(सदमा - उपन्यास)
नेहा
लता के आने से जैसे समय के तो पंख ही लग गए थे। नानी के ही नहीं मानो पूरी प्रकृति
भी ये से सब होता देख कर अल्हादित हो रही थी। सोम प्रकाश अंदर भी मानो बसंत का
उत्सव कोई फैलाव लिये चल रहा है। नेहा लता के संग-साथ के कारण सोम प्रकाश भी जो
हमेशा उदास व शांत रहता था। अब कुछ-कुछ सजीव सा दिखाई देने लगा था। उसकी बूझी
आंखों में मानो प्राण की ज्योति आ गई थी। सूखी हुई मन की झिल में एक आस की
प्रतिछवि नजर आ रही थी। मानो की आसमान पर फिर ये कुछ बादल घिर आये है। ये जरूर थम
कर बरसेंगे और इस धरा को सराबोर, अभिभूत और शीतलता से ओतप्रोत
कर देंगे। देखते ही देखते वह दिन भी आ गया जब सोम प्रकाश को वैद्य जी के यहां ले
जाना था। सुबह की हवा में ठंड के साथ-साथ चारों और कोहरा भी छाया हुआ था। सब एक दम
से गर्म कपड़े पहने और इंतजार करने लगे। न जाने कब अचानक ड्राइवर आये चलना पड़े।
नेहा लता ने मूली के परांठे और अचार एक टिफिन में रख लिया था। और साथ में थोड़े से
अंगूर भी रख लिये थे। क्योंकि नानी ने बतला दिया था की वहाँ से आते-आते श्याम भी
हो सकती है।
जिस समय नेहालता बीमार थी और उसे वैद्य जी के पास ले जाया जाता था। मगर उस समय तो उसे कुछ पता या होश ही नहीं था। कि उसके इलाज में कितना समय लगता था। परंतु अब वह सब बातें नानी से कुरेद-कुरेद कर पूछती रहती है। तब नानी कह रही थी। की बेटी तुम्हें तो वहां पर तीन-तीन दिन के लिए रखा लिया था। देखों बेटी तुम तो ठीक हो गई। परंतु अब इस सोम प्रकाश के साथ क्या होता है। आज हम इसे चौथी बार ले जा रहे है। फिर भी मुझे तो रत्ती भर भी आराम होता दिखाई नहीं दे रहा। तेरे भाग्य से आज कुछ विचित्र घट जाये तो कुछ कह नहीं सकते।
परंतु मुझे बस तेरे आने मात्र से एक उम्मीद दिखलाई दे रही है। सोम प्रकाश की चाल में उसके देखने में, उसके बोलने में, खाना खाने में उस में महीन सा बदलाव आ रहा है। वह भी शायद तेरी संगत का कारण हो सकता है। तब नेहा लता ने कहा की आप इंतजार करो नानी इस तरह की बीमारी में समय लगता है। ये आती तो तुरंत है परंतु जब जाने में समय लेती है। ये पसारा डाल कर बैठ जाती है, और फिर जाने का नाम ही नहीं लेती। परंतु एक बात नानी आप समझो की मुझे जो बीमारी थी वह एक प्रकार का दुर्घटना थी। जिसका कारण था मेरे सर की चोट परंतु सोम प्रकाश को एक सदमा लगा है। अंतस संवेदनशील तंत्रिकाओं में अवरोध पैदा हुआ है। ये तो बस और कारण नजर आते है मेरी बीमारी जो मेरे सर में चोट के कारण हुई थी। उस तरह की बीमार जिसे वैज्ञानिक मनोभ्रंश रोग (डिमेंशिया) आदि नाम भी देते है। वह अलग-अलग कारणों से हो सकता है। जैसे मेरे सर पर एक खास जगह दबाव पड़ा और मेरी याददाश्त एक समय तक सुप्त हो गई। परंतु इस तरह की बीमारी से मरीज धीरे-धीरे दवा के साथ-साथ एक दिन बहार आ जाता है। परंतु सोम प्रकाश के मन पर एक आघात एक सदमा लगा है। वह चेतन ही नहीं अचेतन मन तक हिला गया है। जिससे आदमी एक गहरी सम्मोहन अवस्था की रह कर जीने लग जाता है। एक तनाव जो अति हो जाता है जिसे हमारा मस्तिष्क सहन नहीं कर पाता तब उस का फ्यूज उड़ जाता है। अब ये अति खतरनाक है।इस तरह की बीमारी में
कभी-कभी तो बीमार पूरे जीवन भर उसी अंड़े में फंसा कर जीता रहता है। परंतु अगर
उसका इलाज किया जाये उससे प्रेम किया जाये उसे समझा जाये। उसके डिगे हुए विश्वास
को फिर से सजगता दी जाये तो वह जरूर स्वास्थ्य हो उठता है। तो उस प्रेम की डोर को
पकड़ कर वह जरूर एक दिन बाहर आ सकता है। परंतु इसमें उस बीमार व्यक्ति का भी सहयोग
चाहिए। की वह उस प्रेम की डोर को पकड़ रहा है या नहीं। वरना अकेले तो अति कठिन
कार्य है ये नानी फिर आप हो मैं हूं, सोनी है।
और इनके दोस्त पेंटल है। उपर से यहां ऊटी का हवा पानी तो इस पर अमृत का कार्य
करेगा। देखना नानी हमारा सोम प्रकाश एक दिन जरूर पहले जैसा हो जाएगा।
नानी ने कहा मुझे
भी यही लगता है, और तुम्हारे आने पर बेटा की हमारा सोम
प्रकाश जरूर और जल्दी अपनी पुरानी स्थिति में आ जायेगा। सोम प्रकाश एक दम से चुप
अपनी आराम कुर्सी पर बैठा आसमान को देख रहा था। वह पता नहीं क्या सोच रहा था।
परंतु इतना पक्का था की जो बाते नेहालता और नानी कर रही थी वह उसे अधिक समझ नहीं आ
रही थी। सब लोग कार के आने का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि सात-आठ किलोमीटर तो सड़क
मार्ग है। फिर उसके बाद करीब मील भर तो जरूर एक कच्चा रास्ता है। जो पहाडी नालों
को पार कर के जाना होगा। रास्ते भी अति आराम दायक नहीं है। परंतु नेहा ये सोच रही
थी। चलो सोम प्रकाश तो जवान आदमी है। परंतु नानी इतनी उम्र में भी किस तरह से उस
मार्ग पर चल लेती है।
वह ये सब सोच ही रहे
थे की सामने से कार आती हुई दिखलाई दी। सब खड़े हो गए। क्योंकि जल्दी अगर पहुंच
गये तो वैद्य जी के पास अगर पहला नम्बर आ जायेगा तब श्याम तक आसानी से घर आया जा
सकता था। गाड़ी रोक कर ड्राइवर ने आ कर खेद जताया की मुझे देर हो गई। क्योंकि रात
न जाने क्यों कार के एक पहिये की हवा निकल गई। इसलिए उसे बदलने में समय लग गया। तब
नानी ने कहां की कोई बात नहीं तुम ये बैग उठा लो। और बेटी अच्छे से घर को देख ले
ताला कुंजी लग गया की नहीं। और ये शैतान भी तो साथ चलेगा। हरिप्रसाद की और देख कर
पूंछ हिलाते हुए मानो हरिप्रसाद कह रहा हो मेरे बिना तो वहां पर काम हो ही नहीं
सकता। जैसे वही सब का कर्ता धर्ता है। मानो सोम प्रकाश का नहीं हरि प्रसाद का इलाज
चल रहा है। और वह सबसे पहले कार के पास जाकर खड़ा हो गया।
हरिप्रसाद हमेशा
ड्राइवर के पास वाली ही सीट पर बैठता था। अब चाहे कितनी ही परेशानी हो। वह बहार
शीशे से सारे दृश्य देखता हुआ ही चलता था। जब सामने कोई कुत्ता मिल जाता तो उसे
बड़े ही गोर और गर्व से देखता की देखों तुम क्या जानो गाड़ी में बैठ कर चलने का
क्या मजा है। और दूर तक उसे पीछे जाते हुए देखता रहता। नानी ने पहले सोम प्रकाश को
बिठलाया। और फिर खुद बैठ कर पास में नेहालता को बिठलाया। ड्राइवर ने कहा की नानी
जी चले। तब नानी ने कहां की नहीं अभी तो पूजा पाठ करने की कमी रह गई लगता है। तो
जाकर हवन सामग्री ले कर आती हूं, तेरी और तेरी गाड़ी की
आरती उतरती हूं। देखा नहीं आज सूर्य कैसे आसमान पर मन पहुंच गया है। अब तो हम स्वामी
जी के आश्रम में पहुंच चूके होते। ड्राइवर जानता था की नानी का ये गुस्सा क्षणिक
मात्र है। और वह हंस दिया। और गाड़ी को बेक कर के मंजिल की और चल दिया।
ड्राइवर सारे
रास्ते को जानता था। जहां तक गाड़ी जा सकती थी, वहां
पहुंच कर कार को एक किनारे पर खड़ा कर दिया। और खड़ा रहकर सब के उतरने का इंतजार
करने लगा। इस बीच वह हरिप्रसाद का दरवाजा खोलना तो भूल ही गया। जब सब उतर गए तो
हरि प्रसाद अंदर ही रह गया। तब वह अंदर से पंजे मार कर शोर मचाने लगा की मुझे तो
तुम यहां भूले चले जाते हो। तुम अकेले इतने खतरनाक रास्तों पर चल दिया भले मानस
मेरे बिना तुम्हारी सुरक्षा कौन करेगा। तब नानी ने कहां की उस पाजी का दरवाजा तो
खोल अंदर कैसे रो रहा है। दरवाजा खोलते ही मानो कैद से निकला हरिप्रसाद अपने अंदर
की खुशी को सब के पास जाकर पूछ हिला-हिला कर दिखला रहा था। और फिर भाग कर उस कच्चे
रास्ते की और चल दिया, जहां पर सब लोगों को अब जाना था। और
दूर जाकर गर्व से एक ऊंचे पत्थर पर खड़ा होकर सब की और ऐसे देख रहा था की अब आ जाओ
रास्ता एक दम साफ है कोई खतरा नहीं है।
चलने से पहले
नेहालता ने कहां की ड्राइवर एक बार कार के दरवाजे अच्छे से चेक कर लो, कहीं खुले न रह गये हो। क्योंकि सामान आदि तो ड्राइवर लेकर तुम तो हमारे
साथ ही आ रहे हो। तब तक गाड़ी किस के भरोसे रहेगी। हालांकि यहां पर किसी चोरी
चकोरी का डर नहीं था। इस तरह की कार यहां नाम मात्र के ही लोगों के पास थी।
जिन्हें सब जानते थे उन्हें उंगलियों पर गिना जा सिकता था। आप तो हमारे साथ आ ही रहे
हो। फिर आप चाहों तो हमें वहां पर छोड़ कर वापस चले जाना। क्योंकि हमें तो वहां पर
काफी समय लग सकता है। इतनी देर तक तुम क्यों इंतजार करोगे। घर जाकर तुम कोई दूसरा
कम भी तो सम्हाल सकते हो। हां बेटा तुम्हारा इतना ही संग साथ हमें बहुत सहयोग देता
है। ये सब नानी और नेहालता की मर्जी थी। सब दरवाजे चेक कर संतुष्ट हो ड्राइवर
सामान ले कर सब के साथ-साथ चल दिया। सबसे आगे हरिप्रसाद था। जो करीब आधा मील तो
आगे चलता ही था। जब नानी ने आवाज दी की हरिप्रसाद वापस आ जाओ हमारे साथ चलो ये भी
क्या बात हुई की हमें यहां पर अकेले छोड़ कर तुम इतनी दूर भाग जाते हो। नानी की
आवाज सून कर हरिप्रसाद वापस सब के पास दौड़ता हुआ आ गया। उसका खूला मुख उससे गिरती
लार। उसकी खुशी से फैली आंखें सब का मन मोह रही थी। कुछ देर सब को अपनी उपस्थिति
दिखला कर वह फिर नौ दो ग्यारह हो जाता है। वह सब का प्यार दुलार ले कर फिर से आगे
भाग जाता है। जैसे की उस की गति में और दो पेर वालों की गति में कोई समानता ही न हो।
उस ये सब में बहुत आनंद आ रहा था। कभी वह किसी झाड़ी को सूंघता कभी वह किसी बिल के
पास खड़ा हो कर उसे पंजे से खोदता।
ये सब उसके लिए काम
नहीं, एक खेल था। वह तो प्रत्येक क्षण का आनंद ले रहा था। जैसे आपने देखा उसी
रास्ते पर उसके साथ मनुष्य भी जा रहे थे। परंतु उनके उपर विचारों के साथ-साथ सामान
का भी भार था। जो उनके तन और मन दोनों पर एक दबाव डाल रहा था। न वे सफर का आनंद ले
रहे थे। और न प्रकृति के संग साथ जी ही रहे थे। वह एक प्रकार से अपने को ढ़ो रहे
थे। परंतु पशु पक्षी अपनी जीवन को बिना किसी संस्कार के पूर्णता से अपने एक स्वभाव
के अनुरूप जीते है। यही उनका विकास है। परंतु स्वभाव के अनुरूप नहीं जी कर समाज
संस्कार के नाम पर एक बंधनों में ही बाँध देता है। अगर हम धर्म को एक शब्द में
बांधना चाहते है तो वह ‘स्वभाव’ यहीं
मनुष्य सब भुल गया है। हमारा पूरा जीवन एक अस्वाभाविक हो गया है। प्रकृति के पास
जा कर जो हमें अच्छा लगाता है। तो वह है हम अपने स्वभाव की और लोटने लग जाते है।
जब एक पत्थर के पास बैठते है, पानी में अपने कदम रखते है। या
किसी वृक्ष के संग साथ होते है तो वह अपना स्वाभाविक जीवन जी रहा है। ने वहां उन
वृक्षों में कोई विचार है। और न संस्कार है। हम उसके संग कुछ पल के लिए उसकी ही लय
में बह जाते है।
चारों और खूला
आसमान था। दूर उतंग पहाड़ी पर कहीं-कहीं बर्फ की सफेद चादर भी दिखलाई दे रही थी।
उसी सब के बीच सफेद दुधिया बादल जब पूरे पहाड़ को अपने आँचल से ढंक लेते थे। पल भर
के लिए मानें चारों और किसी शांति फैल जाती थी। हवा में अभी भी ठंडक थी। सोम
प्रकाश का हाथ पकड़े नेहालता आगे-आगे जा रही थी। रास्ता इतना विकट नहीं था। बस वह
सपाट नहीं था। कही वह पत्थरों के बीच से घुमावदार मोड़ आ जाता और पल भर में एक दम
सपाट लम्बा मैदान दिखने लग जाता। कुछ दूर चलने पर एक छोटी पहाड़ी नदी आ जाती है।
उसे अगर बरसाती नाला कहा जाये तो अच्छा होगा। तब नेहा ने ड्राइवर को कहा की आप
नानी का हाथ पकड़ कर उसके साथ चले। नानी ने कहा की अरे नहीं मैं आराम से चल रही
हूं। तुम बस सोम प्रकाश का ख्याल रखो। ये जमीन तो मेरे पेरो को पहचानती है। मानो
मेरे पैर ही आँख है। एक-एक चप्पा मेरा परिचित है। कितनी ही बार यहां से गुजरी हूं
बेटा, जब मैं जवान थी। तब तो कितना सामान साथ ले कर जंगल से आते थे। कितने
प्रकार की कुकुरमुत्ता या खुम्बी और जड़ी बूटियां उस उंची पहाड़ी पर जाकर चुनते और
उन्हें लाकर यहां बेचते थे। यहां के व्यापारी उनके अच्छे दाम दे देते थे। पता है
हम वहां पर एक-एक हफ्ता तक रहते थे। कुछ सूखा खाना साथ ले जाते तब वही चार पत्थर
रख कर बना लेते कितने प्रकार की हरी सब्जियां हम वहीं से ताड़ कर बनाते थे। अब तो
सब स्वप्न की बाते सी लगती है। कितने सुहाने दिन थे। नानी अपने यौवन के समय में
पहुंच गई थी। उसका मन ही नहीं तन भी कुछ पलो के लिए उसी युग में चला गया था। आंखों
में वही चमक, चेहरे पर वही ताजगी फैल गई थी। तब नेहालता तो
उन्हें देखती ही रह गई। वह तो कुछ पल के लिए चलना तक भूल गई।
तब नानी ने उसे
टोका की बेटा ये लकड़ी का पूल है। जरा कमजोर है। ध्यान से और सम्हल कर आगे देख कर
चलो। इस पर चलते हुए हमें बात नहीं करनी चाहिए। और नेहालता देख रही है। की नानी का
रूप रंग एक दम अलग ही हो गया था। उसे लगा की विचारों में भावों में कितनी ताकत
होती है। हम जैसा सोचते है महसूस करते है हमारा मन हमारे तन पर उसका अधिक प्रभाव
पड़ता है। तब नेहालता ने सोम प्रकाश को कहां की सोमू तुम भी क्या कभी नानी के साथ
उस पहाड़ी पर गये हो। तब सोम प्रकाश ने एक बार नानी की और देखा और गर्दन हिला दी।
तब नेहा ने कहा की कितनी उम्र थी तब आपकी। तब सोम प्रकाश चारों और देख कर सोचने
लगा और शायद मन ही मन गिनती भी कर रहा था तब उसने कहां की शायद उस समय मेरी उम्र
दस या बारह साल की होगी जब पहली बार नानी के साथ उपर पहाड़ पर गया था। उन दिनों
हमारे स्कूल की छुट्टियां थी। तब मैंने नानी से जीद्द की थी मैं भी आपके साथ
चलूंगा। नानी जानती थी की वह चलना अति कठिन मार्ग। ये बच्चा इतना लम्बा सफर नहीं
चल पायेगा। फिर वहां उपर ठंड भी अधिक होती थी।
सोम प्रकाश की
आंखों में चमक थी। वह उस समय अपनी धुंधली यादों की पर्त हटा रहा था। और बता रहा था
की नानी सोचती थी की मैं नहीं चढ़ पाऊंगा। परंतु नानी गलत थी। और तब नानी ने बीच
में बात को टोक कर सोम प्रकाश का सहयोग किया की हां। बेटी मैंने तो सोचा ही नहीं
था की ये वहां तक चढ़ जायेगा। परंतु ये बहुत संकल्पवान था। इसने एक बार भी नहीं
कहां था की नानी मैं थक गया हूं। और वहां जाकर भी इसने हमारी बहुत मदद की हम उस
बार सबसे अधिक जड़ी बूटियाँ लाये थे। वह भी सोम प्रकाश की वजह से। तब मैंने याद है
सोम प्रकाश तुझे एक बाटा का स्पोट्र जूता दिलाया था।
तब सोम प्रकाश के चेहरे पर एक बाल वत हंसी फैल गई थी। हां नानी वह मेरा पहला जूता
था। जो मैंने पहना था इससे पहले चप्पल या पी टी सूज ही पहनते थे।
बाते करते जाने में
समय का ज्ञान ही नहीं रहा। और सामने वैद्य जी का आश्रम दिखाई देने लगा। तब नानी ने
कहां की देखो वो सामने ही तो है। बस एक नदी पार करनी होगी। इस पर पूल नहीं बना
क्योंकि यह जरा चौड़ी अधिक ही है। और इस में केवल बरसात का ही पानी अधिक आता है।
इसलिए लोगों को या पशु पक्षियों को इससे अधिक परेशानी नहीं होती। परंतु वहां चलना
इतना आसान नहीं था। एक मस्त चल रहा था तो वह था हरिप्रसाद। वह तो हम से पहले बीच
नदी में पानी का गढ़ा भरा था उस में जाकर बैठ कर स्नान कर रहा था। तब नानी हंसी की
देखों इस पागल को इतनी सर्दी में भी इसे गर्मी छा रही है। पागल बीमार हो जायेगा।
तब वह मस्त उस में लेट-लेट कर सब को दिखा रहा था की है किसी माई के लाला में इतनी
हिम्मत की यहां आकर पानी में उतर सके। और फिर बाहर निकल कर अपने पूरे शरीर का पानी
दो तीन बार झटक कर गिरा दिया और पास के रेत में लेट कर मस्ती करने लगा। सब उसके इस
कार्य को देख कर हंस रहे थे। परंतु यह उनके अपने ही स्नान का तरीका था।
नेहा लता ने नानी
को कहां की देखो इस हरिप्रसाद को नहाने का कोई फायदा नहीं रहा ये तो और उलटा जाकर
रेत में लेट गया। उलटा सब रेत इसके शरीर से लिपट गया। तब नानी हंसी। नानी को इस
तरह से हंसते हुए देख कर नेहा लता ने कहां की नानी तुम क्यों हंसती हो। तब नानी ने
कहां की हम भी ऐसा ही करते थे। जब हम जवान थे तो नहाने या कपड़े धाने के लिए इधर
या उस झील में चले जाते थे। और हम जो लहंगा (घाघरी) पहनते थे वह करीब तीस चालीस
मीटर की बनी होती थी। नेहा लता को ये सून कर बड़ा अचरज हुआ की नानी इतना वज़न कैसे
पहल लेती थी। तब नानी ने कहा की कम से कम चार-पाँच किलों तो चाँदी होती थी हमारे
शरीर पर। पैरों में न जाने क्या-क्या, नेवरी,
छेलकड़े झांझर, गले की हंसली, हाथों के कडूलें। मरी सास ने अपने सारे जेवर मुझे प्यारे से दे दिये थे।
मुझे वह बहुत भारी लगते थे। परंतु कही शादी विवाह में तो वो सब पहल कर जाना ही
होता था। कड़े, छेलकडे या हाथों के कुछ जेवर तो रोज पहनने ही
पड़ते थे।
तब हम भी अपनी उस
घाघरी को पानी में धो कर इस रेत में दबा देते थे। कम से कम दो घंटे के लिए फिर एक
दो सहेली के साथ निकाल कर उसे पत्थर पर सूखने के लिए डालते थे। तब वह तीन दिन में
सूखती थी। यानी वह घाघरी पूरे जीवन में दो तीन बार ही घुल पाती थी। तब नेहा लता ने
अपनी जिज्ञासा दिखलाई की रेत लगने से वह गंदी नहीं हो जाती थी। तब नानी ने कहां की
बेटा रेत सूखा हुआ है। उसका उससे मिलान नहीं हो सकता। आपने देखा नहीं की धोबी जब
कपड़े धोता है तो उसे खुल व सुखे रेत में सूखा देते है। इसलिए रेत पल में सूखने के
बाद झड़ जाता है। इस बात का नेहा लता को जारा भी ज्ञान नहीं था। परंतु कपड़े तो
सूखते उसने कितनी ही बार देखे थे परंतु उसके मन में यह विचार कभी नहीं आया।
बातों ही बातों
आश्रम आ गया। तब नानी ने कहां की आज तो पता ही नहीं चला की कब हम यहां आ गये। नानी
जब मन खुश रहता है तो सफर भी कितना सरल हो जाता है।

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