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शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तीसरा  
दिनांक 29 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—भारतीय संसद में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल, धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक लाया जा रहा है। ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मदर टेरेसा ने भी उसका विरोध किया है। आप अपना मंतव्य दें।

2—संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।

3—पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी,
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।



पहला प्रश्न: भारतीय संसद में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल, धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक लाया जा रहा है। ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मदर टेरेसा ने भी उसका विरोध किया है। आप अपना मंतव्य दें!

कृष्ण प्रेम! भारतीय संसद जो न करे थोड़ा है। बूढ़े बच्चों की जमात है। शरीर से तो बूढ़े हैं, बुद्धि से बहुत बचकाने। जिस विधेयक को धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक नाम दिया जा रहा है, वह वस्तुतः धार्मिक-परतंत्रता लाने का विधेयक है। उसका नाम ही झूठा है; नाम उलटा है।
इस विधेयक के द्वारा इस बात की चेष्टा की जा रही है कि लोग धर्म-परिवर्तन न कर सकें। कोई हिंदू ईसाई न हो सके, कोई ईसाई मुसलमान न हो सके, कोई मुसलमान हिंदू न हो सके। मुसलमान हिंदू होते भी नहीं; ईसाई हिंदू होते भी नहीं। इसलिए विधेयक वस्तुतः ईसाई धर्म के खिलाफ है, क्योंकि हिंदू ईसाई होते हैं।
और किसी व्यक्ति की धर्म को चुनने की स्वतंत्रता को छीनने को स्वतंत्रता विधेयक कहना अत्यंत मूढ़तापूर्ण है। कोई अगर ईसाई होना चाहता है तो हकदार है ईसाई होने का। सच तो यह है, जन्म के साथ धर्म का कोई संबंध नहीं है। नहीं तो आज नहीं कल भारतीय संसद में एकाध विधेयक और ले आना चाहिए--फ्रीडम ऑफ पोलिटिकल आइडियालॉजी बिल; राजनैतिक विचारधारा की स्वतंत्रता का विधेयक। कि जो कम्युनिस्ट घर में पैदा हुआ है उसे कम्युनिस्ट ही रहना पड़ेगा; और जो कांग्रेसी घर में पैदा हुआ है उसे कांग्रेसी ही रहना पड़ेगा।
अगर जन्म के साथ राजनीति तय नहीं होती, तो जन्म के साथ धर्म की विचारधारा कैसे तय हो सकती है? जन्म का क्या संबंध है विचारधारा से? किसी आदमी के खून की जांच से बता सकते हो कि हिंदू है, या मुसलमान है, या ईसाई है? किसी आदमी की हड्डियां बता सकेंगी कि उसकी विचारधारा क्या थी--नास्तिक था कि आस्तिक था?
धर्म से और जन्म का कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन यह देश हिंदू मतांधों के हाथ में पड़ा जा रहा है। इस देश में जो क्रांति हुई, उसे क्रांति नहीं कहना चाहिए, प्रतिक्रांति हो गई है। यह देश हिंदू मतांध लोगों के हाथ का शिकार हुआ जा रहा है। चेष्टा यह है कि कोई हिंदू किसी दूसरे धर्म में न जा सके। लेकिन कोई नहीं पूछता कि हिंदू किसी दूसरे धर्म में जाना क्यों चाहते हैं? और अगर जाना चाहते हैं, तो उनके जाने के कारण मिटाओ। अगर हिंदू नहीं चाहते कि हिंदू ईसाई हों, तो उनके कारण मिटाओ। एक तरफ हरिजनों को जिंदा जलाते हो, उनकी स्त्रियों पर बलात्कार करते हो, उनके बच्चों को भून डालते हो, गांव के गांव बरबाद कर देते हो, आग लगा देते हो, और दूसरी तरफ वे ईसाई भी नहीं हो सकते। यह तो खूब स्वतंत्रता रही! जिस धर्म में उनका जीवन भी संकट में है, उस धर्म में ही उन्हें जीना होगा। इसको स्वतंत्रता कहते हो?
लेकिन इस विधेयक को लाने वाले लोगों का कहना है कि ईसाई लोगों को भरमा लेते हैं। हम भरमाने के खिलाफ विधेयक बना रहे हैं।
तुम नहीं भरमा पाते, ईसाई भरमा लेते हैं?
इस विधेयक को लाने वालों का कहना है कि ईसाई लोगों को धन, पद, नौकरी, प्रतिष्ठा, शिक्षा, भोजन, अस्पताल, स्कूल--ऐसी चीजें देकर भरमा लेते हैं।
तो तुम पांच हजार साल से क्या कर रहे हो? स्कूल नहीं खोल सके? अस्पताल नहीं बना सके? लोगों को रोटी-रोजी-कपड़ा नहीं दे सके? अगर ईसाई लोगों को रोटी-रोजी-कपड़ा देकर भरमा लेते हैं, तो यह तो सिर्फ तुम्हारी लांछना है। यह तो तुम्हारे ऊपर दोषारोपण हुआ। यह तो तुम्हारे चेहरे पर कलंक है, कालिख पुत गई। पांच हजार साल में तुम लोगों को रोटी-रोजी भी नहीं दे पाए! लोग इतने भूखे हैं, इतने दीन, इतने दुर्बल कि रोटी-रोजी के लिए धर्म बदल लेते हैं! तो निश्चित तुम्हारे धर्म की कीमत रोटी-रोजी से ज्यादा नहीं है।
और तुम्हारे धर्म ने दिया क्या उन्हें? अगर दिया होता तो क्यों बदलते?
अगर चाहते हो कि न बदलें, तो कुछ दो। अस्पताल खोलो, स्कूल खोलो। भेजो अपने संन्यासियों को कि उनकी सेवा करें। तुम्हारे पास संन्यासी कुछ कम नहीं हैं। पांच लाख हिंदू संन्यासी हैं! इनको भेजो, सेवा करें, स्कूल चलाएं, अस्पताल खोलें। मगर हिंदू संन्यासी तो सेवा लेता है--करता नहीं। उसने तो सदियों से सेवा ली है। उसके पैर दबाओ, उसके चरणों पर सिर रखो।
लोग थक गए मूढ़ों के चरणों पर सिर रखते-रखते। और लोग भूखे हैं। और लोग अप्रतिष्ठित हैं, अपमानित हैं। तुम्हारे साथ हैं, यही आश्चर्य है! शूद्रों का कभी का तुमसे संबंध छूट जाना चाहिए था। कैसे शूद्र तुम्हारे साथ रहे आ रहे हैं, यह चमत्कार है! जहर तुमने हजारों साल तक पिलाया है कि उनमें अब स्वतंत्रता का बोध भी नहीं रह गया है। उनमें इतनी भी क्षमता नहीं रह गई है कि कह दें कि नमस्कार! अब बहुत हो गया! तुमने हमें बहुत सता लिया। अब कम से कम इतनी तो हमें आज्ञा दो कि हम इस घेरे के बाहर जाएं।
इस भय से कि शूद्र और आदिवासी ईसाई न होते चले जाएं, यह विधेयक लाया जा रहा है। इस विधेयक के पीछे मंशा कुल केवल इतनी है कि धर्म-परिवर्तन की स्वतंत्रता शेष न रह जाए।
यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है; न लोकतांत्रिक है। और एक ऐसे राष्ट्र के लिए जो अपने को धर्म-निरपेक्ष कहता है, इस तरह का विधेयक तो बिलकुल अपमानजनक है।
तो पहली तो बात मैं यह कहना चाहता हूं: यह धर्म-परतंत्रता का विधेयक है--स्वतंत्रता का नहीं। मैं ईसाई नहीं हूं, मैं हिंदू भी नहीं हूं। मैं किसी धर्म का अनुयायी नहीं हूं। लेकिन फिर भी मैं यह मानता हूं कि अगर कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है तो यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। और अगर वह रोटी-रोजी के लिए भी धर्म बदलना चाहता है, तो भी उसका यह जन्मसिद्ध अधिकार है। वह किस कारण से धर्म बदलना चाहता है, यह बात विचारणीय नहीं है। कारण भी उसको ही तय करना है। और अगर वह रोटी-रोजी के लिए अपना धर्म बदल लेता है, तो उससे सिर्फ इतना ही सिद्ध होता है कि जिस धर्म में वह था, वह रोटी-रोजी भी नहीं दे सका--और तो क्या देगा!
थोथी बकवास, थोथे सिद्धांत पेट नहीं भरते। भूखे भजन न होहिं गोपाला! वह बहुत दिन सुन चुका भूखे भजन करते-करते; न आत्मा तृप्त होती है, न शरीर तृप्त होता है। परलोक की तो बात छोड़ो, यह लोक ही कष्ट में और नरक में बीत रहा है। तो अगर कोई इसे बदल लेना चाहे तो मैं उसे उसका जन्मसिद्ध अधिकार मानता हूं। और कोई भी राष्ट्र इस जन्मसिद्ध अधिकार को छीने, वह राष्ट्र लोकतांत्रिक नहीं रह जाता। यह तो पहली बात।
दूसरी बात, ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मैं इस बात के बहुत पक्ष में नहीं हूं कि ईसाई उसका विरोध करें। सिर्फ ईसाई ही क्यों विरोध कर रहे हैं? क्या इस देश में और कोई सोच-विचार करने वाले लोग नहीं हैं? हिंदू चुप, जैन चुप, बौद्ध चुप, सिक्ख चुप। सिर्फ ईसाई ही क्यों विरोध कर रहे हैं? क्योंकि चोट सिर्फ ईसाइयों पर पड़ रही है।
और यह मैं जरूर कहना चाहूंगा कि ईसाइयों के लोगों के धर्म-परिवर्तित करने के जो ढंग हैं, वे ढंग धार्मिक नहीं हैं। वे ढंग रिश्वत जैसे हैं। वे ढंग शोभायोग्य नहीं हैं। वे ढंग किसी धर्म को आदृत नहीं करते। वे ढंग चालबाजियों के हैं।
इसलिए मैं भी विरोध कर रहा हूं इस विधेयक का, लेकिन उस कारण से नहीं जिस कारण से ईसाई विरोध कर रहे हैं। ईसाइयों का विरोध और हिंदुओं का पक्ष तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
हिंदू कह रहे हैं कि हम लोगों को चाहते हैं कि उनके धर्म को कोई सस्ते में न खरीद सके, इसलिए विधेयक बना रहे हैं। ईसाई कहते हैं कि हम मानते हैं कि धर्म-परिवर्तन का अधिकार मनुष्य की स्वतंत्रता है, इसलिए हम विधेयक का विरोध कर रहे हैं। दोनों बातें झूठ कह रहे हैं।
ईसाइयों को मतलब नहीं है धर्म की स्वतंत्रता से। क्योंकि अमरीका में ईसाई विरोध करते हैं ईसाइयों का परिवर्तन। जो ईसाई हरे-कृष्ण आंदोलन में सम्मिलित हो जाते हैं, अमरीका में ईसाई उनका विरोध करते हैं कि यह नहीं होना चाहिए; कि हमारे बच्चों को भड़काया जा रहा है; कि हमारे बच्चों को उलटी-सीधी बातें समझाई जा रही हैं; कि हमारे बच्चों की बुद्धि परिपक्व नहीं है; कि हमारे बच्चों को सम्मोहित किया जा रहा है।
अमरीका में बड़े जोर से चर्चों ने गुहार मचा रखी है कि हमारे बच्चे हरे-कृष्ण आंदोलन में सम्मिलित न हो जाएं, क्योंकि वह हिंदू हो जाना है। यह तो दूर, महर्षि महेश योगी की ध्यान की प्रक्रिया भी कोई ईसाई न करे, इसका चर्च गुहार मचा रहे हैं। क्यों? क्योंकि ध्यान की प्रक्रिया तो कोई धर्म का ऐसा अनिवार्य अंग नहीं है। महर्षि महेश योगी की ध्यान की प्रक्रिया तो बड़ी सीधी है, मंत्र-जाप है। और उनका कोई ऐसा विरोध भी नहीं कि तुम ईसा-ईसा मत जपो। तुम्हें जो जपना हो, वह जपा जा सकता है। तुम्हें अगर अवेमारिया-अवेमारिया जपना है, तो अवेमारिया जपो। उससे भी वही फल होगा जो राम-राम जपने से होता है। महर्षि महेश योगी का ध्यान का आंदोलन कोई हिंदू धर्म का प्रचार नहीं है। क्योंकि ध्यान का हिंदू धर्म से क्या लेना-देना! ध्यान तो जैनों का भी है, बौद्धों का भी है। ध्यान तो एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। मैं महर्षि महेश योगी के ध्यान से सहमत नहीं हूं। मैं नहीं मानता कि वह ध्यान कोई बहुत गहरा ध्यान है कि उसे भावातीत-ध्यान कहा जा सके। लेकिन इस संबंध में मैं जरूर उनका समर्थन करता हूं कि जो ईसाई विरोध कर रहे हैं वह विरोध बेईमानी का है।
अब कोशिश की जा रही है कि कोई भावातीत-ध्यान न करे। क्योंकि जो भावातीत-ध्यान करेगा, वह हिंदू हो रहा है--और ईसाई धर्म को खतरा पैदा हो रहा है। अमरीका में विरोध किया जा रहा है कि भावातीत-ध्यान न कोई करे। स्कूलों में पाबंदी लगाई जा रही है, कालेजों में पाबंदी लगाई जा रही है, युनिवर्सिटियों पर दबाव डाला जा रहा है। राज्यों में ऐसे नियम बनाने की कोशिश की जा रही है--बड़े जोर से--कि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म छोड़ कर किसी दूसरे धर्म में सम्मिलित न हो जाए।
और इतना ही नहीं, जो बच्चे, जो युवक सोच-विचारपूर्वक...और निश्चित समझना कि युवकों के पास ज्यादा सोच-विचार की क्षमता है, वे ज्यादा सुशिक्षित हैं, उनके पास ज्यादा विस्तीर्ण परिप्रेक्ष्य है। उन्होंने बाइबिल भी पढ़ी है और उन्होंने गीता भी पढ़ी है और उन्होंने उपनिषद भी देखे हैं और ताओ तेह किंग भी देखा है। अब उनके सामने चुनाव है। उन्हें चुनाव करना है। और उन्हें पूरब की बातों में ज्यादा गहराई मालूम पड़ रही है। गहराई है। और अगर वे पूरब की बातें को चुन रहे हैं, तो बड़ी घबड़ाहट फैल रही है। वहां ईसाई विरोध कर रहे हैं कि कोई हिंदू न हो जाए, कि कोई बौद्ध न हो जाए।
मेरे संन्यासियों का विरोध शुरू किया जा रहा है। और मेरे संन्यासी तो न हिंदू हो रहे हैं, न बौद्ध हो रहे हैं, न जैन हो रहे हैं। मेरे संन्यासी तो सिर्फ सारे कारागृहों से मुक्त हो रहे हैं। वे तो सिर्फ धार्मिक हो रहे हैं। उनका किसी धर्म से कोई नाता नहीं रह जाने वाला। लेकिन उनका भी विरोध किया जा रहा है। मेरे आश्रमों पर भी पुलिस छापे मार रही है। जर्मनी में प्रोटेस्टेंट चर्च ने खूब प्रचार कर रखा है कि कोई भी मेरा संन्यासी न हो जाए। यहां भी जासूस भेजे हैं प्रोटेस्टेंट चर्च ने कि लोगों को भड़काएं, यहां के खिलाफ खबरें फैलाएं, यहां के संबंध में झूठे प्रचार करें।
तो ईसाइयों के मैं समर्थन में नहीं हूं। ईसाई जो इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, उसमें उनकी नीयत साफ नहीं है। वे चाहते हैं कि उनको सुविधा बनी रहे कि किसी को दवा दे दी, किसी को रोटी दे दी, और रोटी और दवा के बहाने उसका धर्म बदल लिया। यह कोई धर्म-परिवर्तन हुआ? किसी को नौकरी दिला दी और धर्म बदल लिया। यह कोई धर्म-परिवर्तन हुआ? ऐसे कहीं कोई ईसा के करीब आएगा? न वह राम के करीब था, न वह ईसा के करीब रहेगा। और कल अगर राम के मानने वाले ने उसे ज्यादा बड़ी तनख्वाह दिलवा दी, वह राम के साथ फिर हो जाएगा। उसको राम और ईसा से कोई लेना-देना नहीं है, बाजार की बात हो गई।
तो मैं ईसाइयों के विरोध के कारण में सहमत नहीं हूं।
और मदर टेरेसा ने भी विरोध किया है, उससे जाहिर हो जाता है। मदर टेरेसा का भी मस्तिष्क साफ तुम्हारे सामने प्रकट हो जाता है--कि सब सेवा गरीबों की, दीनों की, कोढ़ियों की, अनाथों की, बस ऊपर-ऊपर है। भीतर असली नजर है: किस तरह लोगों को ईसाई बनाया जाए। सेवा तो प्रलोभन है, नजर तो इस बात पर लगी है कि कैसे ईसाइयों की संख्या बढ़ाई जाए।
मैं विधेयक का विरोधी हूं, लेकिन ईसाई जिन कारणों से विरोध कर रहे हैं, वे मेरे कारण नहीं हैं। मेरा कारण तो सिर्फ सीधा-साफ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म स्वयं चुनने का अधिकार होना चाहिए। जन्म के साथ किसी पर धर्म का कोई आरोपण नहीं होना चाहिए।
फिर कोई ईसा को चुने। क्योंकि ईसा के बड़े प्यारे वचन हैं। और ईसा के मार्ग से बहुत लोग पहुंचे हैं। कोई चुने तो जरूर उसे हक होना चाहिए। कोई कृष्ण को चुने, कि कोई बुद्ध को चुने। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भीतरी रुझान और अपने अंतर-झुकाव के अनुसार अपना धर्म चुनना चाहिए। धर्म थोपा नहीं जाना चाहिए। इसलिए मैं विधेयक का विरोधी हूं।
मगर मैं पूछना चाहता हूं मदर टेरेसा से कि अमरीका में जो ईसाई विरोध कर रहे हैं कि कोई हरे-कृष्ण आंदोलन में सम्मिलित न हो, भावातीत-ध्यान न करे, मेरा संन्यासी न हो जाए--उस संबंध में मदर टेरेसा ने एक शब्द भी नहीं कहा! उसका विरोध नहीं किया! उसका भी विरोध करना था।
और यहां तो विधेयक ही लाया जा रहा है, वहां और भी जालसाजियां की जा रही हैं। कोई व्यक्ति अगर हरे-कृष्ण आंदोलन में सम्मिलित हो जाता है, तो मां-बाप उसे चुरवा लेते हैं। उसकी चोरी की जाती है! उस व्यक्ति को जासूसों के द्वारा घेर कर कठघरों में बंद कर दिया जाता है। उसको कठघरों में बंद करके जबरदस्ती ट्रैंक्वेलाइजर्स के इंजेक्शन दिए जाते हैं, इलेक्ट्रिक शॉक दिए जाते हैं। उसको फिर से सम्मोहित किया जाता है कि ईसाई धर्म ही सही है। और उसको सब तरह से सताया जाता है। मां-बाप अपने बच्चों के साथ यह कर रहे हैं! और इसके लिए एजेंसियां बनी हुई हैं। यह अब एक जाना-माना व्यवसाय है अमरीका में, कि अगर तुम्हारा बच्चा ईसाई धर्म छोड़ कर हिंदू हो गया, या बौद्ध हो गया, तो उसे कैसे वापस लाना! तो उसकी एजेंसियां हैं, जासूस हैं, सम्मोहनविद हैं। और वे सब तरह की जालसाजियां कर रहे हैं बच्चों के साथ।
मदर टेरेसा ने इनमें से किसी का विरोध नहीं किया! और हिंदुस्तान के ईसाई इसके विरोध में कहीं कोई जुलूस नहीं निकालते!
ये सब एक जैसे बेईमान हैं। वे हिंदू जो संसद में बैठ कर स्वतंत्रता के नाम पर परतंत्रता का बिल ला रहे हैं, वे, और मदर टेरेसा और ईसाई जो सारे हिंदुस्तान में जगह-जगह जुलूस निकाल रहे हैं, सभाएं कर रहे हैं, वे, इनमें जरा भी फर्क नहीं है। ये सब मौसेरे-मौसेरे भाई हैं। ये सब चोर-चोर एक से हैं। इन दोनों की नजर इस बात पर है कि हमारी संख्या कैसे बढ़ती रहे हिंदू चाहता है: मेरी संख्या कम न हो जाए। ईसाई चाहता है: मेरी संख्या बढ़ती रहे। ये राजनीति के दांव-पेंच हुए। इसका धर्म से क्या लेना-देना है!
मैं, अमरीका में जो ईसाई कर रहे हैं, उसका भी विरोध करता हूं; हिंदुस्तान में जो हिंदू करना चाहते हैं संसद के माध्यम से, उसका भी विरोध करता हूं। मेरी तो घोषणा एक सीधी-सादी घोषणा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का स्वरूपसिद्ध अधिकार है। इस पर किसी का कोई हक नहीं है। और प्रत्येक व्यक्ति को निर्विरोध सुविधा मिलनी चाहिए कि वह अपना धर्म चुने। अगर कोई हिंदू चाहता है कि ईसाई हो जाए, तो जरूर उसे हक है कि वह ईसाई हो जाए।
लेकिन ईसाई होना उसका अंतर-परिवर्तन होना चाहिए। कोई उसकी छाती पर छुरा रख कर ईसाई बना दे, तुम उसको ईसाई होना कहोगे? इसी तरह मुसलमानों ने न मालूम कितने लोगों को मुसलमान बनाया--छाती पर छुरा रख कर। यह कोई मुसलमान बनाना हुआ! यह कोई इसलाम हुआ!
अब हालतें बदल गई हैं, अब छाती पर छुरा नहीं रखा जा सकता। लेकिन छाती पर सौ-सौ रुपये के नोटों की गड्डी तो रखी जा सकती है! यह भी वही बात हुई। उस आदमी को हम मरने की धमकी दे रहे थे कि मार डालेंगे! इस आदमी को हम जीने का प्रलोभन दे रहे हैं कि देख नोटों की गड्डी! मगर बात वही की वही है। मारने की धमकी कि जीने का लोभ--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
देश में स्वतंत्रता की हवा होनी चाहिए। मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे--सब खुले होने चाहिए। जिसको जहां प्रीतिकर लगे, जाए। लेकिन खींचातानी नहीं होनी चाहिए। जिसको जहां सुखद लगे, वहां गुनगुनाए, वहां प्रार्थना करे, वहां ध्यान करे। मगर हाथ-पैर में जंजीरें नहीं होनी चाहिए। न तो मंदिरों में ले जाने के लिए कोई जंजीर होनी चाहिए और न मंदिरों में रोक रखने की कोई जंजीर होनी चाहिए। तब यह देश लोकतंत्र होगा।
मगर इस देश की संसद तो अत्यंत दरिद्र है।
मेरे संबंध में भी थोड़े दिन पहले घंटे भर संसद में विवाद हुआ। मुझसे कहा गया कि मैं उसका जवाब दूं। लेकिन विवाद इतना बचकाना था कि मुझे जवाब देने योग्य भी मालूम नहीं पड़ा। विवाद में कोई बल ही नहीं; कोई बात ही नहीं।
भारतीय संसद तो ऐसा है जैसे प्राइमरी स्कूल। और शर्म भी नहीं आती, परतंत्रता थोपने के लिए बिल को नाम दिया है--फ्रीडम ऑफ रिलीजन, धर्म-स्वातंत्र्य! इसका निश्चित विरोध होना चाहिए। मगर ईसाइयों की तरफ से ही नहीं। ईसाइयों की तरफ से विरोध के पीछे तो न्यस्त स्वार्थ है। और मदर टेरेसा ने भी वक्तव्य देकर एक लिहाज से अच्छा किया। कम से कम उनकी भी असली तस्वीर सामने आ गई, महात्मापन उघड़ गया। इसका विरोध होना चाहिए सबकी तरफ से--हिंदुओं की तरफ से, जैनों की तरफ से, बौद्धों की तरफ से, सिक्खों की तरफ से। और खासकर मेरे लोगों को इसका विरोध करना चाहिए, क्योंकि हम तो किसी धर्म में नहीं मानते, और सभी धर्मों को अपना मानते हैं।
तुम मेरी बात को ख्याल में लेना।
मेरा संन्यासी किसी धर्म का अनुयायी नहीं है। और साथ ही साथ मेरा संन्यासी सारे धर्मों को आत्मसात करता है। उसकी छाती बड़ी है। उसमें कुरान भी समा सकती है और वेद भी समा सकते हैं और धम्मपद भी। उसमें एक कोने में बुद्ध भी विराजमान हो सकते हैं और एक कोने में क्राइस्ट भी बस सकते हैं। मेरे संन्यासी का हृदय बड़ा है। इतना ही बड़ा संन्यासी इस दुनिया को अब बचा सकता है। इतना ही बड़ा धार्मिक हृदय इस दुनिया को अब बचा सकता है।
और उस सौंदर्य का तो अनुभव करो; उस गरिमा और महिमा, उस समृद्धि का तो अनुभव करो, जब तुम्हारे प्राणों में एक श्वास बुद्ध की भी चलती है और एक श्वास महावीर की भी चलती है और एक श्वास मीरा की भी चलती है। तुम्हारी बगिया में ये सारे फूल खिलें, यह अच्छा है, बजाय इसके कि तुम्हारी बगिया में बस एक ही तरह के फूल हों--कि गेंदे ही गेंदे लगा दिए। गेंदे सुंदर होते हैं; मगर गेंदे ही गेंदे बगिया में लगे हों तो बगिया थोड़ी उदास हो जाएगी, बेरौनक हो जाएगी; ऊब पैदा करने लगेगी।
सातों रंग हमारे हैं। सातों स्वर हमारे हैं। इस पृथ्वी पर जितने भी बुद्धपुरुष हुए, सब हमारे हैं। और सारे मंदिर-मस्जिद हमारे हैं। ऐसा कुछ विधेयक लाओ कि किसी मंदिर-मस्जिद में किसी के लिए कोई रोक-टोक न हो। अगर हिंदू किसी दिन ईसाई के चर्च में जाना चाहे तो रोका न जा सके। क्योंकि हिंदू के ईसा उतने ही हैं जितने कि राम, जितने कि कृष्ण। ऐसा कुछ विधेयक लाओ, वह धर्म-स्वातंत्र्य का विधेयक होगा, कि जिसमें कोई ईसाई अगर जैन-मंदिर में जाकर ध्यान करना चाहे तो कोई रुकावट न डाली जा सके। अभी तो हालतें बड़ी अजीब हैं।
अभी तो हालतें ऐसी हैं कि जैन-मंदिर में ईसाई का या मुसलमान का जाना तो दूर, दिगंबर जैन-मंदिर में श्वेतांबर को न जाने दें! प्रोटेस्टेंट चर्च में कैथलिक को न जाने दें! हिंदू के मंदिर में, सवर्ण का मंदिर हो, तो शूद्र को न जाने दें!
कुछ ऐसा विधेयक लाओ कि सारे मंदिर, सारी मस्जिदें, सारे गुरुद्वारे सबके हों। जो जहां चाहे, जहां मौज हो। और क्यों न ऐसा हो कि एक दिन मंदिर और एक दिन मस्जिद और एक दिन गुरुद्वारा! सबके स्वाद क्यों न लिए जाएं? गुरुद्वारे का भी अपना मजा है! गुरुग्रंथ का भी अपना रस है! कभी-कभी उसे भी चखा जाए। एक सा ही आध्यात्मिक भोजन क्यों रोज-रोज? और फिर उससे ऊब पैदा होती है।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी ने भिंडियां बनाईं और मुल्ला ने बहुत तारीफ की और कहा कि भिंडी बड़ी अदभुत है! दूसरे दिन भी बनाईं भिंडियां। मुल्ला ने कोई तारीफ नहीं की, सिर्फ भिंडियां चुपचाप खाता रहा। तीसरे दिन भी भिंडियां बनाईं। मुल्ला ने मुंह बिचकाया, मगर किसी तरह भिंडियां लील गया। चौथे दिन भी जब भिंडियां बनीं तो मुल्ला ने थाली फेंक दी। पत्नी ने कहा, यह बड़ा असंगत व्यवहार है। थाली क्यों फेंकी?
तो मुल्ला ने कहा, भिंडी, भिंडी, भिंडी...क्या मुझे बिलकुल पागल कर देगी?
तो उसने कहा, तुम्हीं ने तो कहा था पहले दिन कि भिंडी बड़ी प्यारी है! तो मैं तो तुम्हारी ही बात मान कर चल रही हूं।
तुम्हारे जीवन में इतनी उदासी न रहेगी, इतनी धूल न रहेगी, अगर कभी-कभी कुरान का भी स्वाद लो और गीता का भी स्वाद लो और उपनिषद का भी स्वाद लो और बाइबिल का भी स्वाद लो। तुम्हारी जिंदगी में ज्यादा रंग होगा, ज्यादा रस होगा। तुम्हारी जिंदगी में ज्यादा आयाम होंगे। तुम्हारी जिंदगी में ज्यादा पहलू होंगे। जैसे कोई हीरे को निखारता है तो पहलू धरता है, अनेक पहलू बनाता है हीरे में। जितने ज्यादा पहलू होते हैं, हीरे में उतनी चमक आती है।
एक ऐसी दुनिया चाहिए जहां हर आदमी को मनुष्य की पूरी वसीयत पूरी की पूरी उपलब्ध हो। यह बात बड़ी दरिद्रता की है कि तुम हिंदू हो, इसलिए जीसस के प्यारे वचन तुम्हारे प्राणों में कभी न गूंजेंगे! तुम वंचित रह जाओगे! और जीसस के वचन ऐसे हैं कि जो उनसे वंचित रह गया, वह कुछ कम रह गया। कुछ ज्यादा हो सकता था। एकाध और कली खिल सकती थी। एकाध और सुगंध उठ सकती थी। रोशनी और थोड़ी सघन हो सकती थी। जो आदमी जीसस से अपरिचित है, उस आदमी में कुछ कमी रह गई; उसकी आत्मा के किसी कोने में अंधेरा रह ही जाएगा, निश्चित रह जाएगा! क्योंकि कृष्ण के बहुत प्यारे वचन हैं, मगर जीसस अनूठे हैं, अद्वितीय हैं! कृष्ण कृष्ण हैं, जीसस जीसस हैं, बुद्ध बुद्ध हैं! सब अनूठे हैं! तुम सबका अद्वितीय आनंद लो।
अगर कोई मुझसे पूछे, तो इसको मैं कहूंगा, स्वतंत्रता-विधेयक--कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का हक है और प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक धर्म में रस लेने का हक है। और प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक धर्मगृह में, मंदिर में, पूजागृह में जाने का अधिकार है। कोई कहीं रोका नहीं जा सकता।
और जरूरत क्या है कि लेबल लगाओ कि यह ईसाई और यह हिंदू और यह मुसलमान और यह जैन? लेबल लगाने की जरूरत क्या है? विशेषण लगाने की जरूरत क्या है? क्या धार्मिक होना काफी नहीं है? क्या धार्मिक होना पर्याप्त नहीं है? क्या तुम सोचते हो, हिंदू होकर तुम धार्मिक से कुछ ज्यादा हो जाओगे? कुछ कम हो जाओगे, ज्यादा नहीं।
धर्म आना चाहिए पृथ्वी पर। और ये सब धाराएं धर्म की धाराएं हैं। और ये सारी धाराएं मिल कर धर्म की गंगा बनती है।
यह जो विधेयक लाया जा रहा है, अलोकतांत्रिक है, जन-विरोधी है, धर्म-विरोधी है।
लेकिन फिर दोहरा दूं: मेरे विरोध का कारण वही नहीं है जो ईसाइयों का है। उनका विरोध का कारण तो वही है जो संसद में विधेयक लाने वालों का है।
विधेयक लाने वालों के पीछे हिंदू मतांध, आर्यसमाजी, इस तरह के लोग हैं। और विधेयक का विरोध करने वाले ईसाई। मैं न तो ईसाई हूं, न हिंदू हूं। मैं तो सिर्फ जैसा मुझे दिखाई पड़ रहा है साफ-साफ, वैसा कह रहा हूं, मेरा कोई पक्षपात नहीं है।

दूसरा प्रश्न: संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है। मैं यही निर्णय नहीं ले पा रहा हूं कि संन्यास लूं कि न लूं! क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि अपने ही साथ ढोंग कर रहा हूं। मुझे ऐसा लगता है कि मैं संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।

जमुनासिंह! संन्यास होने के योग्य कौन है? संन्यास लेने की पात्रता किसकी है? और अगर पात्रता ही हो, तो संन्यास की जरूरत क्या रह जाएगी? पात्र नहीं हैं, पात्रता लाने के लिए ही संन्यास है! बीमार होते हो तो औषधि लेते हो। यह तो नहीं कहते कि मैं बीमार हूं, अभी औषधि कैसे लूं? जब स्वस्थ हो जाऊंगा तब औषधि लूंगा।
संन्यास तो औषधि है, चिकित्सा है, उपचार है। तुम अपात्र हो, इसीलिए तो जरूरत है। अगर तुमने अपात्रता को ही रुकने का कारण बना लिया, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। फिर तो तुम कैसे संन्यासी होओगे? संन्यास पात्रता लाएगा। संन्यास साध्य नहीं है, साधन है--इसे याद रखो। संन्यास साधन है कि तुम्हें पात्र बनाए, निखारे, बुहारे, झाड़े तुम्हारी आत्मा को। धोए, स्नान करवाए। ताकि तुम परमात्मा के योग्य बन सको। संन्यास तुम्हें परमात्मा के योग्य बनाने की पात्रता देगा।
अब तुम कहते हो, पहले मैं पात्र होऊं, तब संन्यासी होऊं। तब तो तुम सिद्ध हो जाओगे, फिर संन्यासी नहीं होओगे। फिर तो तुम बुद्ध हो जाओगे, संन्यासी नहीं होओगे। संन्यास का तो स्पष्ट अर्थ है कि मैं अपात्र हूं, हजार मेरी भूल-चूकें हैं, हजार मेरी नासमझियां हैं, उनको ही काटने के लिए यह गर्दन ले आया हूं; यह संन्यास की तलवार उठे और यह गर्दन कटे।
फिर किस बात को तुम अपात्रता कहते हो, वह भी जरा विचारणीय है। क्योंकि लोगों ने अपात्रता की भी अदभुत परिभाषाएं कर रखी हैं। कोई आदमी अपात्र मानता है अपने को, क्योंकि ब्रह्ममुहूर्त में नहीं उठ पाता।
एक सज्जन ने मुझसे आकर कहा कि कैसे संन्यास लूं? मैं नौ बजे के पहले तो सोकर ही नहीं उठता! उन्होंने इस भरोसे से बात कही, कि यह तो गणित साफ है कि ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए संन्यासी को। मैं तो नौ बजे उठता हूं, तो मैं कैसे संन्यासी हो सकता हूं!
मैंने उनसे पूछा, थोड़ा विचार करो; तुम कब उठते हो, इससे संन्यास का कौन सा अनिवार्य संबंध होगा? घड़ी में कितने बजे हैं--नौ बजे, कि छह बजे, कि पांच, कि तीन--इससे संन्यास की कौन सी अनिवार्यता है? उठ आते हो, यही बहुत है। नौ बजे उठ तो आते हो! और नौ बजे उठ आते हो, उससे संन्यास का संबंध नहीं है, जब उठ आते हो तब सच में जागे हुए होते हो, कि सोए-सोए चलते रहते हो? जागे में जो जागे! नौ बजे तुम उठ आए, वह तो ठीक है, वह तो आंख खुल गई सिर्फ। सपने वही चल रहे हैं, वासनाएं वही चल रही हैं, कामनाएं वही चल रही हैं। ध्यान नहीं है, जागरण नहीं है, होश नहीं है, तो नौ बजे उठो कि पांच बजे उठो, क्या फर्क पड़ेगा!
ब्रह्ममुहूर्त का कोई संबंध घड़ी से नहीं है। ब्रह्ममुहूर्त का संबंध तुम्हारे भीतर उस अदभुत घटना से है जब जागे में जागना घटता है, तब ब्रह्ममुहूर्त। वह कभी भी घट सकता है। भर दोपहरी में घट सकता है। आधी रात घट सकता है। ब्रह्ममुहूर्त का अर्थ होता है: जिस क्षण तुम्हें ब्रह्म का अनुभव हो। सीधी तो बात है। तीन बजे उठने से ब्रह्म का अनुभव हो जाएगा? तो कई बुद्धू तीन बजे उठ रहे हैं जिंदगी भर से! दिन भर झोंका खाते हैं, नींद आती है, और कुछ नहीं! तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी जो तीन बजे उठ आते हैं, उनकी आंखें तुम देखो। दिन भर झोंका खा रहे हैं।
कल मैंने अखबार में पढ़ा कि दो बड़े सर्वोदयी और बड़े गांधीवादी अहमदाबाद में मिले, देश की समस्याओं पर विचार करने को। एक हैं आचार्य जे.बी.कृपलानी और दूसरे हैं रविशंकर महाराज। रविशंकर महाराज की उम्र हैं पंचानबे साल, कृपलानी की उम्र है तिरानबे साल। रविशंकर महाराज को तीन आदमी उठा कर लाए। कृपलानी को दो आदमियों ने सम्हाल कर बिठाला। आधा घंटा संग-साथ रहे, बात कुछ ज्यादा हुई नहीं--क्योंकि बीच-बीच में दोनों की झपकी लग जाती। बूढ़े हो गए, पंचानबे साल, बीच-बीच में झपकी खा जाते, बातचीत तो भूल ही जाती। और जो ज्यादा से ज्यादा बातचीत हुई--देश की बड़ी समस्याओं पर विचार करने इकट्ठे हुए थे--जो ज्यादा से ज्यादा बातचीत हुई वह इतनी हुई कि कहिए, आपका स्वास्थ्य कैसा है? उन्होंने उनसे पूछा, उन्होंने उनसे पूछा। और जब विदा हुए तो एक-दूसरे को सलाह देकर विदा हुए कि जरा स्वास्थ्य का खयाल रखना!
उठ आओ तीन बजे, जिंदगी भर उठते रहो, झपकियां खाते रहोगे। ब्रह्ममुहूर्त नहीं आएगा ऐसे! ब्रह्ममुहूर्त तो ध्यानी को आता है।
मगर वे सज्जन इसको अपात्रता मानते थे। उन्होंने कहा, आपने मुझे बड़ा ढाढ़स दिया; मैं तो दबा जा रहा हूं ऐसे पहाड़ के नीचे। क्योंकि मेरी पत्नी कहती है कि तुम क्या धार्मिक होओगे! वह उठती है पांच बजे, और भजन-कीर्तन भी करती है, उसके सामने तो मैं बिलकुल ही दीन-हीन हो जाता हूं। क्योंकि मैं नौ बजे तक पड़ा रहता हूं। तो वह मुझे तामसी कहती है। और मैं भी मानता हूं कि तामसी हूं। आपने अच्छा मुझे बोध दिया! तो मैं तामसी नहीं हूं?
नौ बजे उठने से तामस का क्या संबंध! तुम सोते कब हो?
कहा, मैं तो दो बजे के पहले कभी नहीं सोता।
और तुम्हारी पत्नी कब सोती है?
वह आठ ही बजे सो जाती है।
तो मैंने कहा, मामला क्या है? जो आठ बजे सो जाता है वह पांच बजे उठ आएगा। स्वभावतः उठना ही पड़ेगा। तुम दो बजे सोओगे तो नौ बजे उठोगे, यह बिलकुल स्वाभाविक है। सात-आठ घंटे तो सोना ही पड़ेगा। लेकिन इससे अपात्रता कहां है? इसमें तामस कहां है?
कोई सोचता है कि मैं दो बार भोजन करता हूं, इसमें तामस है। संन्यासी को तो एक ही बार भोजन करना चाहिए।
संन्यास का संबंध इस बात से है--उतना ही भोजन करना चाहिए जितना जरूरी है। दो बार जरूरी हो तो दो बार और तीन बार जरूरी हो तो तीन बार। सच तो यह है, अगर आदमी के स्वभाव को ठीक से समझा जाए, उसके शरीर को ठीक से समझा जाए, तो जितना थोड़ी-थोड़ी मात्रा में और जितनी बार भोजन किया जाए उतना स्वास्थ्यप्रद है।
तुम्हें पता होना चाहिए कि भारत में वायु-विकार से बहुत लोग पीड़ित हैं। इतने लोग वायु-विकार से दुनिया में कहीं पीड़ित नहीं हैं। और उसका कारण? उसका कारण इकट्ठा भोजन कर लेना है। जितना भोजन भारतीय करते हैं उतना दुनिया में कोई नहीं करता। अमरीका में लोग पांच बार करते हैं, मगर थोड़ा-थोड़ा। कभी बोझ नहीं पड़ता पेट पर। तो अमरीका में अगर लोगों के शरीर ज्यादा अनुपात में मालूम पड़ते हैं, तो स्वाभाविक है। स्त्रियों की देहें अगर ज्यादा सुंदर हैं, अनुपातपूर्ण हैं, तो ज्यादा स्वाभाविक है, बिलकुल ठीक है। यहां तो हम इतना भोजन एक साथ भर लेते हैं, क्योंकि दो बार करना है। और जिनको एक ही बार करना है, उनकी तो फिर तुम मुसीबत समझ ही सकते हो! उनको तो फिर इतना भर लेना है कि चौबीस घंटे काम दे दे। वे तो ऐसे भर लेते हैं जैसे ऊंट रेगिस्तान में जाने के पहले पानी भर लेता है। क्योंकि चौबीस घंटे ईंधन चलाना है।
दिगंबर जैन मुनि एक ही बार भोजन करते हैं। मगर सबकी तोंद निकली होती है। यह बड़ी हैरानी की बात है! एक बार भोजन करने वाले लोग और तोंदें निकली हुई हैं! इनके तो पेट पीठ से लग जाने चाहिए। और बड़ी भद्दी लगती हैं तोंदें। ये तोंदें क्यों निकली हुई हैं? एक ही बार भोजन करना है। तो जितना कर लो! क्योंकि फिर चौबीस घंटे फिर उपाय नहीं है।
जैन मुनि रात में पानी नहीं पोते। तो शाम को ही डट कर पी लेना है। इतना पी लेना है जिसका हिसाब नहीं!
एक बार सोहन के घर मैं मेहमान था और चार-पांच जैन साध्वियां मुझसे मिलना चाहती थीं, वे भी आकर वहां मेहमान हो गईं। अब शाम को ही डट कर पानी पी लोगे, ज्यादा पी लोगे, तो फिर रात भर पेशाब करनी पड़ेगी। अब जैन साध्वियां हैं, वे आधुनिक बाथरूम का उपयोग नहीं कर सकतीं। क्योंकि जैन शास्त्रों में नियम है कि पानी में मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए। उन दिनों ठीक भी था, क्योंकि लोग तालाब में, नदी में मल-मूत्र त्याग करें--उसी में नहाना है, उसी में पानी पीना है, यह बिलकुल ठीक नियम था। लेकिन बुद्धूपन की कोई सीमा तो है ही नहीं! दुनिया में एक परमात्मा को छोड़ कर और मूढ़ता को छोड़ कर और कोई चीज अनंत नहीं है। तो नदी में, नाले में नहीं मल-मूत्र त्याग करना है। और अब जो आधुनिक संडास है, उसमें तो पानी है ही, सेप्टिक टैंक का पानी है उसमें। तो अब इस पानी में कैसे मल-मूत्र त्याग करना? और शाम से ही खूब डट कर पानी पी लो। क्योंकि गर्मी के दिन और रात भर फिर पानी पीना नहीं है, तो जितना पी सको। तो वे साध्वियां रात भर थाली में पेशाब करें और सड़क पर फेंकने जाएं। चपरासी देखता रहा रात। सुबह उसने सोहन से कहा कि ये बाइयां भी खूब हैं! ये रात भर पता नहीं थाली में क्या-क्या भर कर लाती हैं और सड़क पर फेंक जाती हैं।
अब यह तुम पागलपन देखते हो! लेकिन तुमने साधुओं को भी अपने साथ अपने ही जैसा मूढ़ बना लिया है। कोई सोचता है कि तीन बार भोजन करता हूं, तो अपात्र।
मनुष्य के शरीर की अगर जांच करो, तो पता चलेगा कि वह थोड़ा-थोड़ा भोजन करे और अनेक बार करे, तो ज्यादा स्वास्थ्यप्रद है। बोझिल नहीं होगा, भारी नहीं होगा। मनुष्य शाकाहारी है। तुम देखते हो, बंदर शाकाहारी है, बस दिन भर बंदर का काम चलता ही रहता है। इस झाड़, उस झाड़। सिंह मांसाहारी है, वह एक ही बार भोजन करता है चौबीस घंटे में। मांसाहारी जानवरों की जो अंतड़ी होती है, छोटी होती है। शाकाहारी जानवरों की अंतड़ी बहुत लंबी होती है। मनुष्य की अंतड़ी बहुत लंबी है। उसकी अंतड़ियों की लंबाई सबूत है कि वह शाकाहारी है। मांसाहार एक बार कर लिया तो बहुत। क्योंकि मांसाहार पचा-पचाया भोजन है। दूसरा जानवर उसे पहले ही पचा चुका है। तभी तो वह मांस बना। अब तुम साग-सब्जी लोगे, तो तुम्हें दोहरे काम करने पड़ेंगे। तुम्हें खुद ही पचाना पड़ेगा, तो पचाने की लंबी प्रक्रिया है। फिर साग-सब्जी में नब्बे प्रतिशत तो व्यर्थ है, जो बाहर फेंकना पड़ेगा। मांसाहार तो पूरा का पूरा पचाया जा सकता है। उसमें व्यर्थ कुछ भी नहीं है।
तो सिंह एक ही बार भोजन कर लेता है। क्या तुम समझते हो सिंह बड़ा सात्विक है, एक ही बार भोजन करने से? और बंदर तामसिक है? बंदर शाकाहारी है, शुद्ध गांधीवादी है। बंदर बिलकुल जैन है। सिंह यद्यपि जैन मुनि की तरह एक ही बार भोजन करता है, मगर उसको तुम जैन मुनि नहीं कह सकते। वह मांसाहारी है।
तामस क्या? धारणाएं बना ली हैं। उन पर कभी सोच-विचार भी नहीं किया है। और उन्हीं धारणाओं में बंधे चले जाते हो।
अब जमुनासिंह, तुम पूछते हो कि संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।
क्या तुम्हारी अयोग्यता है? धूम्रपान करते हो? कोई बड़ी अयोग्यता नहीं है। ऐसे धुएं को बाहर ले जाना, भीतर लाना, बाहर ले जाना, भीतर ले जाना, इसमें क्या अयोग्यता है? उसी में भावातीत-ध्यान को जोड़ दो। राम-हरि, राम-हरि जपते रहना जी! जब धुआं बाहर ले जाओ--राम, और जब धुआं भीतर ले जाओ--हरि। बस राम-हरि, राम-हरि करते रहना। तो धूम्रपान पर ही सवार हो गया, भावातीत-ध्यान हो गया।
किस बात को तुम कह रहे हो अपात्र हो? पत्नी-बच्चे हैं? सो राम के भी थे, जनक के भी थे--और अपात्र नहीं हुए। कि छोटा-मोटा घर-द्वार है? सो जनक का बड़ा महल था--और अपात्र नहीं हुए। और तुम झोपड़े में ही अपात्र हुए जा रहे हो? कुछ गणित भी तो बिठाओ! कुछ हिसाब-किताब भी सीखो! कि कभी-कभी गुस्सा आ जाता है? सो दुर्वासा मुनि की याद करो! ऋषि-मुनि कैसे-कैसे सुंदर उदाहरण दे गए हैं। उनसे कुछ चेतना लो। कि सुंदर स्त्रियां देख कर मन डांवाडोल हो जाता है? तो सभी ऋषि-मुनियों के डांवाडोल होते रहे। उर्वशियां आती रहीं, अप्सराएं उतरती रहीं और ऋषि-मुनि डांवाडोल होते रहे। अगर तुम्हारा भी दिल डांवाडोल होता है, तुम भी ऋषि-मुनि हो। अगर तुम्हारे पास भी अप्सराएं आने लगी हैं, तो मतलब इंद्र का सिंहासन कंप रहा है। जमुनासिंह, एकाध कदम और, कि तुम सिंहासन पर सवार हुए! किस बात को अपात्रता कहते हो? सब मानवीयता है, अपात्रता कुछ भी नहीं है।
मेरी बात पर खयाल करना, सब मानवीयता है। ये मानवीय सीमाएं हैं। इनको अपात्रता कह कर नाहक निंदा से अपने को मत भरो। क्योंकि निंदा एक बार तुम्हारे भीतर प्रविष्ट हो जाए, आत्म-निंदा, तो तुम जीवन को फिर कभी भी हिम्मत से जी न सकोगे। और तुम्हारे तथाकथित साधु-संत इसी कला में कुशल हैं। तुम्हें आत्म-निंदा से भर दिया है। तुम्हारा इतना अपमान किया है हर तरह से, हर चीज से, कि तुम धीरे-धीरे अपने को महापापी समझने लगे हो। और उस महापाप की धारणा के कारण तुम सोचते हो: कैसे संन्यास होगा? कैसे प्रार्थना होगी? कैसे पूजा होगी? यह अपने से नहीं हो सकता। यह तो विशिष्ट लोगों की बात है। यह तो कुछ खास शुद्ध आत्माओं की बात है। बस इस बहाने तुम जैसे हो वैसे ही बने रहोगे फिर।
मैं तुमसे कहता हूं: संन्यास तुम्हारे लिए है। मनुष्य की सारी सीमाएं अंगीकार करो। तुम मनुष्य जैसे मनुष्य हो। मनुष्य को क्रोध भी आता है, लोभ भी आता है, मोह भी आता है, कामवासना भी उठती है--ये सब मनुष्य के स्वाभाविक लक्षण हैं। इनमें न कुछ पाप है, न इनमें कुछ आत्मग्लानि से भरने का कारण है। हालांकि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इन्हीं पर रुके रहो। अगर इन्हीं पर रुके रहो, यह मुझे कहना होता, तो संन्यास की बात ही नहीं कहता।
फिर संन्यास क्या है?
संन्यास है इन्हीं मनुष्य की सीमाओं का उपयोग कर लेना सीढ़ियों की तरह। क्रोध को सीढ़ी बना लेना करुणा की। काम को सीढ़ी बना लेना राम की। संन्यास कीमिया है, कला है, विज्ञान है। लोहे को सोने में बदलने का रसायनशास्त्र है।
तुम कहते हो, संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है।
जब भी भाव में और विचार में संघर्ष हो, भाव को चुनना। नहीं तो तुम जैसे हो वैसे के वैसे रह जाओगे। विचार कायर है। हमेशा कायर है। भाव में साहस होता है। भाव में ही लोग जोखम उठाते हैं। विचार में कहां? विचार करने वाला तो खड़ा सोचता ही रह जाता है। इसलिए तुमने देखा, जहां जोखम उठाने का क्षण होता है, वहां विचार की प्रक्रिया अपने आप बंद हो जाती है।
समझो कि तुम कार चला रहे हो और अचानक तुम्हें दिखाई पड़ा कि सामने के सरदार जी जो ट्रक लिए चले आ रहे हैं, इनसे बचना मुश्किल है, बारह बज गए हैं! और ताड़ी भी डट कर पी गए हैं। आंखें बंद हैं, और ट्रक चला आ रहा है भयंकर गति से, और बचने का कोई उपाय नहीं है। कुछ सेकेंड पहले तुम्हें यह अहसास हो जाएगा--अब बचने का कोई उपाय नहीं है, गए, गए, गए...। उस समय तुम एक चकित होकर बात जानोगे--अगर बच गए तो पीछे याद आएगी--कि उतने क्षणों के लिए विचार बंद हो जाएगा। कृत्य जारी रहेगा, विचार बंद हो जाएगा। अब तुम भाव के जगत से प्रक्रिया करोगे। हो सकता है, तुम अपनी गाड़ी को खेत में डाल दो। सरदार जी से जूझने की बजाय हो सकता है नदी में छलांग लगा जाओ गाड़ी सहित--कि नदी में फिर भी बचने की आशा है! लेकिन यह होगा विचार से नहीं, भाव से। अगर विचार से करने चलोगे तब तो बहुत देर लग जाएगी। क्योंकि विचार समय चाहता है। तत्क्षण नहीं होता। सोच-विचार में समय लगता है। और यहां तो पलों की बात है। पलक झपी और मामला खतम हुआ!
कभी-कभी तुम्हारे जीवन में ऐसे क्षण होते हैं, जब तुम भाव से कृत्य करते हो। वे कृत्य बड़े अदभुत हैं। संन्यास उन्हीं कृत्यों की दीक्षा है। धीरे-धीरे साधारण जीवन में भी--जहां न ट्रक है, न सरदार जी हैं, न बारह बजे हैं--साधारण जीवन में भी भाव से निष्पन्न होने लगे व्यक्तित्व। संन्यास विचार से हट कर भाव की दुनिया में प्रवेश है। मस्तिष्क से उतर कर हृदय में विराजमान होना है। तर्क को छोड़ कर प्रेम से जीने का नाम संन्यास है।
और तुम कहते हो, संन्यास का भाव उठ रहा है, और मन है कि भागने की कह रहा है।
मन तो कहेगा। मन यानी विचार। मन तो कहेगा: किस पागलपन में पड़े जा रहे हो? निकल भागो! जल्दी करो! ज्यादा देर रह गए, कहीं रंग चढ़ न जाए! कहीं ये दीवानों की मौजूदगी और तुम्हें भी हिम्मत न दे दे और कुछ कर गुजरो, पीछे पछताओ! अभी निकल भागो! मन तो समझाएगा। मन तो हमेशा संकोच ही करता रहता है। अगर मन पर ही तुम छोड़ दो, तो जीवन में कभी भी कुछ कृत्य न हो पाएगा। तुम्हारा जीवन खाली का खाली जाएगा। अगर मन पर ही छोड़ दो, तो तुम कुछ भी निर्णय न कर पाओगे। निर्णय मन की क्षमता नहीं है। निष्पत्तियां मन में पैदा ही नहीं होतीं। मन तो सिर्फ ऊहापोह करता है--ऐसा हो जाए, वैसा हो जाए! ऐसा होगा तो क्या होगा? वैसा होगा तो क्या होगा? और इसका कोई अंत नहीं आता। भाव से कृत्य होता है।
संन्यास तो भाव से ही होने वाला है। जो सोच-विचार कर संन्यास लेंगे, उन्होंने संन्यास लिया ही नहीं। उन्होंने तो गणित बिठाला। वे तो दीवाने हुए ही नहीं। वे तो प्रेम में पागल हुए ही नहीं। और मन सचेत करेगा। मन हजार दलीलें देगा। मन वकील है। मन कहेगा, पहले सोचो! घर जाओगे, पत्नी क्या कहेगी?
मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्रों में बैठा था और हांक रहा था दूर की, कि एक दफा मैं शिकार को गया। भटक गए जंगल में, बहुत खोजा, मगर सिंह का, सिंहनी का कोई पता नहीं। मगर मुझे एक ऐसी आवाज करनी आती है कि जब सब शिकारी थक गए और उन्होंने हार मान ली और मेरे चरणों में सिर रख दिया और कहा कि मुल्ला, अब तुम्हीं कुछ करो, आना व्यर्थ हुआ जा रहा है। मैंने कहा, व्यर्थ नहीं होगा; मैं एक ऐसी आवाज जानता हूं, आवाज लगाते ही एक क्या, दो-चार सिंह-सिंहनियां मौजूद हो जाएंगी। मैंने आवाज दी। फौरन एक सिंहनी झाड़ी से निकली और चली आई। शिकार भी हो गया, यात्रा भी सफल हुई।
मित्रों ने पूछा कि मुल्ला, वह कैसी आवाज थी? एक दफा लगा कर बताओ न!
तो मुल्ला ने आवाज लगाई। फौरन पत्नी बेलन लिए भीतर से निकल आई। उसने कहा कि फिर तुमने वही हरकत की! हजार दफे कह दिया कि इस तरह की आवाज नहीं निकाला करें।
मुल्ला ने कहा, देखा? अब यहां कोई सिंहनी तो है नहीं, मगर जो भी उपलब्ध है, आपके सामने है।
मन कहेगा, घर जाओगे, एकदम सिंहनी निकल आए! फिर क्या करोगे? फिर भागे गैल न मिलेगी। पास-पड़ोस के लोग हंसेंगे। दफ्तर में जाओगे तो लोग पागल कहेंगे। लोग पूछेंगे--तुम्हें क्या हो गया? भले-चंगे गए थे, यह क्या हालत हो गई? किस चक्कर में आ गए? मन ये सारी बातें उठाएगा। और अगर मन की सुनना है, तो फिर तुम्हारे जीवन में कभी कोई क्रांति नहीं हो पाएगी!
मन क्रांतिकारी है ही नहीं। मन तो बहुत ही प्रतिक्रियावादी है। दकियानूस। लकीर का फकीर। जो करता रहा है, बस वही करता है, वही करना चाहता है। मन तो कोल्हू का बैल है।
भाव से क्रांति घटती है। उठता हो भाव, साहस हो भीतर, तो ये बहाने मत खोजो: पात्र, अपात्र। मैं चिंता नहीं करता। मैंने अपात्रों को पात्र बनाने का निर्णय लिया है। तुम कितने ही अपात्र होओ, मेरी तरफ से इनकार नहीं है। क्योंकि कोई भी मनुष्य इतना अपात्र नहीं हो सकता कि परमात्मा से सदा-सदा के लिए दूर रह जाए। एक धागा, एक धागा तो बंधा ही रहता है। नहीं तो हम मर ही जाएंगे। हमारे जीवन का धागा तो बंधा ही रहता है। नहीं तो हम जी ही न सकेंगे। वही सांस लेता है तो हम सांस लेते हैं। वही धड़कता है तो हम धड़कते हैं। तो परमात्मा से हम जुड़े हैं। जब परमात्मा हमें इतना पात्र मान रहा है कि अभी और जीओ, और जीए जाओ, जब उसका आशीर्वाद बरस रहा है, तो फिर मैं कौन हूं जो तुम्हारे संन्यास में बाधा आऊं?
मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि आप हर किसी को संन्यास दे देते हैं!
मैंने कहा, मैं क्या करूं? परमात्मा हर किसी को जीवन दे देता है। जीवन जैसी चीज देने में संकोच नहीं करता, तो मैं संन्यास देने में क्यों संकोच करूं? संन्यास तो केवल जीवन को निखारने की कला का नाम है। जब जीवन उसने दे दिया, तो निखारने की कला, साफ करने की कला--दर्पण तो उसने दे दिया, मैं तो धूल साफ करने के लिए थोड़ा सा आयोजन देता हूं। जब परमात्मा ने जीवन दे दिया, तो मैं कौन हूं जो कहूं कि संन्यास नहीं दूंगा।
इसलिए मैंने किसी को इनकार नहीं किया संन्यास के लिए। हां, तुम्हीं भाग जाओ अपनी अपात्रता को मान कर, तुम्हारी मर्जी! फिर तुम परमात्मा से यह भी प्रार्थना क्यों नहीं करते कि मुझ अपात्र को जीवन क्यों दिया? मैं कैसे जीऊं, मैं तो अपात्र हूं! ब्रह्ममुहूर्त में उठता नहीं, धूम्रपान करता हूं, चार बार भोजन, रात देर से सोता हूं, ताश खेलने की भी लत है--तुमने मुझे जीवन क्यों दिया? और अब भी वापस क्यों नहीं ले लेते? मैं पात्र नहीं हूं।
मेरे हिसाब में जो जीवित होने का पात्र है, वह संन्यास का पात्र भी है। क्योंकि संन्यास तो सिर्फ जीवन को ही रूपांतरित करने की कीमिया है, और कुछ भी नहीं। जीवन तुम्हारे पास है, जीवन को बदलने की कला मैं तुम्हें दे सकता हूं।
तुम कहते हो, मैं यही निर्णय नहीं ले पा रहा हूं कि संन्यास लूं कि न लूं!
तुम कभी निर्णय न ले पाओगे। ये बातें निर्णय से नहीं होतीं। अगर बैठ कर ही सोचते रहे कि कितने तर्क पक्ष में और कितने तर्क विपक्ष में, तो जिंदगी बीत जाएगी, तुम कभी निर्णय न ले पाओगे।
इमेनुअल कांट जर्मनी का एक बड़ा विचारक हुआ। एक स्त्री ने उससे निवेदन किया। स्त्री भी खूब रही होगी! क्योंकि इमेनुअल कांट ऐसा आदमी नहीं जिसके प्रेम में कोई पड़ जाए। बिलकुल रूखा-सूखा आदमी था। गणित। शुद्ध गणित। ऐसा गणित कि उसके नौकर को यह नहीं कहना पड़ता था आकर कि नाश्ता लें। नौकर को कहना पड़ता था: सात बज गए, मालिक! सात बज गए यानी नाश्ता। कि बारह बज गए, मालिक! बारह बज गए यानी भोजन। कि दस बज गए, मालिक! दस बज गए यानी रात हो गई--बिस्तर में। ऐसा भी हो जाता कि लोग बैठे होते--मिलने-जुलने वाले कोई आ गए हैं, मेहमान कोई आ गए हैं--और नौकर आकर कह देता: मालिक, दस बज गए। कि फिर वह नमस्कार भी नहीं करता था, क्योंकि उतनी देर भी नहीं खो सकता। नियम! वह उचक कर जल्दी से अपने कंबल के भीतर हो जाता। नौकर दूसरों से कहता, अब आप लोग जाइए, मालिक सो गए। दस बज गए यानी सो गए। घड़ी से चलता था।
कहते हैं कि इमेनुअल कांट जब विश्वविद्यालय पढ़ाने जाता था तो लोग उसको देख कर अपनी घड़ियां सुधार लेते थे। क्योंकि उसमें कभी भूल हुई ही नहीं--चालीस साल तक, सतत, मिनट-मिनट। एक दिन ऐसा हुआ कि रास्ते में पानी गिर गया था, कीचड़ मची थी, एक जूता उसका कीचड़ में फंस गया। तो उसने उसे निकाला नहीं, क्योंकि उसको निकाले तो उतनी देर लग जाएगी पहुंचने में! उस जूते को वहीं छोड़ दिया, एक ही जूता पहने हुए यूनिवर्सिटी पहुंच गया। किसी ने पूछा कि दूसरे जूते का क्या हुआ? उसने कहा, वह कीचड़ में फंसा है। निकालूं तो देर हो जाए।
घड़ी के कांटे की तरह चलने वाला आदमी, इसके भी प्रेम में एक स्त्री पड़ गई। स्त्रियां ही तो हैं। इनका भी कोई भरोसा नहीं। इससे निवेदन कर बैठी। तो इसने कहा कि सोचूंगा, विचार करूंगा। हां-न सीधा कह देता--वह तो कर ही नहीं सकता था वह। वह तो किसी चीज में हां-न नहीं कहता था। सोचूंगा, विचारूंगा।
तीन साल बीत गए, सोचा, विचारा, खूब सोचा, खूब विचारा। सैकड़ों कारण पक्ष में लिखे, सैकड़ों कारण विपक्ष में; कि विवाह करो तो ये लाभ, ये हानियां; विवाह न करो तो ये लाभ, ये हानियां। आखिर में उसने पाया कि विवाह करने में एक लाभ भर ज्यादा है, वह यह कि अनुभव होगा। न करो, तो एक भर हानि है कि अनुभव नहीं होगा। तो पलड़ा भारी है।
तो तीन साल के बाद उसने जाकर द्वार पर दस्तक दी, लड़की के पिता ने दरवाजा खोला। और कांट ने कहा कि अंततः मैंने तय कर लिया, एक कारण ज्यादा पड़ता है, पलड़ा भारी है। मैं विवाह करूंगा।
पिता हंसने लगा और उसने कहा, बहुत देर हो गई। मेरी लड़की का तो विवाह भी हो चुका; एक बच्चा भी पैदा हो चुका; आप बहुत देर से आए; अब और सोचो। फिर अगर कोई दुबारा तुमसे निवेदन करे तो तुम पहले से ही निर्णय तैयार रखना। इतनी देर अगर सोचने में लगाओगे!
फिर विवाह हुआ नहीं, क्योंकि दुबारा किसी ने प्रार्थना इमेनुअल कांट से की नहीं।
सोच-सोच कर जीओगे तो क्षुद्र में ही समाप्त हो जाओगे। विराट में तो छलांग लगानी होती है, सोचना नहीं होता। विराट में तो साहस चाहिए जोखिम उठाने का, जुआरीपन चाहिए, धंधा नहीं, दुकानदारी नहीं।
जमुनासिंह, लेना हो ले लो, न लेना हो न लो, सोच-विचार में न पड़ो! सोच-विचार में वैसे ही परेशान हो जाओगे। ऐसे ही जिंदगी में क्या परेशानियां कम हैं! यह नई परेशानी और क्यों लेते हो--कि संन्यास लेना कि नहीं लेना? भूलो-भालो! लेना हो ले लो, न लेना हो न लो, मगर इस सोच-विचार में मत पड़ो। तुम्हारे भीतर वैसे ही तो हजार विचार हैं, और एक नया विचार तुम्हारे भीतर उपद्रव खड़ा करे, ऊहापोह मचाए--ऐसा मैं न चाहूंगा। तुम इस पूरे विचार को ही नमस्कार कर लो!
लेकिन अगर भाव उठ ही रहा है, तो उठता रहेगा। रह-रह कर उमंग आती रहेगी। रह-रह कर हवा का एक झोंका तुम्हें सहलाता रहेगा। अगर भाव उठ ही रहा है, तो भाव की भंवर में तुम्हें डूबना पड़ेगा। देर-अबेर जितनी चाहो कर लो। लेकिन जितनी देर करोगे, उतना समय व्यर्थ गया। उतने समय में तो कुछ अनुभव होता, कुछ जीवन पकता, कुछ फूल खिलते। निष्पत्तियां विचार की नहीं होतीं, भाव की छलांग।
और रही तुम्हारी यह बात कि मुझे ऐसा लगता है कि संन्यास लूं तो ढोंग कर रहा हूं।
शुरू में तो लगेगा। लगेगा भी इसीलिए कि तुमने संन्यास की कोई परंपरागत धारणा मान रखी है, कि संन्यासी कैसा होना चाहिए। मैं तो संन्यास की बिलकुल एक नई अवधारणा दे रहा हूं। मैं तो कह रहा हूं तुमसे कि तुम जैसे हो, वैसे के वैसे संन्यासी हो सकते हो। तुम्हारे ऊपर कोई नया ढांचा नहीं बिठा रहा हूं।
पुराने संन्यास की एक धारणा है। उस धारणा से अगर तौलोगे तो ढोंग मालूम पड़ेगा। जैसे, पुराने संन्यासी को कैसे रहना चाहिए, उसमें अगर तुमने जरा भेद पाया कि इससे मैं भिन्न रह रहा हूं--पुराना संन्यासी ब्रह्ममुहूर्त में उठता है, मैं आठ बजे उठता हूं--तो तुम्हें लगेगा मैं ढोंग कर रहा हूं। वह धारणा के कारण ढोंग की स्थिति बन रही है। धारणा की कोई जरूरत ही नहीं है। धारणा को ही जाने दो, ढोंग भी गया। मैं तो तुम्हें सरल-सहज होने को कह रहा हूं। ढोंग की बात ही क्यों पैदा होती है दुनिया में? इसीलिए क्योंकि तुम्हारे ऊपर आदर्श थोप दिए गए हैं। जहां आदर्श है, वहां ढोंग है। मैं तो कोई आदर्श देता नहीं, सारे आदर्श छीन लेता हूं।
जैसे समझो, अगर तुम्हें आदर्श दे दिया कोई कि बस यही भोजन करना संन्यासी के योग्य है। जैसे मोरारजी देसाई कहीं जाते हैं तो बड़ी लंबी फेहरिस्त जाती है। उस फेहरिस्त में क्या-क्या चीजें वे लेते हैं, कब-कब लेते हैं, उस सबका ब्योरा होता है। इतना दूध लेंगे--गाय का; इतना घी लेंगे, वह भी गाय के दूध का; चमचम और संदेश और मलाई, वह सब भी लेते हैं, मगर वह सबके नीचे लिखा रहता है--गाय के दूध से बना हुआ। लहसुन लेते हैं वे, तो लहसुन भी वैसी जैसी गुजरात में होती है। रूस गए तो भी लहसुन गुजरात वाली! और आम वैसे जैसे लखनऊ के होते हैं। उनकी भी फेहरिस्त, कि लंगड़ा, कि फलाना, कि ढिकाना--वह सारी फेहरिस्त, लंबी फेहरिस्त!
मगर यह कुछ नहीं है, मैं एक सज्जन को जानता हूं जो गाय का ही दूध नहीं लेते, सिर्फ सफेद गाय का दूध लेते हैं। एक दफे मेरे साथ यात्रा करनी पड़ी, बड़ी मुसीबत। अगर जरा सा काला दाग हो गाय पर, खतम। बिलकुल सफेद गाय चाहिए। मैंने उनसे पूछा कि यह मामला क्या है? क्या तुम सोचते हो काली गाय का दूध काला होगा? दूध तो सफेद ही होगा। उन्होंने कहा कि वह तो ठीक है, लेकिन काला रंग तमस का रंग है, सफेद रंग सात्विकता का रंग है।
अब अगर ऐसी मूढ़ताओं में पड़ोगे और ऐसे जाल अपने चारों तरफ खड़े करोगे, तो तुम्हें बहुत तरह के ढोंग करने पड़ेंगे। अब भूख लगी है जोर की, और गाय का दूध नहीं मिल रहा और भैंस का पीना पड़ा, तो चित्त में लगेगा--ढोंग हो रहा है। इसलिए नहीं कि भैंस का दूध पी रहे इसलिए ढोंग हो रहा है, बल्कि इसलिए कि वह जो धारणा बैठी है मन में कि गाय का ही पीना था तो ही सात्विक था।
तुम्हारी जितनी ज्यादा धारणाएं होंगी, उतना तुम्हारे भीतर ढोंग होगा। क्योंकि तुम्हारी सारी धारणाओं को हर हालत में पूरा करना आसान नहीं होगा।
मैं एक सज्जन को जानता हूं, जिनकी यह धारणा थी कि जब वे पानी भरें तो अपना बर्तन साफ करें, उस वक्त कोई स्त्री नहीं गुजरनी चाहिए। स्त्री गुजर गई कि बर्तन गंदा हो गया। फिर से बर्तन मलें। जब मुझे पता चला तो मैंने एक स्त्री को कहा कि पांच रुपये रोज दूंगा तुझे, इन महाराज को ठिकाने ही लगाओ! तेरा काम ही यही कि जब ये बर्तन लेकर जाएं नल पर, बस वहीं-वहीं चक्कर लगाना। मलने दो कितना मलते हैं।
दस दफे, पंद्रह दफे, बीस दफे--मगर वे भी आदमी एक हिम्मत के थे, मलते ही गए! क्रोध भी आए, गाली भी बकें, मगर कुछ कर भी नहीं सकते। आखिर उन्हें शक हुआ कि बात क्या है? यह औरत यहीं-यहीं क्यों चक्कर मार रही है? उससे पूछा कि बाई, तू यहीं-यहीं क्यों चक्कर मारती है? कहीं और जा! तेरे पीछे हमें बर्तन मलना पड़ रहा है बार-बार।
उसने कहा, आज तो नहीं जा सकती। इसका, यहीं चक्कर मारने का मुझे पांच रुपया मिला है। मुझे पता नहीं क्यों।...उसे मैंने कहा नहीं था कि इन सज्जन की वजह से।...मैं तो आज यहीं-यहीं चक्कर मारूंगी। और कल भी अगर पांच रुपये मिले तो कल भी चक्कर मारूंगी। आपको कोई तकलीफ है?
वे कहने लगे--उनकी आंखों में आंसू आ गए--उन्होंने कहा, तकलीफ? अस्सी बार बर्तन धो चुका हूं! अब क्या जिंदगी इसी में गुजरेगी? और मैं समझ गया किसने तुझे पांच रुपये दिए हैं।
वे अपना बर्तन लिए भागे सीधे मेरे पास आए, कि यह भी कोई मजाक है!
मैंने कहा, आज तो तुम्हें अपना पुराना नियम तोड़ना पड़ेगा।
उन्होंने कहा, वह तो ढोंग हो जाएगा। मन में मेरे भी कई बार आया, अस्सी बार हो गया बर्तन धोते-धोते, मन में मैंने भी सोचा--एकाध बार इधर को आंख करके, कि अपन ने देखा ही नहीं। जब देखा ही नहीं तो बात ही क्या? हालांकि देख तो लिया, मगर देखा ही नहीं! पानी भर कर अपने घर जाओ, अब यह दिन भर कब तक करते रहोगे? मगर वह ढोंग हो जाएगा।
अब तुम सोचते हो ढोंग कैसे पैदा होता है? पहले एक मूढ़तापूर्ण नियम तैयार कर लो। फिर उसके तोड़ने से ढोंग पैदा होता है। फिर कभी तोड़ना पड़े तो ग्लानि पैदा होती है, अपराध-भाव पैदा होता है। बनाओ आदर्श। जितने बड़े आदर्श बनाओगे, उतने ही तुम ओछे पड़ जाओगे। जितने ओछे पड़ोगे, उतनी ही तुम्हारी संभावना परमात्मा को पाने की कम हो जाएगी।
मैं तुमसे कहता हूं, सहज जीओ। सरलता से जीओ। आदर्श-मुक्त। बोधपूर्वक जीओ जरूर। बस बोध एकमात्र नियम है जो मैं तुम्हें देता हूं। प्रत्येक पल जो उचित लगे, उस क्षण में वह करो। अतीत की धारणाओं के आधार से मत जीओ वर्तमान में।
अन्यथा वर्तमान बदल रहा है, हर घड़ी बदल रहा है, गंगा बही जा रही है, और तुम पुरानी धारणा लिए बैठे हो! और वह धारणा दिक्कत देगी। वह कठिनाई में डालेगी। वह धारणा, दो ही संभावनाएं हैं उस धारणा के साथ। अगर तुम जिद्दी हुए, हठी हुए, तो पागल हो जाओगे उस धारणा को पूरा करने में। और अगर तुम थोड़े समझदार हुए, चालाक हुए, तो पाखंडी हो जाओगे। और ये ही दो विकल्प समाज ने दिए हैं तुम्हें। कुछ लोग जो होशियार हैं, वे पाखंडी हो गए हैं--बाहर कुछ दिखाते हैं, भीतर कुछ। रहते एक ढंग से हैं, दिखाते और ढंग से हैं। बोलते कुछ हैं, करते कुछ हैं। उनके जीवन में दोहरापन हो गया है। यह ढोंग, यह पाखंड। और कुछ जो जिद्दी हैं और बुद्धू हैं, वे पागल हुए जा रहे हैं। वे अस्सी दफे बर्तन मल रहे हैं। मगर एक बात सीधी सी समझ में नहीं आ रही है कि स्त्री के निकलने से बर्तन गंदा हो ही नहीं रहा है!
मैंने उन सज्जन को कहा कि अस्सी बार बर्तन धोकर भी तुम्हें यह अकल न आई--तुम भागे मेरे पास तो आ गए, तुम्हें यह तो अकल आ गई कि मैंने ही इस स्त्री को पांच रुपये दिए हैं, मगर तुम्हें यह अकल न आई कि स्त्री के गुजरने से यह पात्र गंदा कैसे हो जाएगा? पात्रों को कहीं पता चलता है कि कौन स्त्री, कौन पुरुष? और तुम नल पर बैठे पानी भर रहे हो और यह नल जिस झील से आ रहा है उस झील पर स्त्रियां घूम रही होंगी। और यह नल नालियों में से होकर चला आ रहा है और रास्ते में से होता चला आ रहा है और हजारों तरह की स्त्रियां घूम रही होंगी ऊपर। और हजार गंदगियों में से गुजर रही है यह नल की नली--वह सब ठीक, बस स्त्री दिखनी नहीं चाहिए! तुम्हारी आंख गंदी हो जाती है कि पात्र गंदा हो जाता है? मामला क्या है? आंख धो ली, पात्र के पीछे क्यों पड़े हो? किसने तुम्हें समझाया?
उन्होंने कहा कि मेरे गुरुदेव ने कहा था। वे तो अब रहे भी नहीं। तो अब मैं इस नियम को छोड़ भी नहीं सकता--आपकी बात जंचती है, मगर यह तो दगा होगा। गुरु के साथ दगा हो जाएगा। क्योंकि गुरु ने कहा था।
मैंने कहा, गुरु भी तुम्हारे जैसे ही, तुमसे भी ज्यादा महामूढ़ रहे होंगे! ये भी कोई बातें हैं!
मगर इसी तरह से चल रहा है। स्त्री जिस जगह बैठी हो, वहां संन्यासी को नहीं बैठना चाहिए जाकर। क्योंकि उस जगह में स्त्री की तरंगें रह जाती हैं।
तुम भी खूब बातें कर रहे हो! मां के पेट में नौ महीने रहे और तरंगें ही तरंगें रहीं, उन्हीं तरंगों से बने--और अब एक स्त्री बैठी है, उस जगह नहीं बैठना चाहिए! फिर ढोंग करना पड़ेगा। व्यर्थ के नियम बना लोगे, फिर ढोंग करना पड़ेगा। मैं तुमसे कहता हूं, नियम ही न बनाओ। कोई नियम न बनाओ। कोई आदर्श न थोपो। सरलता से, सहजता से जीवन को देखो, और जो उचित हो जिस क्षण में, वैसा करो। मगर औचित्य क्षण में से आना चाहिए, बोध में से आना चाहिए। औचित्य किसी बंधी-बंधाई तैयार धारणा में से नहीं आना चाहिए।
तुम कहते हो कि संन्यास ले लूं तो लगेगा कि ढोंग कर रहा हूं।
नहीं, जरा भी ढोंग नहीं कर रहे हो। संन्यास लेने का भाव उठ रहा है, क्रांति का आवाहन सुनाई पड़ रहा है, कहीं मैंने तुम्हारे हृदय को छू लिया है, कहीं तुम गीले हो गए हो, अब झुठलाओ मत! इन व्यर्थ की बातों में अपने को बहलाओ मत। रही पात्रता की बात, तुम पात्र हो! इस जगत में सभी कुछ पात्र है, क्योंकि परमात्मा व्याप्त है। जहां परमात्मा व्याप्त है, वहां अपात्रता कैसी? हां, तुम्हें और-और पात्र बनाएंगे।
यह बात तुम्हें थोड़ी बेबूझ लगेगी।
मैं तुमसे कहता हूं: तुम जैसे हो, पूर्ण हो। हां, तुम्हें और-और पूर्ण बनाएंगे। तुम जैसे हो, पात्र हो। हां, तुम्हें और-और पात्र बनाएंगे। सौंदर्य पर और सौंदर्य चढ़ाएंगे। लेकिन तुम गंदे नहीं हो। और तुम पापी नहीं हो। तुम्हारे पुण्य पर और-और नये पुण्य के आभूषण लगाएंगे, तुम्हारे पुण्य पर और हीरे चढ़ाएंगे, तुम्हारे पुण्य को और पुण्य बनाएंगे, लेकिन तुम जैसे हो, शुभ हो, सुंदर हो। क्योंकि परमात्मा को स्वीकार हो। परमात्मा को स्वीकार हो तो मैं तुम्हें कैसे अस्वीकार कर सकता हूं? तुम भी अपने को स्वीकार करो--इतना तो करो कम से कम, कि परमात्मा ने तुम्हें जीवन दिया, तुम इस जीवन का तो सम्मान करो, स्वीकार करो। इसी स्वीकार में से तुम्हारे भीतर वास्तविक धर्म का उदय होगा। इसी स्वीकार में से सत्य का जन्म होता है।


आखिरी प्रश्न:
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी,
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
पिया मैं तो कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।

वीणा भारती! भाव की ऐसी दशा का नाम ही प्रार्थना है। मांगना नहीं होता कुछ, चाहना नहीं होता कुछ; मांग चुप ही रहती है और भर जाती है। मांग बोली भी नहीं जाती और झोली भर जाती है। प्रार्थना मुखर नहीं होती, मौन होती है। और परमात्मा कोई सत्य का सिद्धांत नहीं है वरन अस्तित्व को प्रीति करने की एक आयोजना है। इसलिए परमात्मा को प्यारे की तरह ही देखो, प्रीतम की तरह ही देखो!
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
और प्रेम का जानने से क्या संबंध? प्रेम जानता नहीं, प्रेम निर्दोष है। प्रेम ज्ञान से मुक्त है। ज्ञान का कचरा प्रेम नहीं ढोता। और जो ज्ञान का कचरा ढोते हैं, उनके जीवन में कभी प्रेम के फूल नहीं खिलते। वे तो ज्ञान की खाद ही इकट्ठी करते रहते हैं। उनके जीवन में तो दुर्गंध ही दुर्गंध फैल जाती है। प्रेम लाता है एक नई किरण, प्रेम के साथ आता है एक नया आयाम।
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
चुप-चुप ही चाहा जाता है। गुप-चुप चाहा जाता है। कानों-कान किसी को खबर नहीं पड़ती। बात कहने की है ही नहीं, बात पी जाने की है। बात पचा जाने की है। मांस-मज्जा बन जाए बात, ऐसे चुप सन्नाटे में प्रार्थना पकती है। गर्भ में समा जाए बात, वहीं तुम्हारा नया जीवन है।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
और जैसे-जैसे तुम्हारे भीतर प्रेम जगेगा, वैसे-वैसे सारा अस्तित्व उस प्यारे की भाव-भंगिमाएं प्रकट करने लगेगा। वही होता है सुबह के सूरज में। वही होता है रात के तारों में। वही है कलकल नाद में गंगा के। वही है सागर की उत्ताल तरंगों में। वही बरसेगा सावन का मेघ बन कर। और जब बरसे सावन का मेघ बन कर, तो हो मुक्त, छोड़ सब परिधान, छोड़ सब ज्ञान, नहा लेना, खूब नहा लेना!
मैं कल एक कविता पढ़ता था। वह कविता तो दो साधारण प्रेमियों की है, लेकिन उस कविता को हम पंख दे सकते हैं और प्रार्थना बना सकते हैं।

वसनों की चिंता नहीं करो, सुख है ऐसी नादानी में
हम दोनों साथ खड़े भीगें बरखा के पहले पानी में

छोड़ो भी कार्य गृहस्थी के
जैसी भी हो, आओ छत पर
देखो तो क्या यौवन उमड़ा
मेघों वाली अल्हड़ ऋतु पर
जामुनी घटा घिर आई है
पछुआ ने लट बिखराई है
बूंदें तिर आईं नयनों में इन बूंदों की अगवानी में
हम दोनों साथ खड़े भीगें बरखा के पहले पानी में

तुम मुक्त-केशिनी हो जाओ
जूड़ा खुलता, खुल जाने दो
आंचल ढलके, ढल जाने दो
कजरा धुलता, धुल जाने दो
यह है मुहूर्त संयम टूटे
हो प्राण विकल धीरज छूटे
स्वीकृति ही अर्थ निकलता है इस झूठी आनाकानी में हम दोनों साथ खड़े भीगें बरखा के पहले पानी में

मुखड़े पर बौछारें झेलो
पोओ बरौनियों में मोती
देखो मौसम की कृपा-कोर
ऐसी हर बार नहीं होती
सोंधी मिट्टी की महक उठी
नस-नस में पावक दहक उठी
अब रोपें कोई प्रणय-स्वप्न इस मौसम की मेहमानी में
हम दोनों साथ खड़े भीगें बरखा के पहले पानी में
जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी को कहता हो--
वसनों की चिंता नहीं करो, सुख है ऐसी नादानी में
हम दोनों साथ खड़े भीगें बरखा के पहले पानी में
बरखा का पहला पानी आया हो, अषाढ़ के मेघ घिरे हों, पहली बूंदाबांदी हुई हो और प्रेमी बुलाता हो प्रेयसी को कि छोड़ो फिकर घर-गृहस्थी की, वस्त्रों की, केशों की, काजल की, आ जाओ, भीगें बरखा के पहले पानी में। ऐसे ही तो गुरु भी शिष्य को बुलाता है। यही तो पुकार, वीणा, मैंने भी तुझे दी है। सावन के बादल घिरे हैं। जहां भी कोई सदगुरु है, वहां सावन के बादल घिरे हैं। और शिष्य अगर हिम्मत जुटा ले गुरु के साथ थोड़ा निर्वसन होने की, निश्चिंत होने की, श्रद्धायुक्त होने की, तर्कमुक्त होने की, विचार और शास्त्र को त्याग देने की, छोड़ देने की; सरल निर्दोष बच्चे की भांति प्रीति में बंधा गुरु का हाथ पकड़ आ जाए मेघों के नीचे, तो धुल जाए जन्मों-जन्मों का कलुष, तो धुल जाए जन्मों-जन्मों का क्लेश, तो धुल जाए सारी धूल, तो तुम हो जाओ पवित्र--वैसे जैसे कि तुम हो, जैसे कि तुम्हें होना ही चाहिए, जैसा कि तुम्हारा स्वभाव है।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
इस स्नान का नाम ही ध्यान है। खोलो अपने को। और ध्यान रहे, परमात्मा प्रतिपल बरस रहा है। सावन कभी आता और जाता, ऐसा नहीं। यह ऋतु आने-जाने वाली ऋतु नहीं है। परमात्मा तो सदा मौजूद है। बस हम ही हैं कि द्वार-दरवाजे बंद किए बैठे हैं। न उसकी हवाओं को भीतर आने देते, न उसकी रोशनी को भीतर आने देते, न उसकी बूंदाबांदी को भीतर आने देते। हमने सब तरफ से ओट कर ली है, हम सब तरफ से अपने को छिपा कर अंधेरे में बैठ गए हैं।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी।
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
वीणा! तू ठीक कहती है। ऐसा ही अनुभव होता है। प्रार्थना में डूबते व्यक्ति को ऐसा ही लगता है--मैं तो पल-पल ब्याह रही। शहनाई बजती ही चली जाती है विवाह की, मंडप सजता ही चला जाता है विवाह का, फेरी पर फेरी पड़ती ही चली जाती है। ये फेरियां सात पर समाप्त नहीं होतीं। ये फेरियां समाप्त ही नहीं होतीं। ये तो अनंत फेरे हैं। और हर बार गांठ और मजबूत होती चली जाती है, और मजबूत होती चली जाती है। और एक ऐसी घड़ी आती है कि दो दो नहीं रह जाते, एक ही हो जाते हैं। उसी घड़ी की प्रतीक्षा है। उसी घड़ी को तलाशो। उसी घड़ी को खोजो। उस घड़ी को जिसने पा लिया, वही बड़भागी है।
और जो मेरे साथ जुड़े हैं, उनके पैर धीरे-धीरे उस घड़ी की तरफ बढ़ने लगे हैं। और एक कदम भी बढ़ता है तुम्हारा उस तरफ, तो महाक्रांति घटती है। क्योंकि जब तुम एक कदम परमात्मा की तरफ उठाते हो, तो परमात्मा हजार कदम तुम्हारी तरफ उठाता है। यही नियम है।
पिया मैं तो कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
जानने की जरूरत ही नहीं। चाह को भी प्रकट करने की जरूरत नहीं। रहने दो वीणा मौन। उस मौन में ही उठेगा संगीत, उस मौन में ही उठेगा नाद। वही नाद उसके चरणों को छू लेता है। तुम्हारे कहे गए शब्द तो बहुत भारी होते हैं, वापस जमीन पर गिर जाते हैं; जैसे पत्थर फेंको आकाश में, वापस लौट आते हैं। मौन ही पहुंच सकता है उस तक, क्योंकि मौन निर्भार है। शून्य ही पहुंच सकता है उस तक, क्योंकि शून्य पर गुरुत्वाकर्षण का कोई प्रभाव नहीं है।
डर लगेगा लेकिन। भय लगेगा लेकिन। चुप्पी में भय लगता है। इसलिए लोग चुप नहीं होते। बातचीत किए जाते हैं। काम की, बेकाम की। न करनी हो तो भी किए जाते हैं। कोई दूसरा न मिले तो अपने से ही बात करते रहते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रेलवे स्टेशन पर बैठा है। ट्रेन हो गई है बहुत लेट। कुछ-कुछ अपने से ही बड़बड़ाता है। कभी-कभी बड़बड़ा कर हंसता है। और कभी-कभी बड़बड़ा कर हाथ से एक झटका देता है कि हट! धत तेरे की! एक आदमी दूर खड़ा देख रहा है। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि बात क्या है? न रहा गया, जिज्ञासा बढ़ गई, वह आदमी पास आया। उसने कहा, क्षमा करें बड़े मियां, पूछना तो नहीं चाहिए, आपकी निजी बात। आप जो भी कर रहे हैं, आपकी मर्जी। और अपरिचित को छेड़ना भी नहीं चाहिए। मगर मैं रोक न सका अपने कुतूहल को, अपनी जिज्ञासा को। यह माजरा क्या है? आप क्या करते हैं? कुछ-कुछ बड़बड़ाते हैं--ओंठ आपके हिलते मैं देखता हूं, सुनाई तो कुछ पड़ता नहीं, भीतर-भीतर कुछ कहते होंगे; कभी-कभी मुस्कुराते हैं, खिलखिला जाते हैं; और कभी कहते हैं: धत तेरे की! और कुछ फेंकते से मालूम पड़ते हैं।
मुल्ला ने कहा कि नहीं, कोई बुराई की बात नहीं पूछा तो अच्छा ही किया पूछा तो। असल में मैं चाहता ही था कि कोई कुछ पूछ ले। अकेला-अकेला बैठा घबड़ा गया, इसीलिए तो अपने से ही बात कर रहा था। अपने से ही कुछ पुराने चुटकुले सुना रहा हूं। जब कभी कोई जोरदार चुटकुला आ जाता है तो खिलखिला पड़ता हूं, हंसी आ जाती है।
उसने पूछा, वह भी मैं समझ गया, मगर यह धत तेरे की! और जब झिड़क देते हैं?
तो मुल्ला ने कहा कि जब कोई सुना-सुनाया चुटकुला आ जाता है, तो धत तेरे की! झटक देता हूं।
अकेले में भी बैठे-बैठे लोग...तुम भी जरा गौर करना, चाहे ओंठ न हिलते हों, बैठे-बैठे अपने से ही बात करते रहते हो। वे ही बातें जो अपने से कई बार कर चुके हो। कितनी बार कर चुके हो! टूटे-फूटे ग्रामोफोन रिकार्ड हो गए हो। वहीं सुई अटकी है। वही-वही चलता रहता है, वही-वही चलता रहता है। वही तुम दूसरों से कहते हो, वही अपने से कहते रहते हो। दूसरे भी क्या कहेंगे, तुम्हें पता है। कई बार कह चुके। तुम भी उनसे क्या कहोगे, तुम्हें पता है। चुप्पी कठिन है।
क्यों कठिन है?
क्योंकि जैसे ही तुम चुप होने लगते हो, अहंकार तिरोहित होने लगता है। जैसे ही सारे शब्द खोने लगते हैं, वैसे ही शब्दों के बीच में छिपा हुआ जो अहंकार है, वह मरने लगता है। वह शब्दों पर ही जीता है। शब्दों के सहारे ही खड़ा है। शब्द उसके बैसाखी हैं। इसलिए मौन निर-अहंकारिता में ले जाता है। और अकेले होने में डर लगता है। जैसे ही बातचीत बंद हुई कि तुम बिलकुल अकेले हो जाते हो। इसलिए अपने से भी लोग बात करते हैं। लोग अकेले ही ताश भी खेलते हैं; दोनों तरफ से बाजी चलते हैं। कभी अंधेरी गली में अकेले गए हो? डर लगने लगता है तो जोर-जोर से गाना गाने लगते हो। अपना ही गाना सुन कर थोड़ा ढाढ़स बंधता है, हिम्मत आती है, ऐसा लगने लगता है कि अकेला नहीं हूं, कोई गाने वाला भी है। कोई नहीं है वहां।
जो लोग पर्वत-शृंखलाओं पर चढ़ते हैं, पर्वतारोही, उनका यह अनुभव है, अनेक-अनेक पर्वतारोहियों का अनुभव है, कि जब कभी पर्वतों पर वे भटक जाते हैं, बिलकुल भटक जाते हैं, और लगने लगता है कि अब जीवन के बचने का कोई उपाय नहीं है, अधर में लटके रह जाते हैं--ऊपर ऐसी विराट चट्टान है कि पार न कर सकेंगे, नीचे खड्ड है कि गिरेंगे तो मौत है; संगी-साथियों से नाता छूट गया है, लटके हैं रस्सी से, या लटके हैं जड़ से--तो पर्वतारोहियों का यह अनुभव है कि जब ऐसी कभी घड़ी आती है पर्वत के सन्नाटे एकांत में, तो ऐसा लगता है: कोई साथ है। कोई साथ है, अकेले नहीं हैं। वह कौन साथ है? कोई साथ नहीं है। मगर मन आखिरी धोखे देता है। जब कोई साथ नहीं है, तब भी तुम्हें भरोसा दिलाता है--कोई साथ है।
और यह मार्ग है अकेले का।

उड़ चल अकेला,
तोड़ प्रीति-बंध विहग उड़ चल अकेला।
भूले सब स्नेह-गान,
छोड़ा तरुत्तीर मोह,
उड़ा विकल खग अजान श्वेत पंख फैला।
आशा विश्वास धीर,
भर कर मन में अकूल,
बिसरा पथ-प्यार-पीर,
उड़ता जाता अधीर कहीं इस अबेला।
उड़ चल अकेला,
तोड़ प्रीति-बंध विहग उड़ चल अकेला।

सब संबंधों के पार जाना है। अपने को दो हिस्सों में भी बांट कर बात की, तो संबंध बना रहता है। तो हम दो बने रहते हैं, दुई बनी रहती है। अकेले ही चलना होगा।

एकाकी ही चलना होगा!

दुनिया में राही सब मानव
अलग-अलग पर राह सभी की,
जग-कोलाहल में लय होता
गान किसी का, आह किसी की,
पथ के कांटों को तलुवों से एकाकी ही दलना होगा!
एकाकी ही चलना होगा!

पृथ्वी पर दीपक जलते हैं
नभ में ज्योतित अनगिन तारे,
चंद्र-सूर्य भी आलोकित
करते हैं रजनी-दिवस हमारे,
अपनी राह खोजनी है तो एकाकी ही जलना होगा!
एकाकी ही चलना होगा!

वीणा! मौन को साध! चुप्पी को साध! प्रार्थना को भी पी जा और पचा ले! मांगना ही मत परमात्मा से कुछ। तो ही परमात्मा मिलता है। कुछ मांगा कि चूके। कुछ मांगा कि भटके। मांग आई कि प्रार्थना मरी।
न कुछ मांगना है, न कुछ निवेदन करना है, सिर्फ स्वयं को शून्य-भाव से उसके हाथों में छोड़ देना है। जहां ले चले। जैसी उसकी मर्जी! तब खूब होगा स्नान उसके सावन के मेहों में। खूब बजेगी वीणा। अनंत का संगीत जगेगा। अमृत की उपलब्धि होगी। और वह सब हमारा अधिकार है। चूकते हैं तो अपने कारण। जरा सम्हल जाएं, जरा होश सम्हाल लें, तो चूकने की कोई भी जरूरत नहीं है।

आज इतना ही।