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रविवार, 6 जनवरी 2013

पृथ्‍वी का वरदान—(कहानी)

(े कहानी  मेरे जीवन  की एक सत्‍य घटना पर आधारित है, सन 1984 में मैंने जो बोया था, उसे पृथ्‍वी में मुझे मेरे पुत्र को जीवन दान दे कर मुझे लोटा दिया। आज जो लोगों की मानसिकता, दामनी केश में दिख रही है..इसमें कहां खो गई मनुष्‍य की मनुष्‍यता और दिल्‍ली के दिल्‍लों की भावुकता...उनका सहास उनकी बहादूरी...विश्‍वास नहीं होता...प्रकृति देती है, परंतु समय तो लगता है बीज बोने और फसल तैयार होने है...स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा)
           

            अचानक घर की घंटी के बजने से वहां पर फैली बिखरी शांति के साथ ही अँधेरा भी पल भर के लिए थर-थरा गया। भय के मारे शांति मानों किसी खाली कोने में दूबक गई हो। और शिवा नंद जो अपने ध्‍यान में बैठे थे। न जाये क्‍यों आज इस घंटी की धवनि से कुछ बेचैन से हो गये। वैसे तो स्थूल तोर पर घंटी-घंटी होती है। पर न जाये क्‍यों उस दिन वह घंटी आम तरह से बजाने वाली नहीं लग रही था। क्‍या विधूत यंत्र भी मानव की संवेदना को अपने में प्रवेश कर लेते है। ऐसा कई बार होता है जब कोई विचार या संवेदना हमारे हाथों से होकर किसी यंत्र के माध्‍यम से कुछ कहती सी लगती है। क्‍योंकि ये कई बार देखा है कि एक ही घंटी को अनेक लोग जब बजाते है तो हम अलग-अलक अहसास होता है। और हमारा पालतू कुत्‍ता पोनी तो पल भर में पहचान लेता था की घंटी किसी अजनबी ने बजाईं या परिचित ने।

      पर आज अचानक ये घंटी शिवा नंद जी को कुछ अच्‍छी नहीं लगी। उसने उठने की कोशिश की इतनी देर में दो बार और घंटी बज गई उसने घड़ी की और देखा, रात के 9 बज कर 40 मिनट हुए है। अचानक उसका चित कुछ अशुभ के भय से कांप गया। फिर भी उसने अपने चित की उन तरंगों को देखा और मन को दिलासा दिया के तू हमेशा ही गलत क्यों सोचता है। क्‍या तेरे पास कोई अच्‍छे विचार नहीं है। और सब सोचते हुए दरवाजे की कुंडी खोली। देखा तो सामने एक अंजान युवक खड़ा है। शिवा नंद को अचानक बहार की ठंड से भी अधिक अंदर सीतलता चीरती हुई सी लगी। मानों सब एक ठंडी जमी धार दार तलवार अंदर उतरती चली जा रही हो। वह क्षण और भी अधिक मौन और बहुत सधन होता जा रहा थ। मानों समय जम गया है। और भर की बुंदे धीरे-धीरे टपक कर अशान्‍ति उत्पतन कर रही हो।
      दरवाजे पर खड़े युवक ने साहस कर के कहा की ‘’अंकल निर्मल’…..और उस भारी हुए माहोल ने उसके निकलते शब्दों को भी जमा दिया। या उसने कुछ कहा पर वह शिवा नंद जी को नहीं सुनाई दिया। शिवा नंद जी देख रहे थे कि उसके दिल की धड़कन बहुत तेजी से चल रही है।  अचानक अगान तुक के शब्‍द फिर शिवा नंद के कानों में पड़े, अंकल आप घबराये नहीं और उस युवक ने शिवानंद को आगे बढ़ कर कंधे से पकड लिया और सहारा देने के लिहाज से  कहां की भगवान का शुक्र है ज्‍यादा चोट नहीं आई...आप चलिए।
      इतना सुनते ही शिवा नंद का मस्‍तिष्‍क भय और अपशकुन से सुन हो गया। पर उन्‍होंने अपने आप को सम्हाला, और दो गहरी श्वास ली। इतनी देर में आनंदी देवी जो निर्मल की मां थी, आकर वह भी खड़ी हो गई और पूछने लगी कितनी देर से दरवाजे की और और कहने लगी कितनी देर से किसी के बोलने की आवाज नहीं आई—‘’कोन  आया है, और आप किस से बात कर रहे हो।‘’ इतनी देर में शिवानंद जी अपने को सम्हाल चुके थे। ‘’कुछ नहीं , ऐसे ही निर्मल को....ओर उसका गला भर आया। आनंदी देवी सब समझ गई। पर वह शिवानंद को कहने लगी आप धारणाओं मत जो भी हो हमनें कभी किसी का भूल से भी किसी का बुरा नहीं किया। तब भगवान हमारा बुरा  कैसे कर सकता है, आप हिम्‍मत रखो......।
      इतनी देर में पडोस में विश्‍वनाथ जी और उनके लड़के पूरण मल जो निर्मल के दोस्‍त थे। वह भी आ गये। सारी बातें सुन कर पूर्ण ने अपनी कार निकाली और चारों उस में बैठ कर चल दिये। दूरी कोई ज्‍यादा नहीं थी। पर अगर निर्मल को ज्यादा चोट आ गई होगी तो उसे हास्‍पिटल भी तो ले ही जाना होगा। इस लिए कार की तो जरूरत ही थी। गांव से आधा फरलांग दूरी पर जो शिव मंदिर है, माइक्रोवेव टावर के सामने, वहीं पर जाकर जब गाड़ी रोकी तो 10-15 आदमियों की भीड़ सड़क के एक कोने में खड़ी थे। शिवा नंद भारी कदमों से उतरे और भीड़ को चिरते हुए अंदर जा कर देखा तो निर्मल फुटपाथ पर लेटा हुआ है। उसने उसके सर पर हाथ फेर कर पूछा बैटा निर्मल तू ठीक है। इतनी देर से अचेत पड़े निर्मल ने आंखे खोल ली। ये वहां पर खड़े लोग देख कर अचरज कर गये। वह तो ये देख रहे थे की इस की दिल की धड़कन तो चल रही है पर यह अचेत है कहीं कोमा में न चला गया हो। पर बहारी चोट तो कही दिखाई नहीं दे रही थी। न ही कही खून निकला था।
      कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ी भी आ गई। बात ऐसे हुए एक सफेद रंग की मारुती वेन बीच सड़क पर खड़ी कर रखी थी।  और न ही उसने कोई लाईट जला रखी थी। अँधेरा होने के कारण मोटर साईकिल पर आते निर्मल ने उसे नहीं देख पाया या और उस से टकरा गया। और वह ड्राइवर कोई नशेडी सा दिख रहा था।  अब भी वह अपनी वेन को बीच सड़क ही खड़ी किये हुआ था। अपनी सफाई के लिए की मुझे पीछे से आकर टक्‍कर मारी है। और जब पुलिस वाले ने शिवानंद को देखा तो नमस्‍कार कर पूछा बेटा तो ठीक है। शिवा नंद की आंखों में पानी आ गया। और वह कहने लगे सब उपर वाले की कृपा है’….इंस्पेक्टर ने गाड़ी वाले के पास जा पूछा ये क्‍या है। क्‍यों शोर मचा रहा है। वह नशे में तो था ही कहने लगा देखो साहब मेरा शीश टुट गया। पीछे भी कितना नुकसान हो गया। इंस्पेक्टर ने उसे शांत होने को कहा। की भले आदमी तुझे गाडी की पड़ी है क्या तुझे दिखाई नहीं देती कि मनुष्‍य की जान की कोई किमत या इंसानियत भी कोई चिडिया का नाम होता है। क्‍या तेरी गाडी ज्‍यादा कीमती है। और तू इसे बीच सड़क में खड़ा कर के क्‍या कर रहा था। क्‍या चलती गाड़ी से इतने जोर से टक्‍कर लगी है तो उसकी स्‍पीड तो 120 से भी ज्‍यादा होनी चाहिए अगर तू 40 की गति से भी चल रहा हो तो।
      लेकिन हम नशे के आदी आदमी को संवेदन शीलता का पाठ नहीं पढ़ा सकते। उसे तो अपने नुकसान की रटन लगी थी। इतनी देर में विश्वनाथ जी को ताव आ गया। और उसने जा कर उस ड्राइवर को इतने जोर से चांटा मरा की.....वह चारों खाने चित गिरा। और कहा इंस्‍पेक्‍टर साहब इस का मेडिकल करवाइए ये नशे में है। अब मात्र एक थप्‍पड़ में ही सारा नशा काफूर हो गया। और वह नशेड़ी लगा हाथ जोड़ने नहीं मर जाऊँगा....गरीब आदमी हूं। और आधा घंटे से शोर मचा रहा है, उस में जरा भी मनुष्‍यता नहीं है। कि उस आदमी को भी जाकर देख ले कही ज्‍यादा चोट तो नहीं आई है। या उसे कही डाक्‍टर को दिख दे अपनी गाड़ी  को रो रहा है क्‍या हो मनुष्‍यता को। हम ज्‍यादा सुविधाओं में कही पत्‍थर दिल तो नहीं हो रहे है। और अपने पर पड़े एक ही थप्पड़ के दर्द को सहन नहीं कर सका।
      शिवा नंद जी ने विश्‍वनाथ जी को समझाया । छोड़ो विश्‍वनाथ जी। अपना बच्‍चा ठीक है ये भगवान की क्‍या कम कृपा है। ये जैसा करेगा उसे ऐसा ही भरना होगा। तब अचानक उस इंस्‍पेक्‍टर को शिवा नंद की और देख कर कहां, सर आप बच्‍चे को देखिये इसे मैं सम्‍हाल लेता हूं। पूर्ण ने सहार दे कर निर्मल को कार में बिठाया और शिवानंद और विश्‍वनाथ को कहने लगे अंकल आप भी आ जाओ किसी नर्सिंग होम में चलते है। पास ही डा. घोष का क्लिनिक था, वो पारिवारिक डा. की तरह ही गये थे। शिवानंद ने कहा बेटा क्‍यों न डा. घोष को ही दिखा ले वो भरोसे के डा. भी है।
      डा. घोष ने निर्मल को अच्‍छे से चेक किया और कहा किसी किस्‍म की कोई ऐसी वैसी बात नहीं है। इतना बड़ा दुर्धटना होने पर भी निर्मल ठीक है। कई लोगों ने बताया की वहां अभी तक कम से कम 10-12 ऐक्‍सिडेन्‍ट(दुर्धटना) हो चुके है, और एक भी आदमी नहीं बचा। सब लोग तो उस जगह को मनहूस मानने लगे थे। विश्‍वनाथ ने कहा की जब मुझे पता चला की मंदिर के सामने दुर्धटना हुई है तो मैं तो बहुत घबरा गया था। क्‍यों कि वहां दुर्घटना होने का मतलब है मौत।
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      श्‍याम को तो निर्मल का शरीर गर्म था। पर सुबह शरीर का एक-एक जोड़ दर्द कर रहा था। क्‍योंकि खड़ी गाड़ी में मोटर साईकिल जब वेन से टकराई तब वह पूरे जोर से उछल कर वेन के शीशे को तोड़ा हुआ नीचे गिरा। अब निर्मल को सब बातें धीरे-धीरे याद आ रही है। कि कैसे उसकी आंखें बंद हो गई और उसे समझ ही नहीं आया था।
      तभी अचानक फिर से घर की घंटी बजी, सुबह से ही देखने वालों का तांता लगा था। क्‍योंकि निर्मल का स्‍वभाव ऐसा था जिस से एक बार बात कर ले उसका दिल जित लेता था। क्रोध तो उसे छू तक नहीं गया था। शिवानंद को तो सब महात्‍मा के नाम से जानते थे। अब तो कुछ नहीं करते पर पहले ग्रह मंत्रालय में डिप्टी सेकेट्री थे। एक ही बच्‍चा था उनका निर्मल।
      देखा तो वही रात वाला इंस्पेक्टर था, उसने आ कर शिवा नंद जी को नमस्‍ते की। और निर्मल का हाल चाल पूछने लगा। उस समय शिवानंद जी ध्‍यान के कमरे से अभी-अभी लोटे थे। शिवानंद ने उस इंस्‍पेक्‍टर को गोर से देखा और उन्‍हें लगा कि इसे पहले भी कभी देखा है। और याद करने की कोशिश करने लगे। वह इंस्‍पेक्‍टर शिवा नंद के पास आकर बैठ गये । आनंदी देवी चाय बनाने चली गई।
      इंस्पेक्टर ने कहां सर याद है आज से 16-17 साल पहले कि बात, शायद दिसम्बर 1984 की एक रात थी, उस समय में एक सिपाही था। इसी थाने में। जब हमने एक सरदार को.....अचानक शिवानंद को सारी बातें याद आ गई। हां याद है। अरे वो तुम थे पर तुमने मुझे पहचान खूब। तब इंस्पेक्टर ने कहा की सर कुछ चेहरे ऐसे होते है जिन्‍हें हम जीवन में एक बार देख कर भी नहीं भूल पाते। में उस रात को कभी नहीं भूल पाया।
      इतनी देर में आनंदी भी आ गई और दो चार पड़ोस के लोग भी निर्मल का हाल चाल पूछने के लिए आ गये। तब शिवानंद कहने लगे। हाँ वो नवम्‍बर की एक रात थी। रात के यही कोई 9.30 बजे होगें। मुझे दफ्तर से किसी मीटिंग में अचानक रूकना पड़ गया। जब में उसी जगह जहां कल निर्मल का ऐक्‍सिडेन्‍ट हुआ है। ठीक वही जगह थी। एक सफेद रंग की एम्‍बेस्‍डर कार खड़ी थी में स्कूटर पर था। पास से गुजरते हुए मेंने सोचा ऐसे ही कोई एकांत में प्रेमी जोड़ा बैठा बात कर रहा होगा। पर जब मैंने देखा की उस खाली कार में एक सिख बैठा है,  और अकेला, और उसका सर आगे स्‍टेरिंग की और झुका हुआ है। या तो वह बेहोशहोगया लगता है या शराब के नशे के कारण गाड़ी नहीं चला पा रहा था। उन दिनों ये रास्‍ता  और भी बहुत  सुनसान होता था।  लोग रात नौ बजे भी आने में डरते थे। पुलिस हमेशा गश्त करती रहती थी। उस सरदार जी की ऐसी हालत देख कर मुझे कुछ अजीब सा लगा। तब मैंने आगे जाकर स्कूटर रोका। क्‍योंकि अकेला एक सिख, चाहे वो पिये ही हो पर इस सुनसान रात में अकेला। अभी  84 के दंगो की तो वो खून की होली की आग बुझी भी नहीं थी। जो इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद सरदारों के साथ सलूक हुआ। मैं अंदर तक कांप गया।  मेरे चित ने कहां कुछ भी हो एक बार जाकर देखना तो चाहिए, कम से कम मनुष्‍यता तो यही कहती है। मैंने स्‍कूटर को एक और रोका ओर गाड़ी की और गया।  पास जाकर देखा तो उस सरदार जी के  मुहँ से झाग निकल रहे थे। एक बार तो मैंने सोचा की कहीं इन्‍होंने आत्‍मा हत्‍या तो नहीं कर ली। पर फिर भी मैंने उन्‍हें और पास से छु कर देख और समझ गया की इन्‍हें मिरगी को दौरा पड़ा है। दुसरी एक बात ने मेरा ध्‍यान और खीचा की गाड़ी का नम्‍बर—0004, वी. आई. पी था। इतनी देर में पास के गांव के श्री महेश यादव जो ब्रह्म यादव के भाई है वह वहाँ से गुजर रहे थे। मुझे खड़ा देख कर उन्‍हें अपनी कार रोक कर मेरे पर आ कर पूछने लगे कि भाई साहब क्‍यों खड़ हो।  उनके पास आ जाने से मैंने उन्‍हें सरदार जी की हालत उन्‍हें दिखाई ओर पूछा क्‍या किया जा सकता है। तब हम एक से दो हो गये। अब हमारे पास कार भी थी। और हिम्‍मत भी दो गुणा बढ़ गई थी। इतनी देर में ये इंस्‍पेक्‍टर साहब अपनी साईकिल पर गस्‍त करते हुऐ आ गये। अब तो हमारा साहस और बढ़ गया। हमने उन सरदार जी को गाड़ी से निकाला और महेश की कार में पिछली सीट पर लिटा दिया। पास में ये इंस्‍पेक्‍टर साहब बैठ गये। उनकी जेब में जो परिचयपत्र था। वह एन.सी.इ.आर.टी में आफिसर थे। उनका घर का पता, करोल बाग, नाई वाला लिखा था। वह जगह हमारी देखी हुई थी। हम सीधा नई वाली गली में गये। एक गली के नुक्कड पर भीड़ लगी थी। मेंने महेश से कहां की गाड़ी रोको में इस भीड़ से पूछा कर आता हूं।
मैरे हाथ में उनका परिचय पत्र था। मेंने भीड़ में खड़े लोगे में से एक युवक सरदार जी से पूछा ये पता कहां होगा। और उन लोगों को समझने में देर नहीं लगी की हम उन्‍हें ही पूछ रहे है। वह सरदार जी कहने लगे ये मेरे पिता जी है। मेंने कहां आप घबराइए मत सब ठीक है।आप हमारे साथ आईये उन्‍हें गाड़ी से निकलना है। वह हमारे साथ है, उन्‍हें चक्र आ गये थे। ऐसी कोई बात नहीं है। और भीड़ फटा-फट गाड़ी की और दौड़ी। जिस चीज की उन्‍हें उन्‍होंने कल्‍पना भी नहीं की थी वो अचानक यु घर के पास मिल जायेगी।
      लड़का लपक कर कार के पास गया। और अपने पिता को पहचान करे, उसने हमारी और देख कर कहां अंकल आप घर चले। सबने सहार दे कर उनके पिता को  गाड़ी से बहार निकला और घर की और ले गये। शायद गली का दूसरा या तीसरा मकान था।  घर के लोगों ने जो हमारा स्‍वगत सत्‍कार किया मानों हम भगवान है। हमें वहां कम से कम 25-30 मिनट लग गये। वो जो हिन्‍दु सिखों के मन में एक नफरत की परत जमा हो गई थी। वो उनकी प्‍यार भरी बातों और बहते आँख के आंसू एक अनुठा ओर विश्‍वास का साफ सुथरा मार्ग तैयार कर रहे थे। वह सरदार जी अपने किसी रिस्‍ते दार के यहां तिलक नगर जा रहे थे। और टोड़ापूर-इंद्रपूरी का वह सुनसान रोड़ जहां वह बेहोश हो गये थे। दंगों के कारण काफी बदनाम था।  न वे वह तिलक नगर पहुचे न ही घर और आप ये भी जान लीजिए की उस जमाने में मोबाईल फोन भी नहीं होता था। अब उनकी चिंता भी अपनी जगह सही थी।
      किसी तरह से हम वहां से चले। पर वह क्षण सुखद थे। एक काली छाया जो हिन्दू और सिखों के बीच में बन गई थी। उसे हमने पार कर गर्व महसूस हो रहा था। हम खुशी-खुशी घर की और चले। रात को उन दिनों रोड़ सुन सान हो जाते थे। लेकिन जब हम वहां पहुचे तो क्‍या देखते है, पुलिस की गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ खड़ी है। मानों कोई युद्ध छिड़ गया हो। या कोई इन काऊंटर करने के लिए पुलिस बल घेरा डाले खड़ा हो। हमारी समझ में नहीं आ रहा की क्‍या हो गया। हमारे साथ उन सरदार जा का एक लड़का और एक पड़ोसी भी उनके साथ आया था। जिससे  कि वह अपने पिता जी की गाड़ी ले जा सके।
      वह जो माइक्रोवेव का टावर है। उस के चौकीदार ने एक कार, एक स्कूटर और एक साईकिल को खड़ी देख कर गेट के सामने पुलिस को फोन कर दिया की यहां पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है। एस. एच‍. ओ. ही नहीं केन्द्रीय रिजर्व पुलिस की भी एक गाड़ा आ गई थी। दंगों के कारण दिल्‍ली काफी संवेदन शील हो गई थी। जब हम उतरे तो समझ ही नहीं पा रहे थे। ये क्‍या मामला है। मैंने अपना परिचय पत्र दिखाया, पुलिस का सिपाही, जो इस समय इंस्‍पेक्‍टर हो गया था मंद-मंद मुस्‍कुरा रहा था। उन्‍होंने कहां ने की करने के बदले में ये सब मिलेगा इस की कल्‍पना भी नहीं थी। खेर उन सिख युवक ने अपने पिता की घटना कहीं, और उस सिपाही ने जो वहाँ पर गशत कर रहा था उस ने भी कहा। लेकिन क्‍योंकि मेरा स्कूटर और इंस्पेक्टर साहब की साईकिल उस गेट के अंदर खड़ी कर दी थी। सुरक्षा के लिहाज से। और उसी सब ने ये आफत कर दी। जब थाने से सिपाही आये और उन्‍होंने इन सिपाही की साईकिल पहचान ली। मेरे स्कूटर का ताला ताड़ कर बहार निकाल दिया। क्‍योंकि कमिश्‍नर साहब भी बस आने ही वाले थे।
      इतनी देर में एक ऐम्‍बसडर कार आकर रुकी उस में कमिश्‍नर साहब थे। जब सब बातों को पता था। तब जाकर उनका  सारा तनाव खत्‍म हुआ और माहोल को कुछ हलका करने के लिए मजाकिया हंसी हंस कर कहां। साहब ‘’नेकी कर और कुएं मे डाल। आपने अच्‍छा काम किया। पर आपके साथ अच्छा नहीं हुआ। आपके स्कूटर का लोक तोड़ दिया। में हंस पडा। हमें उन्‍होंने कुछ नहीं कहां महेश भी घर जाने की जल्‍दी में था। क्‍यों घर के लोग हमारा भी फिक्र कर रहे थे। अगर थाना-चौकी की नौबत आती तो रात के 12 एक बज जाते।
      अब में उस रात पैदल ही घर आया। तब मुझे याद आया जीवन जटिल है। हम जो भी करते है वह आस्‍तित्‍व में लिख जाता है। वह लोट कर आता है। बीज और पेड़ में जो समय का गैप होता है उसे हम देख नहीं पाते। आज निर्मल को जो धरती ने जीवन दान दिया है। ये उसी एक घटना का फल है। सच ‘’नेकी कर कुएं में डाल’’ वाली बात सही है। अगर हम नेकी कर के उसे बीज से फल की आस करते है, तो उस बात का महत्‍व खो जाता है। बड़े बूढ़ों ने एक-एक बात जीवन के निचोड़ से कही गई है।

स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’