अग्नि
संबंधि दूसरी
विधि:
‘यह
काल्पनिक
जगत जलकर राख
हो रहा है, यह
भाव करो;
और मनुष्य से
श्रेष्ठतर
प्राणी बनो।’
और सूत्र
कहता है कि यह
जगत काल्पनिक
है; वह है, क्योंकि
तुमने उसे
माना हुआ है।
और यह सारा
जगत जल रहा है,
विलीन हो रहा
है।
लेकिन अगर
तुम्हें लगे
कि पहली विधि
कठिन है तो तुम
दूसरी विधि से
भी आरंभ कर
सकते हो। पर
पहली को साध
लने से दूसरी
बहुत आसान हो
जाती है। और
असल में अगर
कोई पहली विधि
को साध लेने
से दूसरी विधि
की जरूरत ही
नहीं रहती।
तुम्हारे
शरीर के साथ
सब कुछ अपने
आप ही विलीन
हो जाता है।
लेकिन यदि
पहली विधि कठिन
लगे तो तुम
दूसरी विधि
में सीधे भी
उतर सकते हो।
मैंने कहा
कि अँगूठों से
आरंभ करो, क्योंकि
वे सिर से,
अहंकार से
बहुत दूर है।
लेकिन हो सकता
है कि तुम्हें
अँगूठों से
आरंभ करने की
बात भी न जमे।
तो और दूर
निकल जाओ—संसार
से शुरू करो।
और तब अपनी
तरफ आओ; संसार से
शुरू करो। और
अपने निकट आओ।
और जब सारा
जगत जल रहा हो
तो तुम्हारे
लिए उस पूरे
जलते जगत में
जलना आसान
होगा।
दूसरी
विधि: ‘यह
काल्पनिक
जगत जलकर राख
हो रहा है। यह
भाव करो;और मनुष्य
से श्रेष्ठतर
प्राणी बनो।’
अगर तुम
सारे संसार को
जलता हुआ देख
सके तो तुम
मनुष्य के
ऊपर उठ गए,
तुम अतिमान हो
गए। तब तुम अति
मानवीय चेतना
को जान गए।
तुम यह कल्पना
कर सकते हो;
लेकिन कल्पना
का प्रशिक्षण
जरूरी है।
हमारी कल्पना
बहुत प्रगाढ़
नहीं है। यह
कमजोर है, क्योंकि
कल्पना के
प्रशिक्षण की
व्यवस्था
ही नहीं है।
बुद्धि
प्रशिक्षित
है; उसके लिए
विद्यालय है
और
महाविद्यालय
है। बुद्धि के
प्रशिक्षण
में जीवन का
बड़ा हिस्सा
खर्च हो जाता
है। लेकिन कल्पना
का कोई
प्रशिक्षण
नहीं होता है।
और कल्पना का
अपना ही जगत
है। बहुत
अद्भुत जगत है।
यदि तुम अपनी
कल्पना को
प्रशिक्षित
कर सको तो
चमत्कार
घटित हो सकते
है।
छोटी-छोटी
चीजों से शुरू
करो। क्योंकि
बड़ी चीजों
में कूदना
कठिन है। और
संभव है तुम्हें
उनमें असफलता
हाथ लगे।
उदाहरण के लिए, यह
कल्पना कि
सारा संसार जल
रहा है, जरा कठिन
है। यह भाव बहुत
गहरा नहीं जा
सकता है।
पहली बात
कि तुम जानते
हो कि यह कल्पना
है। और यदि
कल्पना में
तुम सोचो भी
कि चारों और
लपटें ही लपटें
है तो भी तुम्हें
लगेगा कि
संसार जला
नहीं है। वह
अभी भी है। क्योंकि
यह केवल तुम्हारी
कल्पना है।
और तुम
नहीं जानते हो
कि कल्पना
कैसे यर्थाथ
बनती है। तुम्हें
पहले उसे
महसूस करना
होगा।
इस विधि
में उतरने के
पहले एक सरल
प्रयोग करो।
अपने दोनों
हाथों को एक
दूसरे में गूँथ
लो, आंखें बंद
कर लो। और भाव
करो कि अब वे
ऐसे गूँथ गए
है कि खुल
नहीं सकते। और
उन्हें
खोलने के लिए
कुछ भी नहीं
किया जा सकता।
शुरू-शुरू
में तुम्हें
लगेगा कि तुम
केवल कल्पना
कर रहे हो। और
तुम उन्हें
खोल सकते हो।
लेकिन तुम सतत
दस मिनट तक
भाव करते रहो
कि मैं उन्हें
नहीं खोल
सकता। मैं उन्हें
खोलने के लिए
कुछ नहीं कर
सकता। मेरे
हाथ खुल ही
नहीं सकते। और
फिर दस मिनट
के बाद उन्हें
खोलने कि
कोशिश करो।
दस में से
चार व्यक्ति
तुरंत सफल हो
जाएंगे।
चालीस
प्रतिशत लोग तुरंत
कामयाब हो
जाएंगे—दस
मिनट के बाद
वे अपने हाथ
नहीं खोल
सकते। कल्पना
यथार्थ हो गई।
वे जितना ही
संघर्ष
करेंगे। वे
हाथ खोलने के
लिए जितनी
ताकत लगाएंगे
उतना ही हाथों
का खुलना कठिन
होता जाएगा।
तुम्हें
पसीना आने
लगेगा। तुम्हारे
ही हाथ है। और
तुम देख रहे
हो कि वे बंध
गए है और तुम
उन्हें नहीं
खोल सकत।
लेकिन
भयभीत मत होओ।
फिर आंखें बंद
कर लो और फिर
भाव करो कि
मैं उन्हें
खोल रहा हूं।
खोल सकता हूं।
और तुम उसे
खोल सकते हो।
चालीस
प्रतिशत लोग
तुरंत खोल
लेंगे।
ये चालीस
प्रतिशत लोग
इस विधि में
आसानी से उतर
सकते है। उनके
लिए कोई
कठिनाई नहीं
है। बाकी साठ
प्रतिशत के
लिए यह विधि
कठिन पड़ेगी;
उन्हें समय
लगेगा। जो लोग
बहुत भाव
प्रवण है वे कुछ
भी कल्पना कर
सकते है। और
वह घटित होगा।
और एक बार उन्हें
यह प्रतीति हो
जाए कि कल्पना
यथार्थ हो
सकती है। कि
भाव वास्तविक
बन सकता है।
तो उन्हें
आश्वासन मिल
गया। और वे
आगे बढ़ सकते
है। तब तुम अपने
भाव के द्वारा
बहुत कुछ कर
सकते हो।
तुम अभी भी
भाव से बहुत
कुछ करते हो,
लेकिन तुम्हें
पता नहीं
होता। तुम अभी
भी करते हो,
लेकिन तुम्हें
उसका बोध नहीं
है। शहर में
कोई नया रोग
फैलता है, फ्रैंच
फ्लू फैलता है, और
तुम उसके
शिकार हो जाते
हो। तुम कभी
सोच भी नहीं
सकते कि सौ
में से सत्तर
लोग सिर्फ कल्पना
के कारण बीमार
हो जाते है।
चूंकि शहर में
रोग फैला है।
तुम कल्पना
करने लगते हो
कि मैं भी
इसका शिकार
होने वाला हूं—और
तुम शिकार हो
जाओगे। तुम
सिर्फ अपनी
कल्पना से
अनेक रोग पकड़
लेते हो। तुम
सिर्फ अपनी
कल्पना से
अनेक समस्याएं
निर्मित कर
लेते हो।
तो तुम समस्याओं
को हल भी कर
सकते हो। यदि तुम्हें
पता हो कि तुमने
ही उन्हें निर्मित
किया है। अपनी
कल्पना को थोड़ा
बढ़ाओं और तब यह
विधि बहुत उपयोगी
होगी।
ओशो
विज्ञान
भैरव तंत्र,
भाग-चार
प्रवचन-53
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