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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

छ: लेश्‍याएं—ओर मनुष्‍य के चित के प्रकार(भाग-1)


कृष्‍ण, नील, कापोत—ये तीन अधर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव दुर्गति में उत्‍पन्‍न होता है।
तेज पद्म और शुक्‍ल—ये तीन धर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव सदगति में उत्‍पन्‍न होता है।

कृष्‍ण लेश्‍या
      तो पहले समझें कि लेश्‍या क्‍या है? ऐसा समझें कि सागर शांत है। कोई लहर नहीं है, फिर हवा का एक झोंका आजा है, लहरें उठनी शुरू हो जाती है, तरंगें उठती है। सागर डांवांडोल
हो जाता है, छाती अस्‍त वस्‍त हो जाती है। सब अराजक हो जाता है। उन लहरों का नाम लेश्‍या है। तो लेश्‍या का अर्थ हुआ चित की वृतियां।
      जिसको पतंजलि ने चित-वृति कहा है। उसको महावीर ‘’लेश्‍या’’ कहा हे। चित की वृतियां चित के विचार, वासनायें, कामनायें लोभ, अपेक्षायें, ये सब लेश्‍यायें है।
      कृष्‍ण लेश्‍या का आदमी अपनी आँख फोड़ सकता है,अगर दूसरे की फूटती हों। अपने लाभ का कोई सवाल नहीं है, दूसरे की हानि ही जीवन का लक्ष्‍य है। ऐसे व्‍यक्‍ति के आस-पास काल वर्तुल होगा।
      महावीर कहते है, यह निम्‍नतम दशा है, जहां दूसरे का दुःख ही एकमात्र सुख मालूम पड़ता है। ऐसा आदमी सुखी हो नहीं सकता। सिर्फ वहम में जीता है। क्‍योंकि हमें मिलता वही है जो हम दूसरों को देते है—वही लौट कर आता है। जगत एक प्रतिध्‍वनि है।
      इसलिए हमने यम को , मृत्‍यु को काले रंग में चित्रित किया है; क्‍योंकि उसका कुल रस इतना है कि कब आप मरे, कब आपको ले जाया जाये। आपकी मृत्‍यु ही उसके जीवन का आधार है, इसलिए काले रंग में हमने यम को पोता है। आपकी मृत्‍यु उसके जीवन का आधार है—कुल काम इतना है कि आप कब मरे, प्रतीक्षा इतनी सी है।
      यह जो काला रंग है, इसकी कुछ ख़ूबियाँ, वैज्ञानिक ख़ूबियाँ समझ लेनी जरूरी है। काला रंग गहन भोग का प्रतीक है। काले रंग को वैज्ञानिक अर्थ होता है जब सूर्य की किरण आप तक आती है, तो उसमें सभी रंग होते है। इसलिए सूर्य की किरण सफेद है, शुभ्र है। सफेद सभी रंगों का जोड़ है, एक अर्थ में अगर आपकी आँख पर सभी रंग एक साथ पड़ें तो सफेद बन जायेंगे। छोटे बच्‍चों को स्‍कूल में एक रंगों का वर्तुल दे दिया जाता है। जब उस वर्तुल को जोर से घुमाया जाता है, तो सभी रंग गड्ड-मड्ड हो जाते है। और सफेद बन जाता है।
      सफेद सभी रंग का जोड़ है। जीवन समग्र स्‍वीकार सफेद में है, कुछ अस्‍वीकार नहीं है, कुछ निषध नहीं है, काला सभी रंगों का आभाव है, वहां कोई रंग नहीं है। जीवन में रंग होते है, मौत में कोई रंग नहीं....वहां कोई रंग नहीं है। मौत रंग विहीन है।
      काले रंग का अर्थ है...दूःख का रंग, ध्‍यान रहे, रंग आपको दिखाई पड़ते है उन किरणों से जो आपकी आंखों तक आती है। अगर आपको लाल साड़ी दिखाई पड़ रही है, तो उसका मतलब है कि उस कपड़े से लाल किरण वापस आ रही है। एक अर्थ में काला रंग सभी रंगों का अभाव है।
      इसी लिए महावीर ने सफेद को त्‍याग का प्रतीक कहा है और काले को भोग का प्रतीक कहा है। उसने सभी पी लिया, कूद भी छोड़ा नहीं—सभी किरणों को पी  गया। तो जितना भोगी आदमी होगा, उतनी कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा हुआ होगा। जितना त्‍यागी व्‍यक्‍ति होगा, उतना ही कृष्‍ण लेश्‍या से दूर उठने लगेगा।
      दान और त्‍याग की इतनी महिमा लेश्‍याओं को बदलने का एक प्रयोग है। जब आप कुछ देते है किसी को, आपकी लेश्‍या तत्क्षण बदलती है, लेकिन जैसा मैंने कहा कि अगर आप व्‍यर्थ चीज देते है तो लेश्‍या नहीं बदल सकती। कुछ सार्थक,जो प्रतिकर हे, जो आपके हित का था और काम का था। और दूसरे के भी काम पड़ेगा—जब भी आप ऐसा कुछ देते है। आपकी लेश्‍या तत्‍क्षण परिवर्तित होती है। क्‍योंकि आप शुभ्र की तरफ बढ़ रहे है, कुछ छोड़ रहे है।
      महावीर ने अंत में वस्‍त्र भी छोड़ दिये,सब छोड़ दिया। उस सब छोड़ने का केवल इतना अर्थ है कि कोई पकड़ न रही। और जब कोई पकड़ नहीं रहती तो स्‍वेत, शुक्‍ल लेश्‍या का जन्‍म होता है।
      काली लेश्‍या। ये सधनतम लेश्‍या है। काली निम्नतम स्‍थिति है।
      महावीर ने रंग के आधार पर विश्लेष ण किया है, शायद वहीं एकमात्र रास्‍ता हो सकता है। जब भी चित में कोई वृति होती है तो उसके चेहरे के आस पास उसके रंग की आभा आ जाती है। आपको दिखाई नहीं पड़ती। छोटे बच्‍चों को ज्‍यादा प्रतीत होती है। आपको भी दिखाई पड़ सकती है। अगर आप थोड़े सरल हो जायें। जब कोई व्‍यक्‍ति सच में साधु चित हो जाता है, तो वह आपकी आभा से ही आपको नापता है; आप क्‍या कहते है, उससे नहीं, वह आपको नहीं देखता, आपकी आभा को देखता है।
      अब एक आदमी आ रहा है। उसके आस-पास कृष्‍ण लेश्‍या की आभा है, काला रूप है चारों तरफ; उसके चेहरे के आस-पास एक पर्त है काली तो वह कितनी ही शुभ्रता की बातें करे, वे व्‍यर्थ है, क्‍योंकि वह काली पर्त असली खबर दे रही है। अब तो सूक्ष्‍म कैमरे विकसित हो गये है। जिनसे उसका चित्र भी लिया जा सकता है। वह चित्र बातयेगा कि आपकी क्‍या भीतरी अवस्‍था चल रही है। और यह आभा प्रतिपल बदलती रहती है।
      महावीर, बुद्ध, कृष्‍ण और राम, क्राइस्‍ट के आस-पास सारी दूनिया के संतों के आस-पास हमने उनके चेहरे के प्रभा मंडल बनाया है। हमारे कितने ही भेद हो—ईसाई में,मुसलमान में, हिन्दू में,जैन में बौद्ध में—एक मामले में हमारा भेद नहीं है कि इन सभी ने जाग्रत महापुरुषों के चेहरों के आस पास प्रभा मंडल बनाया है। वह प्रभा-मंडल शुभ्र आभा प्रगट करता है।
      हमारे चेहरे के आस पास सामान्‍यतया काली आभा होती है। और या फिर बीच की आभायें होती है। प्रत्‍येक आभा भीतर की अवस्‍था की खबर देती है। अगर आपके आस पास काली आभा मंडल है, आरा है, तो आपके भीतर भंयकर हिंसा, क्रोध, भंयकर कामवासना होगी। आप उस अवस्‍था में होंगे, जहां आपको खुद भी नुकसान हो तो कोई हर्ज नहीं दूसरे को नुकसान हो तो आपको आनंद मिलेगा।
      आप जैसे कपड़े पहनते हे, वे भी आपके चित की लेश्‍या की खबर देते है। ढीले कपड़—कामुक आदमी एक तरह के कपड़े पहनेगा। कामवासना से हटा हुआ आदमी दूसरी तरह के कपड़े पहने गा। रंग बदल जायेंगे,कपड़े के ढंग बदल जायेंगे। कामुक आदमी चुस्‍त कपड़े पहनेगा। गैर-कामुक आदमी ढीले कपडे पहनने शुरू कर देगा। क्‍योंकि चुस्‍त कपड़ा शरीर को वासना देता है, हिंसा देता है।
      सैनिक को हम ढीले कपड़े नहीं पहना सकते। ढीले कपडे पहनकर सैनिक लड़ने जायेगा तो हारकर वापस लौटेगा। साधु को चुस्‍त कपड़े पहनाना बिलकुल नासमझी की बात है। क्‍योंकि चुस्‍त कपड़े का काम नहीं साधु के लिए। इसलिए साधु निरंतर ढीले कपड़े चूनेगा। जो शरीर को छूते भर रहे, बाँधते नहीं रहे।
      आपको पता है छोटी-छोटी बातें आपके जीवन को संचालित करती है; क्‍योंकि चित क्षुद्र चीजों से ही बना हुआ है। अगर आप चुस्‍त कपड़े पहने हुए हे तो आप दो-दो सीढ़ियां चढ़ने लगते है। एक साथ। अगर आप ढीले कपड़े पहने हुए है तो आपकी चाल शारी होती है। एक सीढ़ी भी आप मुश्‍किल से चढ़ते है। चुस्‍त कपड़े पहन कर आप में गति आ जाती है।
      जब आप रंग चुनते है, वह भी खबर देता है आपके चित की। क्‍योंकि चुनाव अकारण नहीं है। चित चुन रहा है।
      रंग चुनने का कारण यह है कि जब आपके चित में एक वृति होती है तो आपके चेहरे के आसपास एक आरा एक प्रभा मंडल निर्मित होता है। इस प्रभा मंडल के चित्रों से ये भी पता लगाया जा सकता है, आपके भीतर अब क्‍या चल रहा है। कारण क्‍या है, क्‍योंकि आपका पूरा शरीर विद्युत का एक प्रवाह है। आपको शायद ख्‍याल न हो कि पूरा शरीर वैद्युतिक यंत्र है। तो ध्‍यान रहे, जो अपराधी इतने अदालत-कानून के बाद भी अपराध करते है, उनके पास निश्‍चित ही कृष्‍ण लेश्‍या पाई जायेगी। और आप अगर डरते है अपराध करने से कि नुकसान न पहुंच जाए। और आप देख लेते है कि पुलिसवाला रास्‍ते पर खड़ा है, तो रूक जाते है लाल लाइट देखकर। कोई पुलिसवाला नहीं है—नीली लेश्‍या—कोई डर नहीं है, कोई नुकसान हो नहीं सकता है। कृष्ण लेश्या का आदमी है उसको कोई दंड नहीं रोक सकता, पाप से क्‍योंकि होगा इसकी उसे जरा भी फिक्र नहीं होती। वह खोया है अंधेरी घाटियों में। दूसरों को क्‍या होता है, उसको इससे कुछ लेना देना नहीं है, उसे रस है तो दूसरों को केवल नुकसान पहुंचाने मात्र से है।
कृष्‍ण लेश्‍या ये पहली लेश्‍या है, दूसरी लेश्‍या–नील लेश्‍या...क्रमश अगले लेख में..........
ओशो
महावीर वाणी भाग:2,
प्रवचन—चौदहवां, दिनांक 29 अगस्‍त,1973,
पाटकर हाल, बम्‍बई