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गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

नेता जी और सर्कस—


एक राजनेता चुनाव में हार गये। राजनेता थे, और कुछ जानते भी नहीं थे। ने पढ़े-लिखे थे, एक दम से अंगूठा छाप थे। राजनेता होने के लिए अंगूठा छाप होना एक योग्‍यता है। सब तरह से अयोग्‍य होना योग्‍यता है। चुनाव क्‍या हार गए। बड़ी मुश्‍किल में पड़ गये। कोई नौकरी तो मिल नहीं सकती थी, कहीं चपरासी की भी नौकरी नहीं मिली। नेताजी परेशान बाकें हाल, बिना काम के घर में कौन घुसने दे। सब अमचे चमचे भी साथ छोड़ गये।
      अचानक नेता का भाग्‍य खुला और सर्कस गांव में आ गया। सो सर्कस के मैनेजर से कहा कि भइया, कोई काम पर लगा दो। अरे घोड़े को नहलाता रहूंगा। गधे को नहलाता रहूंगा, यूं भी जिंदगी भी घोड़ों और गधों के बीच ही बीती है। कोई भी काम कर सकता हूं। कोई भी काम कर सकता हूं। प्रमाण के लिए इतना काफी है कि दस साल तक संसद का सदस्‍य रहा हूं। अब इससे बुरा और क्‍या काम होगा। तुम जो कहो करूंगा; गोबर, लीद,जो भी कहां सब सफाई कर दूँगा।
      मैनेजर ने कहा कि भई, गोबर-लीद वगैरह की सफाई करने वाले आदमी तो है; एक काम   है अगर कर सको तो, लेकिन अंदर से मैनेजर डर भी रहा था। कि भला संसद सदस्‍य कहीं नाराज न हो जाये।
      राजनेता की बाँछें खिल गई, तुम बोलों और हुआ,कहां क्‍या काम?
      सर्कस का मैनेजर थोड़ा झिझका, फिर उसने कहा( अब आप मानते नहीं तो बताए देता हूं। कि हमारा जो सिंह था वह मर गया है। उसकी खाल हमने निकाल कर रख ली है। उसके भीतर आप घुस जाओ। बस आप टहलते रहना। चारों तरफ खींखचे लगे है। आप बस टहलते रहना। और ये टेप रिकार्डर साथ रखो। अंदर । इसमें आवाज भरी हुई है सिंह कि, तो बीच-बीच में दहाड़ लगा देना। बस टेप रिकार्डर का बटन दबा देना है। दहाड़ निकल जायेगी। जनता आनंदित हो जायेगी। बस आपका कुल इतना काम है।
      राजनेता ने कहा, इसमें क्‍या दिक्‍कत है। अरे यही तो जीवन भर हम करते रहे है। तरह-तरह की खालें ओढ़ी,क्‍या-क्‍या नाटक नहीं किए। कैसी-कैसी नौटंकी नहीं रची। और हम क्‍या बोलते थे। अरे टेप रिकार्डर बोलता था। सैक्रेटरी तैयार करता था। हम भाषण के नाम पर होठ हिला देते थे। यह चलेगा,यह काम तो हमारा अभ्‍यास का है। यह तो बिलकुल ठीक है। योग्‍य हमारे काम मिल गया। भगवान ने देखा कैसी सूनी।
      नेता बड़े खुश हुए। घुस गए सिंह की खाल में। आनंद भी बहुत आया। बार-बार बटन दबाएँ और सिंह की  गर्जना करें। बच्‍चें एकदम से रोने लगें, स्‍त्रीयां बेहोश हो गई, पुरूषों की भी छाती दहल रही थी। नेता को बड़ा आनंद आ रहा था। आनंद ही यह है राजनीति का। और क्‍या आनंद है, कि लोगों की छाती दहल जाए।     
      लेकिन तब देख कि कठधरे का दरवाजा खुला अरे एक दूसरा सिंह भीतर घूस आया। उसको देखते से ही नेता भूल गए, चौकड़ी भूल गए, एक दम दो पैर पर खड़े हो गये। और लगे चिल्‍लाने—अरे बचाओ, मार डाल, अरे बचाओ मारे गए। बचाओ, मुझे नहीं यह काम करना, कोई मुझे बहार निकालों। लोग तो और अधिक डर गये अरे ये किस तरह का सिंह है, जो खड़ा भी और रहा है दो टांगों पर और बचाओ-बचाओ भी बोल रहा है।
      तभी अचानक दूसरे शेर ने उसके पास जाकर जोर से कहां चुप हो जा, बदतमीज, क्‍यों अपनी और मेरे पेट पर लाट मार रहा है। अब यहां जनता भी बैठी है अगर उन्‍होंने हमें देख लिया तो वो धुनाई होगी की रामनाम सत्‍य हो जायेगा। और तू क्‍या सोचता है तू ही चुनाव हारा है, हम भी तो चुनाव हारे है।
--ओशो
आपुई गई हिराय,
प्रवचन—4,
ओशो आश्रम, पूना,