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रविवार, 14 अक्तूबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—75 (ओशो)

 जागते हुए सोते हुए, स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।
     पहले जागरण से शुरू करो। योग ओर तंत्र मनुष्‍य के मन के जीवन को तीन भागों में बाँटता है—स्‍मरण रहे, मन के जीवन को। वे मन को तीन भोगों में बांटते है: जाग्रत,सुषुप्‍ति और स्‍वप्‍न। ये तुम्‍हारी चेतना के नहीं, तुम्‍हारे में के भाग है।
      चेतना चौथी है—तुरीय।  पूर्व  मैं इसे कोई नाम नहीं दिया गया है। सिर्फ तुरीय या चतुर्थ कहा गया है। तीन के नाम है। वे बादल है जिनके नाम हो सकते है। कोई जागता हुआ बादल है, कोई सोया हुआ बादल है। और कोई स्‍वप्‍न देखता हुआ बादल है। और जिस आकाश में वह घूमते है, वह अनाम है, उसे मात्र तुरीय कहां जाता है।

      पश्‍चिम का मनोविज्ञान हाल में ही स्‍वप्‍न के आयाम से परिचित हुआ है। असल में फ्रायड के साथ स्‍वप्‍न महत्‍वपूर्ण हुआ। लेकिन हिंदुओं के लिए यह अत्‍यंत प्राचीन धारणा है। कि तुम तब तक किसी मनुष्‍य को सच में नहीं जान सकते जब तक तुम यह नहीं जानते कि वह अपने स्‍वप्‍नों में क्‍या करता है। क्‍योंकि वह जागते समय में जो भी करता है वह अभिनय  हो सकता है। झूठ हो सकता है। क्‍योंकि वह जागते समय में वह जो करता है बहुत मजबूरी में करता है। वह स्‍वतंत्र नहीं है; समाज है, नियम है, नैतिक व्‍यवस्‍था है। वह निरंतर अपनी कामनाओं के साथ संघर्ष करता है, उनका दमन करता है। उनमें हेर-फेर करता है। समाज के ढांचे के अनुरूप उन्‍हें बदलता है। और समाज तुम्‍हें कभी तुम्‍हारी समग्रता में स्‍वीकार नहीं करता है। वह चुनाव करता है, काट-छांट करता है।
      संस्‍कृति का यही अर्थ है; संस्‍कृति चुनाव है। प्रत्‍येक संस्‍कृति एक संस्‍कार है। कुछ चीजें स्‍वीकृत है और कुछ चीजें अस्‍वीकृत है। कहीं भी तुम्‍हारे समग्र अस्‍तित्‍व को, तुम्‍हारी निजता को स्‍वीकृति नहीं दी जाती है। कही भी नहीं। कहीं कुछ पहलू स्‍वीकृत है; कहीं कुछ और पहलू स्‍वीकृत है। कहीं भी समग्र मनुष्‍य नहीं है।
      तो जाग्रत अवस्‍था में तुम झूठे, नकली कृत्रिम और दमित होने के लिए मजबूर हो। तुम जागते हुए  प्रामाणिक नहीं हो सकते, अभिनेता भर हो सकते हो। तुम सहज नहीं हो सकते। तुम अंत: प्ररेणा से नहीं चलते, बाहर से धकाए जाते हो।
      केवल अपने स्‍वप्‍नों में तुम प्रामाणिक हो सकते हो। तुम अपने स्‍वप्‍नों में जो चाहे कर सकते हो। उससे किसी को लेना-देना नहीं है। वहां तुम अकेले हो। तुम्‍हारे सिवाय कोई भी उसमें प्रवेश नहीं कर सकता है। कोई भी तुम्‍हारे स्‍वप्‍नों में नहीं झांक सकता है। और किसी को इसकी चिंता भी नहीं है। कि तुम अपने स्‍वप्‍नों में क्‍या करते हो। इससे किसी को क्‍या लेना-देना। सपने तुम्‍हारे बिलकुल निजी है। क्‍योंकि वे बिलकुल निजी है और उनका किसी से कोई लेना देना नहीं है। इसलिए तुम स्‍वतंत्र हो सकते हो।
      तो जब तक तुम्‍हारे सपनों को नहीं जाना जाता, तुम्‍हारे असली चेहरे से भी परिचित नहीं हुआ जा सकता हे। हिंदुओं को इसका बोध था। सपनों में प्रवेश करना अनिवार्य है। लेकिन सपने भी बादल ही है। यद्यपि ये बादल निजी है, कुछ स्‍वतंत्र है; फिर भी बादल ही तो है। उनके भी पार जाना है।
      ये तीन अवस्‍थाएं है: जाग्रत सुषुप्‍ति और स्‍वप्‍न। फ्रायड के साथ सपनों पर काम शुरू हुआ। अब सुषुप्‍ति पर, गहरी नींद पर काम होने लगा है। पश्‍चिम में अनेक प्रयोगशालाओं में यह जानने के लिए काम हो रहा है कि नींद क्‍या है। क्‍योंकि यह बहुत आश्‍चर्य की बात लगती है कि हमें यह भी नहीं पता कि नींद क्‍या है? कि नींद में क्‍या यथार्थत: घटित होता है। यह अभी वैज्ञानिक ढंग से नहीं जाना गया है।
      और अगर हम नींद को नहीं जान सकते तो मनुष्‍य को जानना बहुत कठिन होगा। क्‍योंकि मनुष्‍य अपने जिंदगी का एक तिहाई हिस्‍सा नींद से गुजारता है। जीवन का एक तिहाई हिस्‍सा, अगर तुम साठ साल जीने वाले हो तो बीस साल तुम सौकर गुज़ारते हो। इतना बड़ा हिस्‍सा है यह। जब तुम सोए हो तो तुम क्‍या कर रहे हो?
      जागरण की अवस्‍था में तुम समाज के साथ होते हो। स्‍वप्‍न के अवस्‍था में तुम अपनी कामनाओं के साथ होते हो। और गहरी नींद में तुम प्रकृति के साथ होते हो। प्रकृति के गहन गर्भ में होते हो। योग और तंत्र का कहना है कि इन तीनों के पार जाने पर ही तुम ब्रह्म में प्रवेश कर सकते हो। इन तीनों से गुजरना होगा। इनके पार जाना होगा, इनका अतिक्रमण करना होगा।
      एक फर्क है। अभी पश्‍चिम का मनोविज्ञान इन अवस्‍थाओं के अध्‍ययन में उत्‍सुक हो रहा है। पूर्व के साधक इन अवस्‍थाओं में उत्‍सुक थे। इनके अध्‍ययन में नहीं। वे इसमे उत्‍सुक थे कि कैसे इनका अतिक्रमण किया जाए। यह विधि अतिक्रमण की विधि है।
      जागते हुए, सोते हुए,स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।
      बहुत कठिन है। तुम जागरण से शुरू करना होगा। तुम स्‍वप्‍नों में कैसे स्‍मरण रख सकते हो? क्‍या तुम सचेतन रूप से कोई स्‍वप्‍न पैदा कर सकते हो? क्‍या तुम स्‍वप्‍न को व्‍यवस्‍था दे सकते हो। उसमें हेर-फेर कर सकते हो? आदमी कितना नापुंसग है। तुम अपने स्‍वप्‍न भी नहीं निर्मित कर सकते हो। वे भी अपने आप आते है; तुम बिलकुल असहाय हो।
      लेकिन कुछ विधियां है जिनके द्वारा स्‍वप्‍न निर्मित किए जा सकते है। और ये विधियां अतिक्रमण करने में बहुत सहयोगी है। क्‍योंकि अगर तुम स्‍वप्‍न निर्मित कर सकते हो तो तुम उसका अतिक्रमण भी कर सकते हो। लेकिन आरंभ तो जाग्रत अवस्‍था से ही करना होगा।
      जागते समय—चलते समय, खाते समय,काम करते समय। अपने को प्रकाश रूप में स्‍मरण रखो। मानो तुम्‍हारा ह्रदय में एक ज्‍योति जल रही है और तुम्‍हारा शरीर उस ज्‍योति का प्रभामंडल भर है। कल्‍पना करो कि तुम्‍हारे ह्रदय में एक लपट जल रही है। और तुम्‍हारा शरीर उस लपट के चारों और प्रभामंडल के अतिरिक्‍त कुछ नहीं है; तुम्‍हारा शरीर उस लपट के चारों और फैला प्रकाश है। इस कल्‍पना को, इस भाव को अपने मन ओर चेतना की गहराई में उतरने दो। इसे आत्‍मसात करो।
      थोड़ा समय लगेगा। लेकिन यदि तुम यह स्‍मरण करते रहे,कल्‍पना करते रहे,तो धीरे-धीरे तुम इसे पूरे दिन स्‍मरण रखने में समर्थ हो जाओगे। जागते हुए, सड़क पर चलते हुए,  तुम एक चलती फिरती ज्‍योति हो जाओगे। शुरू-शुरू में किसी दूसरे को इसका बोध नहीं होगा; लेकिन अगर तुमने यह स्‍मरण जारी रखा तो तीन महीनों में दूसरों को भी इसका बोध होने लगेगा।
      और जब दूसरों को आभास होने लगे तो तुम निश्‍चिंत हो  सकते हो। किसी से कहना नहीं है। सिर्फ ज्‍योति का भा करना है। और भाव करना है कि तुम्‍हारा शरीर उसके चारों और फैला प्रभामंडल है। यह स्‍थूल शरीर नहीं हे। विद्युत शरीर है। प्रकाश शरीर है। अगर तुम धैर्य पूर्वक लगे रहे तो तीन महीनों में, करीब-करीब तीन महीनों में दूसरों को बोध होने लगेगा। कि तुम्‍हें कुछ घटित हो रहा हे। वे तुम्‍हारे चारों और एक सूक्ष्म प्रकाश महसूस करेंगें। जब तुम निकट जाओगे,उन्‍हें एक तरह की अलग उष्‍मा महसूस होगी। तुम यदि उन्‍हें स्‍पर्श करोगे तो उन्‍हें उष्‍मा स्‍पर्श महसूस होगी। उन्‍हें पता चल जायेगा कि तुम्‍हें कुछ अद्भुत घटित हो रहा है। पर किसी से कहो मत और जब दूसरों को पता चलने लगे तो तुम आश्‍वस्‍त हो सकते हो। और तब तुम दूसरे चरण में प्रवेश कर सकते हो। उसके पहले नहीं।
      दूसरे चरण में इस विधि को स्‍वप्‍नावस्‍था में ले चलना है। अब तुम स्‍वप्‍न जगत में इसका प्रयोग शुरू कर सकते हो। यह अब यथार्थ है, अब यह कल्‍पना ही नहीं है। कल्‍पना के द्वारा तुम ने सत्‍य को उघाड़ लिया है। यह सत्‍य है। सब कुछ प्रकाश से बना है। सब कुछ प्रकाश मय है। तुम प्रकाश हो; हालांकि तुम्‍हें इसका बोध नहीं है। क्‍योंकि पदार्थ का कण-कण प्रकाश है। वैज्ञानिक कहते है कि पदार्थ इलेक्ट्रॉन से बना हे। वह वही बात है। प्रकाश ही सब का स्‍त्रोत है। तुम भी घनीभूत प्रकाश हो। कल्‍पना के जरिए तुम सिर्फ सत्‍य को उघाड़ रहे हो। प्रकट कर रहे हो। इस सत्‍य को आत्‍मसात करो। और जब तुम उससे आपूर हो जाओ तो उसे दूसरे चरण में, स्‍वप्‍न में ले जा सकते हो। उसके पहले नही।
      तो नींद में उतरते हुए ज्‍योति को स्‍मरण करते रहो। देखते रहो, भाव करते रहो कि मैं प्रकाश हूं। और इसी स्‍मरण के साथ नींद में ओर उतर जाओ, और नींद में भी यही स्‍मरण जारी रहता है। आरंभ में कुछ ही स्‍वप्‍न ऐसे होंगे जिनमें तुम्‍हें भाव होगा कि तुम्‍हारे भीतर ज्‍योति है। कि तुम प्रकाश हो। पर धीरे-धीरे स्‍वप्‍न में भी तुम्‍हें यह भाव बना रहने लगेगा।
      और जब यह भाव स्‍वप्‍न में प्रवेश कर जाएगा। सपने विलीन होने लगेंगे। सपने खोने लगेंगे। सपने कम से कम होने लगेंगे। और गहरी नींद की मात्रा बढ़ने लगेगी। और जब तुम्‍हारी स्‍वप्‍नावस्‍था में यह सत्‍य प्रकट हो कि तुम प्रकाश हो, ज्‍योति हो प्रज्‍वलित ज्‍योति हो, तब स्‍वप्‍न विदा हो जायेंगे।
      और जब स्‍वप्‍न विदा हो जाते है, तभी इस भाव को सुषुप्‍ति में गहन नींद में ल जाया जा सकता है। उसके पहले नहीं। अब तुम द्वार पर हो। जब सपने विदा हो गए है और तुम अपने को ज्‍योति की भांति स्‍मरण रखते हो तो तुम नींद के द्वार पर हो। अब तुम इस भा के साथ नींद में प्रवेश कर सकते हो। और यदि तुम एक बार नींद में इस भाव के साथ उतर गये। कि मैं ज्‍योति हूं। तो तुम्‍हें नींद में भी बोध बना रहेगा। और अब नींद केवल तुम्‍हारे शरीर को घटित होगी। तुम्‍हें नहीं।
      कृष्‍ण गीता में यही कहते है कि योगी कभी नहीं सोते; जब दूसरे सोते है तब भी वे जागते है। ऐसा नहीं है कि उनके शरीर को नींद नही आती। उनके शरीर तो सोते है। लेकिन शरीर ही। शरीर को विश्राम की जरूरत है। चेतना को विश्राम की कोई जरूरत नहीं है। क्‍योंकि शरीर यंत्र है। चेतना यंत्र नहीं है। शरीर को ईंधन चाहिए। उसे विश्राम चाहिए। यही कारण है। कि शरीर जन्‍म लेता है, युवा होता है, वृद्ध होता है। और मर जाता है। चेतना न कभी जन्‍म लेती है, न कभी बूढी होती है,और न कभी मरती है। उसे न ईंधन की जरूरत है और न विश्राम की। यह शुद्ध ऊर्जा है; नित्‍य-शाश्‍वत ऊर्जा।
      अगर तुम इस ज्‍योति के, प्रकाश के बिंब को नींद के भीतर ले जा सके तो तुम फिर कभी नहीं सोओगे। सिर्फ तुम्‍हारा शरीर विश्राम करेगा। और जब शरीर सोया है तो तुम यह जानते रहोगे। और जैसे ही यह घटित होता है—तुम तुरीय हो, चतुर्थ हो। स्‍वप्‍न ओ सुषुप्‍ति मन के अंश है। वे अंश है और तुम तुरीय हो गय हो। चतुर्थ हो गए हो। तुरीय वह है जो उनमें से गुजरता है, लेकिन उनमें से कोई भी नहीं।
      वस्‍तुत: यह बिलकुल सरल है। अगर तुम जाग्रत हो ओर फिर तुम स्‍वप्‍न देखने लगते हो तो तुम दोनों नहीं हो सकते। अगर तुम जाग्रति हो तो तुम स्‍वप्‍न नहीं देख सकते। और अगर तुम स्‍वप्‍न हो तो तुम सुषुप्ति में कैसे उतर सकते हो, जहां कोई सपने नहीं होते?
      तुम एक यात्रा हो और ये अवस्‍थाएं पड़ाव है—तभी तुम यहां से वहां जा सकते हो। और फिर वापस आ सकते हो। सुबह तुम फिर जाग्रत अवस्‍था में वापस आ जाओगे। ये अवस्‍थाएं है; और जब इन अवस्‍थाओं से गुजरता है वह तुम हो। लेकिन वह तुम चतुर्थ हो। और इसी चतुर्थ को आत्‍मा कहते है। इसी चतुर्थ को भगवता कहते है; इसी चतुर्थ को अमृत तत्‍व कहते है, शाश्‍वत जीवन कहते है।
      जागते हुए,सोते हुए,स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।
      यह बहुत सुंदर विधि है। लेकिन जाग्रत अवस्‍था से आरंभ करो। और स्‍मरण रहे कि जब दूसरों को इसका बोध होने लगे तभी तुम सफल हुए। उन्‍हें बोध होगा। और तब तुम स्‍वप्‍न में और फिर निद्रा में प्रवेश कर सकते हो। और अंत में तुम उसके प्रति जागोगे जो तुम हो—तुरीय।
ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र, भाग-चार
प्रवचन-49