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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

तालाब--कहानी

ब्‍द को सुनने के लिए कान, पीड़ा को महसूस करने के लिए ह्रदय का स्पंदन, सौंदर्य को देखने के लिए आँखें चाहिए । प्रत्येक बुद्ध पुरुष बार-बार यही दोहराता है ’’ कान है तो सुन लो,  आँखें हैं तो देख लो ।जब मैं छोटा था तब यहीं सोचता था,  क्या ये सब बुद्ध पुरूष किन्‍हीं अंधे-बहरे लोगों के सामने खड़े हो कर बोल रहे थे।‘’ नहीं पर हमारे पास आंखें हो कर भी नहीं देख पाती कान हो कर भी हम बहरे है। हम इतने संवेदन-शुन्य हो गये है। हम विचारों की पर्त के नीचे इतना दब गये है, की हम एक जीवित लाश बन कर जी रहे है। हम पर किसी बात का किस भी विचार का कोई असर नहीं होता है। हमारा जीवन एक गहरी तंद्रा है। प्रकृति की इस लय से हम छिन्‍न भिन्‍न हो गये। प्रकृति की अपनी एक लय है,  एक समस्वरता है, उसमें पेड़, पौधे, जल, थल, चाँद, तारे, क्षितिज उसी लयबद्घता का एक अंग है,  फिर क्या मनुष्य ने प्रकृति  की उस लयवदिता से अपने को अलग-थलग कर लिया है। उसके जीने के अंदाज से तो यही लगता है। चारो ओर अराजकता हंसा तनाव, मानों वह जी नहीं रहा एक जीवन को ढो रहा है। उसका जीवन छिन्‍न-भिन्‍न हो गया है उसकी बहती जीवन सरिता में कही अवरोध पैदा हो गया है। आज उसकी जीवन नदिया रूखी-सुखी निरस और बेजान हो गई। उसमें कोई आनंद उत्‍सव कहीं भी दिखाई नहीं देता। आज वो उस सब  से टुट कर अलग थलग  हो गया है। प्रकृति से अपने को विच्छिन्न कर उसने आधुनिक उपकरणों को अपने जीवन में इस प्रकार रचा-बसा लिया है कि वो खुद हाड़ मास की एक मशीन बन कर रह गया है। वही शायद उसके भाव और संवेदनशीलता को निगल गया है। शायद समय ने इस प्रश्‍न को और अति प्रश्‍न बना दिया हैं।

       मुझे सुबह जल्दी उठने की आदत सी पड गई थी,  सुबह की ताज़ा हवा, कैसे नींद में सोई प्रकृति में और अधिक मादकता भर जाती है। उसका सोया सौंदर्य आपके सोये शरीर में एक नई ताजगी भर ले आता है।   नींद में अल साई सी प्रकृति, ऊँघती सी करवट ले कर  वातावरण में निभ्रर्म शांति फैली रही थी मंद्र हवा में पत्ते का हिलना, आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो वो पत्ता हवा को कह रहा हो अभी थोड़ा और सौ लेने दो। मैं अभी उठना नहीं चाहता,  सुबह के इस वातावरण में पेड़-पौधों के साँस लेने की प्रक्रिया का बदलाव आस पास के माहौल में कैसा सुगबुगाहट सी ला देता है।  मानो, कोई माँ की दूध  भरी छातियों के दबाव में बच्चे के मुँह में ज़्यादा दूध भर गया है और वो लम्बी-लम्बी उसास भर सुबकीयाँ ले कर गोते खा रहा है। आपको सुबह पेड़-पौधों के पास से गुजरते हुए आक्सीजन के अतिशय से कुछ ऐसा ही  महसूस होगा।  किसी पेड़ की टहनी आपको जरा छू भर गई नहीं की आप कैसे अन्दर तक सिहर जायेंगे,  जैसे वो आपको जान‍ती है और छू लेने से एक नव यौवना सी ईठला रही है। भोर की जगती हुई प्रकृति आपके शारीर के रोंए-रोंए मैं कैसे जागरण का संचार भर देती है। उस सुबह के सौन्दर्य और उस वातावरण को जिसने नहीं देखा वो जीवन के कुछ अद्भुत क्षणों से जरूर वंचित रह गया।

       आज गांव में जहां पर पार्क है, वहां पर पहले कभी तालाब हुआ करता था। उसी के किनारे पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष था । आज वहां पार्क बनने से वह पार्क की शोभा बन गया है। उसके चारों तरफ़ पक्का चबूतरा बनाया दिया गया है। जिससे उसे एक नया जीवन दान मिल गया है।  तालाब में मिट्टी भर कर उस पर मुलायम हरी घास उगा दी गई है।  बैठने के लिए बैंच, सुन्दर फूलों के पेड़-पौधे, चारों तरफ़ अमल ताश,  सहमल, नीम और बोगी बिल्ला की झाड़ियाँ,  उगा कर उसका सौन्‍दर्य करण कर दिया गया है। जो गांव की शोभा ही नहीं बढ़ाती थी। साथ-साथ गाँव के इस दम घोटू वातावरण के नाम पर किये विकास में जीवन देने का कार्य कर रहा था। यही एक ऐसी जगह थी जो हरियाली के साथ-साथ  एक खुले पन का अहसास दे रही है। वैसे खत्‍म होते गांव और उसके तालाब हमारी रक्‍त वहिनियों की तरह से जीवन  दाई थे। पर आज न वो तालाब न वो गांव रहे, धीरे-धीरे सब खत्‍म होता जा रहा है। गांव के विकास ने नाम पर वो सब दफन कर दिये गये है। पक्‍की सड़कें पक्के मकान जमीन में पानी का सतर धीरे-धीरे घट रहा है। पर शायद आदमी अपने विकास मैं इतनी  अंधा हो गया है उसके बुरे और खतरनाक होते परिणाम के बारे में जान कर अनभिज्ञ बन हुआ है। मानों बारूद के ढेर पर महल बना रहा हे।

       मैं फेफड़ों से अशुद्ध हवा को नाक के द्वारा जोर-जोर बहार फेंकता था। ये प्रक्रिया आठ-दस मिनट चलती उसके बाद में पार्क के तीन-चार चक्कर लगाता था। शुद्ध हवा शारीर के रोम-रोम से प्रवेश कर उसे अघिक प्राण वान बना जाती थी। जिससे चित थोड़ा सजग हो जाता था। जो ध्‍यान में बैठने में सहयोग देता था। पतंजलि‍ का आलोम-विलोम तो,  आज के तनाव पूर्ण जीवन की गति मैं,  बैल गाड़ी जैसा हो गया है। मैं स्वास को थोड़ा धौकनी की तरह से तेज और अराजक निकलता था। जिससे ज्यादा से ज्यादा कार्बन डाई शरीर से निकल कर जीवन दायिनी आक्सीजन शरीर के रोया रेशे में प्रवेश कर जाए। उसके बाद बरगद के चबूतरे पर एक दरी बिछा कर,  झूर-पटा होने तक ध्यान करता था। गाँव के एक बुर्जग जिन्हें हम सब महाशय जीकह कर पुकारते थे, जब उन्होने मुझे ध्यान करते देखा तो प्रसन्नता के साथ-साथ एक नेक सलाह भी दे डाली। महाशय जी का जरा सा परिचय दे दूँ,  दयानंद जी के पक्के भगत थे,  ता उम्र शादी ना करने का व्रत,  जिसे वो आज तक निभा रहे हैं। अँग्रेज़ों के जमाने से ही दिल्ली पुलिस के नौकर थे,  अभी कुछ दिन पहले ही रिटायर्ड हुए हैं। गांव के लोग उन्‍हें प्रेम और श्रद्धा और सम्‍मान से देखते थे।

            उन्‍होंने कहां बेटा ध्यान में बैठने से पहले एक सफ़ेद पतली चादर ओढ़ कर बैठा करो,  तुम एक पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान करते हो ये बहुत अच्छा करते हो। मैं तो पहाड़ी पर एक खुली जगह पर बैठ कर ध्यान करता था। एक दिन चील के मन में क्या आई, पन्जों से मेरे सर पर हमला कर दिया,  सर में पन्जों गढ़ गए और ख़ून बहने लगा , उस घटना के बाद से मैं भी एक पेड़ के नीचे बैठ कर और चादर ओढ़ कर ही ध्यान करने लगा हूँ।’’

            ये उनकी नेक सलाह मैने उनकी मान ली,  पतली सफ़ेद चादर ओढ़ कर जिस दिन मैं ध्‍यान करने के लिए बैठा, उस चादर से एक झीना सा मन्दिर का गुम्बद मेरे चारों तरफ़ निर्मित हो गया। ध्यान भी उस दिन बहुत गहरा गया,  अचेतन की गहराई में बोलने की फुसफुसाहट ने चारों तरफ़ से मुझे घेर लिया,  एक अनछूती सी ध्वनि तरंग मुझे बहुत गहरे मैं सुनाई दे रही थी।  जहाँ पर विचार भी दम तोड़ ते हुए पीछे छूट गए थे। वो ध्‍वनि बड़ी अजी भी उस में कोई शब्‍द नहीं थे।  जैसे हम किसी पक्षी की आवाज को सुन तो ले पर मस्‍तिष्‍क को कुछ समझ ने आय, पर  प्राण कहीं उस ध्‍वनि को जान जाए की क्‍या कहा जा रहा है? पर हम शब्‍दों में उसे ढाल न पाएँ। उस दिन ध्यान के बाद शरीर मैं ऐसी मधुरता भर गई,  जैसे किसी नवयौवना के शरीर को जब पहली बार उसके प्रेमी ने उसे छुआ है। एक मधुर थकान,  एक अलसाया पन और इसके बीच बहती एक आनन्द और चुलबुले पन की धारा। फिर ये क्रम कई दिन लगातार चला,  जैसे बचपन मैं गर्म बिस्तरों के अंदर हम अल साए से कुनमुनाते हुए,  नींद भरी उन आँखों को मलते,  ऊँघते हुए, पंच तंत्र की कहानी सुनते बच्चों को केवल ध्वनि तो सुनाई देती,  परन्तु मन उस ध्वनि को शब्दों मैं परिवर्तित नहीं कर पा रहा होता। फिर भी वो हां-हुं का हुंकारा भरते रहते है। जिससे कहानी रूक न जाए। गहरा अचेतन आज भी शब्द नहीं जानता,  आपके सपनों मैं भी कोई भाषा नहीं होती,  और न होते है रंग,  कोई बिरला ही रंग और शब्दों से लिप्त स्वप्न देख पाता है।

            तालाब-- ’’सुनते हो तुम्हारे संग और सौंदर्य को महसूस करने के लिए कोई तुम्हारी गोद मैं आकर बैठा था।’’

            बरगद--’’हाँ देखता हूँ, सालों बाद कोई इतने करीब आया हैं।’’

            तालाब--’’मैं तो जब से मिटटी,  रोड़े, पत्थरों के नीचे दब गया हूँ,  एक अन्त हीन घुटन,  छटपटाहट,  बेचैनी सी महसूस करता हूँ,  न जाने कौन सी आस जो सालों पहले मरे हुए को मरने भी नहीं देती।’’

         बरगद--’’ऐसा नहीं कहते तुम तो धरती की गोद में कितने आराम से सो रहे हो,  मुझे देखो,  न जमीन के नीचे पानी,  ऊपर से दम घोटू ये चबूतरा,  मेरी जड़ को दीमक ने खोखला कर दिया हैं। अब साँस भी कितनी मुश्किल से ले पाता हूँ,  पत्ते भी गाडियों के धुँऐ के कारण कैसे लकवा ग्रस्त से हो गए हैं। इन पर ज़मीं धुँऐ की परत, पहले तो बरसात आकर कैसे मुझे नहला जाती थी। अब मुझे बारह महीने अन्धा सा बना दिया हे। २००वर्ष की आयु में ही कैसा बूढ़ा जर्जर सा लगता हूँ, मेरे  दादा परदादा कहा करते थे, ६००वर्ष मैं तो कोई बरगद जा कर युवा होता था। अब तो भगवान से केवल यहीं प्रार्थना करता हूँ, उठा ले इस नर्क से ।‘

            तालाब—‘’मेरे ऊपर फैली‍‍ नर्म मुलायम घास,  उस पर दौड़ते-भागते ये बच्चे,  बेंच पर बैठी बूढ़ों की महफिल,  औरतों का छोटे बच्चों की उँगली पकड़ उनको चलना सिखाना,  कुछ क्षणों के लिए क्या वही रौनक-मेला फिर नहीं लौट आता हैं, सालों पुराना सा,  पर वैसी मदहोशी उल्‍लास अब आज के मनुष्‍यों में कहीं दिखाई नहीं देता है। ये सब मुर्दा चेहरे, लीपते पुतते जरूर है पर वैसी ताजगी नहीं आंखें देखो इनकी कैसे पथ राई सी है। प्राण तो इनमें झाँकता ही नहीं। वो सब देख कर ये सब अच्छा नहीं लगता।’’

            बरगद--’’अच्छा तो बहुत लगता है, बात आपकी कितनी सही है। परन्तु अब पहले जैसी बात कहाँ रही। मुश्किल से कोई बच्चा पतंग के बहाने ही मेरे नजदीक आता है, पत्थर मारता हैं,  पहले कैसे बंदरों की तरह लदते रहते थे, पक्षियों से भी ज़्यादा गूलर तोड़-तोड़ कर कैसे बिखेरते थे। बरसात में भी घर नहीं जाते, जब तुम किनारे तक लबालब भर जाते,  कैसे काँपते-ठिठुरते नीले होठ लिए, मेरी टहनी यों पर चढ़ कर तुम्हारे गर्म-गर्म पानी में छ-पाक से कूद जाते तब तुम कैसा  छिटक कर बखर जाते थे। तब तुम्‍हें कैसा लगता था, पानी में रुनकझुनक बूँदों की बरसात,  और उपर से मेंढकों का गुटरगूँ, मेंढ़क कैसे अपने गलूरे फूलाफला कर टरटर..टरटर...की अवि छिन्न बहती ताने, मानो बादलों को धन्यवाद दे, खुशी में मेध मल्हार गाने  को  मजबूर कर रही हो।‘’

            ध्यान के बाद जब तुम धीरे से आँखें खोल कर देखते हो, तो वहीं पुराने दृश्य अभूतपूर्व सौन्दर्य लिए हुए महसूस होगें, ध्यान का ताज़ा-ताज़ा होश आँखों को कोरी और निर्मल बना देता हैं। पक्षियों की चह-चहाट,  आती-जाती गाडियों का शोर,  कौवों की कांव..कांव...धीरे-धीरे मेरे कानों को सुनाई देने लगी,  तब मुझे अपने होने का भान हुआ। फिर सारा दिन यही विचार मेरे मस्तिष्क में इधर से उधर लुढ़कते रहे, कि मैने वो क्‍या सुना था। क्‍या रहस्‍य था उस भाषा हीन भाषा को। हफ्तों बाद भी उन्‍हें एक सूत्र में पिरों नहीं पाया था। छोटे-छोटे टुकडों में एक पानी के बुलबुले  कि तरह वो उठते ओ खत्‍म होते है। पर उनमें को चित्र या छाया अपना आकार  निर्मित नहीं कर पाई.......                       

            दिल्ली में बढ़ता जनसख्या का दबाव और इसी के कारण इनके बढ़ते विस्तार ने दिल्‍ली के इन गाँवों को कंकरीट का जंगल बना दिया हैं। ठुसती आबादी,  चिड़िया घर के दड़बों की तरह बने कमरे,  सड़क पर जहाँ देखो तहाँ नर मुंड ही नर मुंड,  बीच मैं रेंगाती गाड़ियाँ,  मस्त जुगाली करती गाय और उनके बछड़े,  शोर मचाते सब्ज़ी खोंचों वालों के हाट,  बीच-बीच मैं घण्टे-घड़ियाल बजाते साई और प्रचीन शिव-हनुमान मन्दिर, आपके  कान के पीछे पो-पो, चों-चों करते साइकिल-स्कूटर वाले,  अरे भले मानस देखते नहीं कंधे से कंधे छीलते जा रहे हैं,  और तुम्हें अपने टी..ई..टी..ई की पड़ी। सब्र का घूँट तो कोई पीने को तैयार ही नहीं हैं, सब को जल्दी पड़ी हैं, जैसे इनको जरा भी देरी हुई नहीं तो लाखों काम बिगड़ जायेंगे। सब जानते हैं घर पर जाकर टी०वी० के सामने बड़ा सा मुँह खोल कर झमाईयाँ लेंगे,  या बिना सर पेर के चंडूख़ाना चटपटे समाचार, या फूहड़ धारावाहिक जो गोलगोल कुएँ के मेंडक की तरह, सालों से चल रहे, जिनकी चाल के सामने चींटियों को भी शर्मा आ जाए।

            आज जहाँ पार्क बना है, ३०साल पहले तक एक तालाब हुआ करता था,  उसे प्यार से ‘’राम तला’’ कह कर पुकारते थे। क्योंकि वह मनुष्य, पशु, पक्षियों के लिए,  उत्सव,  मेले,  दुख-दर्द, सभी के जीवन का ए‍क अभिन्न अंग था। कैसे थे वो लोग जिन्हे आज हम अनपढ़ गंवार समझते हैं। जो एक तालाब का नामकरण भी ’’राम तलासरीखा रख देते थे,  कैसे प्रेम छलक-छलक बहता रहा होगा उनके ह्रदय से, हमारे सूखे, नीरस और बेजान ह्रदय इसे समझने मैं भी असमर्थ हैं। डी०डी०ए० ने आधुनिकरण के नाम पर उसे मिटटी, पत्थरों से भर कर उसके उपर एक पार्क का निर्माण कर दिया है। शादी,  जन्म दिन,  नेताओं के भाषण,  धर्मी उत्सव,  आधुनिक राम लीला की बड़ी स्टेज के लिए इन्‍हें जगह की कमी खलती थी। पुराने उत्सव मैले, आज के आधुनिकता की दौड़ मैं गँवारूपन प्रतीत होने लगे थे। अब शायद ये तालाब गाँव के लिए बोझ बन गया था, जो सालों पहले कभी जीवन दायिनी हुआ करता था।  सो अब बेचारे उस तालाब को शहीद कर दिया गया और उसके उपर एक कब्र बना दी पार्क के नाम की। ‘’दसघरा उद्यान’’ का बोर्ड लगा दिया।  इसकी किसी को कोई फिक्र नहीं थी कि हम जो कर रहे इसका आने वाले समय पर क्‍या कु प्रभाव होगा आज हम इस की बात पर विचार नहीं करते। मानों हम संत हो गए है केवल आज और अभी जीना है। कल की प्रवाह कौन करे।

            एक तो तालाब इतना बड़ा, कोई छोटों मोटा समुद्र ही समझो। या शायद में छोटा था इस लिए मुझे वो अथाह लगता था। क्‍योंकि जो बजरी की खाने उस जमाने मुझे बहुत गहरी लगती थी। अब जाकर देखता हूं तो क्‍या समय ने उन्‍हें आँट दिया है। जो पानी से इतनी भर जाती थी उन की तलहटी से मिट्टी निकलना कोई-कोई ही लड़का कर पाता था।  खेर तालाब गांव की जनसख्‍या को देखे तो भी बहुत बड़ा था। उसे पार करने को गौरव गांव के किसी विशेष को ही नाम आता है। वे किंवदंती ही बन गया है। हमारे सामने तो गाव का कोई जानवर भी उसे पार करने का साहस नहीं कर पता था। उसके दो तरफ पहाड़ियां उसे दर्शनीय बना देती थी। चारों तरफ का बरसाती पानी बह कर उसे लबालब भरे रहता था। उस चारों और फैले पेड़-पौधे उसके उपर गाते पक्षियों के मधुर गान, जल का ये अनन्त विस्तार से उठी उँची -उँची लहरे, उसके स्‍वच्‍छ जल मैं झाँकती पेड़-पौधों की परछाई,  एक किनारे से उठी लहर दूर जब दूसरे किनारे की चट्टानों से जब टकरा कर छिटकती, तो कैसे आवाज़ करती, छ...प्पा....क ... और अगर आप पास खड़े है तो आप हो गए सराबोर। जहाँ पानी है,  वहाँ जीवन तो होगा ही। पीपल, बरगद, नीम, रोझ और किंकरों का तो पूरा जंगल ही था।  और उसके दो और बड़ी-बड़ी पहाड़ी चट्टानें जिसके कारण वह और भी भयावह हो जाता था। उस के किनारे पर  हमारा भी एक नीम का वृक्ष था,  उसे सब लोग डूँड़ा नीम कह कर पुकारते थे। यानि उसकी बड़ी-बड़ी साखा ये बीच में टुट कर ठूँठ बन गई थी। आप सोचे होगें हमारा नीम, हां गाँव का प्रत्येक व्यक्ति राम तला के पास एक पेड़ लगा कर अपने को धन्य समझता था। ये डूँड़ा नीम हमारे परदादा ने लगाया था। मैने भी पिता जी से हठ करके एक सहमल का पेड़ लगाया,  उसके चारों तरफ़ काँटों की बाड़ लगाई, ताकी जानवर आदि उसे खा न सके,  मैं रोजाना उसमें पानी डालने जाता था। कितना सुखद लगता,  जब उसमें कोई कोमल पत्ता निकलता,  फिर शाखा-प्रशाखा, टहनी याँ जैसे-जैसे वो बड़ा होता, मेरे अन्दर भी कुछ बढ़ता सा प्रतीत होता था। नन्हा सा, सुकोमल पौधा देखते ही देखते एक दिन जब वो वृक्ष हो गया, जब उसमें पहली बार दो चार फूल खीलें तो मेरे मन कैसे रचयिता होने का भाव जगा था। सहमल कैसे चारों तरफ़ लम्बे-लम्बे घाघरे की तरह टहनी याँ घुमाता हुआ बढ़ता है, जैसे अभी नृत्य करने वाला है। बसंत में पत्ते विहीन फूलों से लदी टहनी याँ आपकी नजरों को ना चाहते हुए भी बरबस अपनी और खींच लेगी। आज तालाब विहीन वो उदास दिखता है, न फूलों में वो चमक है, न पत्तों में इठलाना पन,  उदास, मायूस ऐसे खड़का दिखता है, जैसे एक रोते बच्चे का काजल फैल कर सारे मुहँ को रंग गया हो, अब वो दीवार से मुहँ सटाए उदास रूठा खड़े है, और माँ उसे हँसाने के लिए आईने का सहारा ले रही हो। मुझे भी ऐसा लगता है, काश मैं तालाब में उसका गंदा कुरूप चेहरा उसे दिखा पाता,  तो जरूर वो नन्हे बच्चे की तरह किलकारी मार कर हँस पड़ता, मैं लाचार बेबस उसे देखता हूँ, कहाँ से लाऊं उसके लिए ''रामतला''। शायद वो मेरी बेबसी समझ गया, और अब उसने इंतजार करना भी छोड़ दिया।             

            जेष्ठ की भीषण तपिश से पहाड़-मैदान जब झुलस रहे होते थे, तब भी राम तला हजारों पशु, पक्षियों और मनुष्यों के शारीर की जलन को कम करता था। श्याम होते तक आग उगलती हवा भी तालाब के सम्पर्क मैं आते ही दुर तक कैसी शीतलता भर देती थी। जेष्ठ में दादा बूढ़े की दूज आते तक, राम तला के चेहरे पर बुर्ज गी की बड़ी-बड़ी तरेड़ फैल जाती थी। तब पूरा गाँव उमड़ कर कैसे उसमें भरी कीचड़ के ढेलों को निकाल-निकाल कर उसके किनारे मज़बूत करने के लिए पाल बाँधते थे। सूखे ढेलों के नीचे जब कोई मेढक या कछुआ दिखाई दे जाता तो नई नवेली दुल्हन या बच्चा कैसे अचानक किलकारी मारता,  तब शान्त और थकान भरे वातावरण में कैसे हँसी की फुहार फैल  जाती थी। दिन भर गुड़ और मालपुवो की दावत चलती । साल भर की धूल धामस,  कीचड़ से मुक्ति पा राम तला आने वाली बरसात के लिए फिर जवान हो जाता था। आज भी लकीर पिटी जाती है परम्परा की न उसकी ज़रूरत है न उसमें कोई उत्सव है। बूढ़े दोज की मिट्टी निकालने  की परम्‍परा देहात के हजारों गांव में मनाई जाती है। क्‍यों ओर किसी लिए ये सब बातें आज पढ़ा लिखा तबक़ा कुछ जानना नहीं चाहता। आंखों पर पट्टी बांधे चल रहा भेड़ चाल....

            सावन की बौछारें पूरी प्रकृति के अन्दर शीतलता के साथ नए जीवन का संचार भी भर देती हैं। महरून कोमल तीज घास की पुल्लिंगों पर ही नहीं रास्ते पर भी आपको पेर सम्हाल कर रखने को मजबूर कर देगी। तीज की कोमल त्वचा को जरा सा छुआ नहीं की कैसे नई नवेली दुल्हन की तरह सिकुड़ कर  बैठ जाएगी। कुंवारी लकडियां ही नहीं बढ़ी बुजुर्ग औरतें भी अल्हड़-नटखट हो रात भर झूला झूलती रहती थी। शायद रात उनके बूढ़ेपन को अंधेरे में देख नहीं पाती होगी, उस छद्म का  उन्होने भी इसका फायदा उठा कर अपने बचपन को बाहर निकाल लिया होगा। झूला-झूलते हुए उनके कंठ से निकलते मधुर गीत सर्व-सब‍ में  उल्लास भर देते थे। गीतों की मधुर आवाज़ पक्षियों में भोर होने का भ्रम पैदा कर देता थी, भ्रमित हो वो भी उनके कंठों से कंठ मिला चहकने लगते थे। तालाब शान्त हो, गीतों की मधुर लोरी में, सोता कैसे देव तुल्य प्रतीत होता था।

            दशहरे-दीपावली के दिनों में उसके आस पास जलते दीपक ऐसे प्रतीत होते मानो उसने सोने का ताज पहन लिया हो। घर-घर बनी मिट्टी गोबर की साँझी,  दशहरे वाले दिन खड़िया, गेरू से पुतते मिट्टी के गोल-गोल सितारे, तालाब के सीने पर जब तैराते हुए फ़ैलते तब  अनायास उसके चेहरे पर फैली हँसी देख कर समझ जायेंगे, कि वो गुदगुदी के कारण नन्हे बच्चे की तरह किलकारी मार कर हँस रहा हैं। रात को गीत गाती कुंवारी लड़कियों के सर पर रखे मटके के छेद से निकलता दीपक का प्रकाश कैसा भला प्रतीत होता था। दुर से देखने पर ऐसा लगता कोई आसमान से हजारों तारों को तोड़ कर लिए चला आ रहा हैं। किनारों पर मेंढक और झींगुरों की ताने मानो बेड बाजा कर उनका स्वागत का भी काम कर रहे थे। पास खड़े गाँव के जवान लड़के किनारे पर पत्थरों और कंकरों का ढेर लिए बैठे रहते । लड़के उन मटकों को ले जाकर तालाब मैं बहुत गहरे तक छोड़ कर आते थे। क्‍योंकि उन्‍हें फोडना है, फिर किनारे पर ही फोड़नें में कोर्इ बहादुरी नहीं है। सो उन्‍हें गहरे से गहरे पानी में जाने दिया जाता था। पानी पर तैरते मटकों से निकलता प्रकाश, टिमटिमाते तारों के अक्ष की तरह प्रतीत होता था। उठती हुई लहरे उसको करोड़ो टुकडों मैं तोड़ कर बिखेर देती थी। लगता जैसे अंनत बाजरे किसी विशाल नदी पर तैर रहे हो। एक विशालता, एक गौरव, गरिमा लिए तालाब कितना गर्व से फूला नहीं समाता था।  मटके जब तालाब के बीचो-बीच पहुँच जाते तब लड़के अपनी बहादुरी दिखाते हुए उन्हे पत्थर मार कर तोड़ने लग जाते थे। लकडियां बेबस लाचार सी केवल दर्शक बनी देखती रहती थी। तर्क ये की मटका दूसरे किनारे पहुँच गया तो गाँव कि लड़की किसी के साथ भाग जाएगी, कई-कई लकडियां मटका फूटता देख रोने लग जाती थी। अब ये कोन जाने मटके का दुख या न भाग पाने का गम। शायद इस बे-बुझते प्रश्‍न का उत्तर न तब तालाब के पास तब था और न शायद आज है।

            कार्तिक की ठिठुरती रातों में जब गाँव की कुंवारी लकडियां भोर चार बजे रात को उठ कर राम तला में सवा महीने स्नान करती,  तब उनके गीतों में ठिठुरती ठंड से काँपते होठों प्रकृति का कैसा मधुर राग फैल जाता था। उन मधुर ताने में सोये हुए पेड़ पौधे भी अपनी नींद तोड़ कर अपने अलसाया पन को छोड़ कर झूम उठते थे। तालाब में उठती लहरे कैसे उन क्वाँरे गीतों को मधुर ताल देती थी।  पत्तों का कम्पन साफ़ दिखाई देता था। तालाब भी मानो उस ठंडे पन मैं सुबकीयाँ ले कर आनंद विभोर हो रहा है। और आखिर आती है शरत पूर्णिमा की वो रात जब उस सवा महीने स्‍नान का फल उन कुंवारी लड़कियों को गंगा स्‍नान के रूप में मौका मिलता है। सारे गांव वाले अपनी-अपनी बैल गाडियों के ऊपर उलटी चारपाइयों को बांध कर  उन्हे हिंडोलों की तरह दुल्हन बनाते है। बेलों के गले में चौरासी बाध कर उसकी चाल को और मद मस्‍त कर दिया जाता था। सब गांव की बहु-बेटियाँ रंग बिरंगे कपड़े पहन कर अपनी अपनी-अपनी बेल गाडियों मे बैठ कर गीत गाती हुई चलती है। बेल गड़िया का काफिला उस पूर्णिमा के चमकते चाँद की रोशनी में रेंगता हुआ कैसा भला लगता था। उसे देख तालाब मन ही मन उदास हो जाता था। उस दिन तालाब के सुने पन का साथी केवल उसकी खामोश लहरे ही होती थी।  मानो चाँद की परछाई टुट-टुट कर तालाब के संग आंसू बहा रही हो। महीनों का संग साथ छोड़ गाँव की लकडियां उससे  दूर जा रही थी। तालाब सोचता था क्‍या गंगा का जल मुझे भी पवित्र है।, क्योंकि मैं थिर हूँ, और वो चलायमान?  क्‍या गति में ही जीवन है, या पवित्रता है। लेकिन उसकी उदासी ज्‍यादा देर नहीं टिकती जैसे ही सूर्य की किरणें उसपर फैलीपक्षियों ने अपने पंख खोल कर उसकी नाजुक टहनियों पर फुदकना शुरू कर दिया था।  अपनी चह-चहाट के साथ चहकना ओर गाना शुरू किया।  पीपल के पत्तों का मंद्र समीर में झूमना। आस पास में नया जीवन भर देता था। शांत तालाब में बरबंटीयों का छपाक से गिरना। तालाब को गुदगुदा जाता था। और वह  भूल जाता था अपने दुख को। और खो जाता था पक्षियों की अटखेलियों के पति बिम्ब में।

         होली का हुड़दंग हो, या बिखरता रंग गुलाल,  गाँव की प्रत्येक खुशी-गम में राम तला शामिल रहता था। होली के दिन गांव में पानी कम पड़ जाता, या रंग कम पड़ सकता था। पर रामतला का पानी और मिट्टी अपने अंदर आनंद और उत्‍सव का रंग और गुण गौरव उसे कभी कम नहीं होने देती थी। धीरे-धीर श्‍याम होते तक होली का हुड़दंग घर-गली से चल कर राम तला पर न आ जाये। होली अधूरी ही समझो।  

       या गाँव की बारात जब शादी करने के लिए जाती। घुड़चढी करके हुए इसी तालाब के किनारे,  डूंड़े नीम की छाव में सारी बारात इकट्ठी होती थी। गर्मी की जलती दोपहरी में सब कैसे अपने शारीर की जलन को शांत करने के लिए उस की शरण में आ चेन की स्‍वास लेते थे। अपने  माथे का पसीना पोंछ गहरी मीठी साँस लेते। और दूर सफर पर आगे चलने के लिए अपने को तरोताजा कर तैयारी करते थे। उस समय लड़के की माँ यही भरी पंचायत में सब के सामने दूल्हे को कैसे अपनी सुखी छातियों से दूध पिलाते थी। और दूल्‍हा  किसे शान और लाज से माँ का दूध पीने में गर्व महसूस करता था। और उस समय बेटे और मां का मुहँ शर्म के कारण लाल हो जाता था। तब भी यही रामतला दूल्हे को दूध का वास्‍ता देते का साक्षी बनता था। ओर विवाहा कर के लाने का संकल्प उसे याद दिलाता था।

       शादी के बाद नई नवेली दुल्हन इसी तालाब के किनारे,  नीम की डँड़ियों से आपसे में मार-मार कर पति-पत्नी, देवर ननद, जेठानी....कैसे प्यार से सौटका-सौटकी खेलते थे। तब यहीं तालाब उनके आमोद प्रमोद में अपने को शरीक हुआ पाता था।  और किस तरह से नई दुल्हन घूँघट की ओट से झाँकती हँसी ठिठोली करती हुई तालाब के किनारे चार लडडू उस के किनारे रख देती थी।  जैसे नए प्यार को रामतला का जल सिच सकता है, उसके संग-साथ अंकुरित और विकसित कर सकता है। उसमें प्रेम और विशवास  आशीर्वाद भर सकता है। उनकी जीवन रूपी बेल को सिंच कर पल्‍लवित कर सकता है। और उसी दुल्हन की गोद में जब किलकारी मारता एक नन्हाँ जीवन आ जाता। तब सवा महीने बाद कुआँ पूजन का साक्षी भी यही तालाब बनता था। आज इस तालाब और बरगद की उदासी ओर पीड़ा अब मेरी समझ में आ रही थी। उस  डूंड़े नीम की जड़ के पास से लोगों ने अतिशय मिटटी खोदनी शुरू कर दी थी। जिसके कारण उसकी जड़ें कमजोर हो गई थी। और जिस बात का डर था वहीं हुआ एक दिन भयंकर तूफ़ान में वो नीम धराशायी हो कर गिर गया जिस राम तला ने उसे पोशण दिया आज वह उसकी की गोद में चिर निद्रा में समा गया। उसके हरे कोमल पत्‍ते पानी में डूब गये। उन कौओं की कांव-कांव उस नीम की पीड़ा की एक मात्रा पूकार थी। जिन का घोसला पानी में बह गया। बाकी लोगो की जीवन कि लकीर पर इस घटना का कोई विशेष असर नहीं दिखाई। दिया। कोई खुश था चलो अच्छा हुआ रास्‍ते की अड़चन खत्‍म हुई। या कुछ सोच रहे थे। दो चार दिन दातुन के लिए मारा मारी नहीं करनी होगी। कौवों का घर उजड़ने के कारण कुछ कौवों के उत्पात से दुखी थे। पर वो लड़कियां जो इस पा पींग बढती थी वो आज यहां नहीं थी। अपनी-अपनी ससुराल में मगन। थी। समय के साथ आदमी की जीवन शेली भी बदल गई है। आज की आधुनिक पीढ़ा को ये सब गँवारी पन नहीं जँचता। धीरे-धीरे गांव की जरूरत ने नया रंग लिया और उस रामतला को भी मिटी से भर दिया। क्‍योंकि अब गांव को तालाब की जरूरत नहीं थी। एक पार्क की जरूरत थी। फिर रामतला के खत्म होने के साथ-साथ छोटे-मोटे पेड़ पौधे भी दम तोड़ गए थे। जैसे वो उसके वियोग में संथारा कर अपने प्राण त्याग गये हो। बरगद, पीपल, सहमल गिनती के ही साहसी बुर्ज ग बचे हैं।

            तालाब की मंद फूस-फूसा हट आज भी मानो कुछ कह रही थी ’’छ: सौ साल पहले जब ये गाँव बसा, तब मेरे सौन्दर्य  और स्वच्‍छ: निर्मल जल ने ही उन्हे आकर्षित कर यहाँ रुकने को मजबूर किया था। दुर जहाँ तक भी आँखें देख पाती वहाँ तक  जल ही जल का विस्‍तार था।  मानों जाते हुए  बादल भी शान्त-एकान्त जल में अपनी छवि देखने लिए कुछ क्षण रुकने को मजबूर हो जाता थे। हवा बार-बार धक्के मार कर उन्हे याद दिलाती, महाराज चलो आसन से डोलो बहुत लम्बा सफ़र तै करना है। कहां प्रशांत महा सागर है जहां हमें जाना है पर तुम हो की कहीं भी डेरा डाल कर रूक जाते हो। ऐसे तो पहुंच लिए हम अपनी मंजिल तक।...पर बादल है कि मेरे निर्मल जल में अपनी छवि देख कर जाने को तैयार ही नहीं होते थे। पर बेचारों को आखिर जाना ही पड़ता था। पर जाते-जाते अपनी निर्मल आँखों से आंसू की चंद बूँदे जरूरी गिरा जाता थे। किनारे-किनारे खड़े पेड़-पौधे तब बहुत जोर से हंस कर तालाब से कहते दादा तुम महान हो ये हमारी तो पुकार सुने ही नहीं। आपके ही मोहनी मंत्र का के जाल में ये फँसते है। अगर तुम नहीं होगें तो हमारी क्‍या गत होगी। कौन सुनेगा हमारी पुकार। तब तालाब उनकी परछाई को देखे कर कितनी निरापद हंसी हंसता हुआ सा प्रतीत होते थे।’’वो दिन कितने सुनहरे थे। आज जब याद करता हूं तो खो जाता हूं उन यादों में..मंत्र मुग्ध करता है तो समय, शायद तुम्‍हें भी यकीन नहीं हो।

            बरगद--’’ नहीं दादा ऐसी बात नहीं है। वो सब तो मैंने नहीं देखा पर मैने तो जब से होश सम्हाला था, चारों तरफ़ तुम्हारा ही विस्तार फैला पाया था। एक किनारे पर खड़ा हो जब मैं दूसरे किनारे की और देखता तो तुम्‍हारी विशालता से मुझे भय ही लगता था।‘’

            तालाब--’’तुम जब इतने छोटे थे, कैसे मेरी लहरों को आता देख थर-थर कांपने लग जाते थे। ये तो उस ऊँचे मिटटी के टीले की मेहरबानी ही समझो, जिसे मैं तोड़ नहीं पाया वर्ना तो .... ...। (ये कहते-कहते तालाब मानो उदास हो गया)   

            बरगद--’’हाँ दादा ये कैसा खेल हैं तुम्हीं से जीवन, तुम्हीं से विलय। याद है एक रात जब बहुत तेज़ तूफ़ान आया था, कैसे जड़ तक प्राण काँप गए थे। लहरे भी किनारों से टकरा कर कैसा भयंकर शोर मचा रही थी,  मानो दर्द से छटपटा कर करहा रही हो। उस भयंकर तूफ़ान ने मेरी भी एक बहुत बड़ी शाका को तोड़ दिया था, डूँड़ा नीम तो उस दिन गिर कर आपकी गोद मैं धराशायी हो गया, गिरे हुए के पत्तों पर कैसी निर्भ्रम शांति छाई थी मानों गिरा नहीं  सालों खड़े-खड़े थक कर सो गया है।  उसके गौरव और सम्मान में प्रत्येक गाँव वालों ने उसे आखरी बिदाई से उसे घेर लिया था। उनके चेहरों पर उदासी फैली थी, किसी अपने के खोन का पीड़ा थी। इतने बड़े शोक के सामने अपने एक अंग को खोने की पीड़ा का तो मुझे भान ही नहीं रहा था। महीनों तक मेरी टहनी को नाव बना कर बच्चे किलकारीयाँ मारते हुए उस पर चढ़ कर तैरते रहते इधर से उधर जाते थे।  तुम्हारे सीने पर कैसे वो टूटा हुआ टहना इधर से उधर तैरता फिरता रहता था। कभी बच्‍चें उसे उस पार ले जाया करते इस पार ले आते थे। मैं उनके इस करतबों को देख कर मन ही मन हँसता था,  मुझ जीवित के पास आने से तो कैसे डर के मारे मुँह पीला पड़ जाता था, और मुर्दा तने पर सवारी, हाय ये कैसी विडम्बना.....।'' (कहते-कहते बरगद ने एक गहरी साँस ली हो)

            तालाब--’’हाँ वो कितने स्वणिम और सुहाने दिन थे, अब ना वो दिन रहे न रहे वो बच्चे और न रहे वो खेल।’’

            बरगद और दफ़न तालाब अपनी यादों के ऊपर गिरी धूल मिटटी को झाड़ कर उन मीठी यादों में डूब जाना चाहते थे। हमने प्रकृति का कितना संग-साथ खो दिया है। आज बच्‍चें पेड़ पौधों को उन्‍हें  अपना संगी साथी  मानना तो दुर उनमें भी जीवन है। ये भी भूल गये है। देखो आज पेड़ पौधे जीवित सीमेंट-कंकरीट में जीवित दफ़न खड़े,  कैसे कण-कण मर रहे है। कैसे लाचार, बेबस, असहाय और उदास नज़र आते है। शायद ये दर्द, ये आहें आने वाले तूफ़ान की चेतावनी तो नहीं, न बुर्जग की कोई सुनता है और न प्रकृति के दर्द को कोई महसूस करने की कोशिश करता है। दोनो अनदेखे और त्याज्य अनादर की वस्तु बन कर रह गए है।



       फिर उसके बाद मैं सालों उस बरगद के नीचे बैठ कर ध्यान करता रहा, उसको छूता, उसे बाँहों में भरता, उसके कानों में हलके से फुसफुसा कर कुछ कहा अनकहा सा कहने की कोशिश करता,  कभी उसे पुरानी  बातों को याद दिलाने के लिए उकसाता। लेकिन वो ध्वनि, वो शब्द फिर न जाने कहाँ खो गए। दूर खड़े हो कर जब में उस विशाल बरगद को देखता, तो लगता मुझे इशारा कर अपने पास बुला रहा है। सर्दी की ठिठुरन, गर्मियों की तपिशकाले कजरा रे बादलों की गड़गड़ाहट, न रिमझिम बरसती बरखा उसे हँसा पाई। वो निर्जीव सा पथराई आँखों से ख़ाली शून्य में ताकता रहा। अपनी विशालता को अपने में समेटे, उसकी सूनी टहनीया, उदास पत्ते, हवा की छुअन उन्हे धीरे से हिलती तब उनमें खड़-खड़ाहट जरूर होती, परन्तु  उसकी वो खड़-खड़ाहट कुछ कहना चाह कर भी नहीं कह पाती थी। शायद ना वहाँ अब शब्दों की पहुँच थी,  न ही ध्वनि की.... बस एक नीरवता, एक सूनापन, एक सन्‍नाटा छाया रहता। वह मौन चारों तरफ फैली उस निशब्दता को और अधिक गहरा  कर रहा था। उसका आभा मंडल भी धीरे-धीरे  निस्‍तेज होता जा रहा था। उसके पत्‍ते दिखने में जीवित नहीं लग रहे थे। उसके फलों में भी अब वो ताजगी वो रस वो स्वाद नहीं रह गया था। शायद मुझे लगा वो मर रह है। तिल-तिल कर और में चाह कर भी उसकी मदद नहीं कर पा रहा हूं। ये कैसी विडम्बना और लाचारी है। जो केवल सिसक सकती है रो नहीं सकती।



           परंतु एक प्रश्न सदा प्रश्‍न ही बना रहा। वो उस दिन क्‍यों बोला। क्‍या मेरी चेतना का टुयुनिंग उस दिन उसकी समस्‍वरता से एक हो गई थी। या मेरा चित उस दिन उसी आदम युग में चला गया था अपने केंद्र के सफर पर जब हम निशब्‍द को भी शब्दों से अधिक समझ लेते हे। इसी अल हान से पूरे धर्म ग्रंथ उतरे है। एक मौन के केन्‍द्र पर शब्‍द। इस लिए धर्म ग्रंथ चाहे वो कुरान हो बाईबिल हो, उपनिषाद हो , पुराण हो। वह उतरे है किसी और लोक से। उन का कोई रचयिता नहीं है। पर इस पहली को में कभी समझ या सुलझा नहीं पाया, मैं जब भी उसे देखता,  तो सोचता,  उस दिन वो बरगद का वृक्ष मुझसे क्यों बोला? या ये सब केवल मेरे मन का भ्रम मात्र था। शायद इसे मैं कभी न जान सकूँगा। या ऐसा भी हो कि मैं खुद उसे जानना नहीं चाहता और न ही एक सुखद क्षणों को तोड़ना चाहता हूं। ये भ्रम भरी यादें मेरे जीवन की अनमोल यादों में से एक है। जो मुझे एक नई उर्जा का संचार देती है। और मेरे थके जीवन को फिर एक नई ताजगी देती है। और उठ कर फिर किसी वृक्ष की और बढ़ जाता हूं कि शायद ये भी एक दिन बोलेगा......ये भ्रम मीठा है और में जीना चाहता हूँ, इसी में रहना चाहता हूं
स्‍वामी आनंद प्रसाद 'मनसा'



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