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सोमवार, 13 दिसंबर 2010

स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस और मां शारद


      राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे। और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे। रामकृष्‍ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झाल के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा। सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे है। वर्षा के दिन करीब आ रहे है। काली बदलियां भी छा गई है। घनघोर, जल्‍दी रामकृष्‍ण लोट रहे है। तभी बगुलों की एक पंक्‍ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्‍ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्‍ण वहीं गर पड़े। घर उन्‍हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्‍ती। बामुशिकल से वे होश में लाए जा सके।
      उनसे पूछा, क्‍या हुआ?
      उन्‍होंने कहा, अद्भुत हुआ, बड़ा आनंद हुआ। बार-बार ऐसा ही होना चाहिए। अब मुझे होश में रहने की—जिसको तुम होश कहते हो—उसमें रहने की कोई इच्‍छा नहीं है।
      गांव के लोगों ने, घर के लोगों ने सोचा कि लड़का बिगड़ा जा रहा है। यह तो मामला खराब है। यह ऐसे भी साधु-संग करता था। जाता था सुनने सत्‍संग। तब तक भी ठीक था; अब यह समाधि में भी जाने लगा। अब यह बेहोश हो-हो कर गिरने लगा। यह मामला बिगड़ा जा रहा है। यह हाथ से गया। गदाधर उनका नाम था। जो घर के लोगों का आम सोचने का ढंग होता है, उन्‍होंने कहा, जल्‍दी से इसके विवाह वगैरह का इंतजाम करो, हथकड़ी-बेड़ी डाल दो, तो यह रास्‍ते पर आ जाएगा। सो रामकृष्‍ण से पूछा कि बेटा, विवाह करोगे?
       राम कृष्‍ण ने कहा,करेंगे।
      घर के लोग थोड़े चौके, उन्‍होंने सोचा था यह इनकार करेगा।
      उन्‍होंने कहा जरूर करेंगे, किससे करना है?
      घर के लोगों ने कहा, अरे, हम तो सोचते थे तू सत्‍संगी हो गया है, समाधि लगने लगी है, और गांव में बड़ी चर्चा है कि तू ज्ञानी हो गया है। इस लिए तो हम तेरा विवाह कर रहे थे। और तू है कि कहता है करेंगे, किससे करना है? तू इतनी जल्‍दी में है।
      पास में ही गांव में एक लड़की खोजी गई। रामकृष्‍ण को दिखाने ले गए। रामकृष्‍ण को जब लड़की मिठाई परोसने आई। बंगाल, तो वहां संदेश परोसा होगा। जब संदेश उसने रामकृष्‍ण की थाली में रखे, रामकृष्‍ण ने देखा। शारदा उसका नाम था। खीसे में जितने मां ने रूपये रख दिए थे। सब निकाल कर उसके पैरों पर चढ़ा दिए, और कहा कि तू तो मेरी मां है। शादी हो गई।
      लोगों ने कहा, तू पागल है रे; पहले तो शादी करने की इतनी जल्‍दी कि और अब पत्‍नी को मां कह रहा है। कुछ अक्ल है तुझे, यो बौरा गया है। बेअक्‍ल हो गया है।
      मगर उसने कहा कि यह तो मेरी मां है, शादी होगी, मगर यह मेरी मां ही रहेगी।
      शादी भी हो गई। शादी से इंकार भी नहीं किया। इसको मैं खूबी कहता हूं। रामकृष्‍ण की। इसलिए रामकृष्‍ण से मुझे प्रेम है। एक लगाव है। यह आदमी अदभुत है। शादी करने में इनकार ही नहीं किया। नोट देख कर आंखे बंध करने वाले विनोबा जी नहीं है। अरे शादी से भी नहीं भागा। मगर शादी भी किस मस्‍ती से की। कहा कि मेरी मां है। और फिर जीवन भर मां ही माना। मां ही कहते थे वे शारदा को। और हर वर्ष जब बंगाल में काली की पूजा होती, तो वे काली की पूजा तो करते थे, मगर जब काली की पूजा का दिन आता है, उस दिन वे शारदा की पूजा करते थे। और यूं नहीं,तुम चोंकोगे, शारदा को नग्‍न बिठा लेते थे सिंहासन पर। नग्‍न शारदा
की पूजा करते थे। शारदा को नग्‍न बिठा लेते सिंहासन पर। और फिर चिल्‍लाते, रोते, नाचते, मां और मां की गुहार लगाते। शारदा पहले तो बहुत बेचैन होती थी कि किसी को पता न चल जाए, कि यह तुम क्‍या कर रहे हो। कोई क्‍या कहेगा; मगर धीरे-धीरे शारदा के जीवन में भी रामकृष्‍ण ने क्रांति ला दी।
      रामकृष्‍ण उन सौ में से एक व्‍यक्‍तियों में से है। उन्‍होंने पत्‍नी को छोड़ा नहीं, हालांकि वह कहते यही है; कामिनी-कांचन से मुक्‍त हो जाओ। पुरानी भाषा, वे करें क्‍या--अतिक्रमण किया। नई भाषा का उन्‍हें पता नहीं था।
      मैं कहूंगा: कामिनी-कांचन से मुक्‍त होने का सवाल नहीं है, कामिनी-कांचन को अतिक्रमण करना है। रामकृष्‍ण ने वही किया—अतिक्रमण किया। मगर उनको इस भाषा का साफ-साफ भेद नहीं था। वे बोलते रहे पुराना ढंग, पुरानी शैली।
      मगर रामकृष्‍ण जैसे सभी लोग नहीं है। निन्यानवे ज्ञानी तो, सुलोचना, अज्ञानी है, महाअज्ञानी है। वि सिर्फ बकवास कर रहे है। वह अपने भय का सिर्फ निवेदन कर रहे है। वे दो चीजों से डरे है: क्‍योंकि स्‍त्री में सुख की आशा मालूम पड़ती है। और धन से डरे है। बस दोनों को गालियां दे रहे है। उनकी गालियां सबूत है कि उनके भीतर रस मोजूदा है।
      पर रामकृष्‍ण इस के पास चले गये थे। इस पुराने ढंग के। अब वक्‍त आ गया है कि यह पुराना ढर्रा बंद होना चाहिए। इसलिए मैं धर्म को नई भाषा देने की कोशिश कर रहा हूं। स्‍वभावत: मुझे गालियां पड़ेगी। क्‍योंकि वे निन्यानवे लोग मेरी भाषा की बदलाहट से स्‍वभावत: नाराज होने वाले है। उनके तो हाथ से धंधा गया। उनकी तो मैं जमीन खींचे ले रहा हूं। हां, सौ में से वह जो एक व्‍यक्‍ति है, वह मेरे साथ राज़ी होगा। रामकृष्‍ण जैसा व्‍यक्‍ति मेरे साथ राज़ी होगा। रामकृष्‍ण मुझे मिल जाएं तो मैं उनकी भाषा बदल दूँ। वे मुझसे राज़ी हो जाएंगे। वे कहेंगे, अरे यही मैं कहना चाहता था। मगर मुझे कहने का पता नहीं था। मुझे जो पता था, वैसा मैंने कह दिया था। सच मैं तो यही कहना चाहता था,तुमने तो मेरे मुहँ की बात छिन ली। और वो प्रसन्‍न होंगे, और नाच उठेंगे।
      जीसस मुझे मिल जाएं मुझसे राज़ी होंगे। बुद्ध मुझे मिल जाएं,मुझसे राज़ी होंगे। लेकिन जिन बुद्धूओं को तुम ज्ञानी समझ रही हो वे मुझसे राज़ी नहीं हो सकते।

--ओशो
आपुई गई हिराय,
ओशो कम्‍यून इंटरनेशनल,
पूना