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रविवार, 5 जुलाई 2026

31 - ये जीवन क्‍या है? '(कविता) - ओशो की मधुशाला

31 - ये जीवन क्‍या है

ऐ जीवन तुम क्‍या है?

न मैं जानु न पहचानूँ।

फिर भी नित-नित टकराता

लहरों से बार-बार

न कोई किनारा इस पार

न दिखता को मझ धार

बतला ऐ जीवन क्‍या है?

एक बात पुछूँ वो तो बतला

ये जन्म क्यों है?

क्‍यों है? प्‍यास जगा

कि मैं इसे जानने के

लिए उतावला हो जाऊँ

क्‍या  तनिक ठहराव है

या फिर एक क्षणिक विश्रांत

या है केवल एक निरंतरता।

शायद मुझ ऐसा क्‍यों लगता है,

न यह विश्रांत सी दिखती है

और न ही जीवन कोई ठहराव

और न ही वह निरंतरता।

कैसी अपूर्णता सी फैली रहती थी

नित मेरे चारों और

नहीं दिखती कहीं भी   

जिसे पूर्णता कहां जाता है

कहां है वह पूर्णता।

देखिये तब तो जन्म भी

एक पल या क्षण का खेल बन गया।

जो खेला तो खूद जाता है,

परंतु शायद इसके नियम ज्ञात नहीं।

वह नियम अनंत की संपूर्णता में समाये है।

उसी गति का नाम शायद विकास है,

परंतु ऐसा क्‍यों?

कि हम तो निरंतर में बहते रहे,

बारंबार जन्मते रहे

तब जन्म एक प्रक्रिया है

हर पल हर क्षण एक निरंतरता। 

कोमल मुलायम नए पत्ते-पत्तियां,

नए फूल, नई शाखाएं,

जो ऊंचे और ऊंचे उठते हुए

और नई ऊंचाइयों को छूना चाहते है। 

अग्रसर हो रहे है किसी उतुंग की और

चाहे फिर उसे तुम,

अंबर कह लो या परमात्मा।

परंतु कुछ तो है तुम में

ऐसा जो खिंचता रहता है

पल-पल....नहीं जाने देता अपने से दूर।

क्‍या यही है वो जीवन?

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 

 


 

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