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शुक्रवार, 9 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—ग्यारहवां  
दिनांक 06 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...
2—प्रेम पाप है?
3—आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?
पहला प्रश्न:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...


वीणा! ईश्वर की जिज्ञासा करनी जीवन का सबसे बड़ा अभियान है। उसके पार फिर कोई और खोज नहीं। उससे बड़ी कोई और चुनौती नहीं। और स्वभावतः, जो इस अनंत की यात्रा पर निकलते हैं, उन्हें बहुत पीड़ा झेलनी पड़ती है। पीड़ा मधुर है। पर पीड़ा फिर भी पीड़ा है। कितनी ही मीठी कसक हो, जब प्रभु-प्रेम का तीर हृदय में चुभेगा तो पीड़ा तो होगी। और प्रभु-प्रेम का तीर लग जाए तो उसका फिर कोई इलाज नहीं है। उस बीमारी की फिर कोई दवा नहीं है। फिर तो बीमारी का बढ़ जाना ही दवा है। फिर तो बीमारी इतनी बढ़े, इतनी बढ़े कि बीमारी ही बचे और तू न बचे--तो दवा है।
ईश्वर की तड़प तुझमें उठी है; सब में उठनी चाहिए, क्योंकि जीवन ईश्वर की खोज के बिना अर्थहीन है, रंगहीन है, गंधहीन है। ईश्वर के बिना आदमी है क्या? बांस की एक पोंगरी। ईश्वर से जुड़ जाए तो बांसुरी बने। ईश्वर से जुड़ जाए तो गीत जन्मे। लेकिन ईश्वर से जुड़ने की यात्रा अपने अहंकार को गलाने की यात्रा है। और अहंकार मिटना नहीं चाहता। अहंकार पैर जमा कर बैठा है। जन्मों-जन्मों से बैठा है। इतनी आसानी से कोई मालकियत छोड़ भी दे तो कैसे? इतनी पुरानी मालकियत, कोई छोड़ भी दे तो कैसे? अहंकार तो समझता है मैं मालिक हूं। और ईश्वर की खोज की पहली अनिवार्य शर्त है कि गलाओ अहंकार को। उसी से तड़प होती है। इतने-इतने जन्मों की जमी हुई जड़ें अहंकार की उखाड़ने में दर्द होता है, पीड़ा होती है। यह कोई कपड़े उतारने जैसी बात नहीं है, यह चमड़ी उतारने जैसी बात है।
तू पूछती है:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
ऐसा ही लगेगा। क्योंकि बाहर कुछ दिखाई तो नहीं पड़ता जिसको हम खोज रहे हैं। और कोई अगर पूछे कि क्या खोज रहे हो? तो हम बता भी तो न सकेंगे। भक्त तो गूंगा हो जाता है। उसे कुछ कहना भी हो तो आंखों से झरते हुए आंसुओं से कहना पड़ता है। शब्द छोटे पड़ जाते हैं, ओछे पड़ जाते हैं। शब्द खोटे पड़ जाते हैं। शब्दों के सिक्के प्रेम की दुनिया में नहीं चलते। तो किसी को कहना भी चाहे तो बता नहीं सकता। रोए तो लोग पागल समझें, हंसे तो लोग पागल समझें, चुप रहे तो लोग पागल समझें; और कुछ बोले तो अपना ही अंतःकरण कहे कि यह बोलना ठीक नहीं। क्योंकि अनबोले को कैसे बोला जाए? अनकहे को कैसे कहा जाए? यह तो अपना ही अंतःकरण कहे कि अपराध हो जाएगा। यहां शब्द मत लाना। निःशब्द के इस लोक में शब्द की गंदगी मत लाना। भाव के इस जगत में विचार का कूड़ा-करकट मत लाना। चुप ही सम्हालना इसे। तो और भी कसक होती है। किसी से कह भी लेते तो मन थोड़ा हलका हो जाता। कहने से मन हलका होता है।
मनोविज्ञान तो इस सत्य को बहुत गहराई से स्वीकार करता है। मनोविज्ञान की तो पूरी प्रक्रिया यही है कि मरीज मनोवैज्ञानिक से सिर्फ अपने मन की व्यथा कहता है। मनोवैज्ञानिक उसका कोई इलाज नहीं करता। इलाज की जरूरत ही नहीं आती। यही इलाज हो जाता है। बीमार अपनी व्यथा कहता है, कहते-कहते व्यथा कम हो जाती है। कहते-कहते मन हलका हो जाता है। मनोचिकित्सक तो केवल सुनता है। मनोचिकित्सा का पूरा शास्त्र सुनने की कला है। मनोचिकित्सक चुपचाप सुनता है, ध्यानपूर्वक सुनता है, बड़ी लगन से। तुम्हारा कूड़ा-करकट जिसमें कुछ भी सुनने योग्य नहीं है, उसे ऐसे सुनता है जैसे हीरे-जवाहरात बरसते हों। और जब तुम्हें कोई इतने भाव से सुनता है तो तुम अपना हृदय उंडेल देते हो। उसी उंडेलने में पीड़ा तिरोहित हो जाती है। मनोचिकित्सा को चिकित्सा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वहां औषधि तो है ही नहीं कुछ, न ही चिकित्सा की कोई विधि है, सिर्फ एक सीधा-सादा मनुष्य-जाति का हजारों साल का अनुभव है, निचोड़ है, कि दुख कहने से हलका हो जाता है।
सुख कहने से गहरा हो जाता है, दुख कहने से हलका हो जाता है। इसीलिए तो लोग एक-दूसरे से दुख की बातें करते हैं। अपनों के पास बैठ कर दो क्षण रो लेते हैं। तो बोझ कट जाता है।
लेकिन परमात्मा को जो खोजने चला है उसकी पीड़ा तो मनोवैज्ञानिक हल नहीं कर सकता। परमात्मा को जो खोजने चला है, वह तो सभी चिकित्साओं के पार है। उस बीमार का तो कोई इलाज नहीं, उसका कोई उपचार नहीं। एक तो कहा नहीं जा सकता; कहो तो कोई समझेगा नहीं; कहो कुछ, लोग कुछ और समझेंगे।
भक्तों को तो सदा-सदा लोगों ने विक्षिप्त समझा है। इसलिए भक्त को चुप ही रह जाना पड़ता है। अपनी छाती में दबा लेना पड़ता है अपनी कसक को। और ऐसा ही लगेगा कि दिन-रात रहेगी यह कसक। यह भूले से न भूलेगी। उठते-बैठते, हजार काम करते यह कांटा भीतर चुभता ही रहेगा। यह कांटा समयातीत है, कालातीत है, इसलिए समय से कोई भेद नहीं पड़ता। जागो तो यह है, सोओ तो यह है। भक्त की आंखें नींद में भी गीली होती हैं आंसुओं से। नींद में भी भक्त सपने किसके देखता है? तुम किसके सपने देखते हो?
जो आदमी धन का दीवाना है, वह धन के सपने देखता है--कि मिल गई तिजोरी राह के किनारे पड़ी हुई; कि गिनती करता है, रुपयों की गिनती करता रहता है। जो पद की तलाश करता है, वह सपने देखता है कि पद पर पहुंच गया, हो गया प्रधानमंत्री, हो गया राष्ट्रपति।
जो परमात्मा की खोज करता है, उसे तो उसकी बांसुरी की टेर भी सपने में गूंजती सुनाई पड़ती है। उसे तो उसकी ही छबि तिरती रहती है। उसे तो उसका ही भाव तिरता रहता है। उसे तो एक ही बात पकड़े रहती है, उसकी श्वास-श्वास को एक ही गीत पकड़े रहता है--बोले, न बोले; उठे, बैठे, काम करे, न करे; मंदिर जाए कि मस्जिद, कि दुकान पर बैठे कि बाजार में--मगर परमात्मा उसे छाया की तरह घेरे रहता है। उसके साथ ही होता है।
तो तू ठीक कहती है:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
बात की भी तो नहीं लगेगी यह कसक। किस बात की कसक है? परमात्मा पर मुट्ठी भी तो नहीं बंधती। परमात्मा पर मुट्ठी बंध भी नहीं सकती। परमात्मा तो उन्हें मिलता है जो मुट्ठी खोलना सीखने की कला सीख लेते हैं। उसका आंचल भी तो हाथ में नहीं आता। जरा सी भी पकड़ आ जाए तो भी यह लगे कि चलो, हम जिसकी खोज में चले हैं, वह कोई वास्तविक चीज है। नहीं, पकड़ में आता ही नहीं। बस आया, आया, ऐसा लगता है, लेकिन पकड़ में कभी आता नहीं। जब तक हम हैं तब तक वह नहीं। और जब तक हम हैं तभी तक पकड़ने की चेष्टा है। जब हम ही न रहे, पकड़ने वाला न रहा, फिर पकड़ कैसी? फिर परमात्मा उतर आता है। "मैं' के खोते ही परमात्मा की अनुभूति बरसती है। अभी तो कसक बिन बात की ही रहेगी। तेरा प्रश्न प्यारा है!
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
यह रोग अनूठा है। और यह रोग केवल सौभाग्यशालियों को लगता है। यह रोग स्वास्थ्यों का स्वास्थ्य है। यह रोग जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद है।
मगर शुरू में तो रोग ही लगता है। विरह जलाता है, प्राण पुकारते हैं--पी कहां! पी कहां! और दूर-दूर तक, अनंत तक कहीं भी कोई प्रतिध्वनि नहीं होती, कोई उत्तर नहीं आता। आंखें आकाश में निहारती हैं और उसका कोई पता नहीं चलता, उसके चरण खोजे नहीं मिलते।
भक्त की पीड़ा को समझो! शायद इसीलिए बहुत लोगों ने तय कर रखा है कि परमात्मा से अपने को बचाएंगे। भक्त की पीड़ा को देख कर तय कर रखा है कि ऐसी झंझट में न पड़ेंगे। साधारण जीवन के प्रेम ही कितनी झंझट में डाल देते हैं, तो यह असाधारण प्रेम। प्रेम-पंथ ऐसो कठिन। यह तो असाधारण प्रेम है। यह तो अज्ञात का प्रेम है। इसका तो कोई ओर-छोर नहीं है! इसका तो कोई किनारा नहीं है। यह तो सागर तटहीन है। इसमें तो जो उतरे वे डूबे। इसमें तो डूबना ही उबरना है। इसमें तो मिटना ही पाना है।

चांद?
मैं उसे अवश्य पकडूंगा!
प्रेम के पिंजड़े में पालूंगा,
हृदय की डाल पर सुलाऊंगा,
प्यार की पंखुड़ी
चाह की अंखड़ी

चांद?
उससे
स्वप्नों का नीड़ सजाऊंगा!
तुम्हारा ही तो मुकुट है!
फूलों के मुख पर
तितली सा बैठ कर
वह सतरंगे पर फैलाएगा।
मैं उसे
इंद्रधनु की झूल में झुलाऊंगा,
प्यार का माखन खिलाऊंगा!
तुम्हारा ही तो मुख है!

चांद?
मैं उसे निश्चय चखूंगा,
फूल की हथेली पर रखूंगा,
तुम्हारा तो प्रकाश है।
भावों से सजाऊंगा,
आंसू से धोऊंगा!
तुम्हारी ही तो शोभा है।

पत्तों के अंतराल से
अलकों के जाल से
मैं चांद को
अवश्य पकडूंगा!

दृष्टि नीलिमा में,
रूप चांदनी में बखेरूंगा,
तुम्हारा ही तो बोध है!

जैसे चांद को पकड़े कोई, पकड़ना चाहे कोई। छोटे बच्चे चांद को पकड़ना चाहते हैं, हाथ फैलाते हैं चांद की तरफ।
कृष्ण के जीवन में कहानी है। जब वे छोटे थे तो चांद को पकड़ने के लिए आतुर हो गए। आकाश में ऊगा होगा पूर्णिमा का चांद, और कृष्ण रोने लगे, और रूठ गए। और यशोदा परेशान है, करे तो क्या करे? चांद को पकड़ाए तो कैसे पकड़ाए? फिर उसे सूझी, फिर उसे खयाल आया, उसने गणित बिठाया। उसने एक कांसे की थाली में जल भरा, चांद की छाया पड़ी कांसे की थाली में, कृष्ण को कहा कि ले, अब तू पकड़ ले!
यह कहानी प्रीतिकर है। ऐसे ही जो रोए हैं परमात्मा को पाने के लिए, उनको समझाने के लिए मंदिरों में मूर्तियां बना दी गई हैं--कांसे की थाली में पानी में पड़ा हुआ चांद का प्रतिबिंब। मंदिरों की मूर्तियां बस धोखे हैं--बच्चों को समझाने के। झुका लो सिर, पकड़ लो पैर, चढ़ा दो फूल, धूप-दीप जलाओ, भर लो मन को कि मिल गया।
मगर ऐसे नहीं मिलता है, मिटने से मिलता है। मूर्ति नहीं बनानी है उसकी, अपनी मूर्ति विसर्जित करनी है, तब मिलता है। उसकी पत्थर की मूर्ति बनाने से क्या होगा? यह अपनी जो अहंकार की प्रतिमा है, इसे खंडित करो, इसे जाने दो, इसे आमूल चूल जाने दो। इसमें से रत्ती भर मत बचाना, अन्यथा कठिनाई रहेगी, अन्यथा मामला चांद को पकड़ने जैसा रहेगा। लगता है--यह रहा! वृक्षों की डालों के बीच में झूलता, पत्तों के पार झूलता--यह रहा! हाथ बढ़ाऊं तो पकड़ लूं! मगर चांद पकड़ में आता कहीं?
और चांद बहुत दूर नहीं है। शायद किसी दिन पकड़ में आ भी जाए। आखिर दूरी है आदमी और चांद के बीच, मगर दूरी अनंत नहीं है। अहंकार और परमात्मा के बीच दूरी अनंत है। अहंकार मिटे तो परमात्मा, अहंकार रहे तो परमात्मा नहीं। इस समीकरण को खूब हृदय में गहरा बैठ जाने दो।

खामोशी का समां है और मैं हूं
दियारे-खुफ्तगां है और मैं हूं
कभी खुद को भी इन्सां काश समझे
ये सई-ए-रायगां है और मैं हूं
कहूं किससे कि इस जमहूरियत में
हुजूमे-खुशरवां है और मैं हूं
पड़ा हूं इक तरफ धूनी रमाए
अताबे-रहरवां है और मैं हूं
कहां हैं हमजबां अल्लाह जाने
फकत मेरी जबां है और मैं हूं
खामोशी है जमीं से आस्मां तक
किसी की दास्तां है और मैं हूं
कयामत है खुद अपने आशियां में
तलाशे-आशियां है और मैं हूं
जहां इक जुर्म है यादे-बहारां
वो लाफानी खिजां है और मैं हूं
तरसती हैं खरीदारों को आंखें
जवाहिर की दुकां है और मैं हूं
नहीं आती अब आवाजे-जरस भी
गुबारे-कारवां है और मैं हूं
मआले-बंदगी ऐ "जोश' तौबा
खुदा-ए-मेहरबां है और मैं हूं

खामोशी का समां है और मैं हूं
सब तरफ चुप है, चुप्पी है, सब खामोश है, सन्नाटा है और मैं हूं।
दियारे-खुफ्तगां है और मैं हूं
सोए हुओं का देश है और मैं हूं।
कभी खुद को भी इन्सां काश समझे
ये सई-ए-रायगां है और मैं हूं
अपने को समझे बिना सब व्यर्थ है।
कभी खुद को भी इन्सां काश समझे
अगर अपने को कोई समझ ले...
ये सई-ए-रायगां है और मैं हूं
तो दिखाई पड़ेगा कि जीवन सारा का सारा व्यर्थ है। जिसे हमने अब तक जीवन समझा था, जीवन नहीं है, जीवन कुछ और है।
कहूं किससे कि इस जमहूरियत में
हुजूमे-खुशरवां है और मैं हूं
पड़ा हूं इक तरफ धूनी रमाए
अताबे-रहरवां है और मैं हूं
कहां हैं हमजबां अल्लाह जाने
फकत मेरी जबां है और मैं हूं
खामोशी है जमीं से आस्मां तक
किसी की दास्तां है और मैं हूं
कयामत है खुद अपने आशियां में
तलाशे-आशियां है और मैं हूं
यही इस जगत की सबसे अनहोनी घटना है कि अपने ही नीड़ में बैठे हैं और अपने ही नीड़ की तलाश चल रही है।
कयामत है खुद अपने आशियां में
तलाशे-आशियां है और मैं हूं
जिसे तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। मगर तुम बाहर खोजते हो। तुम अपने नीड़ में बैठे हो, तुम परमात्मा में विराजमान हो, मगर तुम्हारी मौजूदगी उसकी मौजूदगी को अनुभव नहीं होने देती। तुम्हारा शोरगुल उसकी शांत आवाज को प्रकट नहीं होने देता।
जहां इक जुर्म है यादे-बहारां
वो लाफानी खिजां है और मैं हूं
तरसती हैं खरीदारों को आंखें
जवाहिर की दुकां है और मैं हूं
बस इस दुनिया में ऐसी ही हालत है। जवाहिर ही जवाहिर पड़े हैं, हीरे-मोतियों के ढेर लगे हैं। मगर पारखी आंखें नहीं हैं--परख सकें जो, देख सकें जो।
कौन सी आंखें परख सकती हैं? कौन सी आंखें देख सकती हैं?
जिन आंखों में विचारों के जाल नहीं रहे। जिन आंखों में अहंकार के अंबार नहीं रहे। जिन आंखों में मैं-भाव समाप्त हो गया है। वे पारखी हो जाती हैं। उन्हें फिर हीरे ही हीरे दिखाई पड़ते हैं। फिर परमात्मा दूर नहीं है, पास है।
उपनिषद कहते हैं: परमात्मा दूर से भी दूर और पास से भी पास।
विरोधाभास मालूम होता है। गणित तो कहेगा, तर्क तो कहेगा, दूर है तो दूर और पास है तो पास। यह कैसा वक्तव्य हुआ कि दूर से भी दूर और पास से भी पास! लेकिन यह वक्तव्य सही है। गणित लाख कहे, तर्क लाख कहे, यहां तर्क और गणित की कोई गति नहीं है। परमात्मा दूर से भी दूर है, अगर तुम्हारी आंखों में अहंकार की धूल है। और परमात्मा पास से भी पास है, अगर तुम्हारी आंखें अहंकार से मुक्त हैं।
नहीं आती अब आवाजे-जरस भी
गुबारे-कारवां है और मैं हूं
मआले-बंदगी ऐ "जोश' तौबा
खुदा-ए-मेहरबां है और मैं हूं
घबड़ाओ मत। बंदगी किए जाओ, झुके जाओ, पूजा में गले जाओ, प्रार्थना में ढले जाओ, और इतना ही स्मरण रखो--
खुदा-ए-मेहरबां है और मैं हूं
परमात्मा की अनुकंपा अपार है। खोजोगे, मिलेगा। जिन्होंने खोजा है, पाया है। लेकिन जिन्होंने भी खोजा है, उन्होंने बड़ी पीड़ा से पाया है। पीड़ा कीमत है जो चुकानी पड़ती है, वीणा!
तू पूछती है:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
इस रोग का नाम ही प्रेम है। इस रोग का नाम ही भक्ति है। यह बिन बात की कसक है। कारण समझ में नहीं आता, फिर भी प्राणों को मथे डालती है यह कसक। तीर दिखाई नहीं पड़ता, और चुभे चला जाता है। कौन पुकार रहा है, दिखाई नहीं पड़ता, और पुकार है कि खींचे लिए जाती है। कहां चल पड़े हैं, किसकी खोज में चल पड़े हैं, कुछ साफ-साफ नहीं, कुछ स्पष्ट नहीं, सब धुंधला-धुंधला है, जैसे सुबह का कुहासा घिरा हो, मगर पैर हैं कि रुकते नहीं, मगर है कोई चुनौती कि प्राणों के तारों को छेड़ गई है। जाना ही होगा। रुकने का उपाय नहीं है, वीणा। जिसके भीतर भी यह कसक पैदा हो गई, उसके रुकने की कोई संभावना नहीं है। दौड़ो, जितनी तीव्रता और त्वरा से दौड़ सको। मिटो, जितनी शीघ्रता से और गति से मिट सको। अपने को पोंछ ही डालो। फिर कसक में से ही आनंद का जन्म होता है, कांटे फूल बन जाते हैं, विरह मिलन बन जाता है।
और जब विरह मिलन बनता है तभी समझ में आएगा--
भला ये रोग है कैसा?
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
उसके पूर्व पता नहीं चल सकता। प्यासे को कैसे पता चले कि यह प्यास किस चीज की है? प्यास तो पता चलती है। लेकिन जिसने कभी जल न पीया हो, उसे कैसे पता चले कि यह प्यास किस बात की है? उसे तो जल पीने से ही पता चलेगा। हां, जल पीने से दो बातें साफ हो जाएंगी। जल, जल का अनुभव, जल की तृप्ति, परितोष; और साथ ही साथ यह भी कि प्यास किस बात की थी।
यह बड़ा उलटा गणित है। मिलने से पता चलता है कि हम किसे खोज रहे हैं। अनुभव से पता चलता है कि हम किसकी तलाश कर रहे हैं।
इसलिए भक्त एक बड़ी रहस्यमय खोज में संलग्न होता है। इसलिए भक्त को रहस्यवादी कहा है, दुस्साहसी कहा है। क्योंकि उसे खोजता है जिसका साफ-साफ न नक्शा है पास, न छवि है पास। मिल भी जाए तो उसे कैसे पहचानेंगे, इसका भी कुछ पक्का नहीं है। उसकी प्रत्यभिज्ञा कैसे करेंगे? उसे पहले कभी देखा नहीं है।
मगर यह भी अजूबों का अजूबा, कि परमात्मा को पहली दफा देखते ही एकदम पहचान हो जाती है, एकदम प्रत्यभिज्ञा हो जाती है। इसलिए ज्ञानियों ने उसे स्वतःप्रमाण कहा है। उसकी प्रत्यभिज्ञा किसी और अतीत स्मृति के आधार पर नहीं होती, उसके अनुभव के आधार में ही हो जाती है। उसे जानते ही सब जान लिया जाता है। उसका अनुभव ऐसा प्रगाढ़ है, इतना विराट है, इतना गहन है, इतना ऊंचा है कि पोर-पोर में भिद जाता है, कि रोएं-रोएं को प्रतीति हो जाती है, कि श्वास-श्वास को प्रमाण मिल जाता है, कि हृदय की धड़कन-धड़कन बस उसी के नाच में तल्लीन हो जाती है।

दूसरा प्रश्न: क्या प्रेम पाप है?

योगेंद्र! प्रेम यदि पाप है तो फिर संसार में पुण्य कुछ होगा ही नहीं। प्रेम पाप है तो पुण्य असंभव है। क्योंकि पुण्य का सार प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।
लेकिन तुम्हारे प्रश्न को मैं समझा। तुम्हारे तथाकथित साधु-महात्मा यही कहते रहे हैं कि प्रेम पाप है। और वे ऐसी व्यर्थ की बात कहते रहे हैं, लेकिन उन्होंने इतने दिनों से कही है, इतने लंबे अर्से से कही है कि तुम्हें उसकी व्यर्थता, उसका विरोधाभास दिखाई नहीं पड़ता।
प्रेम को तो वे पाप कहते हैं और प्रार्थना को पुण्य कहते हैं। और तुमने कभी गौर से नहीं देखा कि अगर प्रेम पाप है, तो प्रार्थना भी पाप हो जाएगी। क्योंकि प्रार्थना प्रेम का ही परिशुद्ध रूप है। माना कि प्रेम में कुछ अशुद्धियां हैं, लेकिन पाप नहीं है। सोना अगर अशुद्ध हो तो भी लोहा नहीं है। सोना अशुद्ध हो तो भी सोना है। अशुद्ध होकर भी सोना सोना है। रही शुद्ध करने की बात, सो शुद्ध कर लेंगे। कूड़े-करकट को जला देंगे, सोने को आग से गुजार लेंगे; जो व्यर्थ है, असार है, जल जाएगा आग में; जो सार है, जो शुद्ध है, बच जाएगा।
प्रेम और प्रार्थना में उतना ही फर्क है जितना अशुद्ध सोने और शुद्ध सोने में। मगर दोनों ही सोना हैं, यह मैं जोर देकर कहना चाहता हूं। इस पर मेरा बल है। यही आने वाले भविष्य के मनुष्य के धर्म की मूल भित्ति है।
अतीत ने प्रार्थना और प्रेम को अलग-अलग तोड़ दिया था। और उसका दुष्परिणाम हुआ। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रेम दूषित हो गया, कलुषित हो गया, निंदित हो गया। एक तरफ प्रेम को अपराध बना दिया हमने; तो जो प्रेम में थे, उनकी आत्मा का अपमान किया, उनके भीतर आत्मनिंदा पैदा कर दी। और इस जगत में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं है कि किसी व्यक्ति के भीतर आत्मनिंदा पैदा हो जाए। तो प्रेम के कारण हमने पापी पैदा कर दिया दुनिया में। प्रेम पाप है, तो जो भी प्रेम करते हैं, सब पापी हैं। और कौन है जो प्रेम नहीं करता? कोई पत्नी को करता है, कोई पति को, कोई बेटे को, कोई भाई को, कोई मित्र को। शिष्य भी तो गुरु को प्रेम करते हैं! गुरु भी तो शिष्यों को प्रेम करता है! यहां जितने संबंध हैं, वे सारे संबंध ही किसी न किसी अर्थ में प्रेम के संबंध हैं। संबंध मात्र प्रेम के हैं। तो हमने सभी को पापी कर दिया। सारा संसार हमने पाप से भर दिया, एक छोटी सी भूल करके कि प्रेम पाप है।
और दूसरा दुष्परिणाम हुआ कि जब प्रेम पाप हो गया, तो प्रार्थना हमारी थोथी हो गई, उसमें प्राण न रहे, औपचारिक हो गई। प्राण तो प्रेम से मिल सकते थे, तो प्रेम को तो हमने पाप कह दिया। जीवन तो प्रेम से मिलता प्रार्थना को, तो जीवन के तो हमने द्वार बंद कर दिए। प्रेम की ही भूमि से प्रार्थना रस पाती है, तो हमने भूमि को तो निंदित कर दिया और प्रार्थना के वृक्ष को भूमि से अलग कर लिया। भूमि वृक्षहीन हो गई और वृक्ष मुर्दा हो गया। ये दो दुर्घटनाएं घटीं। प्रेम पाप हो गया और प्रार्थना थोथी हो गई।
इसलिए तुम्हारा प्रश्न तो स्वाभाविक है। सदियों-सदियों ने यही समझाया है, इसलिए मन में यह सवाल उठता है: कहीं प्रेम पाप तो नहीं? लेकिन एक बुनियादी भूल हो गई। और उस बुनियादी भूल के कारण पृथ्वी धार्मिक होने से वंचित रह गई। उस भूल को सुधार लेना है। और जितनी जल्दी सुधर जाए उतना अच्छा है।
मैं तुमसे कहता हूं, यह घोषणा करता हूं कि प्रेम पुण्य है।
लेकिन मुझे गलत मत समझ लेना। जब मैं प्रेम को पुण्य कहता हूं तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बस प्रेम पर रुक जाना है। जब मैं प्रेम को पुण्य कह रहा हूं तो सिर्फ यही कह रहा हूं कि प्रेम में सोना छिपा है। कचरा भी है। लेकिन जो कचरा है, वह प्रेम नहीं है। वह विजातीय है। वह सोना नहीं है। कूड़ा-करकट होगा, मिट्टी होगी, कुछ और होगा। विरह की अग्नि से गुजारो इसे। और तुम धीरे-धीरे पाओगे कि तुम्हारे हाथों में प्रार्थना का पक्षी लग गया है, जिसके पंख हैं, जो आकाश में उड़ सकता है। जो इतना हलका है! क्योंकि सारा बोझ कट गया, सारी व्यर्थता गिर गई। जिस दिन तुम प्रार्थना को अनुभव कर पाओगे, उस दिन तुम धन्यवाद दोगे अपने सारे प्रेम के संबंधों को, क्योंकि उनके बिना तुम प्रार्थना तक कभी नहीं आ सकते थे। तुम धन्यवाद दोगे प्रेम के सारे कष्टों को, सुखों को, मिठास के अनुभव और कडुवाहट के अनुभव; जहर और अमृत, प्रेम ने दोनों दिए, उन दोनों को तुम धन्यवाद दोगे। क्योंकि जहर ने भी तुम्हें निखारा और अमृत ने भी तुम्हें सम्हाला और यह घड़ी अंतिम आ सकी सौभाग्य की कि प्रेम प्रार्थना बना।
प्रेम जब प्रार्थना बनता है तो परमात्मा के द्वार खुलते हैं।
प्रेम पाप नहीं है। और किसी बुद्धपुरुष ने प्रेम को पाप नहीं कहा है।
लेकिन लोग कुछ का कुछ समझे हैं। पंडित-पुजारियों ने कहा है। पंडित-पुजारियों की समझ ही क्या है? उनका अनुभव क्या है? तोतों की तरह शास्त्रों को रटे हुए बैठे हैं। हां, उनसे रामायण कहलवा लो, कि उनसे गीता दोहरवा लो, कि वे कुरान का पूरा पाठ कर दें। मगर बस तोतों की तरह, मशीनों की तरह। यह काम तो मशीनें कर सकती हैं। अब तो कंप्यूटर पैदा हो गए हैं, ये सारी बातें कंप्यूटर कर सकते हैं। और आदमी से ज्यादा शुद्ध, आदमी से ज्यादा भूलचूक-मुक्त। बुद्धों ने कुछ कहा, पंडित कुछ समझे। और यह स्वाभाविक है एक अर्थ में, क्योंकि बुद्ध अपनी ऊंचाई से बोलते हैं और पंडित-पुरोहित अपनी नीचाई से समझते हैं। बुद्ध पुकारते हैं पर्वत-शिखरों से और पंडित-पुरोहित अंधेरी घाटियों में सरक रहे हैं। और वहीं से उन्हें जो सुनाई पड़ता है, उसका वे अर्थ बिठाते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं। उन्होंने सब गुड़-गोबर कर दिया।
मुल्ला नसरुद्दीन पुलिस आफिस गया। पुलिस अफसर ने पूछा, बड़े मियां, तुम्हारे पास क्या सुबूत है कि तुम्हारी बीबी पागल हो गई है? कोई डाक्टर की रिपोर्ट, या...
मुल्ला नसरुद्दीन ने बात काटते हुए कहा, यह सब कुछ मैं नहीं जानता साहब, किंतु जो कुछ मैं कह रहा हूं वह सौ प्रतिशत सच है। आज शाम मैं आफिस से घर लौटा तो उसने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया, बड़े प्यार से चाय की प्याली पेश की--हालांकि आज पहली तारीख नहीं है।
लोगों के अपने समझने के ढंग हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन होटल से बाहर निकल रहा है और होटल के बैरा ने कहा, बड़े मियां, टिप में सिर्फ एक अठन्नी! आप मेरा अपमान कर रहे हैं। कम से कम एक रुपया तो होना ही चाहिए।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, क्षमा करना भाई, एक अठन्नी और देकर मैं दुबारा तुम्हारा अपमान नहीं करना चाहता।
लोगों की अपनी समझ है, अपनी व्याख्या है। बुद्धपुरुष कुछ कहते हैं, बुद्धू कुछ समझते हैं। किसी बुद्धपुरुष ने नहीं कहा कि प्रेम पाप है। जीसस ने कहा है: प्रेम परमात्मा है। बुद्ध ने कहा है: प्रेम ध्यान की परिणति है। महावीर ने कहा है: प्रेम समाधि की आत्यंतिक अनुभूति है। नारद से पूछो। शांडिल्य से पूछो। चैतन्य से पूछो। मीरा से पूछो। और क्या तुम सोचते हो, योगेंद्र, इनमें से कोई भी कहेगा प्रेम पाप है? असंभव। जिन्होंने प्रार्थना जानी, जिन्होंने ध्यान जाना, वे कह ही नहीं सकते कि प्रेम पाप है। लेकिन जिन्होंने न ध्यान जाना है, न प्रार्थना जानी है, जिन्होंने जिंदगी का कूड़ा-करकट ही इकट्ठा किया है, और जिन्होंने प्रेम भी नहीं जाना, प्रेम के नाम पर भी कुछ और ढोते रहे हैं; प्रेम के नाम पर भी, प्रेम का मुखौटा लगा कर भी कुछ और ही करते रहे हैं, वे जरूर कहेंगे कि प्रेम पाप है। उनका अनुभव।
अगर साधारण मनुष्य के प्रेम का तुम विचार करो तो बहुत चकित हो जाओगे! उसके प्रेम में इतनी कीचड़ मिली है, उसके सोने में इतना कचरा मिला है, कि सोना तो एक प्रतिशत होगा, निन्यानबे प्रतिशत कचरा है। प्रेम के नाम पर घृणा तक भीतर छिपी है।
तुमने यह बात गौर की? प्रेम को घृणा बनने में देर नहीं लगती। मित्र को दुश्मन बनने में देर कितनी लगती है? जिस स्त्री के लिए तुम जान देने को तैयार थे, उसी की जान लेने को भी तैयार हो जाते हो--इसमें देर कितनी लगती है?
प्रेम इतनी जल्दी घृणा बन जाता है? प्रेम घृणा बन सकता है? और अगर प्रेम घृणा बन सकता है तो कैसा प्रेम! प्रेम घृणा नहीं बन सकता। फिर जो घृणा बन जाता है, वह प्रेम था ही नहीं, कुछ और था, घृणा ही थी, प्रेम का मुखौटा लगा कर नाटक कर रही थी। प्रेम के नाम पर तुम शोषण कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे की मालकियत कर रहे हो। प्रेम के नाम पर राजनीति है, कूटनीति है। प्रेम बड़ा लुभावना शब्द है, बड़ा प्यारा शब्द है, खूब उलझा लेता है। जिससे भी तुम कह देते हो: मुझे आपसे बहुत प्रेम है, वही आपकी बातों में आ जाता है। तुम्हें खुद से भी प्रेम नहीं है, तुम्हें और किससे प्रेम होगा? तुम कहते हो, हमें अपने बच्चों से प्रेम है। अपने बच्चों से तुम्हें प्रेम नहीं है, अपने हैं, इसलिए प्रेम है। मेरे हैं, अहंकार का हिस्सा हैं तुम्हारे, इसलिए प्रेम है। और अगर तुम्हारा बेटा प्रधानमंत्री हो जाए, तो बहुत प्रेम पैदा हो जाएगा। और तुम्हारा बेटा अगर डाकू हो जाए और कारागृह में चला जाए, तो तुम जाकर अदालत में घोषणा कर दोगे कि मैं इनकार करता हूं कि यह मेरा बेटा है। प्रेम समाप्त हो जाएगा।
तुम्हारा प्रेम भी अहंकार है। तुम्हारा प्रेम भी उतने ही दूर तक है जहां तक तुम्हारे अहंकार को सहारा मिलता है, सत्कार मिलता है, सम्मान मिलता है। इस प्रेम के अनुभव के कारण लोगों को भी बात जंच जाती है कि प्रेम पाप है। मगर यह तो प्रेम का अनुभव ही नहीं है। कंकड़-पत्थर बीनते रहे और कहने लगे कि हीरे पाप हैं! हीरों का तुम्हें अनुभव नहीं है।
प्रेम का थोड़ा अनुभव करो। प्रेम बड़ी अदभुत घटना है। साधारण नहीं है, अलौकिक है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग की छोटी सी जो किरण उतरती है, उसी का नाम प्रेम है। इस अंधेरे में रोशनी की जो थोड़ी सी झलक उतर आती है, उसी का नाम प्रेम है। इस पथरीले हृदय में जो थोड़ी आर्द्रता आ जाती है, उसी का नाम प्रेम है।
प्रेम का अर्थ है: मैं किसी के जीवन में आनंदित हूं; किसी के जीवन से आनंदित हूं; अकारण! प्रेम का कोई कारण नहीं होता। कारण हो, तो मोह। और अकारण हो, तो प्रेम। तुम किसी से कहो कि मैं इसलिए तुम्हें प्रेम करता हूं, तो यह मोह। और तुम अगर कोई भी कारण न खोज पाओ, खोजो और न खोज पाओ, लाख खोजो और न खोज पाओ, और तुम्हें यह कहना पड़े कि पता नहीं क्यों, पर प्रेम है, तो मोह नहीं। प्रेम जैसे आकाश से उतरता है, पृथ्वी में उसकी जड़ें ही नहीं होतीं। मोह की जड़ें पृथ्वी में होती हैं। और जिन्होंने प्रेम को पाप कहा है, वे भूल कर रहे हैं शब्दों की। वे मोह को पाप कहें तो ठीक है। क्योंकि मोह का अर्थ है: मेरे का भाव, ममता। प्रेम में तो मोह होता ही नहीं। प्रेम तो बड़ा निर्मोही है।
तुम चौंकोगे मेरी बात सुन कर, लेकिन मैं तुमसे फिर दोहराता हूं: प्रेम अत्यंत निर्मोही है। प्रेम मोह को जानता ही नहीं। प्रेम दूसरे पर कब्जा करता ही नहीं। न तो कब्जा करता है और न अपने पर कब्जा करने देता है। प्रेम तो स्वतंत्रता है। प्रेम तो दो व्यक्तियों के बीच स्वतंत्रता का आदान-प्रदान है। न कोई किसी का मालिक है, न कोई किसी की दासी है। प्रेम एक-दूसरे के गले में फंदा नहीं डालता। प्रेम तो फंदे काटता है। अगर कभी तुम्हारे जीवन में प्रेम का अनुभव हो, तो तुम चकित होओगे: तुम भी मुक्त हुए और जिससे तुम्हारा प्रेम है वह भी मुक्त हुआ। प्रेम मुक्ति लाता है। प्रेम मुक्तिदायी है। और ऐसे प्रेम को ही जीसस ने ईश्वर कहा। बुद्ध ने ध्यान की अंतिम परिणति कहा। महावीर ने कैवल्य का स्वभाव कहा। इस प्रेम को पाप नहीं कहा जा सकता।
तुम्हें पंडितों-पुरोहितों की, संतों-महात्माओं की--तथाकथित संतों-महात्माओं की--बातें जंच गईं, क्योंकि तुम्हारे अनुभव के अनुकूल पड़ गईं। तुम्हारा अनुभव ही गलत है। तुम्हारा अनुभव कंकड़-पत्थरों का है। और जब संतों-महात्माओं ने कहा कि ये सब हीरे कंकड़-पत्थर हैं, तुम्हें भी बात जंची कि बात तो ठीक ही है। और तुम्हारी जिंदगी का प्रेम का जो अनुभव है, इतना दूषित है, इतना धुआं-धुआं है, ज्योति का तो पता ही नहीं चलता, बस धुआं ही धुआं है, कि जब पंडितों ने कहा कि आंखें खराब होती हैं धुएं से, और पीड़ा ही पीड़ा मिलती है, सुख मिलता कहां, तुमको भी बात जंची! क्योंकि यही तो तुम्हारा भी अनुभव है।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, प्रेम निर्धूम शिखा है। प्रेम से धुआं पैदा नहीं होता। हां, प्रेम में जो कचरा है, उसके जलने से धुआं पैदा होता है।
ऐसा समझो कि तुम लकड़ियां जलाते हो, कब धुआं पैदा होता है और कब धुआं पैदा नहीं होता, तुमने विचार किया? लकड़ियों के जलने से धुआं कभी पैदा नहीं होता--अगर लकड़ियां सूखी हों, अगर उनमें पानी न हो भीतर, अगर गीली न हों, तो लकड़ियों से कभी धुआं पैदा नहीं होता। अगर लकड़ी सच में ही सूखी हो, पूरी सूखी हो, उसमें रत्ती मात्र भी जल का अवशेष न रहा हो, तो जरा भी धुआं पैदा नहीं होगा। लकड़ी के जलने से धुआं पैदा नहीं होता। लेकिन लकड़ी गीली हो तो धुआं पैदा होता है। वह गीलापन लकड़ी नहीं है। विजातीय है।
तुम्हारे प्रेम से अगर तुम्हारी आंखें अंधी हो रही हैं और धुआं पैदा हो रहा है और जिंदगी में कालिख आ रही है और जिंदगी उलझन में भरती जा रही है और क्रोध होता है, वैमनस्य होता है,र् ईष्या है, जलन है, यह सब पैदा हो रहा है, तो समझ लेना कि तुम्हारे प्रेम में अभी कचरा बहुत है, विजातीयता बहुत है। इसको अगर कोई पाप कहे तो ठीक, लेकिन यह प्रेम को पाप कहना ठीक नहीं है।
प्रेम से तो कभी धुआं पैदा नहीं होता। अगर तुम्हारे प्रेम से धुआं पैदा होता है तो लकड़ियों को सुखाओ थोड़ा और, निर्मोह करो प्रेम को। मोह लकड़ी को गीला रखता है। निर्मोह करो प्रेम को, अनासक्त करो प्रेम को। प्रेम को घृणा से,र् ईष्या से, जलन से मुक्त करो। और फिर तुम हैरान हो जाओगे कि प्रार्थना की जरूरत ही न रही, तुम्हारा प्रेम ही प्रार्थना बन गया।
और जीवन ने जो अवसर दिया है प्रेम का, इसे ऐसे ही मत गंवा देना। इसे लोग दो तरह से गंवाते हैं। एक तो वे लोग हैं जो प्रेम के नाम पर कुछ और करते रहते हैं और उसे प्रेम समझते हैं। उनको मैं भोगी कहता हूं, संसारी। वे जीवन गंवा देते हैं। और दूसरे वे हैं जो संसार से भाग जाते हैं, प्रेम के कूड़े-करकट से डर कर भाग जाते हैं। कुछ ने कूड़ा-करकट छाती से लगा लिया है, कुछ कूड़े-करकट से डर कर भाग गए। जिन्होंने कूड़ा-करकट छाती से लगाया है, वे भी सोने को न खोज पाएंगे। और जो कूड़े-करकट से डर कर भाग गए, वे सोने से भी भाग गए। क्योंकि सोना और कूड़ा-करकट, सब यहां मिला हुआ है। वे भी कभी प्रेम को न जान पाएंगे। जिनको तुम संन्यासी मानते रहे हो, वे भी प्रेम को नहीं जान पाते। जिनको तुम संसारी जानते हो, वे भी प्रेम को नहीं जानते। भोगी भी वंचित, योगी भी वंचित। अलग-अलग ढंग से वंचित, मगर दोनों वंचित। एक कूड़ा-करकट पकड़ने के कारण वंचित, एक कूड़ा-करकट छोड़ने के कारण वंचित। लेकिन दोनों नहीं देख पाते कि कूड़े-करकट में कुछ छिपा है। मिट्टी में कमल छिपा है, यह दोनों नहीं देख पाते। यही उनका अंधापन है।
मैं तुम्हें चाहूंगा कि तुम जीओ, भागना मत, त्यागना मत। जीवन को उसकी समग्रता में जीओ। जीवन के सारे रूपों में जीवन को जीओ। हां, इतना ही खयाल रहे कि जो रूप तुम्हें कष्ट दे, जानना कि उसमें निखार करना है। छोड़ना नहीं, निखार करना है। त्यागना नहीं, उसमें कुछ गलत है, उस गलत को रूपांतरित करना है।

ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यहीं पे वक्त का सैले-रवां ठहर जाए।
हमें भी चलना है मंजिल तलक मगर ऐ काश,
जरा सी देर को ये कारवां ठहर जाए।

पिलाई आज जो रंगीं लबों के सागर से,
किसी ने ऐसी मयेत्तुंदोत्तेज पी ही नहीं।
ये कहकशां, ये सितारे गवाह हैं ऐ दोस्त,
तेरे अलावा मोहब्बत किसी से की ही नहीं।

गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
हयात सहने-चमन मासियत है फस्ले-बहार।
शराबी ओंठों की मख्मूर अंखड़ियों की कसम,
रिवाजो-रस्मे-जहां गर्के-बादा-ए-गुलनार।

तेरा शबाब, तेरा हुस्न, तेरी रानाई,
खिलें ये फूल तो सारा चमन महक उट्ठे।
तरब की आग को भड़का दे और भड़का दे,
कि जिंदगी की फिजा-ए-खुनक दहक उट्ठे।
ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यह सारा संसार अपना है। यह रात भी अपनी, ये दिन भी अपने। यह सूरज भी अपना, यह चांद भी अपना।
ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यह रात अपनी है, यह चांद अपना है।
यहीं पे वक्त का सैले-रवां ठहर जाए।
काश, ऐसा हो सकता कि रात के इस सौंदर्य में ही समय का कारवां ठहर जाता! काश, ऐसा हो सकता कि फिर कोई बदलाहट न होती!
ऐसा तो हो नहीं सकता। ऐसा चाहोगे तो मुश्किल में पड़ोगे। वक्त का कारवां जरूर ठहरता है, मगर रातों और दिनों में नहीं ठहरता। वक्त का कारवां सिर्फ ध्यान में ठहरता है, प्रार्थना में ठहरता है। समय रुक जाता है, समय भूल जाता है, विस्मृत हो जाता है। मगर यह आकांक्षा तो उठती है, कभी रात के सौंदर्य को देख कर कि बस अब सब यहीं रुक जाए। बस अब जैसा है, ऐसा ही रहे। यहीं से आसक्ति पैदा होती है। यहीं से प्रेम मोह बनना शुरू हो जाता है।
ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यहीं पे वक्त का सैले-रवां ठहर जाए।
हमें भी चलना है मंजिल तलक मगर ऐ काश,
जरा सी देर को ये कारवां ठहर जाए।
पता तो हमें है कि मंजिल तक चलना है, कोई दूर, अज्ञात मंजिल राह देख रही है, मगर फिर भी मन मान लेना चाहता है कि थोड़ी देर को परिवर्तन न हो, यह नदी की धारा रुक जाए। और जब भी तुम्हारा मन चाहता है कि कुछ रुक जाए, धारा रुक जाए, परिवर्तन रुक जाए, तभी तुम बंधन में पड़ जाते हो। रोकने की आकांक्षा बंधन है। जब भी तुम चाहते हो कि चीजें बस ऐसी ही हो जाएं--इतनी सुखद है अभी यह बात, अभी इतना सुखद है यह क्षण, कि कहीं छिटक न जाए हाथ से, कहीं खो न जाए, कहीं यह नदी की धार बह न जाए, कहीं समय बदल न जाए--जहां तुम्हारे मन में ऐसी आकांक्षा जगती है, बस वहीं प्रेम की हत्या शुरू हो गई।
और ऐसी आकांक्षा हम सबके मन में जगती है। कौन नहीं चाहता कि सुख का क्षण सदा को ठहर जाए और दुख का क्षण कभी न आए? मगर न तो सुख के क्षण ठहरते हैं, न दुख के क्षण आने से रुकते हैं। समझदार वह है, जो सुख के क्षण में भी साक्षी होता है, दुख के क्षण में भी साक्षी होता है। और जो साक्षी होता है, उसके लिए समय ठहर जाता है।
पिलाई आज जो रंगीं लबों के सागर से,
किसी ने ऐसी मयेत्तुंदोत्तेज पी ही नहीं।
प्रेमी कह रहा है कि प्रेयसी, तूने अपने रंगीन लबों की सुराही से जो शराब आज पिलाई है, ऐसी तेज शराब न तो कभी किसी ने पिलाई और न कभी किसी ने पी। हर प्रेमी ऐसा ही सोचता है। हर प्रेमी ऐसा ही सोचता है: यह जो हो रहा है मेरे जीवन में, ऐसा कभी किसी को नहीं हुआ।
पिलाई आज जो रंगीं लबों के सागर से,
किसी ने ऐसी मयेत्तुंदोत्तेज पी ही नहीं।
ये कहकशां, ये सितारे गवाह हैं ऐ दोस्त,
तेरे अलावा मोहब्बत किसी से की ही नहीं।
ऐसी भ्रांतियां हैं। तुमसे पहले भी हजारों लोगों ने प्रेम किया है, आज भी हजारों लोग प्रेम कर रहे हैं, आगे भी हजारों लोग प्रेम करते रहेंगे। प्रेम कुछ अस्वाभाविक घटना नहीं है। लेकिन अहंकार ऐसा मान लेना चाहता है कि जैसा प्रेम मैंने किया, किसी ने नहीं किया। सब मजनू फीके, सब फरिहाद फीके। जैसा प्रेम मैंने किया वैसा किसी ने नहीं किया। अहंकार प्रेम पर कब्जा कर लेता है। और जहां अहंकार ने प्रेम पर कब्जा किया, वहीं प्रेम पाप हो जाता है। अहंकार यह भी मानना चाहता है कि बस, यही मेरा एकमात्र प्रेम है।
तेरे अलावा मोहब्बत किसी से की ही नहीं।
प्रेम कोई ऐसी बात नहीं है कि एक पर ठहर जाए। और जिसने प्रेम को एक पर ठहराना चाहा, उसका प्रेम जड़ हो जाता है। प्रेम तो बहता है, चारों तरफ बहता है। जैसे तुम कंकड़ फेंक दो झील में तो लहर उठती है, वर्तुलाकार लहर पर लहर उठती जाती है और चारों तरफ फैलती चली जाती है।
सच्चा प्रेम एक से नहीं होता। सच्चा प्रेम किसी से होता है, ऐसा कहना ही ठीक नहीं। सच्चा प्रेम तो चित्त की एक दशा है; चैतन्य की एक दशा है। सच्चे प्रेम का अर्थ होता है, तुम्हारे भीतर प्रेम है। सच्चे प्रेम का अर्थ होता है, तुम जहां हो, वहां प्रेम की वर्षा होती है। तुम जिसके साथ हो, वहां प्रेम बरसता है। हमने प्रेम को गंदा कर लिया व्यक्तियों से बांध कर। फिर हम एक-दूसरे पर पहरा देने लगे।
मुल्ला नसरुद्दीन पर मुकदमा था अदालत में। उसने अपनी पत्नी को गोली मार दी। मजिस्ट्रेट ने पूछा कि नसरुद्दीन और सब तो ठीक है, मैं तुम्हारी तकलीफ समझता हूं। तुम घर आए, तुमने अपनी पत्नी को किसी की बांहों में देखा, तुम क्रोधित हो गए, तुमने पत्नी को गोली मार दी। यह तो मेरी भी समझ में आता है, मानवीय है। मैं भी शायद यही करता, अगर मेरे साथ ऐसी घटना घटती। मगर मैं तुमसे पूछता हूं, तुमने उस आदमी को गोली क्यों नहीं मारी? पत्नी को गोली क्यों मारी?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, हर सप्ताह एक नये आदमी को गोली मारने की बजाय पत्नी को गोली मारी। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
प्रेम हत्या कर सकता है?र् ईष्या हत्या कर सकती है।र् ईष्या हत्या ही करती है। लेकिन जब प्रेम को तुम एक से बांध देते हो तो अनिवार्यतयार् ईष्या पैदा होती है। जब तुम प्रेम को संबंध बना लेते हो, तभी तुम उसको गंदा बना लेते हो।
प्रेम तो एक भावदशा होनी चाहिए। प्रेम करो, ऐसा मैं नहीं कहता; मैं कहता हूं, प्रेम हो जाओ। और तुम पाओगे कि प्रेम बड़ा पवित्र है। प्रेम करोगे, तो पाप जैसा मालूम पड़ेगा। और प्रेम हो जाओगे, तो पुण्य हो जाएगा।
गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
हयात सहने-चमन मासियत है फस्ले-बहार।
अगर जीवन एक बगीचा है, तो पाप उसमें वसंत है। और गुनाह के बिना तो जिंदगी बेरंग होगी।
गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
हयात सहने-चमन मासियत है फस्ले-बहार।
शराबी ओंठों की मख्मूर अंखड़ियों की कसम,
रिवाजो-रस्मे-जहां गर्के-बादा-ए-गुलनार।
और एक और आश्चर्य की बात तुमसे कहूं। तुम्हारे पंडित-पुरोहित गुहार मचाते रहे हैं; ऐसी गुहार जैसी बरसात के दिनों में मेंढक मचाते हैं। सदियों से एक गुहार मचाते रहे हैं: प्रेम पाप है। इसके दो परिणाम हुए। एक परिणाम तो यह हुआ कि कुछ लोगों ने प्रेम को पाप समझ कर अपने को निंदित माना, अपमानित माना, दीन माना, पापी माना। प्रेम तो जारी रखा--क्योंकि प्रेम स्वाभाविक है, सिर्फ पाप मान लेने से कुछ होता नहीं। हां, लेकिन एक दुर्घटना घट गई, उनका प्रेम विषाक्त हो गया।
फ्रेड्रिक नीत्शे ने यह उल्लेख किया है। फ्रेड्रिक नीत्शे के पास बड़ी अनूठी दृष्टि है। काश, यह आदमी भारत में पैदा हुआ होता तो बुद्ध होता। जर्मनी में पैदा हुआ, इसलिए पागल हो गया। इसके पास अनूठी आंखें थीं। अगर इसको ध्यान का मार्ग मिल जाता तो इसकी अंतर्दृष्टि बड़े हीरे बरसा जाती दुनिया में। यद्यपि इसको ध्यान जैसी किसी बात की कोई प्रतीति नहीं थी, फिर भी कभी-कभी झरोखे उसके जरूर खुलते रहे होंगे। उसे कुछ बातें दिखाई पड़ती रहीं। उन बातों में उसने एक बात यह भी कही है कि पंडित-पुरोहित प्रेम को नष्ट तो नहीं कर पाए, लेकिन उसे विषाक्त करने में जरूर सफल हो गए।
तो एक तो यह दुष्परिणाम हुआ कि लाखों-करोड़ों लोगों का जीवन विषाक्त हो गया। प्रेम पाप है--और करना है प्रेम! तो मां अपने बेटे को प्रेम कर रही है और जान भी रही है कि प्रेम पाप है। यह कैसा प्रेम होगा? यह प्रेम अधूरा हो जाएगा, आधा-आधा हो जाएगा, अपंग हो जाएगा, लंगड़ा हो जाएगा, लूला हो जाएगा। पति पत्नी को प्रेम कर रहा है और जान रहा है कि प्रेम पाप है। पति और पत्नी के बीच में महात्मा खड़े हैं और वे कह रहे हैं: प्रेम पाप है, सावधान! तुम कहीं चले जाओ, कितने ही एकांत में पत्नी को लेकर, दूर पहाड़ों में, इससे क्या होता है? महात्मा पीछा करेंगे, बीच में खड़े होंगे और कहेंगे: प्रेम पाप है। प्रेम करते क्षण में भी कोई तुम्हारे भीतर कहे चला जाता है: प्रेम पाप है।
तो तुम प्रेम पूरा नहीं कर पाते। और जो अनुभव पूरा नहीं होता, उससे मुक्ति नहीं हो सकती। अधूरे अनुभव कभी मुक्ति नहीं लाते। क्योंकि मन कहता है, पता नहीं, अभी कुछ और बाकी हो। अभी पूरा तो जाना नहीं। शायद और कुछ शेष हो। और शायद जो शेष है, वही सुखद हो। इसलिए चले चलो। और पीछे पाप का भाव है, इसलिए वह पूरा कभी होने नहीं देगा। तो एक तो उपद्रव यह हुआ कि कुछ लोगों के जीवन में प्रेम विषाक्त हो गया। और उनके जीवन में प्रार्थना की तो संभावना दूर, प्रेम की संभावना भी न रही। और दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि कुछ लोगों को, प्रेम पाप है, इसकी गुहार सुन कर प्रेम में एक रुग्ण उत्सुकता जग गई। वह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। अगर किसी चीज को करने से इनकार किया जाए, तो करने की आकांक्षा पैदा होती है। किसी दरवाजे पर लिख दो: यहां झांकना मना है। लोग वहां झांकने लगेंगे। जो कभी नहीं झांकते थे, जो वैसे निकल जाते थे हजार दफा उसी दरवाजे के सामने से, वहां लिखा है झांकना मना है, कि जरूर झांकेंगे।
तुमने देखा नहीं, कोई रास्ते से बुरका ओढ़े हुए औरत निकल जाए, तो हर आदमी देखना चाहता है: बुरके के भीतर चेहरा कैसा है? चाहे बुरके के भीतर मुल्ला नसरुद्दीन हों! मगर लोग झांक-झांक कर देखना चाहते हैं। जहां निषेध है, वहां आकर्षण पैदा हो जाता है।
यही तो बुनियादी भूल ईसाइयों की कहानी में परमात्मा ने प्रथम दिन कर दी। अदम को कह दिया कि तू इस वृक्ष के फल मत खाना; इस वृक्ष के फल, इस ज्ञान के वृक्ष के फल वर्जित हैं।
अब तुम जरा सोचो! जरा किसी बच्चे को कहना कि फ्रिज के पास मत जाना, आज वहां रसमलाई रखी है, कि रसगुल्ले रखे हैं। न कहते तो शायद उसे खयाल भी न होता। न कहते तो शायद वह फ्रिज के पास जाता भी नहीं। अब तुमने कह दिया कि रसगुल्ले, रसमलाई, फ्रिज के पास मत जाना! देखो तुम्हारे पैर कहीं फ्रिज के पास न पड़ें, नहीं तो टांग तोड़ दी जाएगी! अब इस बच्चे को चौबीस घंटे एक ही धुन रहेगी कि कब मौका मिल जाए, कब मां पड़ोस में जाए, कि पिता दफ्तर जाएं, कि कब मौका मिल जाए कि वह फ्रिज के पास पहुंचे। अब इसका खेल में मन न लगेगा। अब गिल्ली-डंडे में मन नहीं लगेगा। अब पतंग उड़ाने में मन नहीं लगेगा। वह रसमलाई खींचती ही रहेगी। उसका रस गहरा हो गया। और निषेध जहां है, वहां रस पैदा हो जाता है, बहुत रस पैदा हो जाता है।
किसी फिल्म में लिखा होता है: सिर्फ वयस्कों के लिए। वहां छोटे-छोटे बच्चे पहुंच जाते हैं। मैंने तो एक बच्चे को पकड़ा, वह मूंछ लगा कर पहुंच गया था। दो आने की मूंछ खरीद ली होगी बाजार से, उसको लगा कर पहुंच गया। रास्ते में ही जा रहा था तो मुझे दिखाई पड़ा। मैंने कहा कि इस लड़के को मैं जानता हूं, इसको एकदम से मूंछ कैसे ऊग आई? बच कर भागना चाहा, मैंने रोका, पूछा: तू जा कहां रहा है? उसने कहा, आप मुझे बाधा न डालें, जल्दी मुझे छोड़ें, मुझे जाना है, देर हो जाएगी। मैंने कहा, बात क्या है? उसने कहा, अब आपसे क्या छिपाना, मेटिनी-शो में जा रहा हूं। और वयस्कों के लिए है, तो मैंने यह मूंछ लगा ली है।
अगर वयस्कों के लिए न लिखा होता, तो शायद इस बच्चे को रस भी पैदा न होता।
छोटे-छोटे बच्चों को तुम कहते हो, सिगरेट मत पीना!
अभी उन्होंने पी ही नहीं है। अब तुम उन पर बड़ी कृपा करके उनको संदेश दे रहे हो कि पीओ! तुम रास्ता बता रहे हो। तुम यह कह रहे हो कि सिगरेट पीने में जरूर कोई मजा होगा। तुम बच्चे से कह रहे हो, सिगरेट मत पीना। अब यह पीएगा।
परमात्मा ने जो पहली भूल की थी--परमात्मा को लोग पिता कहते हैं, ठीक ही कहते हैं, क्योंकि ऐसी भूलें पिता ही कर सकते हैं--जो भूल परमात्मा ने की थी, अदम को चखना ही पड़ा फल। वही भूल सारे पिता करते हैं। ऐसा मत करना, वैसा मत करना। बच्चों को अभी पता ही नहीं कि झूठ बोलना क्या होता है। उनको समझाते हैं: झूठ मत बोलना। जितना निषेध बढ़ता जाता है उतना आकर्षण बढ़ता जाता है। जिस चीज में भी निषेध होता है, लगता है जरूर कुछ होगा! नहीं तो निषेध क्यों किया जाता? जरूर कुछ बात होगी! जब इतनी गुहार मचाई जा रही है कि प्रेम पाप है, तो कुछ लोग हैं जिनको प्रेम में पाप के कारण ही रस पैदा हुआ। पाप न कहा जाता तो शायद उन्हें इतना रस पैदा भी न होता। जो चीज भी पाप करार दे दी जाएगी, उसमें रस पैदा हो जाता है।
जैसे समझो! अगर शराब पीना पाप है, तो ज्यादा लोग शराब पीने लगते हैं। जहां-जहां, जिस-जिस देश में शराबबंदी होती है, वहां-वहां लोग ज्यादा शराब पीने लगते हैं। घर-घर शराब बनने लगती है--ग्रामोद्योग खुल जाते हैं। अब मोरारजी देसाई इस देश में भी ग्रामोद्योग खुलवाने की कोशिश कर रहे हैं। घर-घर में शराब बनेगी, घर-घर में भट्टी होगी। और सैकड़ों लोग मरेंगे गलत तरह की शराब पीकर। शराब नहीं मिलेगी तो लोग स्प्रिट पीएंगे। स्प्रिट नहीं मिलेगी तो न मालूम क्या करेंगे--पेट्रोल पीएंगे या क्या पीएंगे, मगर कुछ भी पीएंगे। और तुम रोज अखबारों में पढ़ते हो कि सैकड़ों लोग मर जाते हैं। फिर भी एक अंधापन है, शराबबंदी होनी ही चाहिए।
मोरारजी देसाई को न पीना हो तो कौन कह रहा है कि पीओ? लेकिन बंद करके तुम उन लोगों को पिलवा दोगे जिन्होंने शायद कभी न पी होती। और जिनको पीना है वे तो पीएंगे। कोई कानून इतनी आसानी से नहीं रोक सकता किसी को। सदियों-सदियों में कितने उपदेशक हुए जो कहते रहे, शराब न पीओ--और शराब जारी रही। जिन-जिन देशों में नियम बनाए गए, शराब न पीने के लिए कानून लगाए गए, उन-उन देशों में शराब की खपत बढ़ गई। और चूंकि लोग घर-घर शराब बनाने लगे इसलिए उस शराब का कोई भरोसा भी नहीं कि वह ठीक है, कि जहर है, कि क्या है। और शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग दूसरे परिपूरक खोजते हैं। कमला टॉनिक! न मालूम क्या-क्या रास्ते निकालेंगे। निकालने ही पड़ेंगे। और जब शराब बंद की जाती है तो एक जुगुप्सा पैदा होती है, एक रुग्ण रस पैदा होता है।
गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
तो अगर तुम कहते हो प्रेम पाप है, तो कुछ लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे: गुनाह, पाप?
गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
अगर पाप है प्रेम, तो बिलकुल ठीक है, क्योंकि बिना पाप के जिंदगी में मजा ही क्या? पाप ही न हो तो जिंदगी में रस ही क्या? जिस चीज को भी रसपूर्ण बनाना हो, उसको पाप बना दो, पहले उसको पाप की घोषणा दे दो।
समझ लो कि कोकाकोला पाप। तब तुम देखना कि लोग किस मजे से पीते हैं! फिर इतने जल्दी नहीं गटकेंगे। चुस्की ले-ले कर पीएंगे! पाप जैसी चीज कोई एकदम गटकता है? छिप-छिप कर पीएंगे। पीने में ज्यादा मजा आएगा। पाप की घोषणा कर दो और तुमने मजा बढ़ा दिया। जिस चीज की भी पाप की घोषणा कर दो, उसमें मजा बढ़ जाता है।
अमरीका में कुछ दोत्तीन वर्ष पहले अमरीकी सरकार ने तय किया कि हर सिगरेट के पैकेट पर लिखा होगा कि यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। सिगरेट बनाने वाले उद्योगपति बहुत चिंतित थे कि फिर सिगरेटें खरीदेगा कौन? जब लाल अक्षरों में साफ वाघनग, चेतावनी दी हुई होगी: सावधान! सिगरेट पीना खतरनाक है, स्वास्थ्य के लिए हानिकर है, तो कौन सिगरेट खरीदेगा? उन्होंने बड़ी जद्दोजहद की, लेकिन सरकार ने नियम बना ही दिया। और तब एक बहुत हैरानी का अनुभव हुआ। दोत्तीन महीने तक तो सिगरेट की बिक्री में थोड़ी सी कमी हुई। और उसके बाद एकदम बढ़ती हुई। उससे भी ज्यादा बढ़ कर सिगरेट बिकने लगी जितनी नियम बनने के पहले बिकती थी।
मनोवैज्ञानिक चकित हुए कि बात क्या हुई? खोज-बीन की गई तो पता यह चला कि इससे और लोगों को रस आ गया है। लोग कहते हैं, कौन फिक्र करता है! कोई हम कायर हैं? अरे, न जीए अस्सी साल, अठहत्तर साल सही। दो साल जीकर भी और क्या कर लेते? और न शराब पीओ, और न सिगरेट पीओ, और न प्रेम करो, तो जीकर भी क्या करोगे?
मैंने सुना, एक आदमी मरा। बड़ा साधु आदमी था। जब वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंचा तो दरियाफ्त की जाती है, जो नियम से की गई दरियाफ्त, कि तुमने कोई भाई पाप तो नहीं किए?
उसने कहा, पाप! मैं सदा दूर रहा।
द्वारपाल ने पूछा, कभी प्रेम में तो पड़े होओगे?
उसने कहा, कभी नहीं।
सिगरेट पी?
नहीं।
शराब पी?
नहीं।
जुआ खेला?
नहीं।
रेसकोर्स?
नहीं।
द्वारपाल भी थोड़ा चौंका और उसने कहा, तो फिर इतनी देर वहां करते क्या रहे? इतनी देर जीए कैसे?
लोग अगर किसी चीज को पाप समझ लें, तो उस पाप के समझने में ही रस बढ़ जाता है। कुछ लोग जीवन में विषाक्त हो जाएंगे और कुछ लोग पाप के कारण बहुत आतुर हो जाएंगे।
गुनाह! जिंदगी बेरंग है बगैर गुनाह,
हयात सहने-चमन मासियत है फस्ले-बहार।
अगर जिंदगी कोई बगीचा है, तो पाप वसंत है--ऐसा कुछ लोग समझेंगे।
शराबी ओंठों की मख्मूर अंखड़ियों की कसम,
रिवाजो-रस्मे-जहां गर्के-बादा-ए-गुलनार।
तेरा शबाब...
तेरी जवानी!
...तेरा हुस्न, तेरी रानाई,
तेरा सौंदर्य!
तेरा शबाब, तेरा हुस्न, तेरी रानाई,
खिलें ये फूल तो सारा चमन महक उट्ठे।
फिर कुछ लोग इस तरह के ख्वाबों में खो जाते हैं।
तेरा शबाब, तेरा हुस्न, तेरी रानाई,
खिलें ये फूल तो सारा चमन महक उट्ठे।
तरब की आग को भड़का दे और भड़का दे,
यह जो भोग की आग है--
तरब की आग को भड़का दे और भड़का दे,
कि जिंदगी की फिजा-ए-खुनक दहक उट्ठे।
कि जिंदगी की सर्द, ठंडी हवाएं थोड़ी उत्तप्त हो जाएं। थोड़ी गरमाहट आ जाए। पाप कुछ लोगों की जिंदगी को विषाक्त कर देता है, कुछ लोगों की जिंदगी में गरमाहट दे देता है।
जिन्होंने प्रेम को पाप कहा है, उन्होंने मनुष्य-जाति का बड़ा भयंकर अपमान ही नहीं किया, उसकी हानि भी की है। दो तरह से हानि की है।
मैं प्रेम को पुण्य कहता हूं। लेकिन तुम्हारे प्रेम को नहीं। तुम्हें तो प्रेम का अभी पता ही नहीं। तुमने तो प्रेम का जो कचरा है, उसको सोना समझ रखा है। जरा इस कचरे में टटोलो। इसी कचरे में कहीं हीरा दबा है।
प्रेम का अर्थ क्या होता है? प्रेम का अर्थ होता है: दान। प्रेम का अर्थ होता है: जीवन का बांटना। प्रेम का अर्थ होता है: खुशियां बिखेरना। प्रेम का अर्थ होता है: लोगों के जीवन में थोड़े से फूल खिल जाएं, इसके लिए सतत चेष्टारत रहना। प्रेम का अर्थ होता है: बुझे दीयों को जलाना।
प्रेम धर्म है।


तीसरा प्रश्न: आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?

धीरेंद्र! भीड़ भीड़ है, इसलिए। भीड़ तो भेड?ो की होती है, सिंहों की नहीं होती। भीड़ तो अंधों की होती है, आंख वालों की नहीं होती। आंख वाले तो अकेले चलने में समर्थ होते हैं। भीड़ एक-दूसरे को पकड़ कर चलती है। भीड़ कायरों की होती है, वीरों की नहीं होती।
सिंहों के नहीं लेहड़े। सिंहों की कोई भीड़ नहीं होती।
क्यों? भेड़ें क्यों भीड़ में चलती हैं? क्योंकि भीड़ में एक सुरक्षा है। इतनी हैं, इसलिए कोई खतरा कम रहेगा। इतना संग-साथ है, इसलिए खतरा नहीं होगा।
भीड़ तो अंधी होती है। भीड़ की चाल को मैं भेड़-चाल कहता हूं। भीड़ की बातों का कोई मूल्य नहीं है। अगर भीड़ समझ ही सकती होती तो भीड़ न होती, व्यक्तित्व का जन्म हो जाता। जिस आदमी के भीतर भी थोड़ी प्रज्ञा पैदा होती है वह व्यक्ति बन जाता है, भीड़ का हिस्सा नहीं रह जाता। भीड़ में भी हो तो भी अकेला होता है। बाजार में भी हो तो भी अकेला होता है। उसके पास एक निजता होती है। हिंदू नहीं होता वह। क्योंकि हिंदू तो एक भीड़ का नाम है। मुसलमान नहीं होता वह। क्योंकि मुसलमान तो दूसरी भीड़ का नाम है। ऐसी बहुत भीड़ें हैं जमीन पर। जिसके भीतर थोड़ी सी भी ज्ञान की ज्योति है, जिसके भीतर थोड़ी भी बौद्धिक क्षमता है, निखार है, जो सोच सकता, विचार सकता, जो देख सकता, जिसके पास थोड़ी दृष्टि है, वह किसी भीड़ का हिस्सा नहीं होता। वह अपने पैर खड़ा होता है। उसके मित्र होते हैं, लेकिन भीड़ नहीं होती। उसके संगी-साथी होते हैं, लेकिन भीड़ नहीं होती। उसके साथ समान अनुभव और समान विचार रखने वालों के नाते होते हैं, लेकिन भीड़ नहीं होती। वह चलता तो अपने ही निज बोध से है। वह अपनी ही रोशनी में अपने पैर बढ़ाता है। उसको सुरक्षा की चिंता नहीं होती। तुम पूछते हो कि आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?
इसीलिए कि इतना सहज, इतना सरल और इतना सत्य जीवन-दर्शन भीड़ को डराता है, घबड़ाता है। भीड़ चाहती है कृत्रिम जीवन-दर्शन। क्योंकि जितना कृत्रिम जीवन-दर्शन हो, उतनी ही निजता से छुटकारा रहता है। और जितना सहज, स्वाभाविक जीवन-दर्शन हो, उतनी ही निजता प्रगाढ़ होने लगती है, प्रकट होने लगती है। जितने तुम झूठे हो उतने ही तुम आसानी से भीड़ के हिस्से हो सकते हो। जितने तुम सच्चे हो उतना ही भीड़ तुम्हें बरदाश्त नहीं करेगी।
नहीं तो सुकरात को जहर पिलाती भीड़? सच्चा आदमी। सीधा-साफ। जैसा है वैसा कहेगा। दांव-पेंच नहीं। लीपा-पोती नहीं। दो और दो चार होते हैं तो दो और दो चार ही कहेगा, चाहे परिणाम कुछ भी हो। और जो भीड़ सदा से मानती रही है कि दो और दो पांच होते हैं, वह कैसे बरदाश्त करे? अगर भीड़ सुकरात से राजी हो तो उसका अर्थ हुआ कि अब तक के सारे लोग गलत थे, भीड़ गलत थी, हजारों-हजारों साल से चली आने वाली परंपरा गलत थी। भीड़ यह बरदाश्त नहीं कर सकती। इससे बेहतर यह एक आदमी गलत हो। और इस गलत आदमी को जिंदा रखना ठीक नहीं है। क्योंकि सहज और सत्य की एक खूबी है कि उसकी मौजूदगी झूठ को मिटाने लगती है। झूठ लोगों को बांधे हुए है। हजार तरह के झूठों में लोग जी रहे हैं। बहुत-बहुत दिनों के संबंध होने के कारण झूठ प्यारे भी हो गए हैं। और चूंकि सभी एक जैसे हैं, इसलिए कोई अड़चन पैदा नहीं होती।
एक बार एक इत्र बेचने वाला किसी गांव में इत्र बेचने आया। दो ग्रामीण उसे खेत में मिले। इत्र वाले ने उन्हें एक-एक फाहा देकर अपने इत्र की तारीफ की। एक ग्रामीण ने तपाक से फाहा लेकर अपने मुंह में रख लिया। दूसरे ग्रामीण ने उसे पागल बतलाते हुए कहा, तू पागल है, यार। इत्र की कदर भी नहीं जानता? यहीं खा गया? मैं तो घर जाकर रोटी के साथ खाऊंगा।
इत्र के लिए थोड़ी परख तो चाहिए। और फिर जिन्होंने बदबू को ही जीवन समझ लिया हो, वे सुगंध को नहीं परख पाते।
खलील जिब्रान की प्रसिद्ध कहानी है कि एक मछली बेचने वाली औरत गांव से शहर मछली बेचने आई। मछलियां बेच कर जब लौटती थी तो अचानक बाजार में उसे बचपन की एक सहेली मिल गई। वह सहेली अब मालिन हो गई थी। उस मालिन ने कहा, आज रात मेरे घर रुको! कल सुबह होते ही चले जाना। कितने वर्षों बाद मिले, कितनी-कितनी बातें करने को हैं!
मछली बेचने वाली औरत मालिन के घर रुकी। मालिन का घर बगिया से घिरा हुआ। फिर पुरानी सहेली की सेवा मालिन ने खूब दिल भर कर की। और जब सोने का समय आया और मालिन सोई, तो इसके पहले कि वह सोती, बगिया में गई, चांद निकला था, बेले के फूल खिले थे, उसने बेलों की झोली भर ली और बैलों का ढेर अपनी सहेली उस मछली बेचने वाली औरत के पास आकर लगा दिया, कि रात भर बेलों की सुगंध! लेकिन थोड़ी देर बाद मालिन परेशान हुई, क्योंकि मछली बेचने वाली औरत सो ही नहीं रही, करवट बदलती है बार-बार। पूछा कि क्या नींद नहीं आ रही है?
उसने कहा, क्षमा करो, ये फूल यहां से हटा दो। और मेरी टोकरी, जिसमें मैं मछलियां लाई थी, उस पर जरा पानी छिड़क कर मेरे पास रख दो।
मालिन ने कहा, तू पागल हो गई है?
उसने कहा, मैं पागल नहीं हो गई। मैं तो एक ही सुगंध जानती हूं: मछलियों की। और बाकी सब दुर्गंध है।
भीड़ मछलियों की गंध को जानती है। उससे परिचित है। शास्त्रों के पिटे-पिटाए शब्द दोहराए जाएं तो भीड़ उनसे राजी होती है, क्योंकि बाप-दादों से वही सुने हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही सुने हैं। सुनते-सुनते उनके कान भी पक गए हैं। वे ठीक लगते हैं।
मैं उनसे वह कह रहा हूं जो मेरी प्रतीति है, मेरा अनुभव है। और मजा यह है कि मैं उनसे वह कह रहा हूं जो कि शास्त्रों की अंतर्निहित आत्मा है। मगर शास्त्रों के शब्द मैं उपयोग नहीं कर रहा हूं। शब्द तो पुराने पड़ गए। शब्द तो बदल दिए जाने चाहिए। अब तो हमें नये शब्द खोजने होंगे। हर सदी को अपने शब्द खोजने होते हैं। हर सदी को अपने धर्म के लिए पुनः-पुनः अवतार देना होता है। हर सदी को अपनी अभिव्यक्ति खोजनी होती है।
तो मैं वही कह रहा हूं जो बुद्ध ने कहा, कृष्ण ने कहा, मोहम्मद ने कहा, जीसस ने कहा; लेकिन अपने ढंग से कह रहा हूं। मैं बीसवीं सदी का आदमी हूं। मैं चाहूं भी तो कृष्ण की भाषा नहीं बोल सकता। कृष्ण की भाषा अब किसी अर्थ की भी नहीं है। सार्थक थी उस दिन जिस दिन अर्जुन से कृष्ण बोले थे। आज न तो अर्जुन है, न कुरुक्षेत्र है, न महाभारत हो रहा है। आज कृष्ण की गीता पर अगर कुछ कहना भी हो तो बीसवीं सदी की भाषा में कहना होगा। और तुम्हारी आदत शब्दों को पकड़ने की है, आत्मा को पहचानने की नहीं।
तो भीड़ मेरे नये शब्दों से परेशान है, मेरी नई दृष्टि से परेशान है। जो समझ सकते हैं, वे तो तत्क्षण पहचान लेते हैं कि मैं वही कह रहा हूं जो सदा कहा गया है। भाषा भिन्न है, भाव भिन्न नहीं है। अभिव्यंजना भिन्न है। शायद मेरा वाद्य भिन्न है, मगर जो गीत मैं गा रहा हूं वह शाश्वत का गीत है, सनातन गीत है। उसके अतिरिक्त कोई गीत ही नहीं है। मैं तो हूं भी नहीं, परमात्मा जो गा रहा है उसे ही बिना बाधा डाले तुम तक पहुंच जाने दे रहा हूं।
मगर भीड़ की अपनी आदतें हैं। मैंने सुना है:

जेबकतरों के अखिल भारतीय संगठन ने
करवाया अभूतपूर्व कवि-सम्मेलन
जब बड़ी देर तक बजी नहीं ताली
हर कविता जाने लगी खाली-खाली
तब हमने सम्मेलन के संचालक से पूछा
कि बात क्या है?
हमारे हर कविगण
अच्छी कविता दांव पर लगा रहे हैं
किंतु श्रोता ताली नहीं बजा रहे हैं!
वे बोले, श्रीमान,
बात तो आपको बुरी लगेगी
किंतु साफ बात यह है कि
यहां ताली नहीं बजेगी
क्योंकि हमारे हर श्रोतागण के हाथ
बगल वाले की जेब टटोल रहे हैं
हम अब अपने सम्मेलन का
रहस्य खोल रहे हैं।
अब जेबकतरों ने अगर कवि-सम्मेलन बुलाया हो तो ताली बजे कैसे? हाथ खाली नहीं हैं, सब एक-दूसरे की जेब में पड़े हुए हैं। ताली बजाए तो कौन बजाए!
भीड़ वही समझ सकती है जो भीड़ के भेड़पन को सहारा देता हो। और मैं तो निजता की घोषणा कर रहा हूं। मैं तो कह रहा हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निज जीवन में जीना चाहिए। किसी का अनुकरण नहीं, किसी का अनुसरण नहीं। सीखो सबसे, समझो सबसे, मगर जीना सदा अपनी रोशनी में, अपने अनुभव में! अपना अपमान मत करना। अपनी आत्मा को मत बेचना। सौदे मत करना आत्मा के, समझौते मत करना!
तो भीड़ की भी कठिनाई है। और जब भीड़ को कुछ समझ में नहीं आता, तो भीड़ कुछ तो करेगी! अगर तालियां नहीं बजा सकती तो गालियां तो दे ही सकती है। हाथ उलझे होंगे, जबानें तो मुक्त हैं। भीड़ उन्हीं बातों के लिए मुझे गालियां दे रही है, जिन बातों के लिए उसे मुझे धन्यवाद देना चाहिए। मगर, उनकी तकलीफ भी मेरी समझ में आती है। उनकी मान्यताओं के विपरीत हैं वे बातें। और उनकी मान्यताएं टूटें, तो ही उनके जीवन में थोड़ा प्रकाश आए। मैं भी मजबूर हूं। मैं उनकी मान्यता तोड़ने में लगा ही रहूंगा। वे गालियां देते रहें, मैं उनकी जंजीरें काटता रहूंगा। और निश्चित ही, जिसके पैरों में जंजीरें बहुत दिन तक रही हों, तुम उसकी अचानक जंजीर काटने लगो, वह नाराज होगा!
मैंने सुना है, एक पहाड़ी सराय में एक कवि मेहमान हुआ। उस सराय में द्वार पर ही लटका एक तोता था। उस तोते की एक ही रटंत थी: स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! उस सराय का मालिक स्वतंत्रता के आंदोलन में सिपाही रह चुका था और उसने अपने तोते को भी स्वतंत्रता का पाठ सिखा दिया था। उस सराय का मालिक स्वतंत्रता के आंदोलन में जेलघरों में रहा था, कारागृहों में रहा था। कारागृह में उसके भीतर एक ही आवाज उठती थी प्राणों में: स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! उसने अपने तोते को भी यह सिखा दिया था।
यह बड़े मजे की बात है। हालांकि तोते को बंद किया था पिंजड़े में, मगर यह सिखा दिया था। तो जैसे कोई तोता राम-राम, राम-राम जपता, वह तोता स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता जपता था। न तो मालिक को खयाल था कि मैं यह क्या कर रहा हूं? कि अगर स्वतंत्रता से ही मुझे प्रेम है, तो खोलो द्वार, तोते को उड़ जाने दो! पहाड़ उसके हैं, वन-प्रांतर उसके हैं, झीलें उसकी हैं, वृक्ष उसके हैं, चांदत्तारे उसके हैं, आकाश उसका है--छोड़ो, मुक्त करो! मगर नहीं, सिर्फ स्वतंत्रता का पाठ!
ऐसे ही लोग मोक्ष का पाठ पढ़ रहे हैं। मरना कोई नहीं चाहता, मुक्त कोई नहीं होना चाहता। अगर किसी से कहो कि सच में जाना है मोक्ष? भेज दूं? तो एकदम नाराज हो जाएगा--कि आप समझे क्या हैं? आप मोक्ष भेजना चाहते हैं मुझे? अभी नहीं। जाऊंगा कभी। यह तो अंत की तैयारी कर रहा हूं।
लोग राम-राम, राम-राम जप रहे हैं, लेकिन राम से किसी को कुछ लेना-देना नहीं है। ऐसा ही तोता था। लेकिन कवि तो कवि। कवि ने कहा कि बेचारा तोता, स्वतंत्रता के लिए कितना आग्रह कर रहा है, कोई सुन नहीं रहा! दिन में तो उसने कहा कि ठीक नहीं है, क्योंकि सराय का मालिक शायद नाराज हो, उसका तोता छोड़ दो तो। रात! तोता फिर भी बोले जा रहा था। चांद निकला था पूरा और तोता बार-बार रात के सन्नाटे में, उस पहाड़ के सन्नाटे में उसकी गूंज उठती थी: स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! कवि तो कवि। वह उठा और उसने जाकर तोते का दरवाजा खोला और कहा, प्यारे, उड़ जाओ! मगर तोता नहीं उड़ा। बल्कि तोते ने क्रोध से उस कवि को देखा: यह कौन है जो उसका दरवाजा खोल रहा है?
कवि तो कवि, तोते को उड़ते नहीं देखा तो हाथ डाल कर तोते को बाहर निकालना चाहा। तोते ने चोंचें मारीं! मगर कवि तो कवि, तोता चोंचें मारता रहा, पैरों से जोर से उसने सींकचे पकड़ लिए, मगर कवि तो कवि, उसने खींच कर तोते को उड़ा ही दिया। उसके हाथ लहूलुहान हो गए, लेकिन फिर भी वह प्रसन्न था कि एक आत्मा मुक्त तो हुई! बड़ी निश्चिंतता से सोया।
सुबह जब आंख खुली तो हैरान हुआ। तोता पिंजड़े में बैठा था--दरवाजा अभी भी पिंजड़े का खुला था--और चिल्ला रहा था: स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! स्वतंत्रता!
जो कारागृहों में रहने के आदी हो गए हैं, उन्हें मुक्त करना आसान नहीं। जो अंधविश्वासों में जीने के आदी हो गए हैं, उनको उनके बाहर लाना आसान नहीं। जिन्होंने कुछ पक्षपात निर्मित कर लिए हैं, पक्षपात ही जिनके प्राण बन गए हैं, उनसे उनके पक्षपात छीनना आसान नहीं। मेरे हाथ लहूलुहान होंगे। मगर कवि तो कवि! गालियां दो, पत्थर मारो, मुकदमे चलाओ, सारा सरकारी यंत्र पीछे लगाओ--मगर कवि तो कवि!

चमन वालों में इदराके-नमू बढ़ता ही जाता है,
मुबारिक हो रिवाजे-रंगो-बू बढ़ता ही जाता है।
सलासिल भी हैं, जिंदां भी हैं दीवानों की राहों में,
मगर ऐ दोस्त शोरे-हाए-हू बढ़ता ही जाता है।
ये मंजिल की कशिश है या शऊरे-जादापैमाई?
बहरमुश्किल मजाके-जुस्तजू बढ़ता ही जाता है।
हुजूरे-मोहतसिब रिंदों की बेबाकी कोई देखे,
जवाबन हलका-ए-जामो-सुबू बढ़ता ही जाता है।
खुमारे-हसरते-दोशीना कैसा आज तो "ताबां'
बहरजुरअ सुरूरे-आरजू बढ़ता ही जाता है।
मेरी बादापरस्ती मूर्दे-इलजाम है साकी,
खिरद वालों की महफिल में जुनूं बदनाम है साकी।

चमन वालों में इदराके-नमू बढ़ता ही जाता है,
बगीचे में खबर पहुंचने लगी, ज्ञान की खबर पहुंचने लगी।
मुबारिक हो रिवाजे-रंगो-बू बढ़ता ही जाता है।
कुछ रंग भी आने लगा, कुछ गंध भी आने लगी।
मुबारिक हो रिवाजे-रंगो-बू बढ़ता ही जाता है।
सलासिल भी हैं, जिंदां भी हैं दीवानों की राहों में
एक बात खयाल रखना, जो दीवाने हैं--और मैं दीवाना हूं और मेरे साथ जो हैं वे दीवाने हैं--जो दीवाने हैं, उनके रास्ते में जंजीरें भी आएंगी, कारागृह भी आएंगे।
सलासिल भी हैं, जिंदां भी हैं दीवानों की राहों में
मगर ऐ दोस्त शोरे-हाए-हू बढ़ता ही जाता है।
मगर बड़ी खुशी की बात है, न जंजीरों की फिक्र है, न कारागृह की फिक्र है, जो गीत हमें गाना है, हम गाए जा रहे; जो आवाज हमें लगानी है, हम लगाए जा रहे; जो शोर हमें मचाना है, हम मचाए जा रहे।
ये मंजिल की कशिश है या शऊरे-जादापैमाई?
यह परमात्मा की मंजिल का आकर्षण है या अज्ञात राहों में जाने का आनंद, जो भी हो--
ये मंजिल की कशिश है या शऊरे-जादापैमाई?
बहरमुश्किल मजाके-जुस्तजू बढ़ता ही जाता है।
कठिनाइयां बढ़ रही हैं, लेकिन हर कठिनाई के साथ-साथ तलाश का आनंद, खोज का आनंद, जिज्ञासा का आनंद भी बढ़ रहा है। जो मेरे साथ खड़े हैं उन्हें गालियां पड़ेंगी, जो मेरे साथ खड़े हैं उन पर पत्थर पड़ेंगे, जो मेरे साथ खड़े हैं उनके रास्ते में--
सलासिल भी हैं, जिंदां भी हैं दीवानों की राहों में
मगर ऐ दोस्त शोरे-हाए-हू बढ़ता ही जाता है।
बढ़ती ही जाती है दीवानों की यह महफिल। इस मधुशाला में पीने वालों की संख्या बढ़ती ही जाती है। न गालियां रोक पाएंगी, न जंजीरें रोक पाएंगी, न कारागृह रोक पाएंगे।
ये मंजिल की कशिश है या शऊरे-जादा पैमाई?
बहरमुश्किल मजाके-जुस्तजू बढ़ता ही जाता है।
और आती हैं कठिनाइयां। रोज-रोज आती हैं, रोज-रोज बढ़ती जाती हैं। लेकिन जितनी ही कठिनाइयां बढ़ती हैं, उतना ही परमात्मा की खोज का आनंद। यह जुस्तजू, यह तलाश भी उतनी ही गहरी होती जाती है।
हुजूरे-मुहतसिब रिंदों की बेबाकी कोई देखे,
जरा पियक्कड़ों की हिम्मत भी तो देखो!
हुजूरे-मोहतसिब रिंदों की बेबाकी कोई देखे,
जवाबन हलका-ए-जामो-सुबू बढ़ता ही जाता है।
जितनी गालियां बढ़ती हैं, जितनी जंजीरें बढ़ती हैं, जितने कारागृह खड़े होते हैं, उतनी ही यहां सुराही और ढलती है, प्याले और चलते हैं। यहां पीने वाले और पीते हैं, और पीए जाते हैं।
जवाबन हलका-ए-जामो-सुबू बढ़ता ही जाता है।
पियक्कड़ों की यह महफिल रोज-रोज बड़ी होती जाती है। यह हमारा जवाब है गालियों के लिए। और हमारे पास कोई जवाब नहीं है। गालियां बढ़ेंगी, हमारा जवाब एक ही है कि हम पियक्कड़ों को बढ़ाएंगे, हम दीवानों को बढ़ाएंगे।
खुमारे-हसरते-दोशीना कैसा आज तो "ताबां'
बहरजुरअ सुरूरे-आरजू बढ़ता ही जाता है।
कल की रात की खुमार की तो क्या बात कहें!
बहरजुरअ सुरूरे-आरजू बढ़ता ही जाता है।
हर बूंद के साथ मस्ती गहन हो रही है, खुमार बढ़ रहा है और आकांक्षा का नशा गहन हो रहा है।
मेरी बादापरस्ती मूर्दे-इलजाम है साकी,
मेरी शराब की पूजा--मैं सत्य को तो शराब कहता हूं; मैं तो परमात्मा को शराब कहता हूं; क्योंकि जो इनको पी लेता है, फिर कभी होश में नहीं आता।
मेरी   बादापरस्ती...
मेरी शराब की पूजा!
...मूर्दे-इलजाम है साकी,
आकांक्षा का नशा है, अभीप्सा का नशा है।
खिरद वालों की महफिल में जुनूं बदनाम है साकी।
लेकिन तथाकथित बुद्धि में जो उलझे हैं, विचार में जो उलझे हैं, उनके बीच तो सदा से ही प्रेमियों का, पागलों का ऐसा ही सम्मान हुआ है गालियों से, ऐसा ही स्वागत हुआ है गालियों से।
मेरी बादापरस्ती मूर्दे-इलजाम है साकी,
खिरद वालों की महफिल में जुनूं बदनाम है साकी।
यह तो पुरानी बात है, कि यह पागलपन भक्तों का...
खिरद वालों की महफिल में जुनूं बदनाम है साकी।
यह तो सदा से बदनाम रहा है। मीरा बदनाम थी। ऐसी बदनाम थी कि घर के लोगों ने ही जहर का प्याला भेजा कि पी ले और मर जाए तो घर की तो बदनामी न हो, कम से कम वंश की बदनामी तो बचे। और मीरा है कि कहती है: सब लोक-लाज खोई। नाचने लगी गांव-गांव।
जीसस बदनाम थे। बदनाम न होते तो सूली लगती? सूली तुम उन्हें देते हो जिन्हें तुम सम्मान देते हो? उनको तो तुम कहते हो--पद्मभूषण, पद्मविभूषण, भारतरत्न।
ब्लिट्ज का सुझाव मैंने कल देखा, वह मुझे पसंद आया। मोरारजी देसाई ने ये पदवियां तो अलग कर दीं, तो ब्लिट्ज ने सुझाव दिया है कि अब नई पदवियां शुरू करो--मूत्ररत्न; मूत्रभूषण; मूत्रविभूषण; महामूत्ररत्न। मूत्ररत्न वह जो चुपचाप पीएं और किसी को कहें न। मूत्रभूषण वह जो खुलेआम पीएं। मूत्रविभूषण वह जो न खुद पीएं बल्कि दूसरों को भी पिलवाएं। और महामूत्रभूषण वह जो अपनी ही न पीएं, दूसरों की भी पीएं।
जीसस को कोई सम्मान तो दिया नहीं किसी ने, सूली दी। लेकिन जीसस जैसे व्यक्ति को सूली भी सिंहासन हो जाती है। तुम जीसस जैसे व्यक्ति को सूली दे ही नहीं सकते। तुम सूली भी दो तो सिंहासन हो जाता है। यही तो जीसस के साथ जुड़ी हुई कहानी का अर्थ है कि जीसस को सूली दी गई और तीन दिन बाद वे पुनरुज्जीवित हो उठे।
कुछ तो ऐसे लोग हैं इस दुनिया में जो मर कर जी जाते हैं और करोड़ों-करोड़ों ऐसे लोग हैं इस दुनिया में जो जी रहे हैं और मरे हुए हैं; जिन्हें जीवन का कुछ पता नहीं है। जीवन का तो पता ही उन्हें चलता है, जो प्रेम का घूंट पीते हैं, जो प्रार्थना का घूंट पीते हैं, जो प्रभु के पागलपन में डूबते हैं।
मेरी बादापरस्ती मूर्दे-इलजाम है साकी,
खिरद वालों की महफिल में जुनूं बदनाम है साकी।

आज इतना ही।