वो लिखते थे कविता पेन्सिल
से।
छिल कर रखते थे,
तीन-चार सहेलियाँ एक साथ।
फिर बाद में उन्हें एक-एक
कर के अपनी
नाजुक उंगलियों से उठते थे,
कैसे उनकी ये नजाकत एक
सुंदर कविता का
रूप ले लेती थी।
दूसरी और कठोर से दिखने
वाले पेन,
और कहां ये महीन नाजुक
पेन्सिल
क्या मेल है दोनों का
वो पेन जो दिखता ढीठ एक पुरुष
की तरह।
थी उसमें कितनी हेकड़ी और
अकड़।
साफ दिखाई देता था
एक छुपा अहंकार उसके चेहरे
पर
एक क्षत्री की तरह, था वो निडर,
वीर और, वो धीर भी।
छोड़ दिया उस निडर का साथ
जो अडिग था अमिट था
फिर मैं भी करने लगा अमल,
चुना एक नया मार्ग
जो बनाता था एक सुकोमल
मार्ग
एक अनछुई सी डगर
जिसे राज मार्ग नहीं कहां
जा सकता
फिर लिखने लगा उस कोमल सी पेन्सिल
से,
मैंने किया संकल्प, सच ही कहता हूं।
अब शब्दों में एक लय थी
एक कोमलता थी, एक सरला
एक लय, एक छंद एक नजाकत
और एक समस्वरता थी।
जो हठीली बिलकुल नहीं थी।
चल पड़ा शब्दों का एक नया खेल
रचना का खिलने लगा कमल
वो बनती सी दिखती थी सुकोमल,
कभी वह कुछ हो जाती चंचल,
और देखने से ही लगता था
उसका खिलता सा उसका चितवन,
और छू जाती उसमें
निर्झर सी अपूर्णता,
पूर्ण होता उसका देवत्व
भाव।
(ये कविता मैंने जब महान कवि श्री बच्चन जी की आत्म कथा पढ़ रहा तो उनके जीवन दर्शन से प्रभावित होकर लिखी है)
परिजात के फूूल
मनसा-मोहनी दसघरा

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