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रविवार, 1 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—01

पीपल का वृक्ष और मेरे आंसू---


      इस बारे में तुम मेरी मां से पूछ सकते हो—क्‍योंकि इस समय वे यहीं है...। अपने जन्‍म के बाद तीन दि‍नों तक मैंने जरा भी दुध नहीं पिया, और वे सभी परेशान थे, चिंतित थे। चिकित्‍सक चिंतित थे कि यदि यह बच्‍चा दूध पीने से इनकार कर रहा है तो वह किस प्रकार जी सकेगा। लेकिन उन्‍हें मेरी परेशानी का कोई भी अनुमान नहीं था, कि वे मेरे लिए क्‍या कठिनाई पैदा कर रहे थे। वे प्रत्‍येक संभव उपाय से मुझे दुध पीने के लिए बाध्‍य करने का प्रयास कर रहे थे। और ऐसा कोई उपाय न था जिससे मैं उनको समझा सकूँ, या वे स्‍वयं ही मेरी कठिनाई को समझ लेते।
      अपने पिछले जन्‍म में अपनी मृत्‍यु से पूर्व मैं उपवास में था। मैं इक्‍कीस दिनों का उपवास पूरा करना चाहता था, किंतु इसके पहले कि मेरा उपवास पूरा हो पाता तीन दिन पूर्व मेरी हत्‍या कर दी गई। तीन दिनों का इस जन्‍म में भी मुझको पूरा बोध था, कि मुझे अपना उपवास पूरा करना है। मैं वास्‍तव में जिद्दी हूं, वरना लोग चीजों को एक जन्‍म से दूसरे जन्‍म ले नहीं जाते; एक बार एक अध्‍याय बंद हो गया तो बंद हो गया।
      लेकिन उन तीन दिनों तक मेरे मुंह में वे कुछ भी डाल पाने में सफल नहीं हो सके, मैंने बस अस्‍वीकार कर दिया था उसको। लेकिन तीन दिन बाद मैं पूरी तरह से सामान्‍य हो गया था, और वे सब आश्‍चर्यचकित हो उठे, ‘तीन दिन तब यह बच्‍चा इनकार क्‍यों कर रहा था, न कोई बिमारी थी, न कोई समस्‍या थी—और तीन दिन बाद वह पूरी तरह से सामान्‍य हो गया।’ यह मामला उनके लिए रहस्‍य बना रहा।
      मैंने कुछ नहीं किया, मैंने केवल वह करना जारी रखा जो मैं अपने पिछले जन्‍म में कर रहा था। और इसीलिए मेरे बचपन में मुझको पागल, सनकी समझा जाता था। क्‍योंकि मैं कभी इसका कोई कारण नहीं बताता था कि कोई भी काय्र में क्‍यों करना चाहता था। मैं बस कह देता था कि मैं यह करना चाहता हूं। मेरे पास उसके लिए कारण थे कि मैं क्‍यों कर रहा हूं, लेकिन वे कारण मैं आपको नहीं बता सकता हूं, क्‍योंकि आप और समझ नहीं सकते हो?
         मेरे पिता कहते थे, ‘मैं नहीं समझ सकता और तुम समझ सकते है?
      मैं कहता, ‘हां, वह कुछ ऐसी बात है जो मेरे आंतरिक अनुभव से जुड़ी है। इसका आपकी आयु से या आपका मेरे पिता होने से कोई लेना-देना नहीं है। निश्चित रूप से आप उससे भी कहीं अधिक समझ सकते है, लेकिन यह कुछ ऐसा है जो मेरे भीतर है—केवल मैं ही वहां पहुंच सकता हूं, आप नहीं पहुंच सकते।’
      और वे सब यहीं कहते, ‘असंभव है तुम्‍हे समझ पाना।’
      मैं कहता, ‘यदि प्रत्‍येक व्‍यक्ति को स्‍वीकार कर लिया जाए तो यह बहुत बड़ी राहत होगी। मुझको बस असंभव की भांति स्‍वीकार कर लें जिससे कि मैं आपके लिए और अधिक समय समस्‍या न बनूं और मुझको हर तरह कि बात समझाने की कठि‍नाई का सामना न करना पड़े। मैं वहीं करने जा रहा हूं जो मुझको करना है। इसको बदलने को कोई भी उपाय नहीं है। मेरे लिए यही परम है। यह आपके द्वारा मुझे अनुमति देने या नहीं देने का प्रश्‍न नहीं है।’
      तो यह मेरा सदा को कार्य था: जो कुछ भी मैं करना चाहूं उसी को मैं कर लूँगा।
      एक दिन की घटना मैं भूल नहीं सकता हूं.....। कुछ बातें ऐसी है जिनसे कोई तार्किक अर्थ नहीं निकलता है, और उनकी कोई अर्थवत्‍ता भी नहीं होती, लेकिन किसी तरह वे तुम्‍हारे स्‍मृति पटल पर अंकित रहा करती है। तुम  समझ नहीं पाते कि किस कारण से वे वहां पर है। क्‍योंकि ऐसी लाखों चींजे घट चुकी है जो और अधिक महत्‍वपूर्ण है, और अधिक अर्थपूर्ण है, लेकिन वे सभी स्‍मृति कोष से खो चुकी है। किंतु कुछ गैर-अर्थपूर्ण चीजें—तुम कोई कारण नहीं खोज सकते क्यों, किंतु वे स्मृति में बनी हुई है। उन्‍होंने एक छापा छोड़ी हुई है।
      ऐसी ही एक बात मुझको याद पड़ती है। मैं स्‍कूल से आ रहा था, मेरा स्‍कूल मेरे घर से कोई एक मील दूर था। लगभग आधे रास्‍ते में एक पीपल का वृक्ष था। मैं दिन में कम से कम चार बार उस पीपल के वृक्ष के पास से होकर निकला करता था। स्‍कूल जाते समय, फिर भोजन के लिए दोपहर कि समय घर जाते हुऐ, फिर पुन: स्‍कूल जाते समय, और फिर छुट्टी होने पर घर लौटते समय। इसलिए हजारों बार मैं उस वृक्ष के निकट से होकर निकला था, लेकिन उस दिन कुछ घट गया।
      वह गर्मी के मौसम का एक दिन था, और मैं वृक्ष के निकट आया, तो मैं पसीने से नहाया हुआ था। मैं उस वृक्ष के नीचे से निकला, और वृक्ष के नीचे इतनी ठंडक थी कि बिना कुछ सोच-विचार किए मैं कुछ क्षण के लिए वहां ठहर गया, पता नहीं क्‍यों। मैं अस वृक्ष के तन के निकट चला गया, वहां बैठ गया और वृक्ष के तने को अनुभव किया। मैं समझा नहीं सकता है कि क्‍या हुआ, किंतु स्‍वयं मैंने अपने को आनंदित अनुभव किया अपने को, जैसे कि मेरे और वृक्ष के मध्‍य कुछ प्रवाहित हो रहा था। केवल वह ठंडक इसका कारण नहीं हो सकती थी। क्‍योंकि अनेक बार मैं पसीने से लथपथ था, मैं वृक्ष की ठंडक से होकर गुजरा था। मैं पहले भी वहां ठहरा था, और न ही वहां बैठ गया था जैसे किसी पुराने मित्र से मिल रहा हूं।
      वह क्षण मेरी स्‍मृति के आकाश में एक सितारे की भांति जगमगाता रहा है। मेरे जीवन में बहुत कुछ घटित हुआ है, लेकिन मैंने उस क्षण की स्‍मृति को कभी मंद पड़ते हुए नहीं पाया,  मेरी स्‍मृति में यह अब भी वैसा ही है। जब कभी मैं पीछे लौट कर देखता हूं तो पाता हूं कि, यह अभी भी वही है। न तो उस दिन मैं स्‍पष्‍टता से जान पाया कि क्‍या घटित हो गया था, न आज कह सकता हूं कि क्या हुआ था। लेकिन कुछ घटित हो गया था। और उस दिन से उस वृक्ष के साथ एक विशेष प्रकार का संबंध हो गया था जिसको मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। मनुष्‍य के साथ भी ऐसी अंतरंगता कभी नहीं घटी। इस पूरे संसार में किसी और की तुलना में मैं वृक्ष के प्रति और अधिक आत्‍मीय हो गया। मेरे लिए यह एक नियमित कार्य हो गया: जब कभी भी मैं उस वृक्ष के निकट से होकर निकलता मैं वहां कुछ सेकेंड या कुछ मिनट के लिए बैठ जाता और बस वृक्ष को अनुभव करता। अब भी मैं देख सकता हूं—हमारे मध्‍य कुछ विकसित होता चला गया।
      जिस दिन मैंने स्‍कूल छोड़ा और विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययन के लिए दूसरे नगर जाने लगा तो मैंने अपने पिता से, अपनी मां से, अपने चाचाओं से और अपने पूरे परिवार से विदा ली। मैं उस प्रकार का व्‍यक्ति नहीं हूं जो सरलता से विलाप करता है या रोता है। उस समय भी जब मुझको बुरी तरह से सज़ा दी गई हो, और मेरे हाथों से हथेली पर बेंत मारे जाने के कारण खून भी निकल रहा हो, लेकिन तब भी मेरी आंखों में आंसू नहीं आते थे।
      मेरे पिता जी कहां करते :’तुम्‍हारी आंखें में आंसू है भी या नहीं।’
      मैं कहता: ‘आप मेरे हाथों को बेंत मार-मार कर लहूलुहान कर सकते है लेकिन आप मुझकेा रोने और चिल्‍लाने के लिए बाध्‍य नहीं कर सकते। और मुझे क्‍यों रोना चाहिए, क्योंकि आप जो कुछ भी कर रहे है पूरी तरह से ठीक है वह। मैंने कुछ किया है तो अच्‍छी तरह से उसका परिणाम सोच कर किया है। झूठ मैं कभी बोलता नहीं, इसलिए दंड से बच पाने का कोई उपाय नहीं है। आँसू बहाने में क्‍या सार है।‘
      लेकिन जब मैं उस वृक्ष के पास विदा लेने के लिए गया तो मैं रोने लगा। अपने पूरे जीवन में यही एकमात्र समय है जो मुझको अपने रोने के लिए याद पड़ता है; अन्‍यथा मेरे लिए आंसू पूर्णत: अपरिचित थे। मेरे बचपन में मेरी एक बहन, जिसको मैं अपने अन्‍य सभी भाइयों और बहनों से अधिक चाहता था। उसकी मृत्‍यु हो गई। और भारत में तुम्‍हारे दर्जन भर भार्इ और बहन होते है। मैं अपने पिता को छेड़ा करता था: ‘आप एक दर्जन की संख्‍या पूरी करने से चूक गए’?—क्‍योंकि आपके केवल ग्‍यारह बच्‍चे है, आपको जरा सा गणित लगाना चाहिए था, बस  एक बच्‍चा और पैदा कर लेते।‘
      और वे कहते, ‘तुम मेरे पुत्र हो , लेकिन तुम मेरे साथ भी मजाक करने का प्रयास कर रह हो।’
      मैं कहता: ’मैं मजाक नहीं कर रहा हूं, मैं ता बस यह कह रहा हूं कि‍सी को बताने के लिए एक दर्जन  बहुत सरल है—और मैं ठीक यहीं कर रहा हूं। यदि‍ कोई मुझसे पूछता है कि आपके कितने भाई बहन है, तो कहना आसान होता एक ‘दर्जन’। आपने इसको अनावश्‍यक रूप से जटिल बना दिया है: ग्‍यारह। या तो आप दस पर रूक जाते—यह पूर्ण संख्‍या प्रतीत होती है।
      इन दस बहनो और भाइयों में से मैं अपनी बहन को बहुत प्रेम करता था, जिसकी जब मैं बहुत छोटा था तब मृत्‍यु हो गई थी। उस समय मेरी आयु पाँच वर्ष रही होगी और उसकी तीन वर्ष की। लेकिन तब भी मैं रोया नहीं। मैं हैरान और सदमे में था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति रो रहा था। और उन सभी ने सोचा कि मैं सदमा ग्रस्त हो गया हूं, क्‍योंकि मैं अपनी बहन को बहुत प्‍यार करता था। मेरे पूरे परिवार में प्रत्‍येक व्‍यक्ति यह जानता था कि मैं उसे बहुत चाहता था और वह मुझको बहुत चाहती थी। उनहोंने सोचा कि शायद ऐसा सदमे के कारण हो गया है कि मेरे आंसू नहीं आ रहे थे, लेकिन मामला वैसा नहीं था।
      जब मेरे नाना की मृत्‍यु हुई तो भी मैं नहीं रोया, जब कि मेरा लालन-पालन उन्‍ही ने किया था। मेरे जन्‍म-दिवस पा वे समीप के नगर से हाथी लेकर आया करते थे.....भारत में उन दिनों हाथी या तो राजा लोग रखते थे, क्योंकि उसका रखरखाव उसका भोजन और वह सेवा जिसकी जरूरत हाथी को होती है बहुत खर्चीला है, या उसको महात्‍मा लोग रखा करते थे।
      दो प्रकार के लोग उसे रखा करते थे। महात्‍मा लोग हाथी रख सकते थे, क्‍योंकि उनके अनुयायी उसका ख्‍याल रख लेते थे। पड़ोस में एक महात्‍मा जी रहा करते थे, जिनके पास एक हाथी था, इसलिए मेरे जन्‍म–दिवस पर मेरे नाना वह हाथी ले आया करते थे। वे मुझको उस हाथी पर चाँदी के सिक्‍कों से भरी दो थैलियां, दोनों और एक-एक थैली देकर बिठा दिया करते थे।
      मेरे बचपन के दिनों में भारत में अभी कागज के नोट चलना आरंभ नहीं हुए थे; रूपये के लिए अभी भी चाँदी का प्रयोग किया जाता था। मेरे नाना दो थैलियां, दोनें और लटकती हुई, बड़ी थैलियां चाँदी के सिक्‍कों से भर देते थे, और मैं गांव में चारों और चाँदी के सिक्‍के फेंकता हुआ, लुटाना आरंभ कर देता था। वे मेरे पीछे-पीछे अपनी बैलगाड़ी में और रूपये लेकर आ जाते थे, और मुझको कहते रहते थे: ‘कंजूसी मत करो, मेरे पास बहुत सिक्‍के है। तुम उतने सिक्‍के नहीं लुटा पाओगें जितने अधिक मेरे पास है, लुटाते चल जाओ।’
      स्‍वभावत: सारा गांव हाथी के पीछे सिक्‍के लूटता रहता था। यह कोई बड़ा गांव था भी नहीं; पूरे गांव में दो या तीन सौ लोग रहते थे, इसलिए मैं गांव में चारों और गांव के एक मात्र रास्‍ते पर जाता था। उन्‍होंने हर संभव ढंग से मुझको यह खयाल देने का प्रयास किया कि मैं किसी राज परिवार का सदस्‍य हूं।
      उन्‍होंने मुझको इतना प्रेम दिया कि मेरे लिए बीमार पड़ जाना असंभव था। अब बीमारी पर तुम्‍हारा कोर्इ बस तो चलता नहीं। किंतु तुम इसके बारे में अपना मुंह बंद रख सकते हो। यदि मुझे हलका सा सिरदर्द भी हो जाए, तो वे बहुत घबरा जाते थे। व अपने घोड़े को निकाल लाते और उस पर बैठ कर निकटतम चिकित्‍सक के पास पहुंच जाते और चिकित्‍सक को साथ लेकर ही लोटते। यह कार्य इतना अधिक दुष्‍कर था, सिरदर्द से भी अधिक कठिन, इसलिए मैं बस खामोश रहा करता था, इसके बारे में कुछ भी न कहा करता था। जब उन्‍होंने मेरी गोद में अपने प्राण त्‍यागे तब भी मेरे आंसू नहीं गि‍रे। मुझको भी संदेह हो गया कि शायद मेरे शरीर में अश्रु-ग्रंथियां नहीं है।
      लेकिन उस दिन पीपल के उस वृक्ष से विदा लेते समय मैं पहली और आखरी बार रोया। मेरे स्‍मृति कोष में यह बहुत प्रकाशमान अनुभूति बनी हुइ  है। और जब मैं रो रहा था तो यह बात मुझको नितांत रूप से सुनिश्चित थी कि वृक्ष की आंखों में भी आंसू अवश्‍य आए होंगे, हांलाकि मैं उस वृक्ष की आंखें देख नहीं पाया और मुझे आंसू भी दिखार्इ नहीं दिए। किंतु मैं अनुभव कर सका। जग मैंने वृक्ष को स्‍पर्श किया तो मुझे उसकी उदासी अनुभव हुई, और मैं उसका आशीष, अलविदा अनुभव कर पाया। और निश्चित रूप से यह मेरा उसके साथ अंतिम भेंट थी, क्‍योंकि एक वर्ष बाद जब‍ मैं वापस लौटा तो किसी मूर्खतापूर्ण कारण से यह वृक्ष काट डाला गया था और उसे हटा दिया गया था।
       यह मूर्खतापूर्ण कारण यह था कि वे एक छोटा स्‍मृति स्‍तंभ बना रहे थे, और नगर के मध्‍य में वह सर्वाधिक सुंदर स्‍थान था। यह स्‍मारक उस मूढ़ के लिए था जिसके पास चुनाव जीत सकने और नगरपालिका का आध्‍यक्ष बनने के लिए पर्याप्‍त धन था। वह कम से कम पैंतीस वर्षो से उस नगर में नगरपालिका का अध्यक्ष‍ पद पर सबसे लंबे समय तक रहने बाला व्‍यक्ति था1 उसकी अध्‍यक्षता से प्रत्‍येक व्‍यक्ति प्रसन्‍न था, क्‍योंकि वह बहुत मूर्ख था, तुम कुछ भी कर डाला और वह कोर्इ रूकावट उत्‍पन्‍न नहीं करता था।
      तुम सड़क के ठीक मध्‍य में अपना मकान बना सकते थे। और वह कोर्इ चिंता नहीं करता था। तुम्‍हें बस उसको बोट देना पड़ेगा। इस लिए पूरा नगर उससे प्रसन्‍न था, क्‍योंकि प्रत्‍येक व्यिक्त को पूरी तरह स्‍वतंत्रता थी। नगर समिति, सभासद, क्‍लर्क और हेड़कलर्क वे सभी उससे प्रसन्‍न थे। प्रत्‍येक व्‍यक्ति यही चाहता था कि सदा कि लिए वही अध्‍यक्ष बना रहे। लेकिन सौभाग्‍य से मूढ़ों को भी मरना पड़ता है। किंतु उसकी मृत्‍यु एक दुर्भाग्‍य थी, क्‍योंकि उन्‍होंने उसके लिए स्‍मारक बनाने के लिए एक स्‍थान की तलाश की और उन लोगों ने वह पीपल का वृक्ष काट डाला। अब एक जीवित पीपल के वृक्ष के स्‍थान पर संगमरमर के पत्‍थर का स्‍तंभ वहां खड़ा है।
      मैं बातों को भूलता नहीं हूं, लेकिन कहे जाने के लिए बहुत बातें हे। और भाषा एक आयामी है, रेखीय है—तुम केवल एक रेखा, एक आयाम में जा सकते हो—और अनुभव बहुआयामी होता है, यह हजारों रेखाओं में गति करता है। तथाकथित वक्‍ताओं के साथ समस्‍या होती है। कि क्‍या कहा जाए। मेरी समस्‍या है कि क्‍या न कहा जाए, क्‍योंकि कहे जाने के लिए बहुत कुछ है जो प्र‍तीक्षा कर रहा है, हर और से द्वार खटखटा रहा है और कह रहा है, ‘मुझे भीतर आने दो।’ इसलिए मैं बहक जाता हूं....लेकिन स्‍मरण कराने में शर्माओ मत।
--ओशो

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