन को चुना था कि ईश्‍वर परमात्‍मा प्रेम है। वह यही समझाने जा रहा था। लेकिन उस आदमी ने आंखे खोली और वह चिल्‍लाया, पुरोहित मुझे पता है कि तू प्रेम पर बोलने जा रहा है। मैं भी आज सुनने आने वाला था। लेकिन दुष्‍टों ने मुझे छुरी मारकर यहां पटक दिया है। लेकिन याद रख अगर में जिन्‍दा रह गया तो गांव भर में खबर कर दूँगा कि आदमी मर रहा था। और यह आदमी प्रेम पर व्‍याख्‍यान देने चला गया था। देख आगे मत बढ़।
      इससे पुरोहित को थोड़ा डर लगा। क्‍योंकि अगर वह आदमी जिंदा रह गया तो गांव में खबर कर दे तो लोग कहेंगे कि प्रेम का व्‍याख्‍यान बड़ा झूठा है। आपने इस आदमी की फिक्र न की, जो मरता था। तो मजबूरी में उसे नीचे उतर कर उसके पास जाना पडा। वहां जाकर उसका चेहरा देखा तो बहुत घबराया। चेहरा तो पहचाना हुआ सा मालूम पड़ता है। उसने कहा, ऐसा मालूम होता है मैंने तुम्‍हें कहीं देखा है? और उस मरणासन्‍न आदमी ने कहां,जरूर देखा होगा। मैं शैतान हूं और पादरियों से अपना पुराना नाता है। तुमने नहीं देखा होगा तो किसने मुझे देखा होगा।
      तब उसे ख्‍याल आया कि वह तो शैतान है, चर्च में उसकी तस्‍वीर लटकी हे। उसने अपने हाथ अलग कर लिये और कहा कि मर जा। शैतान को तो हम चाहते है कि वह मर ही जाये। अच्‍छा हुआ कि तू मर जा, मैं तुझे बचाने का क्‍यों उपाय करूं। मैंने तेरा खून भी छू लिया, यह भी पाप हुआ। मैं जाता हूं।
      वह शैतान जोर से हंसा, उसने कहा याद रखना जिस दिन में मर जाऊँगा,उस दिन तुम्‍हारा धंधा भी मर जायेगा। मेरे बिना तुम जिंदा भी नहीं रह सकते हो। मैं हूं, इसलिए तुम जिंदा हो। मैं तुम्‍हारे धंधे का आधार हूं। मुझे बचाने की कोशिश करों, नहीं तो जिस दिन शैतान मर जायगा, उसी दिन पुरोहित पंड़े, पुजारी सब मर जायेगे; क्‍योंकि दुनिया अच्‍छी हो जायेगी। पंडे, पुजारी, पुरोहित,की कोई जरूरत नही रह जायेगी।
      पुरोहित ने सोचा और घबरा गया। बात तो एक दम सही है। बात तो बहुत बुनियादी कह रहा है। ये बात मेरी समझ में क्‍यों नहीं आई। उसने उसे तत्‍काल कंधे पर उठाया, और कहां प्‍यारे शैतान तुम घबराओ मत, मैं तुम्‍हें अस्‍पताल में ले चलता हूं वहां तुम्हारी इलाज कराऊंगा। तुम देखना जरूर ठीक हो जाओगे। लेकिन देखो मर मत जाना। तुम बिलकुल ठीक कहते हो। तुम मर गये तो हम बिलकुल ही बेकार हो जायेगे।
      हमें ख्‍याल भी नहीं आ सकता हे कि पुरोहित के धंधे के पीछे शैतान है। हमें यह भी ख्‍याल नहीं आ सकता कि शैतान के धंधे के पीछे पुरोहित हे। कि जो शैतान का धंधा चल रहा है.....सेक्‍स का शोषण चल रहा है। सारी दुनिया में....हर चीज के पीछे सेक्‍स का शोषण चल रहा है। हमें ख्‍याल भी नहीं आ सकता की इसके पीछे पुरोहित का हाथ हो सकता है। पुरोहित ने जितनी निंदा की है। सेक्‍स उतना आकर्षक हो गया है। फिर उसने जितने दमन के लिए कहां है, आदमी उतना भोग में गिर गया है। पुरोहित ने जितना इंकार किया हे कि सेक्‍स के संबंध में सोचना ही मत, सेक्‍स उतनी ही अंजान पहेली हो गयी है। और हम उसके संबंध में कुछ भी करने मे असमर्थ है।
      नहीं। ज्ञान चाहिए। ज्ञान शक्‍ति है। और सेक्‍स का ज्ञान बड़ी शक्‍ति बन सकता है। अज्ञान में जीना हितकर नहीं है। और सेक्‍स के अज्ञान में जीना तो बिलकुल हितकर नहीं है।
      यह भी हो सकता है, कि हम न जायें चाँद पर। कोई जरूरत नहीं है चाँद पर जान पर की। चाँद को जान लेने से कोई मनुष्‍य जाति का बहुत हित नहीं हो सकता। यह भी जरूरी नहीं है कि हम पैसिफिक महासागर की गहराइयों में उतरें पाँच मील, जहां की सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती। उसको जान लेने से भी मनुष्‍य जाति का कोई बहुत परम मंगल हो जाने वाला नहीं है। यह भी जरूरी नहीं है कि हम एटम को तोड़े ओर पहचाने।
      लेकिन एक बात बिलकुल जरूरी हे, सबसे जरूरी है, अल्‍टीमेट कन्‍सर्न की है। और वह यह है कि मनुष्‍य के सेक्‍स को ठीक से जान लें और समझ लें। ताकि नये मनुष्‍य को जन्‍म देने में सफल हो सकें।
      ये थोड़ी से बातें तीन दिन में मैंने आपसे कहीं। कल आपके प्रश्‍न के उत्‍तर दूँगा। और चूंकि कल का दिन खाली छूट गया। कुछ मित्र आये और देखकर लौट गये तो मेरे ऊपर उनका ऋण हो गया है तो मैं कल दो घंटे उत्‍तर दे दूँगा, ताकि आपको कोई अड़चन और तकलीफ न हो। अपने प्रश्‍न आप लिखकर दे देंगे ईमानदारी से क्‍योंकि यह मामला ऐसा नहीं है कि आप परमात्‍मा, आत्‍मा के संबंध में जिस तरह की बातें पूछते है, वह यहां पूछे। यह मामला जिन्‍दगी का है और सीधे और सच्‍चे अगर आपके प्रश्‍न पूछे तो हम इन विषयों की और गहराई में भी उतरने में समर्थ हो सकते है।
      मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना, उसके लिए अनुगृहित हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्‍मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्‍वीकार करें।
( क्रमश: अगले अंक में ..................देखें)

ओशो
संभोग से समाधि की ओर,
प्रवचन—4
गोवा लिया टैंक, बम्‍बई,
1 अक्‍टूबर—1968,